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अबकी बार, शिखंडी सरकार! प्‍लेबॉय वाली यौन क्रांति से विश्‍वविद्यालय की हिंदू संस्‍कृति को प्रत्‍यक्षत: कोई खतरा नहीं

अभिषेक श्रीवास्तव

जिन्‍होंने सन् 96 के क्रैकडाउन को देखा-झेला है, वे जानते हैं कि उसमें और इस बार में दो बुनियादी अंतर हैं। उस वक्‍त लड़ाई छात्रों और प्रशासन के बीच थी। छात्र हनुमान की पूंछ बने हुए थे तो प्रशासन रावण। इस बार लड़ाई छात्राओं की है- विशुद्ध छात्राओं की मांगों पर, बिना किसी राजनीतिक दखल के और अनिवार्यत: कैंपस सुरक्षा से जुड़ी हुई। पांच दर्जन गाडि़यों का काफिला लेकर इनका संहार करने कौन आया है? हज़ारों की संख्‍या में शिखंडी।

होगा फिर वही- ये प्‍यादे हॉस्‍टलों में घुसेंगे, लड़के-लड़कियों को रात भर मारकर खदेड़ेंगे और सुबह तक महामना की बगिया को शांत करा देंगे।

पूछिए दूसरा अंतर क्‍या है?

अबकी बार कुलपति से लेकर, परिसर में रहने वाले स्‍वनामधन्‍य शिक्षकों से लेकर, हिंदी विभाग की छत से उत्‍तर-आधुनिकता के आकाश में स्‍त्रीवाद की पतंग उड़ाने वाले मास्‍टरों से लेकर बच्चियों के मां-बाप परिजन, मोहल्‍ले, समाज, बिरादरी और समुदाय से लेकर भोगी-योगी-रोगी तक सब के सब स्‍वेच्‍छया शिखंडी बन चुके हैं। बोले तो…

अबकी बार, शिखंडी सरकार!

इसमें कोई दो राय नहीं कि महामना मालवीय की बगिया मधुर मनोहर अतीव सुंदर है जहां हर किस्‍म के फूल खिलते रहे हैं, लेकिन इन सब का जेंडर एक होता है- पुरुष। इन सब की जाति भी एक होती है- द्विज।

बीएचयू का दोहरा सनातन रोग है जाति और पितृसत्‍ता।

जाति का रोग हमेशा ऊपर से साफ़ दिखता था। पितृसत्‍ता अपनी बर्बरता में कभी-कभी प्रकट होती थी, वरना सतह के नीचे वह शांत सोते की तरह बहती रहती थी जिससे उसका आरोप लगाना थोड़ा मुश्किल हो जाता था।

अभी जब मैंने Rangnath Singh का स्‍टेटस पढ़ा, तो दूसरा आयाम भी समझ में आया कि आखिर क्‍यों अपने जैसे कुछ अंतर्मुखी टाइप लड़कों को महिलाओं के हॉस्‍टल के सामने से मुंह छुपाकर निकलने की मजबूरी होती थी।

दरअसल, बीएचयू में मोटे तौर पर हिंदीपट्टी के खांटी पूर्वांचली लड़के पढ़ने-रहने आते हैं। जो थोड़ा शहरी एक्‍सपोज़र वाले होते हैं, कोएड में प्रशिक्षित, उनका व्‍यवहार लड़कियों के प्रति शुरुआत से दोस्‍ताना होता है वरना अधिकतर पुरबिया लहजे के ही होते हैं। ये लड़के लग्‍घी से पानी पीते-पिलाते हैं। लड़की सामने आती है तो भौंचक रह जाते हैं। लटपटाने लग जाते हैं। व्‍यवहार में यह विसंगति कोई भी रूप ले सकती है- अगर उसमें थोड़ा विवेक है तो लड़का सामने से सिर झुका कर निकल लेगा वरना ढेला उठाकर बालकनी में सूखते कपड़े पर मार देगा। बीएचयू में दशकों से अं‍तर्निहित जो सांस्‍कृतिक मूल्‍य पोषित किया गया है, वह ढेला मारने को प्रश्रय देता है।

इसका एक उदाहरण देता हूं। सैकड़ों ऐसे उदाहरण हैं, किताब बन जाएगी।

सन् 98-99 में एक रूसी चैनल आता था- टीबी6 या 7 जैसा कोई नाम था। रात दो बजे से उस पर प्‍लेबॉय नाम का कार्यक्रम चलता था। सारे हॉस्‍टलों में टीवी नहीं होता था, तो जेसी बोस के कॉमन हॉल में टीवी देखने के लिए आस पड़ोस के हॉस्‍टलों में रात एक बजे से हरकारा लगना शुरू हो जाता था। रात दो बजे के बाद जेसी बोस का कॉमन हॉल फुल होता। फुल का मतलब? पांच साल के मेसबॉय से लेकर साठ साल के महाराज तक पूरी रेंज, इसके अलावा बीएससी पार्ट 1, 2 और 3 तक सब छात्र। कुछ एमएससी के भी, अपना हॉस्‍टल होने के नाते।

प्‍लेबॉय रात दो बजे यौन क्रांति का सबब हुआ करता था जहां देवरिया के महाराजों और उनके पोतों से लेकर महाराष्‍ट्र के छात्रों तक समाजवाद की हवा चलती थी। भला हो सुषमा स्‍वराज का कि 1999 में एनडीए सरकार आने के बाद उन्‍होंने काफी बाद में इसे बैन करवा दिया।

महामना की बगिया रात को जवान होती थी। और यह बात मैं तब की कर रहा हूं जब लड़कों के हाथ में मोबाइल नहीं था, कमरे में लैपटॉप कनेक्‍शन नहीं और सर्फिंग का चार्ज लंका पर पचास रुपया घंटा होता था। सोचिए, कि आखिर ऐसी संस्‍कृति पर किसी ने कोई लगाम लगाने की कोशिश क्‍यों नहीं की? सिर्फ इसलिए क्‍योंकि इससे विश्‍वविद्यालय की हिंदू संस्‍कृति को प्रत्‍यक्षत: कोई खतरा नहीं दिखता था। आज जो सीधे सरेराह कपड़ों में हाथ डालने की आदिम हिमाकत हो रही है, उसी का विस्‍तार है। इसीलिए मैं बार-बार बरसों से कहता रहा हूं कि प्रॉब्‍लम कहीं और नहीं, काशी 'हिंदू' विश्‍वविद्यालय में है। पुरुष-सत्‍ता और सवर्ण सामंतवाद के घातक मिश्रण से बने इस 'हिंदू' को जब तक विखंडित नहीं करेंगे, महामना की बगिया ऐसे ही फलती-फूलती रहेगी।




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