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बिहार एपिसोड : जब धर्मनिरपेक्षता थी ही नहीं तो उसे खतरा कैसा

शाहनवाज आलम

नीतीश कुमार द्वारा बिहार में महागठबंधन के अपने सहयोगी राजद से सम्बंध तोड़ कर दूसरे ही दिन भाजपा के साथ गठबंधन करके सरकार बना लेने की घटना से भाजपा विरोधी विपक्षी मोर्चे की कलई खुल गई है। विपक्ष ने जहां इसे नीतीश का अवसरवाद बताया है तो वहीं नीतीश इसे भ्रष्ट लालू कुनबे से अपनी मुक्ति और अंतरआत्मा की आवाज पर उठाया गया कदम बताकर इस यू टर्न को जायज ठहराया।

यहां गौरतलब है कि इस पूरे प्रकरण में लालू के पुत्र और उपमुख्यमंत्री रहे तेजस्वी यादव पर अवैध सम्पत्ति अर्जित करने के मामले में सीबीआई जांच अहम कारक रहा जिस पर नीतीश कुमार ने कथित तौर पर आरोपों से घिरे मंत्री से किनारा कर अपनी कथित मिस्टर क्लीन की छवि को बचाने की कोषिष की है। लेकिन बिहार की राजनीति को करीब से समझने वाले लोग बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि यहां भ्रष्टाचार कभी भी राजनीतिक मुद्दा नहीं रहा है और पूरी राजनीति जातियों की अस्मितावादी गोलबंदी के इर्द-गिर्द घूमती रही है, जिसमें अब मुस्लिम विरोधी चेतना राजनीतिक गोलबंदी की नई धुरी है। ऐसे में यह समझना बहुत जरूरी हो जाता है कि बिहार में अचानक भ्रष्टाचार का इतना बड़ा मुद्दा कैसे बनना बताया जा रहा है जहां एक मंत्री पर महज एक एफआईआर के कारण महागठबंधन से नीतीश अलग हो गए और जनसंहारों से लेकर दंगों तक के आरोपी भाजपा नेता उन्हें भ्रष्टाचारियों का साथ छोड़ कर अपने साथ आने पर बधाई दे रहे हैं।

दरअसल, जो विपक्ष नीतीश को दो साल पहले मिले जनादेश को भाजपा की साम्प्रदायिकता के खिलाफ मिला जनादेश बताकर नीतीश पर अवसरवादी होने का आरोप लगा रहा है वह खुद इस जनादेश की गलत व्याख्या प्रस्तुत कर रहा है। क्योंकि महागठबंधन के पक्ष में मिला वोट साम्प्रदायिकता विरोधी होने के बजाए पिछड़ी और दलित जातियों के अपने क्षत्रपों को मिला वोट था जिनका भाजपा से विरोध सिर्फ उसके कथित तौर पर सवर्णवादी होने के कारण था ना कि उसके मुस्लिम विरोधी होने के कारण। इस महागठबंधन में मुसलमान तो सिर्फ भाजपा को हराने के लिए शामिल था। इस तरह, नीतीश के खिलाफ विपक्ष का सबसे मजबूत तर्क ही वैचारिक और तथ्यात्मक तौर पर सिर्फ कमजोर ही नहीं है बल्कि सफेद झूठ है।

दरअसल, विपक्ष का यह तर्क पिछले एक दशक में बहुसंख्यक हिंदू जनमानस में आए इस बदलाव की नासमझी को भी दर्शाता है जिसमें जनता को सिर्फ उस भ्रष्टाचारी नेता और दल से परेशानी है जो हिंदुत्व के राजनीतिक दायरे से बाहर हैं। उसे हिंदुत्ववादी भ्रष्टाचारियों और हत्यारों से कोई दिक्कत नहीं है। उसके समर्थन में वह आक्रामक तरीके से खड़ा भी है। इसे इस नजीर से भी समझा जा सकता है कि पिछली यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार पर रोज मनमोहन सिंह से इस्तीफा मांगने वाली आम भीड़ मोदी सरकार में राममंदिर के निर्माण पर बहस चलाने में बहुत सहजता से लग गई है। उसे अडानी-अम्बानी के सरकार संरक्षित लूट या किसानों की आत्महत्या पर कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि ये सब एक मुस्लिम विरोधी हिंदुत्ववादी सरकार के नेतृत्व में हो रहा है। वहीं विपक्ष का न सिर्फ इस समझदारी को स्वीकार करने से बचने का रिकार्ड रहा है बल्कि वह खुद इस बदलाव के खेल में इस हद तक नर्म हिंदुत्ववादी पोजीशन लेता रहा है कि उसने ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द को ही बहुसंख्यकवाद की तरफ झुका एक मजाक बना दिया है।

इसीलिए, आज अगर शरद यादव चाहें भी कि जदयू में नीतीश के भाजपा के साथ जाने के खिलाफ दो फाड़ करा दें तो उनका सफल हो पाना मुष्किल है क्योंकि उन्होंने या उनकी पार्टी ने मुसलमानों से वोट तो लिया लेकिन अपने जातिगत हिंदू आधार को कभी सेक्यूलर मूल्यों पर प्रशिक्षित नहीं किया। वहीं नीतीश के इस यू टर्न से लालू के जातिगत यादव आधार में ठेकों, सत्ता संरचना या रोजगार में समायोजित न हो पाने के कारण तो गुस्सा हो सकता है लेकिन उसे भाजपा की हिंदुत्ववादी सरकार के आ जाने से कोई वैचारिक दिक्कत नहीं होने वाली है। आखिर धर्मनिरपेक्षता के शोर में इस रिकॉर्ड को कैसे भुलाया जा सकता है कि भागलपुर दंगे के लगभग सारे दोषी लालू के सजातीय थे जिन्हें लालू ने बखूबी बचाने का काम ही नहीं किया था बल्कि मुख्य आरोपी कामेश्वर यादव को सद्भावना पुरस्कार भी दिया था। वे तो सिर्फ 80 के अंत में कांग्रेस से दूर हो चुके मुसलमानों का वोट लेने के लिए रणनीतिक तौर पर ‘धर्मनिरपेक्ष’ बने थे। वास्तव में बिहार में धर्मनिरपेक्षता एक मजाक, एक प्रहसन थी। जिसे अब गम्भीरहिंदुत्ववादी राजनीति पूरी तरह निगल चुकी है

वहीं एक और सच्चाई जिससे विपक्ष अभी भी आंख चुरा रहा है वह यह कि आज की भाजपा किसी भी लालू या मायावती से कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से पिछड़े और दलित हिंदुआंे को सत्ता और संगठन में प्रतिनिधित्व देने को तैयार है। जिसका अभाव एक दौर में अस्मितावादी हिंदू सामाजिक न्याय की राजनीति के उभार का मुख्य कारक था। इस तरह अब वह मुख्य वजह ही लगभग खत्म हो चुकने के कगार पर है जिसने पिछड़े और दलित हिंदुओं को एक समय भाजपा के खिलाफ खड़ा कर दिया था। यानी अब, व्यक्तिगत राजनीतिक संकटों को पूरे समाज के संकट के बतौर प्रचारित कर पाने का स्पेस भी लालू या मायावती जैसे नेताओं के पास नहीं बचा है।

इस तरह, विपक्ष बयानबाजी चाहे जो करे, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि नीतीश के इस यूटर्न से कथित सेक्यूलर राजनीति को कोई नुकसान नहीं हुआ है क्योंकि उसका कोई अस्त्वि ही नहीं था, अगर था भी तो वह सिर्फ एक बूथ आधारित समीकरण का नाम था जिसमें मुसलमानों को राजद और जदयू के हिंदुत्ववादी उम्मीदवारों को वोट देना होता था। हां, बदली स्थितियों में बिहार के मुसलमान जरूर खौफजदा होंगे क्योंकि उनकी जो मॉब लिंचिंग अब तक बिहार में नहीं हो रही थी वो अब यहां भी होगी। लेकिन मुसलमानों के मारे जाने से किस कथित सेक्यूलर नेता को दिक्कत है, आखिर वो कोई दलित तो हैं नहीं कि उनके मारे जाने पर उनके घर जाया जाए। शरद यादव, राहुल गांधी या धर्मनिरपेक्षता  के ‘शहीद’ बनने पर तुले लालू यादव में से कितने लोग पहलू खान या जुनैद के घर गए थे ? या इस सवाल को ऐसे पूछना ज्यादा सही होगा कि क्या वे इन मुसलमानों के घर जा कर अपने जातिगत हिंदू जनाधारों के बीच मुस्लिम परस्त कहे जाने का ‘कलंक’ झेलने को तैयार हैं?

इसलिए बिहार के घटनाक्रम में कोई सबक है तो यही कि आप एक विचारधारा वाली सरकार को विचारहीन और भ्रष्ट राजनीतिक टोटकों से चैलेंज नहीं कर सकते।

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