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भाजपा के दिन पूरे होने जा रहे, सिर्फ चुनावों का इंतज़ार, हिल उठा है अब मोदी का आत्मविश्वास भी

भाजपा के दिन पूरे होने जा रहे, सिर्फ चुनावों का इंतज़ार, हिल उठा है अब मोदी का आत्मविश्वास भी

मनोज कुमार झा

जैसे-जैसे राजस्थान और मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में हड़कंप की स्थिति बनती जा रही है। भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह की हालत भी पतली नजर आ रही है। सहयोगी शिवसेना द्वारा अपमानित किये जाने के बाद वे समर्थन के लिए फिल्मी सितारों के चक्कर लगा रहे हैं, पर फिल्मी सितारे वोट देने नहीं आते और न ही जनता पर उनका कोई राजनीतिक प्रभाव होता है। पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी भरोसा फिल्मी सितारों पर रहा है। वे इस देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने सितारों के साथ पतंग उड़ाई है और स्वच्छता अभियान का उन्हें ब्रांड एम्बेसडर बनाया है। पर अब मोदी का आत्मविश्वास भी हिल उठा है। कर्नाटक के घटनाक्रम और राहुल गांधी की जन सभाओं में उमड़ती भीड़ से इनके हौसले पस्त होते नजर आ रहे हैं। अभी हाल में इन्होंने पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को संघ के कार्यक्रम में बुलाया, पर प्रणब मुखर्जी ने वहां जाकर संघ की संकीर्ण विचारधारा के विरुद्ध ही भाषण दिया। इसके बाद संघ के आईटी सेल वालों ने फोटोशॉप का सहारा लेकर एक संघी के रूप में उनकी छवि बनानी चाही, पर लोगों ने संघ के फर्जीवाड़े को भली-भांति समझ लिया। अब आम जन मानस में यह बात बैठती जा रही है कि भाजपा उऩका भला करने वाली नहीं। वैसे तो इसके पहले कांग्रेस पर भी लोगों का भरोसा नहीं रहा था, पर अब लोग तुलना कर रहे हैं और कह रहे हैं कि कांग्रेस भाजपा से लाख दर्जा बेहतर थी। यानी इस बात की पूरी गुंजाइश है कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस की गठबंधन सरकारें बनेंगी। 



मनोज कुमार झा

यहां एक सवाल है कि क्या कांग्रेस चुनाव पूर्व एक व्यापक मोर्चा बनाने के लिए तैयार है। यदि चुनाव पूर्व मोर्चा नहीं बनता तो कई तरह की समस्याएं पैदा होती हैं। विधायकों-सांसदों की खरीद-बिक्री की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। दूसरी बात, कांग्रेस नेतृत्व यानी राहुल गांधी और उनके मुख्य सलाहकारों को सोचना होगा कि 2019 में होने वाले आम चुनाव को लेकर वे कैसे रणनीति बनाएं। उन्हें भाजपा-विरोधी हर दल से संपर्क कर उन्हें साथ जोड़ना होगा, क्योंकि अब समय बहुत कम है। उन्हें गठबंधन बनाने के प्रयास में तेजी लानी होगी। समय रहते सबको जोड़ कर अखिल भारतीय स्तर के साथ-साथ क्षेत्रीय स्तर पर भी जहां जो दल ज्यादा प्रभावशाली है, वहां उसे स्वायत्तता देनी होगी। उत्तर प्रदेश में ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि अखिलेश यादव और मायावती साथ आ सकती हैं। सपा, बसपा और कांग्रेस यदि यूपी में एक साथ मिल कर चुनाव लड़ते हैं तो भाजपा की मिट्टी पलीद हो जाएगी। यूपी में योगी के शासन से लोग त्राहि-त्रहि कर रहे हैं। पर वे मजबूर हैं, करें तो क्या करें। अभी उपचुनावों के जो संकेत आए हैं, वे पूरी तरह भाजपा के विरोध में हैं। लेकिन यदि कांग्रेस और अन्य दलों ने गठबंधन बनाने में सुस्ती दिखाई तो नुकसान भी हो सकता है। इसमें दो राय नहीं कि जनता किसी भी हाल में भाजपा के शासन से मुक्ति पाना चाहती है। लेकिन यदि समय पर विकल्प नहीं मिला तो वह लाचारी में यथास्थिति को स्वीकार करने को मजबूर होगी।

बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के साथ कांग्रेस का स्वाभाविक समझौता है। बिहार भाजपा के विरोध का सबसे मजबूत दुर्ग था, पर नीतीश कुमार की सत्ता-लोलुपता के कारण भाजपा वहां पैठ बनाने में सफल हुई है। नीतीश कुमार का कोई ठिकाना नहीं है। ये एक पक्के अवसरवादी नेता हैं और पहले भी भाजपा के साथ जाने के बाद उसका साथ छोड़ चुके हैं। कोई शक नहीं, भाजपा की परिस्थितियां प्रतिकूल देख कर ये पाला बदल लें और भाजपा-विरोधी गठबंधन में शामिल हो जाएं। ऐसे में, इन्हें भी साथ लेने से कांग्रेस को गुरेज नहीं करना चाहिए। आपद धर्म के तहत जो भी भाजपा के विरोध में आए, उसे कांग्रेस को साथ जोड़ लेना चाहिए।

जहां तक पश्चिम बंगाल का सवाल है, ममता बनर्जी ने भाजपाइयों को छठी का दूध याद करा दिया है। ममता भाजपाइयों से उनकी भाषा में ही बात कर रही हैं। यह गलत नहीं है। ममता भाजपा-विरोधी गठबंधन में शामिल होंगी, यह तय है, पर सवाल वामपंथियों का है कि वे क्या करेंगे। क्या वे ममता के साथ सामंजस्य स्थापित करेंगे या अलग-थलग रहने की नीति पर चलेंगे? इस सवाल का जवाब वामपंथियों को देना होगा। अभी तक वे ‘गुड़ खायेंगे और गुलगुले से परहेज’ की नीति पर चल रहे हैं और इसी का परिणाम है कि राष्ट्रीय राजनीति में उनकी जगह सिकुड़ती जा रही है। त्रिपुरा भी हाथ से निकल गया। केरल में इनकी वैचारिक अवस्थिति और नीतियां क्या हैं, ये भी सबको पता है। पश्चिम बंगाल में ये सिंगूर और नंदीग्राम की वजह से गये। सर्वहारा की पार्टी होने का दावा करने और पूंजीपतियों का खुल कर समर्थन करने का हश्र सामने आ गया। अब भी ये अपनी संकीर्णता को छोड़ कर व्यापक भाजपा-विरोधी मोर्चे में शामिल नहीं होते हैं तो ये पूरी तरह से अप्रासंगिक हो जाएंगे। काफी हद तक तो हो भी चुके हैं।

इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक और शिगूफा छोड़ा है कि उनकी जान पर खतरा है और जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मानव बम से हत्या कर दी गई थी, उसी तरह उनकी हत्या की भी साजिश की जा रही है। कहा जा रहा है कि माओवादियों ने यह साजिश रची है और इस मामले में कुछ लोगों की धर-पकड़ भी की गई है। लेकिन जिस तरह से इस पूरे मामले को सामने लाया गया है, उससे जाहिर होता है कि इसमें कोई सच्चाई नहीं है, बल्कि लोगों का ध्यान बंटाने के लिए ऐसा किया गया है।



जो भी हो, इस मामले की सच्चाई सुरक्षा और जांच एजेंसियों को पूरी तत्परता के सामने लानी चाहिए, अन्यथा जनता यही समझेगी कि ‘भेड़िया आया, भेड़िया आया’। वैसे, भूलना नहीं चाहिए कि संघ का पूरा इतिहास ही साजिशों का इतिहास रहा है और साजिशों के परिणामस्वरूप ही यह सत्ता में आई है। पर लगता है, अब इसके दिन पूरे होने जा रहे हैं। जिस दिन भाजपा केंद्र की सत्ता से हटेगी, वह दिन ऐतिहासिक होगा, इसमें कोई दो राय नहीं है। 

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