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अप्रत्याशित नहीं है भाजपा की जीत, जातीय नफ़रत का अहम रोल

 

अनिल कुमार यादव

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भाजपा की जीत कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है,बल्कि भाजपा का बहुमत से बहुत आगे निकल जाना थोड़ा सा आश्चर्यजनक जरूर रहा है. इस जीत को राजनीतिक विश्लेषक अलग–अलग नजरिये से देख रहे हैं और अपने हिसाब से विश्लेषित करना शुरू कर दिए हैं.

फौरी तौर पर कुछ लोग इसे मोदी लहर करार दे रहे हैं तो कुछ इसे विकास की राजनीति की जीत बता रहे हैं.

अकादमिक विश्लेषण अभी नहीं किया जा रहा है, जल्दी ही वह भी भारी-भरकम आंकड़ों के साथ जाति समीकरण की गुत्थी को सुलझाने के दावे के साथ बाजार में हाजिर हो जायेंगें. लेकिन इस लेख में कोशिश की गयी है कि समाज के उस गतिविज्ञान को समझा जा सके जिससे इस तरह का चुनाव परिणाम आया है.

जातीय नफ़रत की राजनीति का अलजेब्रा

कहानी शुरू करते हैं ठाकुरद्वारा विधान सभा के एक गाँव से, जोकि दलित बाहुल्य गाँव है, जिसमें जाटव और भूइयार जाति के लोग रहते हैं.

भूइयार दलित जाति है जो पेशेगत तौर पर खेत-मजदूर है.

गाँव के रहने वाले श्यामलाल बीएड पास हैं, वोट का नाम लेते ही बोलते हैं कि राजपाल सिंह को देना है, सपा ने तो मुल्ला खड़ा किया है और हाथी से यादव.

यह पूछे जाने पर की आप तो दलित हैं, वो गुस्से में आ जाते हैं और कहते हैं – देख भई दलित मतलब जाटव जो कभी मरे जानवर उठाते थे और खाते भी थे तो उनसे हमारा कोई नाता नही है. मायावती ने जाटवों को सर पे बिठा दिया किसी की सुनते ही नही हैं.

मुरादाबाद विधान सभा के ज्ञान वाली बस्ती की कहानी भी कुछ इसी तरह की है। हाई स्कूल पास मुकेश जाति के हिसाब से जाटव हैं, पर जैसे ही वाल्मीकि समुदाय के साथ खानपान की बात शुरू होती है तपाक से पूछ्ते हैं कि आपकी जाति क्या है? जबाब मिलने पर बोलते हैं कि आपको नही पता होगा, आप यहाँ के नही लगते हैं. यहाँ तो कुछ वाल्मीकि मुल्लों की तरह बड़ा भी खाते हैं. हम तो संत रविदास के वंशज हैं आपको तो पता ही होगा. आप पढ़े-लिखे हैं.

दूसरी कहानी भी कुछ इसी तरह की है मोहनलालगंज विधान सभा की.

राजमणि जाति से ठाकुर हैं और बीएससी पास भी. वो बताते हैं कि यह जो रोड बनी हैं, मायावती के शासन में बनी है.

उनसे सवाल किया जाता है तब तो आप लोग हाथी पे वोट कर रहे होंगे, है न ? जबाब आशा के विपरीत था. नहीं, भाजपा को। जबाब मिलता है. बसपा को क्यों नही? भाई साहब एक बार सरकार बनी थी चमार सर पर मूतने लगे थे.किसी को डांट-डपट दिया बस लग गया हरिजन एक्ट. तो इसलिए सपा या भाजपा का दलित विधायक बने चलेगा.

मोहनलालगंज लोकसभा की ही दूसरी विधानसभा है-सिधौली.

सिधौली की कहानी के किरदार हैं- दरबारी पासी. पहले कभी बसपा के वोटर थे 2014 से भगवा ओढ़ लिए हैं. वे बताते हैं कि चमार तो पंडितों के सर पे पैर रख दिए हैं. एक जमाना था कि डांगर (मरे जानवर) न मिले तो पेट नहीं भरता था. इस चुनाव में सब भूत उतार दिया जायेगा.

तीसरी कहानी आजमगढ़ के अतरौलिया विधान सभा की है.

मिंटू सिंह गाँव के बीएलओ हैं. लखनऊ का नाम सुनकर खातिर-बातिर में लग जातें हैं. बातचीत शुरू होती है. पहला सवाल मिंटू सिंह ही दाग देते हैं – तो भाई साहब आप तो अपर कास्ट के होगें.

न चाहते हुए भी मैंने हाँ में थोडा सा सर हिला दिया.

बस मिंटू साहब शुरू हो गए- आप आजमगढ़ जाईये कभी कचहरी के आस-पास देखिये, सब अहीर के लड़के गले में सोने की मोटी-मोटी चेन पहने उत्पात मचाये हुए हैं. देखकर सांप लोट जाता है। आपको अतरौलिया के विषय में मालूम नहीं होगा. यहाँ मारा ठाकुर भी 15 बीघा का काश्तकार है. कोई तपा अहीर भी होगा तो तब के समय में 5 बीघा खेत नहीं रहा होगा. अब हुआ है 10 -15 साल के भीतर. जितना भी बैनामा हुआ है, ट्रक आया है बन्दूक आई सब अहीरों के पास ही.

सवाल पूछा जाता है कि तब तो वोट बसपा के अखण्ड प्रताप सिंह को मिल रहा हैं न. मिंटू सिंह गहरी साँस लेतें हैं – नहीं भाई साहब, यही तो रोना है भाजपा जीत रही है तो निषाद को दिया जा रहा है. इस बार यही नारा है संग्राम (सपा उम्मीदवार) हराओ.

खैर प्रेम और नफ़रत मनुष्य की सामान्य मनोवृति है जो हमारे समाज में साफ-साफ देखी जा सकती है. जाहिर सी बात है कि इसपर राजनीति भी होती आयी है और हो भी रही है.

समाज के नफ़रत की राजनीति को समझना बेहद जरूरी हो गया है. अगर हम नफ़रत को किसी पैमाने पर नाप पाते तो कई संवृतियों को आसानी से समझ जाते कि समाज कैसे चल रहा है.

समाज के पास अपना एक पैमाना है कि किस जातीय समुदाय से कितनी नफ़रत करनी है और कितना प्रेम. हिन्दू समाज को अगर उसके जातीय पदसोपान में सजा दिया जाये तो तस्वीर थोड़ी साफ़ हो जाएगी.

मान लीजिये की एक ऊर्ध्वाधर लाइन है जिसके सबसे ऊपरी बिंदु पर सबसे ऊँची जाति का समुदाय स्थापित है, उसके नीचे उससे छोटा फिर उसके बाद उससे छोटा, जैसा कि भारत का रुढ़िवादी हिन्दू समाज है.

अब इस लाइन पर नफ़रत को नापा जाये तो ऊपर वाले जातीय समुदाय अपने नीचे की जातियों के किये जैसे –जैसे नीचे आता है नफ़रत का ग्राफ बढ़ने लगता है.

इसको इस तरह भी समझा जा सकता है कि कोई ओबीसी ब्राह्मण के गिलास में पानी पी लेता है लेकिन जाटव नहीं पी सकता है.

अब इस लाइन को नीचे से देखिये। जैसे ही हम नीचे से ऊपर जाते हैं तो नफरत घटने लगती है यानि कोई जाटव अपने पास की कथित ठीक ऊपर वाली जाति से ज्यादा नफ़रत करता है मतलब कि नीचे से ऊपर जाने पर नफ़रत घटने लगती है.

भाजपा की इस जीत की रणनीति में जातीय नफ़रत की राजनीति रामबाण रही है. जिसमें थोड़ा फेरबदल करके खूब चलाया गया। मसलन उच्च जातियों ने कहीं-कहीं इस नफ़रत की राजनीति के समीकरण को बदले भी जैसा कि तीसरी कहानी में देखा जा सकता है. सामाजिक तौर पर वे यादव की अपेक्षा निषाद जाति से ज्यादा नफ़रत करते हैं, क्योंकि निषाद यादवों से नीची जाति मानी जाति है, लेकिन परिस्थिति अनुसार वे अपने फार्मूले को राजनीतिक हिसाब से बदल लेते हैं. भाजपा की जातीय राजनीति का अलजेब्रा इसी नफरत की जातीय की राजनीति पर गढ़ा गया है.

( आगे जारी है …… )

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