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News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

राजनीतिक अदूरदर्शिता और दिशाभ्रम का शिकार बोडो आन्दोलन

Bodo Movement victim of political foresight and direction confusion

नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (National Democratic Front of Bodoland) ने दावा किया है कि उन्होंने पिछले दिनों कुछ ऐसे लोगों को मौत के घाट उतार दिया है, जो असम में रहते थे और मूलतः हिन्दी भाषी थे.

The Asian Center for Human Rights has condemned the National Democratic Front of Boroland.

एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स ने नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ़ बोरोलैंड की निंदा की है. उन्होंने कहा है कि इस तरह से निर्दोष और निहत्थे नागरिकों को मारना बिल्‍कुल गलत है और इसकी निंदा की जानी चाहिए.

नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ़ बोडोलैंड ने क़त्ल-ए-आम की ज़िम्मेदारी लेते हुए दावा किया है कि उनके किसी कार्यकर्ता की कथित फर्जी मुठभेड़ में हुई मौत का बदला लेने के लिए इन लोगों को मार डाला गया.

यह वहशत की हद है. अपनी राजनीतिक मंजिल को हासिल करने के लिए निर्दोष बिहारी लोगों को मारना बिकुल गलत है और उसकी चौतरफा निंदा की जानी चाहिए. बदकिस्मती यह है कि कुछ राजनीतिक पार्टियों ने बोडो अवाम और उसकी मांगों के उल्टी-पुल्‍टी व्याख्या करके इस समस्या के आस-पास भी राजनीतिक रोटियाँ सेंकना शुरू कर दिया है. इस तरह की हल्की राजनीतिक पैंतरेबाजी की भी निंदा की जानी चाहिए.

Bodos living in tribal areas of Assam have been neglected for hundreds of years.

इस बात में कोई शक़ नहीं है कि असम के आदिवासी इलाकों में रहने वाले बोडो सैकड़ों वर्षों से उपेक्षा का शिकार हैं. अंग्रेजों के वक़्त में भी इनके लिए सरकारी तौर पर कुछ नहीं हुआ. आज़ादी के बाद भी ब्रह्मपुत्र के उत्तर के इन इलाकों में शिक्षा का सही प्रसार नहीं हुआ. बोडो भाषा बोलने वाले इन आदिवासियों को गौहाटी, डिब्रूगढ़ और शिलांग के अच्छे कालेजों में दाखिला नहीं मिलता था. देश की राजनीति में भी इनकी मौजूदगी शून्य ही रही.

जवाहरलाल नेहरू के जाने के बाद बोडो इलाके में असंतोष बढ़ना शुरू हुआ. कोकराझार, बसका, चिरांग और उदालगिरी जिलों में फैले हुए इन आदिवासियों ने 70 के दशक में अपने आपको विकास की गाड़ी में जोड़ने के लिए राजनीतिक प्रयास शुरू किया, लेकिन देश का दुर्भाग्य है कि उसके बाद राज्य और केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व ऐसे लोगों के पास पंहुच गया जो दूरदर्शी नहीं थे. नतीजा यह हुआ कि बोडो लोग अलग-थलग पड़ते गए.

साठ के दशक में प्लेन्स ट्राइबल्स कौंसिल ऑफ़ असम (Plains Tribals Council of Assam) के बैनर के नीचे बोडो अधिकारों की बात की जाने लगी. देखा यह गया कि आदिवासियों के लिए जो सुविधाएं (facilities for tribals) सरकार की तरफ से उपलब्ध कराई गयी थीं, उन पर अन्य ताक़तवर वर्गों का क़ब्ज़ा शुरू हो गया था. बोडो इलाकों में शिक्षा के केंद्र नहीं बनाए गए इसलिए वहां शिक्षित लोगों की कमी बनी रही. उनके लिए आरक्षित सीटों पर सही उम्मीदवार न मिलने के कारण सामान्य वर्ग के लोग भर्ती होते रहे. 1967 में प्लेन्स ट्राइबल्स कौंसिल ऑफ़ असम ने एक अलग केंद्र शासित क्षेत्र, ‘उदयाचल’ की स्थापना की मांग की, लेकिन राजनीतिक बिरादरी ने उस मांग को गंभीरता से नहीं लिया. खासी और गारो आदिवासियों ने तो राजनीतिक ताक़त का इस्तेमाल करके अपने लिए एक नए राज्य मेघालय का गठन करवा लिए लेकिन बोडो आदिवासी निराश ही रहे.

Upendranath Brahma was an Indian Bodo social activist and the former president of ABSU.

बाद में जब 1979 में असम गण परिषद् ने बाहर से आये भारतीयों और बंगलादेशियों को भगाने का अभियान चलाया, तब भी बोडो समुदाय के लोग राजनीतिक तंत्र से बाहर ही रहे. 80 के दशक में  मुख्य धारा की राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से पूरी तरह निराश होने के बाद बोडो छात्रों ने एक संगठन बनाया और अलग राज्य की स्थापना की मांग शुरू कर दी. 1978 में शुरू हुए इस आन्दोलन के नेता उपेन्द्र नाथ ब्रह्म (Upendranath Brahma (Upandranath brahma) थे.

भारत की केंद्रीय राजनीति में यही दौर सबसे ज़्यादा अस्थिरता का भी है. 1989 में जो राजनीतिक प्रयोगों का दौर शुरू हुआ अभी तक वह चल रहा है. केंद्र में सभी पार्टियों में सत्ता के भूखे नेताओं का मेला लगा हुआ है. अपराधियों क एक बड़ा वर्ग राष्ट्र की राजनीति में हावी है. नतीजा यह है कि बोडो लोगों की जायज़ मांगों पर किसी का ध्यान ही नहीं गया.

अब हालात बदल गए हैं. बोडोलैंड के आन्दोलन को विदेशी सहायता मिल रही है. यह सहायता उन लोगों की तरफ से आ रही है, जो भारत की एकता के दुश्मन हैं.
Shesh Narain Singh शेष नारायण सिंह
शेष नारायण सिंह (Shesh Narain Singh ) वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह हस्तक्षेप के संरक्षक हैं।

ज़ाहिर है कि अब साधारण बोडो अवाम के बीच ही के कुछ लोग आतंकवादी बनकर किसी अदृश्य ताक़त के हाथों में खेल रहे हैं. इसलिए बोडो आन्दोलन के नाम पर कुछ ऐसे काम हो रहे हैं, जो किसी भी तरह से राजनीतिक नहीं कहे जा सकते.

पिछले एक हफ्ते में असम में बोडो आतंकवादियों की तरफ से निरीह हिन्दी भाषियों को मौत के घाट उतारना बहुत ही घटिया काम है. ऐसी हालात देश की एकता के लिए बहुत बड़ा ख़तरा हैं. सभी राजनीतिक पार्टियों को अपने निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर बोडो अवाम की जायज़ मांगों पर गौर करना चाहिए और उनके आन्दोलन में घुस गए विदेशी प्रभाव को ख़त्म करने में राजनीतिक सहयोग देना चाहिए. बीजेपी ने निरीह लोगों की हत्‍या के मामले में राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश शुरू कर दी है, उसे भी ऐसा करने से बचना चाहिए.

शेष नारायण सिंह

About शेष नारायण सिंह

शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह हस्तक्षेप के संरक्षक हैं।

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