शब्द

मरजाने चाँद के सदके… मेरे कोठे दिया बारियाँ…

Chand Kavita

….कार्तिक पूर्णिमा की शाम से.. वो गंगा के तट पर है… मौजों में परछावे डालता.. सिरते दीप को निहारता.. सुर्ख़ आँखों वाला चाँद.. कच्ची नींद का जागा झींका.. माथे पर ढेर सी रोलियों का टीका… मन्नतों के धागे सँवारे.. आरतियाँ सर से वारे… धुआं-धुआं अगरबत्तियों की ख़ुशबू में गुम.. दौनों में तरते फूलों को चूम… अर्घ्य के छिड़के जल से …

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संकीर्णता ने हिंदी साहित्य को बंजर और साम्यवाद को मध्यमवर्गीय बना दिया

Jan Sahitya parv

संकीर्णता ने हिंदी साहित्य को बंजर और साम्यवाद को मध्यमवर्गीय बना दिया जयपुर, 16 नवंबर 2019. जनवादी लेखक संघ और जनसंस्कृति मंच द्वारा देराश्री शिक्षक सदन, राजस्थान विश्वविद्यालय में आयोजित किये जा रहे जन साहित्य पर्व के दूसरे दिन आज ‘सिनेमा के रास्ते’,’साहित्य के रास्ते’ और ‘सियासत के रास्ते’ पर सत्र हुए. पहला सत्र – सिनेमा के रास्ते पहले सत्र …

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.इस छोर… ढूँढता हूँ मैं … गुमशुदा ख़ुशियों का सिरा … उस छोर मेरी तलाश में है … इक गाँव सिरफिरा….

Gaon ka kosa

ऊँची रिहायशी बिल्डिंगों की खिड़कियों से झाँकूँ तो शहर बौना लगता है… चींटियों सी रेंगती कारें और खिलौने से मकाँ.. हवाओ के सफ़र से मैं भी मानने लगा हूँ कि क़द बढ़ गया है मेरा… कुछ लोग मेरे मयार के नहीं रहे.. झुक कर मिलूँ तो ओहदों को फ़र्क़ पड़ता है.. बेवजह नहीं मिलता अब मैं किसी से… पुराने दोस्तों …

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बाज़ार में पसरा… ये जश्न.. किसका जश्न है…? कोई मामूली बात नहीं… यह राम की घर वापसी का प्रश्न है

Dr. Kavita Arora on Deepawali Diya

बड़ी हसरत से तकते हैं शक्लों को मिट्टी के दिये… बाज़ार के कोनों से… और फिर उदासी ओढ़ कर सोचते हैं अक्सर… क्या उस नदी ने झूठ बोला था… इक उम्र तलक सरयू ने बांची..कथा राम की… बनबास राम का… और राम का लौटना… उसने रोज़ कहा… किस तरह वो जगमगाहटों का आधार बने थे .. इक सीता की पालकी …

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देह-विमर्श के मसालों और सेहतमंद स्त्रीवादी मसालों में फर्क क्या है

अनिल कुमार पुष्कर : कवि और आलोचक

स्त्रीवादी बनाम देहवादी विमर्श पर एक टिप्पणी A commentary on feminist versus sexist discourse हिन्दुस्तान में कई तरह के मसालों को बनाने की तमाम विधियाँ लम्बे समय से ईजाद की जाती रही हैं. जिस तरह मसालों की सूची में संसद से पारित स्पाईस बोर्ड में शामिल कुल 52 मसाले हैं और आइएसओ की सूची में 109 मसाले हैं. यहाँ तक …

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विचार के बिना अधूरी होती है रचना

Madhya Pradesh Progressive Writers Association

प्रलेसं के एक दिवसीय रचना शिविर में कविता, कहानी, लेखन पर हुआ विमर्श वरिष्ठ रचनाकारों से रू-ब-रू हुए युवा लेखक तेजी से बदलते समाज में रचनाकारों की दृष्टि और भूमिका पर हुई चर्चा भोपाल। बेहतर कविता लेखन के लिए कवि के पास “कवि हृदय” के साथ साथ “कवि मस्तिष्क” होना भी अपेक्षित है। विचार के बिना रचना अधूरी है। बदलते …

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बेटे से बतरस : डेढ़ सदी के बाद फजीहत/ किससे मांगें आदर बेटा

Modi Gandhi ji

बेटे से बतरस : डेढ़ सदी के बाद फजीहत/ किससे मांगें आदर बेटा ************ वे नेशन के फादर बेटा करके बने अनादर बेटा * उनके पांव बहुत हैं लंबे छोटी निकली चादर बेटा * माफी मांग रहे बापू से हम सब देखो सादर बेटा * बोलें या फिर करें खुदकशी समझे नहीं बिरादर बेटा * चौतरफा थू-थू ,थू थू- थू …

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सुभाष राय की चिंताओं, सरोकार और लेखकीय दृष्टि से परिचित कराती एक पुस्तक ‘ जाग मछन्दर जाग’

'जाग मछन्दर जाग' वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि सुभाष राय की दूसरी पुस्तक है।

( ‘जाग मछन्दर जाग‘ वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि सुभाष राय की दूसरी पुस्तक है। इसके पहले बोधि प्रकाशन से प्रकाशित उनका कविता संग्रह ‘सलीब पर सच‘ काफी चर्चित रहा। ‘जाग मछन्दर जाग’ अमन प्रकाशन कानपुर से प्रकाशित है। इस पुस्तक पर हिंदी के जाने- माने आलोचक प्रोफेसर अरुण होता की एक टिप्पणी प्रस्तुत है।) कहा जाता है कि शिवजी पार्वती …

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‘मैं एक कारसेवक था’ : आत्मकथा के बहाने मानवता की जरूरी लड़ाई की किताब !!

Main Ek Karsewak Tha book by Bhanwar Meghwanshi

“मेरी कहानियां, मेरे परिवार की कहानियां – वे भारत में कहानियां थी ही नहीं. वो तो ज़िंदगी थी.जब नए मुल्क में मेरे नए दोस्त बने, तब ही यह हुआ कि मेरे परिवार के साथ जो हुआ, जो हमने किया, वो कहानियां बनीं. कहानियां जो लिखी जा सकें, कहानियां जो सुनाई जा सकें.” – सुजाता गिडला ( भारतवंशी अमरीकी दलित लेखक, …

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गुजरात के गधे : लेकिन राजा से कहा था बारिश होगी, बारिश होगी, बारिश होगी

सुबोध सरकार (Subodh Sarkar) सभापति, बांग्ला कविता अकादेमी, कोलकाता

गुजरात के गधे  Asses of gujrat                 राजा का मन खराब है, रात को नींद नहीं कोई सुनता नहीं बात, पुलिस को गोली चलाने को कहा है पुलिस चुन-चुनकर गोली मार रही है फिर से घुटने का दर्द बढ़ा है.   ऐसे वक्त में राजा का मन चाहता है शिकार पर चलें.   जंगल …

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दीदी के बोलो – इस देश का कवि न्याय मांगता है आपसे

Didi ke Bolo

दीदी के बोलो – [यह जिंदगीनामा किस्तों में चलेगा, तब तक जब तक मेरे खिलाफ हुई साजिश का अंत और इन्तेहाँ नहीं होता इन मुश्किलों का,,, – अनिल पुष्कर]  Series of Cold Blooded Murder – Part One सुनिए ध्रितिकान्तो! ओनली रिवेंज – हैरिटेज में मुन्नी और सात चौकीदार – एक   सुनिए ध्रितिकान्तो ! यह एम. मित्रा. की  कथा नहीं …

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माणिक वर्मा : दर्जी से सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार बनने तक का संघर्षशील सफर

Famous Hasya Kavi Manik Verma Died

श्रद्धांजलि स्मृति शेष माणिक वर्मा माणिक वर्मा (Manik Verma) मंचों पर उस दौर के व्यंग्यकारों में शामिल हैं जब छन्द मुक्त व्यंग्य विधा को स्वतंत्र स्थान मिलने लगा था। एक ओर हास्य कविता में काका हाथरसी, निर्भय हाथरसी, गोपाल प्रसाद व्यास रमई काका शैल चतुर्वेदी हुल्लड़ मोरादाबादी आदि थे तो दूसरी ओर देवराज दिनेश, माणिक वर्मा, सुरेश उपाध्याय, ओम प्रकाश …

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संवेदनात्मक ज्ञान को चरितार्थ करती पुस्तक “जिन्हें जुर्मे इश्क पे नाज था”

Virendra Jain वीरेन्द्र जैन, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व स्तंभकार हैं।

समीक्षा – जिन्हें जुर्मे इश्क पे नाज था मुक्तिबोध ने कहा था कि साहित्य संवेदनात्मक ज्ञान है। उन्होंने किसी विधा विशेष के बारे में ऐसा नहीं कहा अपितु साहित्य की सभी विधाओं के बारे में टिप्पणी की थी। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जिस रचना में ज्ञान और संवेदना का संतुलन है वही साहित्य की श्रेणी में आती …

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एक पूर्व संघ-कार्यकर्ता कारसेवक की आपबीती है मैं एक कारसेवक था

Main Ek Karsewak Tha book by Bhanwar Meghwanshi

“में कहता हूँ आँखिन देखी” की तर्ज़ पर यह एक पूर्व संघ-कार्यकर्ता कारसेवक की आपबीती है “मैं एक कारसेवक था” (Main Ek Karsewak Tha book by Bhanwar Meghwanshi)। यह किताब उन सब को पढ़नी चाहिए, जो संघ को भीतर से समझना चाहते हैं। ख़ासतौर पर संघ के कार्यकर्ताओं को ! यह क़िताब संगठन निर्माण की उन बारीकियों के बारे में …

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हिंदी अंग्रेजी में तू-तू, मैं-मैं की वार

14 सितंबर को हिंदी दिवस (Hindi Diwas on 14 september) के मौके पर कई बुद्धजीवियों ने अपने ज्ञान का प्रदर्शन किया। हिंदी के सम्मान (Honor of hindi) के लिए लंबे चौड़े भाषण का भी प्रयोग हुआ। स्कूल से लेकर सोशल मीडिया तक हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में मंच को दुल्हन की तरह सजाया गया। इन तमाम चीज़ों को देखकर मन …

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मैं तो हिन्दी के बिना जी नहीं सकता, पर सरकार को जलसे की जरूरत क्यों है ॽ

Jagadishwar Chaturvedi

आज 14 सितम्बर है। सारे देश में केन्द्र सरकार के दफ्तरों में हिन्दी दिवस का दिन है। सरकार की आदत है वह कोई काम जलसे के बिना नहीं करती। सरकार की नजर प्रचार पर होती है वह जितना हिन्दी भाषा में काम करती है, उससे ज्यादा ढोल पीटती है। सरकार को भाषा से कम प्रचार से ज्यादा प्रेम है, हम …

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इस गाँव में सिर्फ कार सेवक, उस गाँव में बजरंग/ हे राम, तुम गंगातीरे कौन सा देश रच गये

Kallu Subodh Sarkar

गुलमोहर हाउसिंग कॉम्प्लेक्स   गुलमोहर, गुलाबख़ास, घुसने के साथ ही पाम डेढ़ सौ परिवारों के लिए लगभग एक आवासन जरा घुसते ही मारुती वैन, स्कूटर, साइकिल नाम बताओ – मुसलमान, हिन्दू कितने जन?   तब ठीक-ठीक आठ बजे होंगे, नमाज खत्म हुई घर लौट रहे हैं घर के लोग, टीवी में सीरियल शंखध्वनि मिल गई है जंगले में गोधूलि के …

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जानिए “लड़कियों के टॉयलेट में क्या कर रहा था” वाले सुबोध सरकार कौन हैं

सुबोध सरकार (Subodh Sarkar) सभापति, बांग्ला कविता अकादेमी, कोलकाता

जीवन परिचय : सुबोध सरकार (Subodh Sarkar), कृष्णा नगर, पश्चिम बंगाल में सन 1958 को पैदा हुए. बांग्ला के आधुनिक कवियों (Modern poets of bangla) में शुमार इनका पहला कविता-संग्रह (Subodh Sarkar’s first poetry collection) 70 के दशक में छपा. अब तक तकरीबन 26 से अधिक कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. इसके अलावा अमरीका पर एक यात्रा-वृत्तांत तथा दो अनूदित …

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सुलह की कोशिशों में रात भर इक चाँद भटकता है…..

kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

यह सितम्बर के गीला-सीला दिन.. फ़लक को भरमाये.. बादलों की पोटली में कुछ-कुछ धूप लटकाये… शाम को ढलकर.. हौले-हौले चलकर.. जब क्षितिज की ड्योढ़ी पर पसरता है.. बालों से बारिशें झटकती.. साँझ को.. बड़ा अखरता है… सुरमई बादलो की धुँध पर उँगलियाँ चलाकर… गुलाबी सर्दियों के गुनगुने क़िस्से सुनाकर.. जब-जब आह भरें.. तब तब साँझ की त्योरियाँ चढ़ें… नहीं सुहाता …

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तो ऐतिहासिक नहीं काल्पनिक पात्र है उमराव जान

Abhishek Bachchan-Aishwarya Rai's Umrao Jaan film

वाकया 2008 का है। मैं उन दिनों इंडियन एक्सप्रेस के लखनऊ ब्यूरो (Lucknow Bureau of Indian Express) में काम करता था। एक दिन अचानक एक खबर एक साथ कई हिंदी अखबारों में छपी कि ऐशबाग कब्रिस्तान में उमराव जान की कब्र (Umrao Jaan’s grave in Aishbagh cemetery) तोड़ कर रास्ता बना दिया गया है। ये खबर जल्द ही दिल्ली मीडिया …

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मेरे शहर की/ तरक़्क़ी का यह मंज़र/ किसके हिस्से में आता है

kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

काली रात की बस से उतरा रौशनी का छिटका, सहर की चिल्ल पौं, ट्रकों के हॉर्न की आवाज़ में भी बेसुध…बे खटका… वो रोड के डिवाइडर पर औंधे मुँह पड़ा रहेगा… और सैटेलाइट की सड़क कोर वाली झुग्गियों पर सूरज के चमकीले साये चढ़ जायेंगे तो लक दक शहर के बदन पर यह कोढ़ के साये साफ़ नज़र आयेंगे… ईसाइयों …

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स्वप्निल का संसार और उसमें ब्रह्मराक्षस की ताकाझांकी

Jaisa Maine Jeevan dekha स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताओं की समीक्षा

स्वप्निल को कभी स्वप्न में भी ख़याल नहीं रहा होगा कि खूंखार कवि अनिल जनविजय के रहते मुझ सा नौसिखिया उनकी कविताओं की समीक्षा लिख मारेगा और उसकी धज कुछ ऐसी होगी कि आज 40 साल बाद भी किसी पत्रिका में छपी वो समीक्षा उनके पास सुरक्षित है। कुछ दिन पहले रंगकर्मी और हिंदी सिनेमा में अपना तम्बू ताने नन्दलाल …

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डरना किसी से भी नहीं, गुरू से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं वेद से भी नहीं – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी

Acharya Hazari Prasad Dwivedi

आज आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी (Acharya Hazari Prasad Dwivedi) का जन्मदिन है- काशी की संस्कृति – विद्वत्ता और कुटिल दबंगई विश्वनाथ त्रिपाठी ने ‘व्योमकेश दरवेश’ में काशी के बारे में लिखा है – “काशी में विद्वत्ता और कुटिल दबंगई का अद्भुत मेल दिखलाई पड़ता है। कुटिलता, कूटनीति, ओछापन, स्वार्थ- आदि का समावेश विद्बता में हो जाता है। काशी में प्रतिभा के …

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जयशंकर प्रसाद वैदिक कर्मकांड के मानवीय पक्षों का समर्थन करते हैं, उसके पाखंड का नहीं

News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

“कामायनी” के प्रकाशन को 75 वर्ष (75 years of publication of “Kamayani”) होने को हैं महानतम रूसी कहानीकार एंटन चेखव के मुहावरे (Idioms of Anton Chekhov – the greatest Russian storyteller), में कहें तो कामायनी समूचे छायावादी आन्दोलन का- प्रधान हस्ताक्षर -हैं। जिसके प्रकाशन को अब 75 वर्ष होने को जा रहे है। निःसंदेह कामायनी का रचनाकाल दूसरे विश्व -युद्ध …

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समाज की ‘फ्रोजन स्टेट’ को तोड़ने के लिए थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’

Rajgati Theater of Relevance

समाज की ‘फ्रोजन स्टेट’ को तोड़ने के लिए थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ (Theater of Relevance to break the ‘frozen state’ of society) अपनी कलात्मकता से विवेक की मिटटी में विचार का पौधा लगाने के लिए प्रतिबद्ध! – मंजुल भारद्वाज 27 वर्ष पहले यानी 1992 में भूमंडलीकरण (Globalization) का अजगर प्राकृतिक संसाधनों को लीलने के लिए अपना फन विश्व में फैला चुका …

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कविता और राजनीति का अपने साहित्य में विलक्षण संबंध स्थापित किया खूब लड़ी मर्दानी वाली सुभद्रा कुमारी चौहान ने

Jagadishwar Chaturvedi

आज है खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी, की सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्मदिन हिन्दी आलोचकों में मुक्तिबोध के अलावा किसी बड़े समीक्षक ने सुभद्राकुमारी चौहान पर कलम चलाने की जहमत नहीं उठायी, जबकि वे स्वाधीनता संग्राम में महिलाओं और दलितों को संगठित करने में महात्मा गांधी के साथ अग्रणी कतारों में रहीं। प्रसिद्ध हिन्दी कवि गजानन …

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मर्डर इन द कैथेड्रल और न्यू इंडिया : नाटक जो लिखा इलियट ने वह काल्पनिक नहीं इतिहास है 

Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना

मर्डर इन द कैथेड्रल (Review of Murder in the Cathedral in Hindi) गीति नाट्य विधा (opera) में लिखी गयी अंग्रेज कवि और आलोचक नोबेल पुरस्कार विजेता टीएस इलियट (play by American English poet T.S. Eliot) की अत्यंत प्रासंगिक कृति है। Brief by outline the historical background of murder in the cathedral. रवीन्द नाथ टैगोर ने भी चंडालिका, श्यामा, रक्तकरबी, शाप …

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दुनिया ने प्रगति की पर मनुष्यता का क्या हुआ ? याद किए गए प्रेमचंद

Munshi Premchand

मुंशी प्रेमचंद की जयंती (Munshi Premchand Jubilee) पर उनको उत्तराखंड के दिनेशपुर (Dineshpur of Uttarakhand) में याद किया गया। बहुत ही बेहतरीन कार्यक्रम रहा। विचारगोष्ठी में प्रेमचंद का कथा-साहित्य (Story of Premchand) और प्रेमचंद की जनपक्षधरता (Premchand’s Janpakshadharata) पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। गोष्ठी को जनसत्ता के पूर्व सहसम्पादक पलाश विश्वास, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन की रविंदर कौर, रंगकर्मी …

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अफ़सोस किताबों के लिखने वाले भी किताबों के सफ़हों में दफ़्न हैं किसी सूखे गुलाब की तरह

Munshi Premchand

खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए। सवाल यह है कि किताबों ने क्या दिया मुझको ? अफ़सोस किताबों के लिखने वाले भी किताबों के सफ़हों में दफ़्न हैं, किसी सूखे गुलाब की तरह, जब बरक खोलो तो महकने लगती है शख़्सियत उनकी। चमकती जिल्द की सूरत कहाँ बताती है कि किन पथरीली राहों से वो शख़्स गुज़रा …

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अरुंधति रॉय और डॉ. राम विलास शर्मा की आँखों से गांधी और अंबेडकर देखना

अरुंधति रॉय की किताब 'एक था डॉक्टर और एक था संत', (Arundhati Roy's book Ek Tha Doctor Ek Tha Sant)

विमर्शमूलक विखंडन और कोरी उकसावेबाजी में विभाजन की रेखा बहुत महीन होती है अरुंधति रॉय की किताब ‘एक था डॉक्टर और एक था संत‘, (Arundhati Roy’s book Ek Tha Doctor Ek Tha Sant) की समीक्षा अरुंधति रॉय की किताब ‘एक था डॉक्टर और एक था संत‘, (Arundhati Roy’s book Ek Tha Doctor Ek Tha Sant,) लगभग एक सांस में ही …

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 समीक्षा – शैडो पॉलिटिक्स

Shadow Politics Cover PB

छाया राजनीति (शैडो पॉलिटिक्स) का इतिहास मानव इतिहास जितना ही पुराना है। किंतु, इस विषय पर हिंदी में किसी पुस्तक का सर्वथा अभाव है। इस दृष्टिकोण से अनिल राय की पुस्तक शैडो पॉलिटिक्स न सिर्फ एक नए विषय को हिंदी में प्रस्तुत करती है बल्कि इस विषय को कितनी संतुलित दृष्टि से लिखा जाए, इसके भी मानक खड़े करती है। …

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शुद्ध रूप से एक विधवा की प्रेम कथा है, प्रणय-प्रेम गाथा है मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास ‘मल्लिका’

Manisha Kulshreshtha's novel 'Mallika'

भारतेन्दु बाबू के प्रणय-प्रेम की एक कथा — ‘मल्लिका‘ आज मनीषा कुलश्रेष्ठ का हाल में प्रकाशित उपन्यास ‘मल्लिका’ (Manisha Kulshreshtha’s novel ‘Mallika’) पढ़ गया। मल्लिका, बंकिम चंद्र चटोपाध्याय की ममेरी बहन, बंगाल के एक शिक्षित संभ्रांत घराने की बाल विधवा (child widow)। तत्कालीन बंगाली मध्यवर्ग (Bengali middle class) के संस्कारों के अनुरूप जीवन बिताने के लिये काशी को चुनती है। …

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अपने युग की जन-विरोधी सामाजिक विसंगतियों पर जोरदार प्रहार किया कबीर ने

Kabir कबीर

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, समाज में अपने जीवन का अस्तित्व बनाए रखने के लिए उसे संघर्ष करना पड़ता है। यह संघर्ष उसे मानव से भी करना पड़ता है और प्रकृति से भी। फल-स्वरूप उसे नाना प्रकार के अनुभव होते हैं। हम जिस समाज में रहते हैं, सांस लेते हैं, जिस परिवेश को जीते हैं, उससे अनभिज्ञ कैसे रह सकते …

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लुटियंस का मोहल्ला..

Rajeev mittal राजीव मित्तल, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

पांडवों ने एक जंगल पे इन्द्रप्रस्थ (Indraprastha) क्या बसा दिया, न जाने कितने सूरमाओं को खेलने का मौका दे दिया.. पिछले हजार साल में कई ने उजाड़ा, कई ने बसाया। पिछली शताब्दी में सर एडविन लुटियंस (Sir Edwin Lutyens) ने पता नहीं किन कुदाल-फावड़ों से 2800 एकड़ ज़मीन को ऐसा रूप दे दिया कि जिसे देखो अपनी खटिया मुगलों से …

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अँधियारे पाख की इक कविता है जिसने चाँद बचा रक्खा है ..

डॉ. कविता अरोरा शुक्ल पक्ष फलक पर ढुलकता चाँद …टुकड़ी-टुकड़ी डली-डली घुलता चाँद …सर्दी ..गरमी ..बरसात ..तन तन्हा अकेली रात …मौसमों के सफ़र पर मशरिक़ से मगरिब डोलता है ..निगाहों-निगाहों में सभी को तोलता है…मसरूफियात से फ़ुरसत कहाँ आदमी को ..अब भला चाँद से कौन बोलता है ….दिन जलाये बैठी इन बिल्डिंगों का उजाला ….बढ़ा के हाथ फलक से रात …

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जब राजीव गांधी ने कहा था – ”रक्त बहाने के बजाय, घृणा को बह जाने दो’

Rajiv Gandhi

भाषाविद् डॉ. मन्नूलाल यदु की पुस्तक “राजीव गांधी: भारतीयता की तलाश” का यह अंश प्रतिष्ठित समाचारपत्र देशबन्धु में प्रकाशित हुआ था। स्व. राजीव गांधी की पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि (Tribute to Rajiv Gandhi’s death anniversary) के साथ साभार पुनर्प्रकाशन… – डॉ. मन्नूलाल यदु, भाषाविद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बनने के बाद 31 अक्टूबर,1984 को राष्ट्र के नाम जो संदेश प्रसारित किया …

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कविता का सर्वोत्‍तम कालखंड है छायावाद – प्रो. रजनीश कुमार शुक्‍ल

हिंदी विश्‍वविद्यालय (Hindi University) में ‘छायावाद के सौ वर्ष’ (Hundred years of chhaayaavaad) पर राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी उद्घाटित

हिंदी विश्‍वविद्यालय में ‘छायावाद के सौ वर्ष’ पर राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी का समापन वर्धा,  11 मई 2019: छायावाद का समय (Time of Chhayawad) कविता का सर्वोत्‍तम कालखंड (Best period of poetry) रहा है। यह काल हमारे सामने एक उज्‍ज्‍वल भाष्‍य के रूप में सामने आता है। छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्‍त और महादेवी वर्मा (Suryakant Tripathy Nirala, …

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सत्ता की सूली : न्यायपालिका में हमेशा न्याय नहीं होता! कभी-कभी सिर्फ जजमेंट होता है!

Satta Ki Suli सत्ता की सूली, लोया की गाटेगांव यात्रा

सत्ता की सूली : अनसुलझी हत्याओं और अन्याय की कड़वी यादों को हमारे जेहन में जीवित रखती है बाम्बे हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी जी कोलसे पाटिल (B.J. Kolse Patil, former Judge of the Bombay High Court) कहते हैं: ”न्यायपालिका में हमेशा न्याय नहीं होता! कभी-कभी सिर्फ जजमेंट होता है!‘ विख्यात न्यायविद पाटिल ने यह टिप्पणी ‘सत्ता की सूली’ शीर्षक …

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छायावाद ने हृदय से आखों तक दृष्टि और रौशनी दी है – प्रो. विजय बहादुर सिंह

हिंदी विश्‍वविद्यालय (Hindi University) में ‘छायावाद के सौ वर्ष’ (Hundred years of chhaayaavaad) पर राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी उद्घाटित

हिंदी विश्‍वविद्यालय (Hindi University) में ‘छायावाद के सौ वर्ष’ (Hundred years of chhaayaavaad) पर राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी उद्घाटित वर्धा, दि. 08 मई 2019: महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय (Mahatma Gandhi International Hindi University) के हिंदी एवं तुलनात्‍मक साहित्‍य विभाग की ओर से ‘छायावाद के सौ वर्ष’ विषय पर आयोजित संगोष्‍ठी में बतौर मुख्‍य वक्‍ता वरिष्‍ठ आलोचक प्रो. विजय बहादुर सिंह ने …

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अडिग प्रेम : सच्चे प्रेम, दर्द और एक ऐसी रात की कहानी जिसका रोमांच कोई नारी शरीर ताउम्र नहीं भूल सकता

Seema Aseem Saxena Novel Adig Prem सीमा सक्सेना असीम का उपन्यास "अडिग प्रेम"

एक स्त्री के मन की यात्रा करने जैसा है सीमा सक्सेना असीम का उपन्यास “अडिग प्रेम” पढ़ना सीमा सक्सेना “असीम” का उपन्यास “अडिग प्रेम” पढ़ना एक स्त्री के मन की यात्रा करने जैसा है। एक लड़की जो अपने अध्यापक के प्रति आसक्त होती है और परिस्थिति वश उसके साथ एकाकार भी होती है और संपूर्णता के साथ समर्पित भी। सच्चे …

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धूल भरे मौसमों की ख़ुमारी पर दो बूँद की बारिश….

Ishq

धूल भरे मौसमों की ख़ुमारी पर दो बूँद की बारिश…. सौंधी महक से बौराई.. फ़िज़ां में…. शबनमी अल सुबहा के जोगिया लशकारे.. दरख़्तों के चेहरों से सरकते हैं.. तो.. अलसाये मजबूत काँधो वाले आबनूसी जिस्म.. उठाकर बाज़ुओं को अंगडाईयाँ.. लेने लगते हैं… इक मनचली शाख़.. उंगलियों में लपेट-लपेट कर कभी खोलें.. कभी बाँधे सिरे… अटका के सुबह को पहलू से …

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वादा फ़रामोशी : सरकारी वादों की मुकम्मल पड़ताल

Vada Faroshi Facts not fictions based on RTI शशि शेखर, संजॉय बसु और नीरज कुमार की किताब 'वादा फ़रामोशी पढ़िए'

राहुल गांधी (Rahul Gandhi), कॉमरेड कन्हैया कुमार (Comrade Kanhaiya Kumar), आरजेडी नेता तेजस्वी यादव (RJD leader Tejashwi Yadav), समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव (Samajwadi Party President Akhilesh Yadav), जेएमएम के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन और झारखंड कांग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार, इन तमाम नेताओँ में एक बात कॉमन है। ये नेता अपनी हर सभा में कहते हैं कि मोदी …

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और फिर से छतों से तुम्हें प्यार हो जायेगा…

Poetry on Kite by Kavita Arora

….पतंग उड़ा कर तो देखो.. तुम डोर संग हवाओं के रिश्ते महसूस करोगे… फ़लक तक रंगीन फरफराहटों में.. यक़ीनन काग़ज़ी टुकड़े नहीं, तुम उड़ोगे.. वो ख़्वाब चिड़ियों के परों वाले.. बादलों पर घरों वाले…. मगरिब का मुहल्ला.. शाम का थल्ला.. शफ़क का दरवज्जा.. तारों का छज्जा.. फलक की गली.. इक चाँद की डली.. उमंगों की तमाम उड़ानों के सिरे माँझे …

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इक गढ़े सच पर अंधा राष्ट्र चल रहा है.. भक्त सोचते हैं देश बदल रहा है

RSS Half Pants jaya prada Mohd Azam Khan

इक गढ़े सच पर अंधा राष्ट्र चल रहा है.. भक्त सोचते हैं देश बदल रहा है ओ इतिहास पर पलने वाली दीमकों.. बस भी करो.. अब छिजी हुई भारतीयता में संस्कृति की नंगी टाँग.. साफ़ नज़र आ रही है.. लाचार इतिहास की छातियों पर बने तुम्हारे  पपड़ीदार बमौटो ( दीमको के घर) में छिपे सिवाहीयों  ( लम्बे सर वाली दीमक …

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लोया की गाटेगांव यात्रा

Satta Ki Suli सत्ता की सूली, लोया की गाटेगांव यात्रा

महाराष्ट्र का लातूर एक विनाशकारी भूकंप के लिए जाना जाता है। 30 सितंबर,1993 कीउस तबाही को याद कर लोगों की आज भी रूह कांप जाती है। जज लोया 30 हजार जिंदगियों के लिए कब्र बन चुके इसी लातूर से तालुक रखते थे। उनका गांव गाटेगांव लातूर से तकरीबन 20 किमी दूर है। उस साल 23 अक्तूबर 2014 को दिवाली पड़ी। …

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अस्मिता, अंबेडकर और रामविलास शर्मा

Jagadishwar Chaturvedi

रामविलास शर्मा (Ram Vilas Sharma) के लेखन में अस्मिता विमर्श को मार्क्सवादी नजरिए (Marxist Attitudes) से देखा गया है। वे वर्गीय नजरिए से जाति प्रथा (caste system) पर विचार करते हैं। आमतौर पर अस्मिता साहित्य पर जब भी बात होती है तो उस पर हमें बार-बार बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के विचारों (Views of Babasaheb Bhimrao Ambedkar) का स्मरण आता है। …

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भगतसिंह का लेख – लाला लाजपत राय और नौजवान

Shaheed E Azam Bhagat Singh

(यह वह दौर था जब कौंसिल के चुनावों में लाला लाजपत राय ने कांग्रेस का साथ छोड़कर उसकी मुख़ालफ़त करनी आरम्भ कर दी थी और अनेक ऐसी बातें कहीं जो कि किसी भी तरह उन्हें शोभा नहीं देती थीं। यह देखकर कुछ संवेदनशील नौजवानों ने लाला जी के विरुद्ध आवाज़ उठाई। उसका बदला लेने के लिए लाला जी ने खुले …

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कहानी को अस्मिता की राजनीति से सबसे पहले मोहन राकेश ने जोड़ा

Mohan Rakesh

आज मोहन राकेश के जन्मदिन पर विशेष Special on the birthday of Mohan Rakesh जगदीश्वर चतुर्वेदी आज मोहन राकेश का जन्मदिन (Mohan Rakesh’s Birthday) है। सन् 1925 में आज के ही दिन उनका जन्म हुआ था। मोहन राकेश के पिता वकील थे और साथ ही साहित्य और संगीत के प्रेमी (Lover of literature and music) भी थे। पिता की साहित्यिक रुचि …

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एय मेरी तुलू ए नूर .. तू बढ़ और छा जा अबद की काली रवायतों पर ..

kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

डॉ. कविता अरोरा एय मेरी तुलू ए नूर .. तू बढ़ और छा जा अबद की काली रवायतों पर .. कर शुरूआत नयी .. लिक्ख उजाले  अपनी लकीरों में .. तू ख़ुशियों का अर्क पी .. रक्साँ- रक्साँ बढ़ चल .. हो बड़ी ..मेरे भरोसे पर .. कि यह माँ .. ता उम्र तुम्हारा साथ नहीं छोड़ने वाली … तू …

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प्रेमचंद हिंदी साहित्य के हार्डवेयर हैं, तो भीष्म साहनी हिंदी साहित्य के सॉफ्टवेयर !

Munshi Premchand

हमारे समय में भीष्म साहनी प्रगतिशील लेखक संघ की घाटशिला इकाई (झारखण्ड) का आयोजन: 14 नवम्बर, 2015 घाटशिला 14 नवम्बर, 2015. कालजयी कथाकार, नाटककार, अनुवादक, रंगमंचीय कलाकार अभिनेता भीष्म साहनी के जन्म शताब्दी वर्ष 2015 में देश भर में उन्हें याद किया जा रहा है. इसी कड़ी में घाटशिला प्रलेसं ने 14 नबम्वर को ताम्र नगरी मऊभण्डार स्थित आई.सी.सी. मजदूर …

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राम का देश/ रामसे बंधु की हॉरर मूवी बन गया/ करकट दमनक की हुआ हुआ

देश को क्या हुआ सतत डराते जिन्न बुरी आत्माएँ सन्नाटा तोडती उल्लूओं की आवाज़ चमगादड़ों का शोर कभी डायनों का प्रलाप टी वी पर आग उगलता अगिया बेताल शांति भंग हो गई राम का देश रामसे बंधु की हॉरर मूवी बन गया करकट दमनक की हुआ हुआ देश को क्या हुआ // जसबीर चावला //

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कहते हैं कि बहरा हो गया है हाकिम/ तभी तो सबकी फ़रियाद नहीं सुनता

ये रास्ते हैं इंसाफ़ केजंहागीर के दरबार का भारी है घंटाहर एक के हिलानें से नहीं बजता कहते हैं कि बहरा हो गया है हाकिमतभी तो सबकी फ़रियाद नहीं सुनता कुछ लोग चाहें जितनी एड़ियाँ रगड़ेंमंहगा है इंसाफ़ सबको नहीं मिलता कर ली आयद पाबंदी उसनें खुद परकहीं पर भी हो जुर्म वो नहीं बोलता सब लिखा है मुल्क के …

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स्मृतिलोप से हट कर यथार्थ की ओर : हिंदी समाज में हीरा डोम की तलाश

Breaking news

स्मृतिलोप से हट कर यथार्थ की ओर : हिंदी समाज में हीरा डोम की तलाश –सुभाष गाताडे ( अकार, हिंदी समाज पर केंद्रित अंक में जल्द ही प्रकाशित) ‘देवताओं, मंदिरों और ऋषियों का यह देश ! इसलिए क्या यहां सबकुछ अमर है ? वर्ण अमर, जाति अमर, अस्पृश्यता अमर ! ..युग के बाद युग आए ! बड़े बड़े चक्रवर्ती आये …

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बीसवीं सदी में फ़ैज़ जैसा कवि भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं हुआ

Faiz Ahmad Faiz

बीसवीं सदी में फ़ैज़ जैसा कवि भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं हुआ गुलामी से मुक्ति का महाकवि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पुण्यतिथि पर विशेष जगदीश्वर चतुर्वेदी फ़ैज उन तमाम लेखकों के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं जो समाज को बदलना चाहते हैं,  अमेरिकी साम्राज्यवाद की सांस्कृतिक-आर्थिक गुलामी और विश्व में वर्चस्व स्थापित करने की मुहिम का विरोध करना …

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यह खुद बेहद डरे हुए हैं ….इस नंगी औरत से ….

mob lynching

यह खुद बेहद डरे हुए हैं ….इस नंगी औरत से …. डॉ. कविता अरोरा कौन है ..? किसकी क्या लगती है ? कुछ भी तो नहीं पता …बद़जात का … एैसी वैसी ही है  …यह औरत … शायद औरत भी नहीं है … यह तो महज़ जिस्म है … जिस्म … रेड लाइट एरिया का … बिका हुआ ..जिस्म .. …

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जब राजीव गांधी ने कहा था – ”रक्त बहाने के बजाय, घृणा को बह जाने दो’

Rajiv Gandhi

जब राजीव गांधी ने कहा था – ”रक्त बहाने के बजाय, घृणा को बह जाने दो’ – डॉ. मन्नूलाल यदु, भाषाविद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बनने के बाद 31 अक्टूबर,1984 को राष्ट्र के नाम जो संदेश प्रसारित किया था, वह ऐसी घड़ी थी, जब इंदिरा जी की हत्या हो चुकी थी और पूरा राष्ट्र आंदोलित था। उस घड़ी में उन्होंने राष्ट्र …

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तुम मनाओ 15अगस्त…./ मैं अफ़सोस मनाऊँगी…./  इस देश में पैदा होने का अफ़सोस…..

kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

तुम मनाओ 15अगस्त…./ मैं अफ़सोस मनाऊँगी…./  इस देश में पैदा होने का अफ़सोस….. डॉ. कविता अरोरा हाँ हमने मान लिया…. हम रिश्ते नहीं..महज़..जिस्म हैं… जिस्म…. बग़ैर फ़र्क़ कि उम्र क्या है… 5..7..12…14…सब चलती हैं……, उफ़ वक़्त के वफ़्फ़े…. चुप्पी साधे कोने …. हर छ: घंटे में .. सामने बेबसी से तकते हैं… सख़्त गिरफ़्त में… गपचे हुए जिस्म .. सुनते …

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प्रेमचंद किसान को सुखी देखना, स्त्री की मुक्ति और दलितों के लिए सामाजिक न्याय चाहते थे

Munshi Premchand

प्रेमचंद किसान को सुखी देखना, स्त्री की मुक्ति और दलितों के लिए सामाजिक न्याय चाहते थे प्रेमचंद के बहाने : आज के लेखकीय सरोकार (31 जुलाईः प्रेमचंद जयन्ती) विजय विशाल बुरा है हमारा यह समय क्योंकि हमारे समय के सबसे सच्चे युवा लोग/ हताश हैं, निरूपाय महसूस कर रहे हैं खुद को। सबसे बहादुर युवा लोगों के/ चेहरे गुमसुम हैं …

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समय जैसा है, उसे ही लिखा जाए….संदर्भ प्रेमचंद का प्रयाण दिवस

Munshi Premchand

(प्रेमचंद की तत्वमीमांसा और लेखक के पुनर्संदर्भीकरण की ज्ञान मीमांसा ) प्रेमचंद का प्रयाण दिवस पर विशेष अरुण माहेश्वरी उपन्यास सम्राट प्रेमचंद : 1880 में जन्म ; 20वीं सदी के प्रारंभ के साथ लेखन का प्रारंभ ; और 1936 में मृत्यु की लगभग आखिरी घड़ी तक लेखन का एक अविराम सिलसिला। हिंदी के उपन्यास सम्राट। उपन्यास विधा : अनुभव और …

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अंधेर नगरी में सत्यानाश फौजदार का राजकाज! रवींद्र प्रेमचंद के बाद निशाने पर भारतेंदु?

Bharatendu Harishchandra

क्या वैदिकी सभ्यता का प्रतीक न होने की वजह से अशोक चक्र को भी हटा देंगे? रवींद्र का दलित विमर्श-28 पलाश विश्वास डिजिटल इंडिया में इन दिनों जो वेदों, उपनिषदों, पुराणों, स्मृतियों, महाकाव्यों के वैदिकी साहित्य में लिखा है, सिर्फ वही सच है और बाकी भारतीय इतिहास, हड़प्पा मोहंजोदोड़ो सिंधु घाटी की सभ्यता, अनार्य द्रविड़ शक हुण कुषाण खस पठान …

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व्यावहारिक निर्देशिका पटकथा लेखन : एक जरूरी किताब

Vyavaharik Nirdeshika Patkatha Lekhan

मनोज कुमार झा हिंदी के महत्त्वपूर्ण कथाकार और ‘जिसने लाहौर नहीं वेख्या वो जनम्या ही नहीं‘ जैसे विख्यात नाटक के रचनाकार असग़र वजाहत की ‘व्यावहारिक निर्देशिका पटकथा लेखन‘ नये और उभरते हुए पटकथा लेखकों के लिए एक बहुत ही जरूरी किताब है। हिंदी में पटकथा लेखन पर पुस्तकों का अभाव है और खासकर वैसी पुस्तक का जो असग़र वजाहत ने …

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जनविजय जी जैसे विद्वतजन हम जैसे लोगों को अपढ़, अछूत और अयोग्य मानते हैं

Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना

क्लासिक साहित्य जनपक्षधर होता तो हिंदी में अज्ञेय से बड़ा जनपक्षधर कोई नहीं होता। पलाश विश्वास संदर्भः Anil Janvijay July 17 at 3:26am तारा बाबू का कुछ पढ़ा हो किसी ने तब तो कुछ कहेंगे। पलाश विश्वास ने बिना पढ़े ही सबको संघी घोषित कर दिया,  इसीलिए मैंने इनके इस लेख पर कोई जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा। इन्होंने गुरुदत्त …

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संघ परिवार के पास साहित्यकार नहीं हैं तो हमारे पास कितने साहित्यकार बचे हैं? शिक्षा व्यवस्था आखिर क्या है?

Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना

पलाश विश्वास हमारे आदरणीय जगदीश्वर चतुर्वेदी ने फेसबुक वाल पर सवाल किया है कि पांच ऐसे उपन्यासों के नाम बतायें, जो संघ परिवार की विचारधारा से प्रेरित हैं। इसकी प्रतिक्रिया में दावा यही है कि संघ परिवार के पास कोई साहित्यकार नहीं है। लगता है कि बंकिम वंशजों को पहचानने में लोग चूक रहे हैं। गुरुदत्त (Gurudutt)  का किसी आलोचक ने …

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कालजयी रचना : विभाजन की त्रासदी का सच है ‘तमस’

Tragedy of division tamas

विभाजन की त्रासदी पर एक से बढ़ कर एक कृतियां सामने आईं, पर भीष्म साहनी का उपन्यास ‘तमस’ सबसे अलग ही है। यह एक ऐसी कृति है जिसका नाम भारतीय साहित्य के इतिहास में अमिट रहेगा। देश के विभाजन, उसके बाद होने वाले लोमहर्षक दंगों और उस समय की राजनीति का जैसा चित्रण इस उपन्यास में हुआ है, वैसा शायद …

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हिंदुओं के भारी पैमाने पर इस्लाम कबूलने के बारे में स्वामी विवेकानन्द के दो टूक विचार

swami vivekananda

वे (गरीब लोग) जमींदारों, पुरोहितों के शिकंजे से आजाद होना चाहते थे।इसलिए बंगाल के किसानों में हिंदुओं से ज्यादा मुसलमान हैं क्योंकि बंगाल में बहुत ज्यादा जमींदार थे। भारत में मुसलमान इस्लाम के साथ भारत का परिचय सातवीं सदी में हुआ। इसके बाद से करीब तेरह साल से इस देश में मुस्लिम जन समुदाय का वजूद कायम है। बाहर से …

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जन्मशताब्दी वर्ष के मौके पर बिजन भट्टाचार्य के रंगकर्म का तात्पर्य

Bijon Bhattacharya

बिजन भट्टाचार्य जन्मशताब्दी वर्ष, Bijan Bhattacharya Birth Centenary Year, बंगाल में रंगमंच का इतिहास, History of theater in Bengal भारतीय गण नाट्य आंदोलन ने इस देश में सांस्कृतिक क्रांति (Cultural revolution) की जमीन तैयार की थी, हम कभी उस जमीन पर खड़े हो नहीं सके। लेकिन इप्टा (IPTA) का असर सिर्फ रंग कर्म तक सीमाबद्ध नहीं है। भारतीय सिनेमा के …

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प्रेमचंद और भाषा समस्या

Munshi Premchand

एक है मीडिया की भाषा और दूसरी जनता की भाषा, मीडिया की भाषा और जनता की भाषा के संप्रेषण को एकमेक करने से बचना चाहिए। प्रेमचंद ने भाषा के प्रसंग में एक बहुत ही रोचक उपमा देकर भाषा को समझाने की कोशिश की है। उन्होंने लिखा है ´यदि कोई बंगाली तोता पालता है तो उसकी राष्ट्रभाषा बँगला होती है। उसी …

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सच जानना कठिन ज़रूर है, नामुमकिन नहीं… हम शिकार की तरफ हैं या शिकारी की तरफ !

opinion

It is difficult to know the truth, but not impossible … सवाल है कि हम शिकार की तरफ हैं या शिकारी की तरफ ! कुछ सच हमें अपनी आँखों से ही देखने होंगे, अपने मस्तिष्क से जज करने होंगे और अपने हृदय से स्वीकारने होंगे। सच की खोज (Find the truth) को शायद इसीलिए तप कहा जाता है। क्योंकि सच …

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इतिहास लहूलुहान, पन्ना दर पन्ना खून का सैलाब! लहुलुहान फिजां है लहुलुहान स्वतंत्रता लहुलुहान संप्रभुता लहूलुहान

Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना

पलाश विश्वास मर्डर इन द कैथेड्रल गीति नाट्य विधा में लिखी गयी अंग्रेज कवि और आलोचक नोबेल पुरस्कार विजेता टीएस इलियट की अत्यंत प्रासंगिक कृति है। रवीन्द नाथ टैगोर ने भी चंडालिका, श्यामा, रक्तकरबी, शाप मोचन जैसे गीति नाट्य लिखे हैं और उनका मंचन भी बेहद लोकप्रिय हैं। लेकिन गीतांजलि के मुकाबले रवींद्र की दूसरी रचनाओं की तरह उनके गीति …

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प्रतापराव कदम की कवितायें-बाजारवाद के बनाये दुःखतंत्र का सच

opinion

बाजारवाद के बनाये दुःखतंत्र का सच प्रतापराव कदम की कवितायें Poems of Prataprao Kadam in Hindi. प्रतापराव कदम की कवितायें अपने समय की आहट को भांप लेती हैं. गहराई से तंत्र के षड्यंत्र की पहचान करती हैं. दुनिया के बाहरी और भीतरी हिस्से में चल रही हलचल की सूक्ष्म पड़ताल करती हैं. हम जिस भी समय में जियें घटनाएँ हमारी जिन्दगी …

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बेक़रारी है जैज़ में, वह बेचैन है, थिर नहीं रहता और कभी रहेगा भी नहीं

opinion

चट्टानी जीवन का संगीत-3 जैज़ आज भी ‘शास्त्र’ की बजाय ‘करत विद्या’ है जैज़ पर एक लम्बे आलेख की तीसरी कड़ी जैज़ में बेक़रारी है, वह बेचैन है, थिर नहीं रहता  और कभी रहेगा भी नहीं — जे.जे.जौनसन, ट्रौम्बोन वादक जैज़ के स्रोत भले ही तीन-चार सौ साल पहले अफ़्रीका से ग़ुलाम बना कर लाये गये लोगों के गाने-बजाने में खोये …

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गौ मूत्र को पवित्र मान पी जाते हैं, लेकिन दलितों के हाथ का छुआ हुआ पानी नहीं पी सकते !

Hindu Taliban book by Bhanwar Meghwanshi

संघ परिवार में इंसानों को जानवरों से भी कमतर मानने का रिवाज़ शुरू से ही है जानवर, दलित और चकवाडा का तालाब हिन्दू तालिबान -40 भंवर मेघवंशी राजस्थान की राजधानी जयपुर के निकटवर्ती इलाके दुदू के फागी कस्बे के चकवाडा गाँव के निवासी बाबूलाल बैरवा लम्बे समय तक विहिप से जुड़े रहे हैं तथा उन्होंने कारसेवा में भी हिस्सेदारी की। …

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संगीनों के साये में स्कूल

Sangeenon ke saye men school

संगीनों के साये में स्कूल डरी फ़िक्रमंद मांओं ने बलैयाँ ली नजर उतारी दुआएँ माँगी अल्लाह ताला से जिगर के टुकड़ों को चूम कर रुखसत किया फ़ौजी संगीनों के साये में स्कूल बैरक हो गई जेल सी ऊंची स्कूल की दीवारें अमन की फ़ाख्ता नदारद थी फूलों में बारूदी गंध माहौल में गोलियों की आवाज़ें तितलियों के कटे पंख लो …

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ख़ून के धब्बे पड़ गये हैं ‘इल्म की किताबों’ पर

Jasbir Chawla's Poetry in Hindi, जसबीर चावला की कविता हिंदी में

शूट आउट एट पेशावर स्कूल : शकील का ख़त अम्मी के नाम Shoot out at peshawar school : Shakeel’s letter to Ammi ”””””””””””””””””””””””””””””””””””””’ अम्मी लो मैंने ज़िद छोड़ दी नये बैग की लंच बाक्स की नई पानी की बोतल की न चाहिये शार्पनर न इरेज़र सब कुछ तो ‘इरेज़’ कर दिया ‘तालीबान’* ने हाँ जरूर चाहिये ढेरों ‘ब्लाटिंग पेपर’ ख़ून …

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इक़बाल की शायरी में धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के गहरे अंतर्विरोध

Just in, Breaking News.

अल्लामा इक़बाल की शायरी में धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के गहरे अंतर्विरोध The deep contradiction of secularism and communalism in the poetry of Allama Iqbal अल्लामा इक़बाल (Allama Iqbal) उर्दू के प्रमुख शायरों में से एक हैं। उनकी शायरी में धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के गहरे अंतर्विरोध मिलते हैं। ये अंतर्विरोध इस बात का संकेत है कि एक लेखक के अंदर में वैचारिक …

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इति‍हास का आधार प्रेमचंद क्‍यों नहीं

Munshi Premchand

आज उपन्यासकार प्रेमचंद का जन्मदिन है । प्रेमचंद जयंती पर विशेष Today is the birthday of novelist Premchand. Special on Premchand Jayanti हिन्दी साहित्य के दो महत्वपूर्ण इतिहास ग्रंथ रामचन्द्र शुक्ल का ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखित ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’ का प्रकाशन एक दशक के दौरान होता है, यह दशक प्रेमचंद के साहित्य का चरमोत्कर्ष भी …

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नमक का दरोगा वाले कलम के सिपाही प्रेमचंद को नमन

Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना

गोदान में खेत खाओ संस्कृति के पूँजी वर्चस्व का भी अच्छा खासा ब्यौरा है। आज सुबह सुबह बसंतीपुर से पद्दो का फोन आया। पहली बार तो लगा किसी कंपनी का होगा, इसलिए काट दिया। दोबारा उसके रिंगियाने पर मोबाइल से संपर्क साध लिया। छूटते ही पद्दो ने कहा कि आज दिनेशपुर में तुझे प्रेमचंद सम्मान दिया जा रहा है। मैंने …

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तमाम पीढ़ियों को प्रेमचंद के रचना-कर्म ने दिशा प्रदान की

Munshi Premchand

शैलेंद्र चौहान प्रेमचंद ने सन् 1936 में अपने लेख ‘महाजनी सभ्यता’ में लिखा है कि ‘मनुष्य समाज दो भागों में बँट गया है। बड़ा हिस्सा तो मरने और खपने वालों का है, और बहुत ही छोटा हिस्सा उन लोगों का था जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को बस में किए हुए हैं। इन्हें इस बड़े भाग के …

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संघ परिवार और भाजपा को नहीं भूलना चाहिए कि इतिहास मरता नहीं, बल्कि सवाल करता है

Palasi se Vibhajan tak aadhunik Bharat ka Itihas

इतिहास सवाल करेगा कि… (पलासी से विभाजन तक के बहाने) An excellent book in the history of modern India written by Prof. Shekhar Vandyopadhyay of Victoria University, New Zealand नयी सरकार आने के बाद पिछले दिनों ‘पलासी से विभाजन तक’ नामक किताब को आरएसएस के अनुषंगिक संगठन विद्या भारती के महामंत्री दीनानाथ बत्रा द्वारा कानूनी नोटिस भेजा गया है। न्यूजीलैण्ड के …

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‘तिनका तिनका तिहाड़’-खामोश क्यों हैं सलाखें

Tinka Tinka Tihar

असली सजा तो जेल से बाहर आने के बाद शुरू होती है जेल! दो अक्षर का यह शब्द अपने आप में ही कितना खामोश लगता है। जेल का नाम सुनते ही हम सभी के जहन में अपराध से घिरी एक दुनिया आने लगती है, जहाँ रहने वाले प्रत्येक कैदी के हाथ किसी न किसी अपराध से रंगे होते हैं। लेकिन …

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‘वर्धा शब्‍दकोश’ में हैं ज्ञान के विविध अनुशासनों के शब्‍द भंडार : प्रो.जैन

Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya Wardha

वर्धा, 26 अक्‍टूबर, 2013; महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय की बहुआयामी परियोजना के तहत प्रकाशित ‘वर्धा शब्‍दकोश’ का लोकार्पण हिंदी की सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो.निर्मला जैन ने शनिवार को नागार्जुन सराय में आयोजित एक भव्‍य समारोह में किया। इस अवसर पर कुलपति विभूति नारायण राय, प्रतिकुलपति प्रो.ए.अरविंदाक्षन, ‘वर्धा शब्‍दकोश’ के संपादक प्रो.आर.पी.सक्‍सेना मंचस्‍थ थे। समारोह में ‘शमशेर रचनावली’, हिंदी स्‍पेल चेकर …

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हिंदी की स्त्री रचनाकारों का द्वन्द्व

News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

Conflicts among female Hindi writers हिंदी साहित्य (Hindi Literature) विशेषकर स्त्री साहित्य (Female Literature) की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमारी जानीमानी लेखिकाएँ (Famous Writers) भी स्त्रीवाद (feminism), स्त्री-लेखन (Female Writing) जैसी कोटियों और अवधारणाओं पर न तो विश्वास करती हैं न ही बात करना चाहती हैं। इसके प्रति अमूमन इनका रवैया प्रतिगामी और अवहेलना से पूर्ण होता है। …

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स्त्रियों में कृष्ण जितने पॉप्यूलर हैं उतने राम नहीं

opinion

शक्ति, शौर्य आदि से स्त्री आकर्षित नहीं होती Women are not attracted by strength, bravery etc. How is a woman attracted ? स्त्री सर्वप्रथम विनम्र व्यवहार से मुग्ध होती है A woman is first to be fascinated by polite behavior स्त्रियां पुरुष में फ्रेंडली एटीट्यूड चाहती हैं Women want friendly attitude in men क्या कारण है कि स्त्रियों में मिथकीय …

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डॉ. रामविलास शर्मा की दृष्टि में निराला के साहित्य में प्रेम और कामुकता

suryakant tripathi nirala

प्रेम और कामुकता व्यक्ति ही नहीं सामाजिक सत्य भी है. आधुनिक पश्चिमी समाजशास्त्रियों की दृष्टि में प्रेम से अलग कामुकता, कामुक-भिन्नता और काम-चेतना आधुनिक परिघटनाएं हैं लेकिन भारतीय सन्दर्भ में इनकी जड़ें काफी पुरानी हैं. भारत में कामुकता का आधार ग्रन्थ (The basis text of sexuality in India) वात्स्यायन द्वारा रचित ‘कामसूत्र’ है. सुश्रुत की ‘चरक संहिता’ में भी इसका …

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हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह एक पुरुष, भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह

News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

“कामायनी” के प्रकाशन को 75 वर्ष होने को हैं महानतम रूसी कहानीकार एंटन चेखव के मुहावरे, में कहें तो कामायनी समूचे छायावादी आन्दोलन का- प्रधान हस्ताक्षर -हैं। जिसके प्रकाशन को अब 75 वर्ष होने को जा रहे है। निःसंदेह कामायनी का रचनाकाल दूसरे विश्व -युद्ध से पहले का है, किन्तु किसी भी युद्धकाल में असहाय मानवता की जो भयावह स्थिति …

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कविता के उपनिवेश का अंत और नागार्जुन

Jagadishwar Chaturvedi

साइबर युग में कविता और साहित्य (Poetry and Literature in the Cyber Age) को लेकर अनेक किस्म की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। कुछ लोग यह सोच रहे हैं लोकतंत्र में कविता या साहित्य को कैद करके रखा जा सकता है ?  (Poetry or literature can be kept immurement in a democracy?) यह सोचते रहे हैं कि साहित्य हाशिए …

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