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सांप्रदायिकता की चुनौती और धर्मनिरपेक्षता की असलियत

मनोज कुमार झा

नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ताकत लगातार बढ़ती चली जा रही है। देश की प्रमुख संस्थाओं के भगवाकरण की तैयारियों को बाकायदा अंजाम दिया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि अब देश में हिंदू राज की स्थापना हो गई।

संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मोहन वैद्य ने कहा था कि संघ के लिए देश और हिंदुत्व एक है।

मोहन वैद्य ही नहीं, स्वयं संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी बयान दिया कि भारत में रहने वाले चाहे किसी भी धर्म और संप्रदाय के हों, सभी हिंदू हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की घोषित विचारधारा हिंदू राष्ट्रवाद है, तो क्या भारतीय जनता पार्टी (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के सत्ता में आ जाने के बाद भारत की पहचान हिंदुत्व से होगी?

भूलना नहीं होगा कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ही उनकी सरकार में शामिल सभी प्रमुख मंत्री खुद को संघ से प्रतिबद्ध बताते रहे हैं। कई मंत्रियों ने मोदी का विरोध करने वालों को पाकिस्तान चले जाने की सलाह दी थी। ‘लव जिहाद’, ‘घर वापसी’,’धर्मांतरण’ और ‘राममंदिर’ जैसे मुद्दे को बार-बार उभारा जाता रहा। तो क्या यह मान लिया जाए कि अब देश में हिंदू राष्ट्रवाद की ही ध्वजा लहराएगी?  क्या नवसाम्राज्यवाद के देशी पैरोकारों की साजिश जो लंबे समय से रची जा रही थी, छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी ताकतों के पूरी तरह से खोखला साबित हो जाने के बाद सफल होकर रहेगी?

मनोज कुमार झा स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

भूलना नहीं होगा कि राष्ट्रवाद का अभ्युदय ऐतिहासिक दृष्टि से पूरी तरह एक यूरोपीय परिघटना है और राष्ट्रीयताओं का अभ्युदय धार्मिक आग्रहों, पूर्वग्रहों और चर्च की सत्ता से टकरा कर ही हुआ था।

भारतीय राष्ट्रवाद की खासियत रही है कि इसका विकास औपनिवेशिक शक्तियों से संघर्ष के दौरान हुआ और 1857 के गदर के बाद जब अंग्रेजों को लगा कि सिर्फ हिंसक दमन कारगर नहीं होगा तो उन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ की वह कुख्यात नीति अख्तियार कर ली जिसका अंजाम धार्मिक आधार पर ‘द्विराष्ट्रवाद’ के सिद्धांत और फिर आजादी के साथ ही मानव सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक देश विभाजन के रूप में सामने आया।

अब सवाल यह है कि आजादी के सात दशक के बाद केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अनेक छोटे-बड़े संगठन खुलकर हिंदुत्व की बात कर रहे हैं और इसे राष्ट्र का पर्याय बता रहे हैं, तो क्या अब ‘खंड-खंड राष्ट्रवाद’ के सिद्धांत को अमली जामा पहनाया जाएगा?

अगर राष्ट्रवाद को इस तरह धर्म से जोड़ा गया तो देश को एक नहीं, अनेकानेक विभाजन के लिए तैयार रहना होगा।

गौरतलब है कि संघ के प्रचार प्रमुख मोहन वैद्य ने जैन-बौद्ध व सिख समुदाय को हिंदू धर्म का प्रतीक बताते हुए कहा था कि इन धर्मों की मान्यताओं में हिंदू धर्म की झलक मिलती है और ये समान विचारधारा रखते हैं, तो क्या यह समझा जाए कि टक्कर हिंदू और मुसलमान के बीच है। यह एक भयावह संदेश है।

बहरहाल, नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उभार अचानक हुई परिघटना नहीं है, बल्कि एक ऐतिहासिक प्रक्रिया की परिणति है, जिसका विकल्प फिलहाल नजर नहीं आता। ये दरअसल दिखा देता है कि भारतीय गणतंत्र का धर्मनिरपेक्षतावाद किस कदर खोखला था।

प्राय: सभी विद्वानों ने यह स्वीकार किया है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षतावाद ‘सर्वधर्म समभाव’ पर आधारित गांधी-नेहरू मॉडल था, जबकि सेक्युलरिज्म का मतलब है कि राज्य का धार्मिक मामलों से कोई लेना-देना नहीं होगा और यह व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास की चीज होगा। ऐसा हुआ नहीं। हो सकता भी नहीं था, क्योंकि नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस, सहयोगी दलों और वामपंथियों ने सांप्रदायिक आधार पर राष्ट्र का विभाजन स्वीकार कर लिया था। कांग्रेस एवं अन्य दलों ने राष्ट्रीय मुक्ति की जनाकांक्षा को लेकर साम्राज्यवादी शक्तियों से संघर्ष आगे बढ़ाने की जगह उनसे समझौता कर लेना ही राष्ट्रीय पूंजीवाद के हित में जरूरी समझा था, जो दरअसल साम्राज्यवाद की छत्रछाया में ही अपने विकास का अवसर ढूंढ रहा था। वह अपने चरित्र में पतनशील और एक हद तक जनविरोधी भी था।

अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन में सोवियत संघ के प्रमुख रूप से उभर जाने और मार्क्सवादी दर्शन की मूल अवधारणा अंतरराष्ट्रीय सर्वहारावाद से उसके विमुख हो जाने के कारण वामपंथियों को गुमराह होने में देर न लगी। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, वह तो ब्रिटिश सत्ता से संघर्ष और समझौते के मार्ग पर शुरू से ही चल रही थी।

अगर धार्मिक आधार पर राष्ट्र का विभाजन हो गया और कांग्रेस समेत तमाम दलों ने इसे स्वीकार कर लिया तो महज संविधान में दर्ज कर लिए जाने की वजह से ही भारतीय गणतंत्र वास्तविक अर्थों में धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता था। ‘हिंदू-मुस्लिम सिख-ईसाई आपसे में हैं भाई-भाई’, ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना’, ‘ईश्वर-अल्ला तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान’, इसी तरह की धर्मनिरपेक्षता गांधी-नेहरू के सेक्युलरिज्म और वामपंथियों के सेक्युलरिज्म की खासियत बनी रही। चुनावी प्रक्रिया में वोटों को धर्म, जाति और सामुदायिक पहचान के आधार पर बांटा जाता रहा और जनता को लगातार बरगलाया जाता रहा। धार्मिक संस्थाओं और प्रतिनिधियों को राजकीय संरक्षण प्राप्त होता रहा, उन्हें मान्यता दी जाती रही। फिर कूपमंडूकता और सांप्रदायिक आधार पर घृणा का प्रचार करने वाले उग्र हिंदूवादियों को कैसे रोका जा सकता था, जिनकी जड़ें देश के राजनीतिक इतिहास में बहुत गहरी थीं।

ऐसे कई नेता रहे हैं, जिनके लिए धर्मनिरपेक्षता सिर्फ  रघुपतिराघव राजाराम ही रही है और कई धर्मनिरपेक्षतावादी इस चक्कर में अल्पसंख्यकवादी होकर रह गए। यहां प्रो. हरबंस मुखिया के इस कथन को नहीं भूला जा सकता कि बहुसंख्यक सांप्रदायिकता और अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और दोनों समान रूप से खतरनाक हैं। वामपंथी धर्मनिरपेक्षता को लेकर कोई स्वतंत्र अवधारणा विकसित नहीं कर सके, क्योंकि वे औपनिवेशिक ढांचे वाले भारतीय गणतंत्र को स्वीकार कर चुके थे। वे भी सत्ता के अंग बन गए थे। भूख और गरीबी जैसे अहम मसलों का हल न हो तो वोटों की राजनीति में धार्मिक और जातीय पहचान को उभार कर स्वार्थ सिद्ध करना आसान हो जाता है।

यहां यह मान लेने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि भारतीय राष्ट्रवाद का चरित्र मौलिक रूप से धर्मनिरपेक्ष कभी नहीं रहा। हां, उस पर धर्मनिरपेक्षता का मुलम्मा अवश्य चढ़ा रहा।

ऐसे में, कांग्रेस-वामपंथियों-मध्यमार्गियों-समाजवादियों की राजनीति खंड-खंड होकर लूटमार पर आधारित हो गई। बड़े-बड़े घोटालों और भीषण नव साम्राज्यवादी लूट ने देश की अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया तो उनका राजनीतिक प्रभाव भी शून्य हो गया। ऐसे में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ के प्रतिनिधि नरेंद्र मोदी ने शासन की बागडोर संभाल ली, तो यह पहले से चली आ रही प्रक्रिया की स्वाभाविक परिणति ही है।

खास बात यह है कि ‘हिंदू राष्ट्र की सर्वसत्तावादी राजनीति को कोई चुनौती दरपेश नहीं है, क्योंकि कांग्रेस-वामपंथियों समेत अन्य तमाम दल जाति और धर्म की ही राजनीति कर रहे हैं। जैसे यह माना जाता है कि ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, वैसे ही भाजपा को छोड़ कर तमाम दलों का मानना है कि ‘अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता सांप्रदायिकता नहीं होती। चुनावों के मौसम में कई दलों के नेता जामा मस्जिद के इमाम के साथ खड़े हो जाते हैं और उनसे अपने पक्ष में वोट देने की अपील करवाते हैं। कई शंकराचार्यों और महंतों-धर्माधीशों के आगे शीश नवाते नजर आते हैं। ऐसे में, भाजपा को सांप्रदायिक और अन्य दलों को धर्मनिरपेक्ष मानना गलत होगा।

दरअसल, भारतीय गणतंत्र के मूल में ही धर्मनिरपेक्षता नहीं थी। यह अलग बात है कि भारत ‘धर्मनिरपेक्ष’ तो रहा, पर राष्ट्रवाद के साथ धर्म का घालमेल शुरू से ही बना रहा। सांप्रदायिकता कभी भी खुलकर सामने नहीं आती। प्रेमचंद के शब्दों में यह गीदड़ की तरह शेर की खाल ओढ़ कर आती है। फिर सांप्रदायिकता का हमला इतने छुपे रूपों में होता है कि निशाना कौन किसे बना रहा है, ये साफ दिखता नहीं और इस क्रम में कई अल्पसंख्यक समुदायों को भारी वंचना का शिकार होना पड़ता है।

मनोज कुमार झा स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

                        

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