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खतरे में मुल्क की मासूमियत

राजीव रंजन श्रीवास्तव

देश इस वक्त कई तरह के खतरों और मुश्किलों से जूझ रहा है। आतंकवाद, उग्रवाद, सांप्रदायिक कट्टरता, अशिक्षा, बेरोजगारी, महंगाई, कुपोषण और न जाने क्या-क्या। इन बड़ी-बड़ी समस्याओं से निपटने के लिए बड़े-बड़े लोग बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं, नीतियां और योजनाएं बना रहे हैं, लेकिन एक और बड़ी समस्या है, जिसकी ओर सरकार और समाज का ध्यान जाना चाहिए। यह समस्या है, बचपन के गुम होने की। यानी बच्चों की मासूमियत के गुम होने की।

ऐसा देखा जाता है कि हम बच्चों से जुड़े मसलों को अक्सर नज़रंदाज़ कर देते हैं, लेकिन ऐसा करना कितना घातक होता है, यह तब पता चलता है, जब ग्रेटर नोएडा दोहरा हत्याकांड जैसी घटनाएं हमारे सामने आती हैं। यहां एक 15-16 साल के किशोर ने अपनी मां और बहन का बेरहमी से कत्ल कर दिया। पांच दिनों तक फरार रहने के बाद वह पुलिस की गिरफ्त में आया है। उसके पिता दुखी हैं, लाचार हैं और दुविधा में हैं कि अब अपने नाबालिग बेटे के साथ वे क्या करें? उसे माफ करें या सजा दिलवाएं?

समाज के खिलाफ अपराध है यह कानून की नज़र में यह

यूं तो आरोपी बच्चे के जुर्म पर फैसला जुवेनाइल कोर्ट ही करेगा और उसके पिता की माफी से कोर्ट के फैसले पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि उसने अपराध भले अपने परिजनों के साथ किया है, लेकिन कानून की नज़र में यह समाज के खिलाफ अपराध है।

आरोपी के पिता अपने बच्चों का भविष्य बनाने के लिए पैतृक गांव छोड़कर ग्रेटर नोएडा आए थे।

खबरों के मुताबिक आरोपी को पढ़ाई के लिए घर में डांट पड़ती थी और होशियार बहन के साथ उसकी तुलना होती थी। इस बात से उसके भीतर गुस्सा और तनाव बढ़ता गया, और आखिर में उसने अपनी मां और बहन की हत्या कर दी।

वर्चुअल दुनिया में गुम हो रहे हैं बच्चे

इस अपराधी बच्चे के परिजनों के मुताबिक उसे मोबाइल पर गेम खेलने की आदत थी..वो अक्सर हाई स्कूल गैंगस्टर क्राइम गेम मोबाइल पर खेलता रहता था। यह गेम वेगास क्राइम सिटी और अमेरिकन हाई स्कूल गैंग की कहानी है। इसका मुख्य किरदार जैक है, जो एक बुरा बच्चा है और तरह-तरह के अपराध करता है। इस गेम में अपराध करने के बाद पुलिस से भागना होता है और विरोध करने वाले की हत्या करना होता है। फिलहाल यह नहीं पता कि मां और बहन की हत्या करने वाले किशोर पर इस खेल का कितना असर था, लेकिन एक समाज के रूप में हमारे लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए कि हमारे बच्चे हमसे ही दूर होकर किस तरह वर्चुअल दुनिया में गुम हो रहे हैं।

आपको याद होगा कि कुछ समय पहले ही ब्लू व्हेल गेम से पूरी दुनिया में हाहाकार मचा हुआ था..जबकि इस गेम के कारण हो रही आत्महत्या पर पूरी तरह से काबू नहीं पाया जा सका है।

डिजिटल भारत का उत्पाद

इंटरनेट पर खेले जाने वाले ऐसे कितने ही गेम रोजाना तैयार हो रहे हैं, आखिर कितनों को रोका जा सकता है? डिजिटल भारत बनाने के सपने में यह भी संभव नहीं है कि बच्चों को कम्प्यूटर या मोबाइल से दूर रखा जाए। इस समस्या का उपाय यही है कि हम अपने बच्चों को अपना समय दें। उनके साथ वक्त बिताकर उनकी बातें सुनने का धैर्य रखें। उनकी परेशानियों और तनावों को उनके नजरिए से समझने की कोशिश करें। उन्हें इस तनाव से मुक्त करें कि अगर वे पढ़ाई में अच्छा नहीं कर पाए, तो उनका जीवन बर्बाद हो जाएगा।

बच्चों और किशोरों में भी तेजी से बढ़ रहे हैं यौन अपराध

याद करें, सितम्बर में रायान स्कूल में हुए प्रद्युम्न हत्याकांड में भी एक नाबालिग को आरोपी माना गया है और और उसके लिए भी यही कहा जा रहा है कि परीक्षा से बचने के लिए उसने ऐसा घातक कदम उठाया। अभी पिछले महीने एक और चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जिसमें एक चार साल के बच्चे पर अपनी ही हमउम्र बच्ची के साथ यौनशोषण का आरोप लगा है। महज चार साल की अबोध अवस्था में, जब बच्चा अपने आसपास की दुनिया को आंख खोलकर देखना शुरू करता है, ऐसा गंभीर अपराध असंभव बात लगती है। लेकिन यह कड़वी सच्चाई है कि बच्चों और किशोरों में यौन अपराध भी तेजी से बढ़ रहे हैं। आपको याद होगा निर्भय गैंगरेप कांड..जिसमें सबसे ज्यादा बर्बरता नाबालिग अपराधी ने ही की थी।

दस साल में बीस गुना बढ़ गई किशोर अपराधियों की संख्या

एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं, कि साल 2003 में दुष्कर्म के आरोप में गिफ्तार होने वाले नाबालिग अपराधियों की संख्या 535 थी, जबकि साल 2013 में यह संख्या बढ़कर 10,693 तक जा पहुंची थी। दस साल में किशोर अपराधियों की संख्या में यह इजाफा डरावना है। बलात्कार, हत्या, चोरी ये सारे अपराध क्या सचमुच अब बच्चों का खेल हो गए हैं? अगर ऐसा है, तो क्या इसके लिए हम बच्चों को जिम्मेदार ठहराएंगे या यह कहेंगे कि बच्चे, अपने बड़ों से ही सीखते हैं। और आज के बच्चे अपने चारों ओर केवल नाराजगी, खीझ, कुंठा, तनाव ही तो देख रहे हैं, चाहे वह राजनीतिक हो या सामाजिक। बच्चों की मासूमियत और उनकी भावनाओं को पोषित-पल्लवित करें, ऐसा सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, शैक्षणिक और राजनीतिक माहौल हम कहां दे रहे हैं? सच तो ये है कि मुल्क की मासूमियत खतरे में है और इसका असर हमारे भविष्य पर पड़ेगा, कम से कम यही सोच कर हमें सचेत होना चाहिए।

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