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वसुंधरा जी ! क्या (गो)तस्कर ऐसे ही गरीब होते हैं?

0 राजेंद्र शर्मा

भाजपा के राज में राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में मुसलमान दहशत में जी रहे हैं और मेवात के इलाके के समूचे गरीब मुस्लिम समुदाय पर, अपराधी का ठप्पा ही लगाने की कोशिशें की जा रही हैं।

भूमि अधिकार आंदोलन के तथ्यान्वेषी दल को, गोरक्षा के नाम पर तथा लव जेहाद समेत अन्य बहानों से अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ते हमलों के शिकार भरतपुर, अलवर, राजसमंद तथा उदयपुर जिलों के अपने दो दिवसीय दौरे के क्रम में, बड़े तीखे ढंग से इस सचाई का एहसास हुआ।

सैकड़ों किसान तथा खेत मजदूर संगठनों के इस संयुक्त मंच के तथ्यान्वेषी दल ने 6 तथा 7 जनवरी के अपने दौरे से लौटकर, 8 जनवरी को नई-दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में जारी अपनी आरंभिक रिपोर्ट में अपना यह दो-टूक निष्कर्ष रखा कि,

कानून और व्यवस्था के तंत्र से और भाजपा के नेतृत्ववाली राज्य सरकार से भरोसा पूरी तरह से उठ गया है।

तथ्यान्वेषी दल की विस्तृत रिपोर्ट बाद में जारी की जाएगी। इस दल में केरल से राज्यसभा सदस्य तथा अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव के के रागेश, बंगाल से लोकसभा सदस्य, बद्रुदज्जा खान, बिहार से विधायक व एआइकेएमएस नेता मेहबूब आलम, राजस्थान के पूर्व-विधायक तथा अखिल भारतीय किसान सभा के उपाध्यक्ष, अमरा राम, किसान सभा के संयुक्त सचिव, डा0 वीजू कृष्णन, केरल के पूर्व-विधायक तथा किसान सभा के वित्त सचिव, पी कृष्णप्रसाद, अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन के अध्यक्ष, तिरुनावुक्करासु, सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट पी वी सुरेंद्र नाथ, वरिष्ठ एडवोकेट रेश्मिता आर चंद्रन, एडवोकेट के आर सुभाष चंद्रन, एनएपीएम के राष्ट्रीय संयोजक बिलाल खान, गुजरात से भूमि अधिकार आंदोलन के नेता मुजाहिद नफीस, एआइकेएमएस के उपाध्यक्ष, देवेंद्र सिंह चौहान, एआइकेएमएस की कार्यकारिणी के सदस्य, धीरेंद्र भदौरिया और राजस्थान से भूमि अधिकार आंदोलन से जुड़े किसान सभा नेतागण छगन लाल चौधरी व डा0 संजय माधव, समग्र सेवा संघ के सवाई सिंह, मौलाना हनीफ और इंसाफ के वीरेंद्र विद्रोही शामिल थे। हर जगह, अखिल भारतीय किसान सभा तथा अन्य जनतांत्रिक संगठनों के स्थानीय नेता जानकारियां एकत्रित करने में इस तथ्यान्वेषी दल के साथ रहे।

तथ्यान्वेषी दल के साथ मीडिया की एक टीम भी थी, जिसमें इन पंक्तियों का लेखक भी शामिल था।



उमर खान : गोतस्कर या गोपालक

भूमि अधिकार आंदोलन के तथ्यान्वेषी दल ने अपनी छान-बीन की शुरूआत, भरतपुर जिले की पहाड़ी तहसील के गांव, घाटमिका से की।

पिछली नवंबर की 10 तारीख को इस गांव के गरीब मेव किसान, 42 वर्षीय उमर खान की तथाकथित गोरक्षकों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।

उमर खान को गोली तब मारी गयी जब वह अपने दो साथियों, ताहिर तथा जावेद के साथ टेंपो पर मवेशी ला रहे थे। घटना में उमर की मौत हो गयी जबकि ताहिर के बाजू में गोली लगी और जावेद किसी तरह से बच निकला। बाद में इस हत्या को आत्महत्या/ दुर्घटना का रूप देने के लिए, उमर की लाश दूर ले जाकर रेल की पटरी के पास डाल दी गयी। पूरे दो दिन बाद, 12 नवंबर को लाश मिली थी।

वसुंधरा राजे के राज की पुलिस के रुख का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि पहले तो अलवर पुलिस पुलिस ने, जिसके इलाके में हत्या की यह वारदार हुई थी, उमर की मौत गोली लगने से होने को ही नकारने की कोशिश की। अलवर के अस्पताल से इसी आशय की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी ले लगी।

बाद में, खासतौर पर ताहिर के गोलीबारी का सच उजागर करने पर ज्यादा शोर उठने पर, जयपुर के अस्पताल में दोबारा पोस्टमार्टम कराया गया, तो गोली से उमर की मौत होने का सच सामने आया। इसके बावजूद, भाजपा राज के रुख का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि पुलिस के कथित गोरक्षकों द्वारा गोली मारे जाने की सचाई स्वीकार करने और इस सिलसिले में आठ लोगों की निशानदेही करने के बावजूद, सांसदों व विधायकों के साथ इस तथ्यन्वेषी दल के पहुंच से सिर्फ एक रोज पहले, चार बचे हुए आरोपितों को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। दूसरी ओर, गोरक्षकों के हमले में गोली से घायल हुआ ताहिर और जावेद, हमले के बाद से ही ‘‘गोतस्करी’’ के आरोप में जेल में बंद हैं और उनकी जमानत नहीं हुई है।

घाटमिका गांव में उमर खान के शोक संतप्त से मिलने तथ्यान्वेषी दल का उसके घर जाना, खुद ही अनेक तथ्य सामने ले आया।

आठ छोटे-छोटे बच्चों के बाप, जिनमें सबसे बड़ा महज अठारह साल का है, उमर की हत्या ने मुश्किल से एक-सवा बीघा खेत के मालिक इस परिवार को किस तरह से असहाय कर दिया है, इसका कुछ अंदाजा घटना के दो महीने बाद भी मृतक की बेवा तथा मां ही नहीं बच्चों के भी न रुकते आंसुओं से पता चलता था।

इन बच्चों को धीरज बंधाते-बंधाते, बिहार के विधायक महबूब आलम तो खुद भी रो पड़े।

उमर का कच्चा और कमजोर घर, उसकी घोर गरीबी का प्रत्यक्ष सबूत था।



वास्तव में तथ्यान्वेषी दल में एक सवाल सब की जुबान पर था कि क्या (गो)तस्कर ऐसे ही गरीब होते हैं? बाद में गांव में सरपंच के घर के निकट आयोजित सभा में भूमि अधिकार आंदोलन के स्थानीय नेताओं द्वारा यह जानकारी भी दी गयी कि फिलहाल उनका प्रयास इसी पर केंद्रित है कि इस असहाय परिवार के लिए, जिसे राज्य सरकार तथा प्रशासन की ओर से रत्तीभर सहायता नहीं मिली है, रोजी-रोटी का कोई स्थायी इंतजाम किस तरह किया जाए। योजना इस परिवार को कुछ दूकानें बनाकर देने की है, जिसके लिए चार-पांच लाख रु0 का चंदा इकट्ठा भी हो चुका बताते हैं।

मेवों पर अपराधी का ठप्पा लगाने का खेल

जहां घाटमिका की सभा में तथा स्थानीय लोगों से बातचीत में जहां एक पूरे के पूरे समुदाय की छवि अपराधी और खासतौर पर ‘‘गोतस्कर’’ की बनाए जाने की शासन-प्रशासन की कोशिशों का सच रेखांकित हुआ, जिसका प्रत्यक्ष सबूत पुलिस प्रशासन द्वारा टीम में शामिल सांसदों-विधायकों आदि को दी गयी इस गांव व आस-पास के लोगों के खिलाफ दर्ज पुलिस मामलों की लंबी-चौड़ी सूची थी, इस गांव की वास्तविक स्थिति खुद इस छवि के बेतुकेपन का सबूत पेश कर रही थी। न सिर्फ तथ्यान्वेषी दल ने राष्ट्रीय राजधानी से सिर्फ सवा सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस गांव को ‘घोर उपेक्षा’ का शिकार पाया जहां ‘लोग उपयुक्त सडक़ों, सुसज्जित स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों, पानी की आपूर्ति तथा अन्य बुनियादी सहूलियतों जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं’, बल्कि यह भी दर्ज किया कि ‘मेवात क्षेत्र में पडऩे वाले इस गांव में कभी कोई सांप्रदायिक वारदात नहीं हुई है और हिंदू-मुसलमान पूरी तरह से मिल-जुलकर रहते हैं। इसका कुछ अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उमर के गांव में सिर्फ एक घर हिंदुओं का होने के बावजूद, पिछली बार तक गांव का सरपंच हिंदू रामौतार ही बनता आया था।

सांप्रदायिक ताकतों तथा उनसे प्रभावित प्रशासन द्वारा बनायी जा रही ‘गोतस्कर’ की छवि के विपरीत, पशु पालन से आय पर बहुत ज्यादा निर्भर गरीब मेव, आम तौर पर गोपालक हैं। घाटमिका गांव में ही कम से कम आठ-दस परिवार, सौ-सौ तक गायों को पालने वाले होंगे। इसके पीछे काफी प्रभावशाली आर्थिक तर्क भी है। बराबर का दूध देने वाली भैंस के मुकाबले, गाय आधी से तीन-चौथाई तक कीमत में मिल जाती है और इसलिए गरीब परिवार गाय की रखना ज्यादा पसंद करते हैं। आस-पास के इलाके की पहाडिय़ों में मवेशियों के चरने के लिए काफी सुविधा है, जिससे दूध के लिए पशुपालन सस्ता। इसलिए, मेव समुदाय को गरीबी में गोपालन का ही सहारा है।



इसके बावजूद, वसुंधरा राजे सरकार का प्रशासन, इन गोपालकों को ‘‘गोतस्कर’’ साबित करने में लगा हुआ है। अलवर में तथ्यान्वेषी दल को कलैक्टर तथा एसपी से मुलाकात में जो रुख दिखाई दिया, इसी सचाई की पुष्टि करता था। बाद में दिल्ली में जारी की गयी दल की आरंभिक रिपोर्ट में यह रेखांकित किया गया है कि, ‘गांव के लोगों से, समुदाय के नेताओं से तथा पंचायत के निर्वाचित प्रतिनिधियों से बातचीत में टीम को पता चला कि मेवात क्षेत्र के समूचे मुस्लिम समुदाय पर अपराधी का ठप्पा लगाने की सुनियोजित कोशिश हो रही है। पुलिस विभाग में कुछ तत्व सांप्रदायिक ताकतों के साथ मिलीभगत कर, अल्पसंख्यक समुदाय के गांववासियों पर अपराधी का ठप्पा लगाने की कोशिश कर रहे हैं, जो ब्रिटिश औपनिवेशिक जमाने में कुछ कबीलों को ही अपराधी कबीले घोषित किए जाने की ही याद दिलाता है।

अलवर में, जहां पशुपालक किसानों की हत्या की एक के बाद एक वारदातें हुई हैं, शीर्ष राजस्व तथा पुलिस अधिकारियों से बातचीत करते हुए टीम को अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ भारी पूर्वाग्रह देखने को मिला। इसी पूर्वाग्रह तथा स्पष्ट रूप से पक्षपाती रुख व धार्मिक प्रोफाइलिंग के चलते, मवेशी पालक किसानों के खिलाफ गोतस्करों के रूप में अनेक झूठे मामले दर्ज किए गए हैं और उन्हें सुनियोजित तरीके से परेशान किया जा रहा है। अलवर में कलैक्टर तथा पुलिस सुपरिंटेंडेंट का रुख संवेदनहीन था और वे गोरक्षकों के ही आख्यान को आगे बढ़ा रहे थे।’



पुलिस-गोरक्षक साठ-गांठ

अलवर में स्थानीय लोगों से तथा प्रैस से तथ्यान्वेषी दल के संवाद में कथित गोरक्षकों और पुलिस की साठगांठ का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया। इसी क्रम में यह जानकारी सामने आयी कि पुलिस ने दो जिलों में करीब एक दर्जन तथाकथित गोतस्करी विरोधी चौकियां कायम की हैं। इन चौकियों में मामूली संख्या में तैनात किए गए पुलिस के सिपाही, गोतस्करों की कथित रोक-थाम के लिए, कथित गोरक्षकों पर ही निर्भर हैं।

दूसरी ओर, पुलिस के साथ गठजोड़ इन कथित गोरक्षकों के हौसले बढ़ाता है और वे न सिर्फ मवेशी ले जा रहे वाहनों आदि पर बढ़ते पैमाने पर हमले कर रहे हैं बल्कि इन हमलों में घातक हथियारों का भी प्रयोग कर रहे हैं। ऐसे हमले के हरेक मामले में पुलिस, हमले के शिकारों पर ही गोतस्करी का केस थोप देती है। और यह तो भाजपा राज में राजस्थान में प्रशासन ने कायदा ही बना लिया है कि ऐसे हमलों में मौत होने की सूरत में भी कोई मुआवजा नहीं दिया जाता है क्योंकि मरने वालों/ घायलों को पहले ही ‘‘गोतस्कर’’ करार दिया जा चुका होता है।

अलवर में तथ्यान्वेषी दल की मुलाकात 22 वर्षीय तालीम के परिवारवालों से भी हुई। कथित गोतस्करविरोधी अभियान के नाम पर पुलिस की गोली से मौत के इस ताजातरीन मामले को फर्जी मुठभेड़ में हत्या का मामला करार देते हुए, पीड़ित परिवार ने ध्यान दिलाया कि तालीम को कनपटी से रिवाल्वर सटाकर गोली मारी गयी थी। हत्या के कई दिन बाद तक एफआईआर भी दायर नहीं की गयी थी, जबकि सामाजिक कार्यकर्ताओं से पुलिस अधिकारियों ने कहा था कि सरकार ने पुलिसवालों को मुठभेड़ में गोली चलाने का अधिकार दिया हुआ है। यह पहलू खान की हत्या समेत, अलवर जिले में ही एक ही साल में गोरक्षा के नाम पर हत्या का तीसरा मामला था।



अफराजुल : हिंदुत्ववादी बर्बरता

राजसमंद में, जहां बंगाली मजदूर, अफराजुल की नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी गयी थी और इस बर्बर कांड का वीडियो बनवाया गया था और सोशल मीडिया पर डाला गया था, तथ्यान्वेषी दल ने कलैक्टर तथा पुलिस सुपरिंटेंडेंट से मुलाकात इस केस में प्रगति की जानकारी ली। यहां प्रशासन तथा पुलिस का रुख आम तौर पर सहयोगपूर्ण लगा। शासन के एक हिस्से तथा उसके समर्थकों की हत्यारे शंभूलाल रैगर को किसी न किसी तरह से ‘पागल हत्यारा’ बनाकर पेश करने की कोशिशों के विपरीत, पुलिस सुपरिंटेंडेंट ने तथ्यान्वेषी दल से बातचीत में स्पष्ट शब्दों में उसे ‘सोचे-समझे तरीके से हत्या करने वाला’ करार दिया। पुलिस व प्रशासन ने ध्यान दिलाया कि उसने हत्या की बाकायदा साजिश रची थी और सुनियोजित तरीके से ‘लव जेहाद’ का झूठा बहाना प्रचारित करने की कोशिश की थी। उसने एक 15 वर्षीय बच्चे को हत्या का अपना साझीदार बनाते हुए, उसे इस बर्बर कांड का वीडियो बनाने के लिए प्रशिक्षण दिया था।

अधिकारियों ने यह भी बताया कि यह क्षेत्र सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए जाना जाता है और उक्त हत्याकांड इस क्षेत्र में अशांति फैलाने की सोची-समझी तथा स्वार्थप्रेरित कोशिश का ही मामला लगता है।

बाद में राजसमंद के लोगों, खासतौर पर मजदूरों के साथ हुई तथ्यान्वेषी दल की मुलाकात ने भी इसी धारणा की पुष्टि की।

अधिकारीगण ने यह भी रेखांकित किया कि हत्यारे के परिवार के खाते में बाहर से चंदा भिजवाने की तत्ववादियों की कोशिशों को, उक्त खाते को जाम करने की कार्रवाई के जरिए तत्परता से विफल किया गया था। दूसरी ओर, अफराजुल के परिवार को 5 लाख रु0 का मुआवजा देने का भी एलान किया गया है। अफराजुल के परिवार के घटना के बाद बंगाल में अपने गांव चले जाने के चलते, तथ्यान्वेषी दल उससे मुलाकात नहीं कर पाया।

उदयपुर में हुई जन-सुनवाई में तथ्यान्वेषी दल का सामना सत्ताधारी भाजपा तथा संघ परिवार द्वारा पैदा किए गए बहुत ही तनावपूर्ण हालात और ऐसे हालात में एक ओर सांप्रदायिक हमले तथा दूसरी ओर पुलिस की जोर-जबर्दस्ती झेल रहे अल्पसंख्यक समुदाय की लाचारी की स्थिति सामने आयी।

उदयपुर में सांप्रदायिक हमलों के ताजा चक्र का संबंध, अफराजुल हत्याकांड से भी है। इस हत्याकांड के विरुद्घ तथा कुछ अन्य मुद्दों को लेकर, 8 तरीख को मुस्लिम समुदाय की ओर से यहां एक प्रदर्शन हुआ था। इसके जवाब के नाम पर, 14 दिसंबर को हिंदुत्ववादियों का उग्र तथा हिंसक प्रदर्शन हुआ, जिसके खिलाफ पुलिस को कार्रवाई भी करनी पड़ी।

इसी प्रदर्शन के हिस्से के तौर पर जिला अदालत पर केसरिया झंडा फहराने जैसी संविधान व कानूनविरोधी हरकत भी की गयी थी। बाद में, इस उग्र प्रदर्शन के लिए हिंदुत्ववादी तत्वों के खिलाफ कार्रवाई को संतुलित करने के लिए, पुलिस ने हफ्ते भर पहले के प्रदर्शन के नाम पर मुसलमानों की धर-पकड़ का अभियान छेड़ दिया।



हिंदुत्ववादी राज में

       काज़ी शफी मोहम्मद ने पुलिस के बिना वारंट, रात में किसी भी समय पर मुसलमानों के घरों पर गिरफ्तारी के लिए छापे मारने, घर की औरतों-बच्चों को तंग करने तथा आमतौर प

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