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Veer Savarkar

अगर माफी ‘वीर’ सावरकर प्रधानमंत्री बने होते तो !

यह सोचना मासूमियत की पराकाष्ठा होगी कि चुनावों के ऐन मौके पर शिवसेना सुप्रीमो द्वारा सावरकर का यह महिमामंडन स्वत:स्फूर्त किस्म का था। एक तरफ, उसका मकसद था इस भावनात्मक मुद्दे को उठा कर कुछ वोट और हासिल किए जाएं; दूसरे, इस मराठी आयकन का शिवसेना द्वारा प्रोजेक्शन करके एक तरह से ‘सीनियर सहयोगी’ भाजपा को असुविधाजनक स्थिति में डालने की साफ मंशा थी जो पटेल के बारे में- जो गुजराती थे- हमेशा स्तुतिसुमन अर्पित करती रहती है। तीसरे, इस बात को धीरे से रेखांकित करना कि सावरकर के प्रति संघ-भाजपा का प्रेम दरअसल बहुत हाल में उपजा है।

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पिछले पांच साल से अधिक अर्से से हम सभी भाजपा की तरफ से प्रायोजित इस बहस से वाकिफ हैं। बर्तानिया की हुकूमत के खिलाफ खड़े स्वाधीनता आन्दोलन की इन दो अजीम शख्सियतों के बीच एक उनकी तरफ से एक छद्म दीवार खड़ी करने की कोशिश लगातार की जाती रही है जो खुद अपने आप को ‘गांधी के सिपाही’ कहते थे।

बहरहाल, हिन्दुत्व की हिमायती जमातों में जो आपसी तफरका/दूरियां मौजूद हैं, उसके नतीजतन अब यह देखने में आ रहा है कि पटेल के लिए हिन्दुत्व के हिमायतियों में से ही एक नया ‘प्रतिद्वंद्वी’ सामने आ रहा है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह ‘बेहतर प्रधानमंत्री’ हो सकता था।

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जनाब उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray), जो अपने पिता की मौत के बाद अब शिवसेना के मुखिया हैं और फिलवक्त जिनकी पार्टी भाजपा की जूनियर सहयोगी के तौर पर सक्रिय हैं, ने पिछले दिनों एक किताब के विमोचन के वक्त यह बात साफ कर दी। उन्होंने कहा कि अगर ‘वीर सावरकर प्रधानमंत्री बने होते तो पाकिस्तान वजूद/अस्तित्व में ही नहीं आता’। उन्होंने अपनी तकरीर/भाषण में नेहरू को ‘वीर’ कहने से भी इन्कार किया और यह एकांतिक किस्म का बयान दिया कि ‘सावरकर ने जिस तरह 14 साल जेल में बिताए उस तरह सिर्फ 14 मिनट ही नेहरू ने जेल में बिताए होते तो उन्होंने नेहरू को वीर कहा होता।’

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जाहिर सी बात है कि यह हकीकत है कि नेहरू ने अपनी जिन्दगी के नौ साल उपनिवेशवादियों की जेल में बिताए और तमाम तकलीफों के बावजूद अपने उसूलों से समझौता नहीं किया और इसके बरअक्स सावरकर द्वारा जेल में बिताए 14 सालों में उन्होंने सजा में माफी की गुहार लगाते हुए ‘माई बाप’ ब्रिटिश सरकार के पास कई दया याचिकाएं भेजीं, उनके लिए कोई मायने नहीं रखती।

द्वि-राष्ट्र का सिद्धांत” के जनक सावरकर, the father of “two-nation theory”

अधिक चिन्ताजनक बात यह थी कि यह महज वैकल्पिक नजरिये की प्रस्तुति नहीं थी बल्कि जनाब ठाकरे ने /कांग्रेस के एक नेता का नाम लेते हुए साफ कहा/ कि ‘सावरकर का अपमान करने के लिए उन्हें जूते से पीट दिया जाए।’

यह तथ्य कि कांग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर ने खुल कर कहा था कि सावरकर ने खुद द्विराष्ट्र का सिद्धांत प्रस्तावित किया था और उन्होंने ही हिन्दुत्व शब्द को परिभाषित किया था, यही बात ठाकरे को नागवार गुजरी थी। निश्चित ही उन्हें यह जानने से कोई सरोकार नहीं था कि वर्ष 1937 में अहमदाबाद में आयोजित हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अधिवेशन में अध्यक्ष पद से बोलते हुए सावरकर ने यही बात कही थी कि भारत में दो राष्ट्र बसते हैं:

”भारत में दो विरोधी राष्ट्र एक साथ बसते हैं, कई बचकाने राजनेता यह मानने की गंभीर गलती करते हैं कि भारत पहले से ही एक सदभावपूर्ण मुल्क बन चुका है या यही कि ऐसी महज इच्छा होना ही काफी है। हमारे यह सदिच्छा रखनेवाले लेकिन अविचारी मित्र अपने ख्वाबों को ही हकीकत मान लेते हैं। इसके चलते ही वह साम्प्रदायिक विवादों को लेकर बेचैन रहते हैं और इसके लिए साम्प्रदायिक संगठनों को जिम्मेदार मानते हैं। लेकिन ठोस वस्तुस्थिति यह है कि कथित साम्प्रदायिक प्रश्न हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सदियों से चले आ रहे सांस्कृतिक, धार्मिक और राष्ट्रीय शत्रुता… की ही विरासत है… भारत को हम एक एकजुट और समरूप राष्ट्र के तौर पर समझ नहीं सकते, बल्कि इसके विपरीत उसमें मुख्यत: दो राष्ट्र बसे हैं: हिन्दू और मुसलमान। ‘(वी डी सावरकर, समग्र सावरकर वांग्मय हिन्दू राष्ट्र दर्शन 1963, पृ  296)।

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एक साल बाद उन्होंने कहा- ‘हिन्दू भारत में एक राष्ट्र हैं- हिन्दुस्तान में और मुस्लिम अल्पसंख्यक एक समुदाय हैं।’

याद रहे, जिन्ना ने 1939 में द्विराष्ट्र सिद्धांत पेश किया- सावरकर द्वारा इसे पेश किए जाने के दो साल बाद। यह उस वक्त के राजनीतिक माहौल का प्रतिबिम्बन था कि आर सी मजूमदार, ऐसे इतिहासकार, जिन्हें संघ परिवार के नज़रिये के प्रति सहानुभूति रखने वाले विद्वान के तौर पर जाना जाता है, उन्होंने स्वीकारा था कि  ‘एक महत्वपूर्ण कारक था जो भारत के साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन के विचार के उद्भव के लिए काफी हद तक जिम्मेदार था। वह था हिन्दू महासभा।’ ( आर सी मजूमदार, स्ट्रगल फॉर फ्रीडम, RC Majumdar, Struggle for Freedom, पृ  611)।

Savarkar’s glorification by Shiv Sena supremo

यह सोचना मासूमियत की पराकाष्ठा होगी कि चुनावों के ऐन मौके पर शिवसेना सुप्रीमो द्वारा सावरकर का यह महिमामंडन स्वत:स्फूर्त किस्म का था। एक तरफ, उसका मकसद था इस भावनात्मक मुद्दे को उठा कर कुछ वोट और हासिल किए जाएं; दूसरे, इस मराठी आयकन का शिवसेना द्वारा प्रोजेक्शन करके एक तरह से ‘सीनियर सहयोगी’ भाजपा को असुविधाजनक स्थिति में डालने की साफ मंशा थी जो पटेल के बारे में- जो गुजराती थे- हमेशा स्तुतिसुमन अर्पित करती रहती है। तीसरे, इस बात को धीरे से रेखांकित करना कि सावरकर के प्रति संघ-भाजपा का प्रेम दरअसल बहुत हाल में उपजा है।

यही कुंठा सावरकर के आगे वीर लगाकर भगत सिंह के समकक्ष खड़ा करने की कोशिश करती है

याद किया जा सकता है पोर्ट ब्लेयर के सेल्युलर जेल से सावरकर की नामपट्टिका हटाने का प्रसंग /2004/ और किस तरह विक्रम सावरकर, जो सावरकर के अपने भतीजे थे, उनके द्वारा एक राष्ट्रीय अखबार को दिया गया साक्षात्कार, जिसमें उन्होंने सावरकर के प्रति भाजपा के रुख को बेपर्दा किया था और उनके प्रति अचानक उमड़े उसके प्रेम की असलियत उजागर की थी:

‘इस बात को रेखांकित किया जा सकता है कि उन्होंने भाजपा के वरिष्ठ नेताओं पर यह आरोप लगाया था कि ‘पोर्ट ब्लेयर के सेल्युलर जेल से उनके चाचा की नामपट्टिका हटाने के मसले पर वह खामोश रहे।’ उनके मुताबिक राम कापसे, जो अंडमान और निकोबार द्वीपसमूहों के लेफ्टिनेंट गवर्नर के पद पर आसीन थे और पूर्व सांसद राम नाइक / दोनों भाजपा नेता…/ ”बिल्कुल खामोश रहे जब नामपट्टिका हटाई गई।”

रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया गया था कि  ”… सावरकर में भाजपा की रुचि की कमी की बात उन्हें आश्चर्यचकित नहीं करती। ”हम अच्छी तरह जानते हैं कि भाजपा और राष्टीय स्वयंसेवक संघ दोनों ने कभी भी सावरकर के दर्शन को स्वीकारा नहीं।’ रिपोर्ट बताती है कि  ‘/विक्रम/ सावरकर इस बात पर जोर देते हैं कि सावरकर के प्रति भाजपा का हालिया प्रेम दरअसल आंखों में धूल झोंकना है।’  ‘इसका मकसद महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में मतदाताओं को लुभाना है।’ / अगस्त 30, 2004, इंडियन एक्स्प्रेस/

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निश्चित ही सावरकर की ‘महानता’ के इर्द-गिर्द जारी बहस को हम हिन्दुत्व खेमे की आपसी लड़ाई तक सीमित नहीं कर सकते और इस बात की सख्त जरूरत है कि व्यापक अन्तर्क्रिया के लिए इस समूचे मुद्दे को खोला जाए। सावरकर के जीवन में हम दो चरणों को साफ देख सकते हैं।

पहला चरण, जब उन्हें ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जारी अपनी जुझारू सक्रियताओं के चलते दो उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी और अंडमान के जेल भेजा गया था, यही वह दौर था जब वह हिन्दू एवं मुस्लिम एकता के हिमायती थे और दूसरा चरण तब शुरू होता है जब वह जेल के अन्दर से ब्रिटिश सरकार को दया याचिकाएं भेजना शुरू करते हैं और हिन्दू एकता के हिमायती हो जाते हैं, यहां तक कि हिन्दू राष्ट्र के सिद्धांत के प्रस्तुतकर्ता बनते हैं। 28 मई 1883 को एक मराठी ब्राह्मण परिवार में जनमे सावरकर ब्रिटिश-विरोधी आन्दोलन की तरफ आकर्षित हुए और वह स्कूल के दिनों में ही मैजिनी के ‘यंग इटली’ जैसे अनुभव से प्रेरणा पाकर अभिनव भारत सोसायटी बनाने में कामयाब हुए थे। बाद में वह कानून की पढ़ाई करने के लिए लन्दन चले गए, जहां वह और रैडिकल राजनीतिक गतिविधियों में जुड़ते गए।

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ब्रिटिशों के खिलाफ खड़े 1857 के विद्रोह से प्रेरणा लेते हुए तथा उसके मकसद को व्यापक आबादी तक पहुंचाने के मकसद से उन्होंने मराठी में एक ग्रंथ भी लिखा जिसका शीर्षक था ‘1857 का भारत का स्वाधीनता संग्राम’ जिसमें हिन्दू-मुस्लिम एकता के बारे में- जो इस युद्ध के दौरान साफ प्रगट हुई थी- ढेर सारी अच्छी बातें लिखी गयीं थीं। इस किताब को 1857 के शहीदों को समर्पित किया गया था और जिन वीरों, वीरांगनाओं के नाम इसमें लिखे गए थे वह थे मंगल पांडे, रानी लक्ष्मीबाई, नानासाहब, मौलवी अहमद शाह, अजीमुल्ला खान, तात्या टोपे, बहादुरशाह जफर, बेगम हजरत महल और कई अन्य।

सावरकर ने इस ग्रंथ का समापन हिन्दोस्तां के आखरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की गजल की पंक्तियों के साथ किया था: गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख्ते लंदन तक चलेगी तेग हिन्दोस्तान की। सावरकर का यह मानना था कि यह विद्रोह फ्रेंच और अमेरिकी इन्कलाब के समकक्ष था।

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इस किताब की ‘विस्फोटक अन्तर्वस्तु’ को देखते हुए सरकार ने इस किताब पर तत्काल पाबंदी लगा दी और इसके बावजूद इस किताब के कई संस्करण निकले तथा वह कई अन्य भाषाओं में अनूदित भी हुई। बाद में उन्हें ऐसी ही रैडिकल गतिविधियों के लिए तथा भारत में चल रही समानान्तर ऐसी ही गतिविधियों से रिश्ते बनाए रखने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार किया गया और उन्हें दो उम्र कैद की सजा सुनाई गई तथा अंडमान के सेल्युलर जेल भेजा गया।

ऐसा प्रतीत होता है कि जेल के सख्त जीवन ने- जिसे अन्य कैदियों द्वारा बिना किसी समझौते के साथ बरदाश्त किया जा रहा था – उन्हें तोड़ दिया और जल्द रिहाई के लिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार के पास याचिकाएं भेजना शुरू किया। काफी समय बाद ब्रिटिश सरकार ने उनकी इन याचिकाओं पर गौर किया और उन्हें घर भेजा गया, लेकिन उन पर प्रतिबंध कायम रहे तथा उन्हें निर्देश दिया गया कि वह राजनीतिक गतिविधियों से न जुड़ें। उन्हें अंतत: तभी रिहा किया गया जब भारत के सूबों में चुनाव हुए और तत्कालीन मुंबई प्रांत में कांग्रेस के नेतृत्ववाली सरकार बनी।

Did Savarkar really want a united India!

अगर हम उस बहस की तरफ फिर लौटें कि क्या उद्धव ठाकरे के इस दावे में कोई दम है कि भारत अखंड बना रहता अगर सावरकर प्रधानमंत्री बने होते? तुरंत सवाल उठता है कि क्या सावरकर वाकई अखंड भारत चाहते थे!

द्विराष्ट्र सिद्धांत के इस मूल प्रस्तुतिकर्ता ने वर्ष 1943 के अगस्त में एक मीडिया सम्मेलन में यह बात कही थी, जिसे पिछले दिनों कांग्रेस पार्टी ने अपने आधिकारिक टिवटर हैण्डल से साझा किया था: ”विगत तीस सालों से हम भारत की भौगोलिक एकता की इस विचारधारा से परिचित हुए हैं और कांग्रेस इस एकता की मजबूत हिमायती रही है, लेकिन अल्पसंख्यक मुसलमान, जो कम्युनल अवार्ड के बाद एक के बाद एक छूटें मांग रहे हैं, अब इस दावे के साथ सामने आए हैं कि वह एक अलग राष्ट्र हैं। मुझे जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत से कोई परेशानी नहीं है। हम हिन्दू अपने आप में एक राष्ट्र हैं और यह एक ऐतिहासिक हकीकत है कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं।’

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इस तरह जनाब उद्धव ठाकरे का यह दावा अर्थहीन है। एक ऐसा शख्स जो ऐलानिया तौर पर द्विराष्ट्र सिद्धांत का अग्रणी विचारक था, वह अखंड भारत की अगुआई नहीं कर सकता था। यह कहना उसी तरह का होगा कि ब्रिटिशों के चले जाने के बाद जिन्ना अखंड भारत की अगुआई कर सकते थे।

वैसे सावरकर की अपनी स्थिति क्या थी चालीस के दशक के पूर्वार्द्ध में जब उपनिवेशवाद के खिलाफ खड़ी कांग्रेस पार्टी और समाज के अन्य रैडिकल धड़े ब्रिटिशों के खिलाफ ‘करो या मरो’ का संघर्ष चला रहे थे? यह बात अब इतिहास हो चुकी है कि किस तरह उस दौर में हिन्दुत्व की हिमायती ताकतों ने समझौतापरस्ती का रुख अख्तियार किया था। विदित है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ से अपने आप को दूर रखा था, मगर सावरकर उनसे भी एक कदम आगे बढ़ गए थे। उन दिनों वह भारत के दौरे पर निकले थे और घूम-घूम कर सभाओं में, मीटिंगों में हिन्दू युवकों का आह्वान कर रहे थे कि वह सेना में भरती हो। ‘हिन्दुओं का सैन्यीकरण करो और राष्ट्र का हिन्दुकरण करो’ का उनका केन्द्रीय नारा एक तरह से बढ़ते जनान्दोलनों से निपट रही ब्रिटिश सरकार की दमन की कोशिशों के लिए मददगार साबित हो रहा था।

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एक तरफ जहां कांग्रेस पार्टी ने अलग-अलग प्रांतों में संचालित उसकी सरकारों को यह निर्देश दिया कि वह अपनी सरकारों से इस्तीफा दें, वहीं सावरकर की अगुआईवाली हिन्दू महासभा उसी अंतराल में सिंध, उत्तर पश्चिमी प्रांत और बंगाल में मुस्लिम लीग के साथ सत्ता में साझेदारी कर रही थी और अपनी इस समझौतापरस्ती को यूं उचित ठहरा रही थी: ‘व्यावहारिक राजनीति में भी महासभा जानती है कि हमें उचित समझौतों के रास्ते ही आगे बढ़ना पड़ेगा।’   (वी डी सावरकर , समग्र सावरकर वांग्मय हिन्दू राष्ट्र दर्शन 1963पृ  479-480)

यह जानना महत्वपूर्ण है कि इसके बावजूद कि हिन्दू महासभा मुस्लिम लीग के साथ सत्ता में साझेदारी कर रही थी, और इसके बावजूद कि हिन्दू युवकों को ब्रिटिश सेना में भरती कराने के अभियान में सावरकर मुब्तिला रहे थे, खुद ब्रिटिश उन्हें ‘चूका हुआ कारतूस’ समझते थे। ए जी नूरानी, संवैधानिक विशेषज्ञ और राजनीतिक विश्लेषक, अपनी किताब ‘सावरकर एण्ड हिन्दुत्व’ /पेज 92, लेफटवर्ड, 2019/ में इंडिया आफिस के जान पर्सिवल गिब्सन – जो उन दिनों राजनीतिक विभाग के मुखिया थे – की एक बैठक के मिनट के अंश साझा करते हैं। उनके मुताबिक, उन्होंने 1 अगस्त 1944 को ब्रिटिश सरकार को लिखा था कि ‘वह इस बात को जरूरी नहीं समझते कि सावरकर द्वारा सेक्रेटरी आफ स्टेट, इंडिया को भेजे गए तार की स्वीकृति दी जाए।

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मालूम हो कि जनाब लिओपाल्ड एस अमेरी, जो सेक्रेटरी आफ स्टेट थे, को जुलाई 26, 19क्व44 को सावरकर ने एक तार भेजा था जिसमें यह दावा किया गया था कि ‘महासभा हिन्दुओं का अखिल भारतीय प्रतिनिधित्ववाली एकमात्र संस्था है’। नूरानी इस बात को नोट भी करते हैं कि ऐसे राजनेता जिनका आभामंडल खतम होता जाता है, उसी तर्ज पर सावरकर चल रहे थे। खबरों में बने रहने के लिए सावरकर नियमित प्रेस विज्ञप्ति जारी करते रहते थे और इस बात का भी ध्यान रख रहे थे कि ऐसे बयान अधिकाधिक एकांतिक किस्म के हों। एक पुरानी स्कॉटिश कहावत है जो कहती है कि  ”अगर इच्छाएं अश्व होतीं तो भिक्षुक भी उस पर सवार होते।’

जनाब ठाकरे के बोल उसी तर्ज पर प्रकट हो रहे हैं। निश्चित ही शिवसेना के इस नए सुप्रीमो इस हकीकत से वाकिफ भी नहीं होंगे कि किस तरह सावरकर ने त्रावणकोर के दीवान अय्यर की जल्द जल्द तारीफ करने में वक्त नहीं गंवाया था, जब अय्यर ने त्रावणकोर को आजाद घोषित करने का दुस्साहस किया था। फ्रंटलाइन में प्रकाशित ए जी नूरानी का उपरोक्त लेख / जिसमें वह सी पी रामस्वामी अय्यर के दो चरित्रों की समीक्षा करते हैं/ उजागर करता है: ‘सर सी पी रामस्वामी अय्यर, जो त्रावणकोर के दीवान थे, उन्होंने अपने राज्य को भारत से स्वतंत्र घोषित किया था। यह दुस्साहस यहीं समाप्त नहीं हुआ था। उन्होंने बहादुरी के साथ और बेहद जल्दबाजी में त्रावणकोर राज्य से एक राजदूत भी जिन्ना के पाकिस्तान भेजा था और इस तरह अपने आप को आजाद भारत और समग्र भारत के दुश्मन के तौर पर पेश किया था। और, इस देशद्रोह के लिए आखिर भारत में से किसने उनकी हौसलाआफजाई की? और कौन लेकिन ‘वीर’ सावरकर?’

और सबसे अन्त में, शिवसेना द्वारा सावरकर का यह प्रशस्तिगान दरअसल 90 के दशक में राज्य में कायम शिवसेना-भाजपा की पहली हुकूमत / जिसमें शिवसेना सीनियर पार्टनर थी / के अपने रेकार्ड से विपरीत जान पड़ता है, जब उद्धव के पिता बाल ठाकरे के हाथ में इस हुकूमत का रिमोट कंट्रोल था / जिसका वह बाकायदा दावा करते थे/। जनाब उद्धव ठाकरे को यह स्पष्टीकरण देना ही होगा कि आखिर इस पूरे अंतराल में जबकि उन्होंने हुकूमत संभाली थी, उन दिनों उनका सावरकर प्रेम कहां खो गया था, आखिर क्यों नहीं राज्य विधानसभा में सावरकर का अदद पोर्टेट लगाने के बारे में भी उन्होंने नहीं सोचा।

आखिर सावरकर की ‘महान विरासत’ – जिसकी बात वह बढ़चढ़ कर करते दिखते हैं, उन्होंने उस ‘विरासत’ से इतनी दूरी क्यों बना रखी थी?

सुभाष गाताडे

About Subhash Gatade

Subhash Gatade ( born 1957) is a left activist, writer and translator. He has done M Tech ( Mech Engg 1981) from BHU-IT, Varanasi. He has authored few books including Modinama : On Caste, Cows and the Manusmriti ( Leftword, in press), Charvak ke Vaaris ( Authors Pride, Hindi, 2018), Ambedkar ani Rashtriya Swayamsevak Sangh ( Sugava, Marathi, 2016), Beesavi Sadi Mein Ambedkar ka Sawal ( Dakhal, Hindi, 2014), Godse ki Aulad ( Pharos, Urdu, 2013) , Godse’s Children – Hindutva Terror in India (Pharos, 2011), The Saffron Condition ( Three Essays, 2011) He also occasionally writes for children. Pahad Se Uncha Aadmi ( NCERT, Hindi, 2010)

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