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Anna Hazare Arvind Kejriwal

मॉब लिंचिंग : क्या अन्ना आंदोलन से समाज को भीड़तंत्र और अराजकता की तरफ ले जाने की शुरूआत हुई ?

वर्तमान भारतीय समाज का एक बड़ा तबका जो आबादी के आधार पर बहुसंख्यक है।  वह आबादी तेजी से पर-पीड़ा सुखदायी समाज की ओर बढ़ता जा रहा है। हर दिन हमें संचार व समाचार-पत्रों में अल्पसंख्यक के उपर हमलों व उनकी निर्मम हत्या की खबरें आ रही हैं। यह सभी घटनाएं एक उन्मादी भीड़ के जरिये की जा रही हैं, जिस भीड़ की बागड़ोर ऐसे लोगों के बीच है जो समाज में यह स्वीकारने के लिए भी नहीं तैयार है कि ये हमारे लोग हैं। इन सभी घटनाओं को जनता के फैसले का नाम दिया जा रहा है। यहीं से लोकतंत्र में फ़िर से कुछ बुनियादी सवाल को जन्म देते हैं। जिनमें से एक सवाल जनतंत्र बनाम जनवाद की है। जो समाज में हिंसा को ओछी सामाजिक स्वीकृति के नाम पर बढ़ावा, व इन घटनाओं का महिमामंडन कर रहे हैं। जिनके समर्थन में जनप्रतिनिधियों का भी एक तबका है।

लिबरल डेमोक्रेसी (Liberal Democracy) या उदारतावादी जनतंत्र का वजूद में आना एक सौदे का नतीजा कहा जा सकता है। जिसके तहत संपत्ति की मिल्कियत का सवाल चर्चा से बाहर कर संपत्ति के अधिकार (right to Property) को मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) की हैसियत से नवाजा जाता है। लिहाजा, बराबरी का सवाल अवसरों की बराबरी में तब्दील हो जाता है और व्यक्तिगत आजादी को सर्वोपरि मूल्य का दर्जा दे दिया जाता है। अवसरों की बराबरी हासिल करने के लिए संपत्ति के पुर्नवितरण की सैद्धांतिक दावेदारी संभव नहीं रह जाती। बराबरी और आजादी इस तरह उदारतावादी दर्शन में एक-दूसरे के विरोधी बन जाते हैं इस तरह जनता की नाक में नकेल डाल दी जाती है। धीरे-धीरे उदारतावाद जनतंत्र को अपनी गिरफ्त में जकड़ लेता है और नुमाइंदगी की व्यवस्था जनतंत्र का पर्याय मान ली जाती है आज यह बात हमारी सामूहिक याददाश्त से भी गायब हो चुकी है कि जनतंत्र और नुमाइंदगी में कोई सीधा स्वभाविक और जरूरी रिश्ता नहीं है।

एक तरफ़ राष्ट्रवाद के नाम पे लोगो को लामबंदी की जा रहीं थी तो दूसरी तरफ़ प्रतिनिधित्व संस्थाओं को लोकत्रंत की रीढ़ बताया जा रहा था। समाजवादी परंपरा और मार्क्सवाद के आविर्भाव के साथ जन समूह के बारे में यह नकारात्मकता रुख काफी हद तक बदला और माना जाने लगा कि आम लोग ही इतिहास के निर्माता होते हैं, मार्क्स के लिए कोई औपचारिक पद्धतिगत व्यवस्था नहीं है जनतंत्र, जिसे किसी कानून के अंतर्गत रख दिया जा सके। मार्क्स खुद कभी भी संपत्ति की दासता को कबूल नहीं करते क्योंकि अवसरों का सीधा ताल्लुक समाज में व्याप्त गैर बराबरी से है जिसके मूल में संपत्ति का सवाल है।

लोक परंपरा का इतिहास (History of folk tradition) हमें प्राचीन यूनान में भी मिलता है परंतु वह नागरिकता के उदारवादी परंपरा से बिल्कुल अलग है क्योंकि यूनानी खयाल एक सतत सक्रिय नागरिक जमात पर टिका है जबकि आधुनिक युग में सक्रिय नागरिकता का ख्याल गणराज्यवाद या रिपब्लिकेनिज्म में देखने को मिलता है इन सब चीजों के बावजूद जनतंत्र या लोक एक नकारात्मक रुख लगातार बना ही रहता है। इसी नकारात्मक रुख का परिणाम हम उन्नीसवीं सदी में यूरोप के क्रांतिकारी उभारों में मास डेमोक्रेसी के रूप में देखते हैं।

इन सब यात्राओं का परिणाम हमारे सामने कुछ बहंसों को लेकर आता है जो जनतंत्र बनाम जनवाद तथा आधुनिकता और लोकतंत्र के द्वंदात्मक मसलों पर बात करने की वक़ालत करता है।

Criticism of democracy

पिछले कुछ सालों में हमारे यहां लोकतंत्र को लेकर ताजा बहस भी चल रही है जिसमें मार्क्सवादी खेमे से जनतंत्र की आलोचना की जाती है जिसमें मुख्य रूप से अरुंधति राय समेत कई लेखक व बुद्धिजीवी का मानना है कि यह जनतंत्र झूठा है क्योंकि इसकी आधार पूंजीवादी व्यवस्था पर टिकी हुई है। इनकी आलोचना का विकल्प उस समाजवादी जनतंत्र पर टिका है जिसके बारे में कोई नहीं जानता कि वह कैसा होगा।

अन्ना हजारे के आंदोलन के वजूद में आने के बाद एक नई बहस का आगाज हुआ जो किसी बिल को लेकर लोगों का एक बहुत बड़ा तबका सड़क पर था जो इन प्रश्नों को फिर से केंद्र में लाती है कि क्या जनता का काम केवल पाँच सालों में एक बार वोट डालना है, हालांकि यह सवाल पहली बार नहीं उठा था मगर पिछले सवालों में से इस प्रकार अलग था कि इस बार यह सवाल किसी राजनीतिक दल के नेता के तरफ से नहीं बल्कि पूरी तरह से औपचारिक राजनीति के दायरे के बाहर से आदमियों की एक भीड़ के बीच से उठ रही थी जो राजनीतिक दलों के लिए अपने आप में बहुत चिंताजनक थी।

अंततः इस प्रकार के आंदोलनों पर राजनीतिक हलकों से जो पलटवार हुआ उसने कुछ तीखेपन सवाल उठाए कि क्या इस प्रकार के आंदोलन से जो सवाल उठ रहे हैं वह समाज को भीड़तंत्र और अराजकता की तरफ ले जा सकता है क्योंकि कानून बनाना संसद का काम है इस तरह जनतंत्र बनाम जनवाद का विरोध खड़ा हो जाता है जो इतिहास में पहली बार नहीं होता दुनिया के कई अन्य देशों में भी ठीक इसी तरह खड़ा किया जा चुका है।

संदर्भो के लिये सुभाष पालशीकर, धीरूभाई सेठ, संजय कुमार, योगेंद्र यादव, व आदित्य निगम जी के लेखों को देख सकते हैं.

शुभम जायसवाल

एम.फिल. शोधार्थी

हिंदी विश्विद्यालय, वर्धा

 

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