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West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee.(File Photo: IANS)

दीदी ने मुसलिम सांप्रदायिकता के साथ फासिज्म का जो जहरीला रसायन तैयार किया है, भयंकर होंगे उसके नतीजे

दक्षिण 24 परगना के मुस्लिम बहुल इलाकों से होकर मध्य कोलकाता के धर्मतल्ला के रानी रासमणि रोड तक संघ परिवार के हिंदू संहति मंच का विशाल जुलूस जय श्रीराम के जयघोष के साथ निकला है।

बजरंगियों के मत्थे पर भगवा पट्टी थी तो नेताओं के सुर में मुसलमानों के खिलाफ खुला जिहाद।

डोनाल्ड ट्रंप का दुनिया भर में पहला खुल्ला समर्थन।

मुसलमान बहुल इलाकों में इस जुलूस पर छिटपुट पथराव और जबाव में जुलूस में शामिल बजरंगियों के तांडव की भी खबर है।

सबसे खास बात है कि कभी आमार नाम वियतनाम, तोमार नाम वियतनाम के नारे के साथ अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ सबसे मुखर रहे कोलकाता में संघियों ने व्यापक पैमाने पर मुसलमानों के खिलाफ जिहाद का ऐलान करने वाले डान डोनाल्ड ट्रंप की तस्वीरों के साथ उनके इस्लामविरोधी जिहाद के समर्थन में दक्षिण 24 परगना और कोलकाता में व्यापक पोस्टरबाजी की है, प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष और उदारता के झंडेवरदार बंगाल के लिए यह बेहद शर्मनाक हादसा है।

वामपक्ष के सफाये पर उतारू दीदी ने मुसलमान वोट बैंक अटूट रखकर फासिज्म के राजकाज के साथ जो जहरीला रसायन तैयार किया है, उसके नतीजे बंगाल में सीमाओं के आर पार भयंकर तो होंगे ही, बाकी देश भी अछूता नहीं रहेगा।

गौरतलब है कि वामशासन काल में 1980 के सिख संहार, असम और पूर्वोत्तर में खूनखराबे और बाबरी विध्वंस के वक्त भी कोई धार्मिक ध्रुवीकरण नहीं हुआ था।

अब 2011 के परिवर्तन के बाद यह ध्रुवीकरण आहिस्ते आहिस्ते सुनामी में तब्दील है। धूलागढ़ को लेकर दंगा व्यापक बनाने की हिंदुत्व मुहिम जारी है तो जिलों में लगातार सांप्रदायिक संघर्ष उत्तर बंगाल, मध्य बंगाल और दक्षिण बंगाल का रोजनामचा बन गया है।

दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा और मुहर्रम के मौके पर भी अब तनातनी आम है।

2014 से बंगाल में हिंदुओं के ध्रुवीकरण में बांग्लादेश में बचे खुचे दो करोड़ हिंदुओं और गैर मुसलमानों पर लगातार तेज होते हमलों के साथ साथ असम में उल्फाई राजकाज के साथ जमीनी स्तर पर संघी कैडरों की ममता राज में बेलगाम सक्रियता बहुत तेजी आयी है। बंगाल जीतने के लिए शरणार्थी समस्या नागरिकता कानून बनाकर गहराने के बाद संघियों ने शरणार्थियों को भी अपनी गिरफ्त में दबोच लिया है, जिनका बाकी कोई तरनहार नहीं है।

शारदा फर्जीवाड़ा के तुरुप का पत्ता खींसे में रखकर दो सांसदों को गिरफ्तार करते ही दीदी हिंदुत्व की पटरी पर फिर वापस हो गयी हैं। हालांकि चुनावी समीकरण के मुताबिक उन्होंने मुसलमान वोट बैक को अटूट रखने के लिए ओबीसी आरक्षण के तहत बंगाल के पचानब्वे फीसद मुसलमानों को दे दिया है। पश्चिम बंगाल के कमिशन फॉर बैकवर्ड क्लासेज ने सोमवार को यह तय किया कि मुस्लिम समुदाय की ‘खास’ जाति को भी ओबीसी कैटिगरी के अंतर्गत लाया जाना चाहिए।  अब तक मुस्लिम समाज के करीब 113 समुदायों को ओबीसी कैटिगरी में शामिल कर लिया गया है।

इसके विपरीत ओबीसी हिंदुओं को आरक्षण के बारे में उन्हें कोई सरदर्द नहीं है। बंगाल में ओबीसी जनसंख्या पचास फीसद से ज्यादा है। दलितों और मतुआ और शरणार्थियों के साथ उनके केसरियाकरण से बंगाल में अब हिंदुत्व की सुनामी है।

इस खतरे का अंदेशा भी दीदी को खूब है, लेकिन वे अपने ही बिछाये जाल में उलझ गयी है।

बहरहाल केसरिया सुनामी पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया है कि किसी भी समुदाय द्वारा की जाने वाली हिंसा से उनकी सरकार सख्ती से निपटेगी। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में दंगा भड़काने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

दीदी ने कहा,  ‘हम उन्हें नहीं बख्शेंगे जो दंगे की आग भड़काते हैं और दूसरों को उकसाते हैं। हम किसी भी समुदाय,  चाहे वह हिंदू हो,  मुसलमान हो,  सिख हो या फिर ईसाई,  किसी की भी हिंसक गतिविधियों से सख्ती से निपटेंगे।’

बांग्लादेश की सरहद भी पाकिस्तान की सरहद से कम संवेदनशील नहीं है।  बांग्लादेश में भारतविरोधी गतिविधियां पाकिस्तान से कम नहीं है और फर्क इतना है कि फिलहाल बांग्लादेश में भारत की मित्र सरकार है और बांग्लादेश फिलहाल शरणार्थी संकट खड़ा करते रहने के बावजूद भारत के लिए कोई फौजी हुकूमत नहीं है।

फिरभी बंगाल में धार्मिक ध्रुवीकरण से राष्ट्रीयता का जो खतरनाक उग्रवादी तेवर है, उससे डरने की जरूरत है क्योंकि कश्मीर और पंजाब, तमिलनाडु की तरह यह उग्र राष्ट्रीयता सरहदों के आर पार है।

बंगाल में हिंदूकरण अभियान के तहत प्रदेश भाजपा के संघी अध्यक्ष व विधायक दिलीप घोष एकदम प्रवीण तोगड़िया के अवतार में हैं और उनकी भाषा डान डोनाल्ड की है।

इन्हीं डान घोष ने हिंदुत्व के एजंडे को जायज ठहराने के लिए बंगाल के उदार, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों पर निशाना साधा है।

डान घोष ने नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन पर खासतौर पर निशाना साधा है।

घोष ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा,  ‘हमारे एक बंगाली साथी ने नोबल पुरस्कार जीता और हमें इस पर गर्व है लेकिन उन्होंने इस राज्य के लिए क्या किया? उन्होंने इस राष्ट्र को क्या दिया है?’

उन्होंने कहा,  ‘नालंदा विश्वविद्यालय के चांसलर के पद से हटाए जाने से सेन अत्यधिक पीड़ित हैं। ऐसे लोग बिना रीढ़ के होते हैं और इन्हें खरीदा या बेचा जा सकता है और ये किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं। ‘

घोष के मुताबिक बंगाल के बुद्धिजीवी मेरुदंडविहीन है। बंगाल की शिक्षा व शिक्षा व्यवस्था की हालत बदतर होते जा रहे हैं,  लेकिन बंगाल के बुद्धिजीवी चुप हैं। कोई आवाज नहीं उठा रहा है। कोई कुछ भी नहीं कह रहे हैं। अपनी सुविधा के लिए पहले वामपंथियों के पक्ष में लाल चोला पहन लिये थे और अब तृणमूल की शिविर में शामिल हो गये हैं।

पलाश विश्वास

About Palash Biswas

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए "जनसत्ता" कोलकाता से अवकाशप्राप्त। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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