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Dilip Kumar

सांप्रदायिकता घर उजाड़ती है, मज़हब इंसान बनाता है- दिलीप कुमार

दिलीप कुमार से फ़ज़ल इमाम मल्लिक की बातचीत (Dilip Kumar’s Hindi Interview)

अमिताभ बच्चन ने कभी दिलीप कुमार के बारे में कहा (Amitabh Bachchan’s statement about Dilip Kumar) था कि ‘वे महान कलाकार हैं। कोई भी कलाकार जो यह कहता है कि वह उनसे प्रभावित नहीं है झूठ बोलता है।’ पर मेरा मानना है कि दिलीप कुमार एक अच्छे इंसान पहले हैं और कोई भी आदमी उनसे मिल कर प्रभावित नहीं होता है तो वह झूठ बोलता है। उनसे मिलना, बातें करना और उन्हें सुनना अपने आप में एक अनुभव से गुजरने जैसा है। आबशारों सी गुनगुनाती उनकी बात करने की शैली किसी को भी अपने सम्मोहन में जकड़ सकती है। बीच-बीच में हौले से मुस्कुराना। फिर बुजुर्गों के अंदाज में किसी ख़ास बिंदू को समझाना, उनकी शख़्सियत को और भी विस्तार देती है।

16 फरवरी, 1993। स्थान ताज बंगाल होटल, कलकत्ता (अब कोलकाता)। क़रीब आठ घंटे की कोशिश के बाद उनसे मुलाकात हुई। 17 फरवरी को उन्हें एक जलसे में हिस्सा लेना था। देश में छह दिसंबर 1992 के बाद जो माहौल बन गया था उसके ख़िलाफ़ कलकत्ता में जलसा किया जा रहा था। सांप्रदायिक दंगों से जल रहे देश को दिशा देने के लिए सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ लोग जमा हो रहे थे। दिलीप कुमार भी उनमें से एक थे।

वे एक दिन पहले कलकत्ता आए। सुबह लगभग नौ बजे फोन किया, उनके साथ आए सेक्रेटरी जान ने फोन पर बताया दिलीप साहब आराम कर रहे हैं। मेरा परिचय जानने के बाद उन्होंने यह वादा ज़रूर किया कि दिलीप साहेब से वे मेरी बातचीत ज़रूर कराएंगे। उन्होंने मेरा टेलीफोन नंबर लिया। थोड़ी देर बाद फिर फ़ोन किया तो जान का जवाब था- वे आराम कर रहे हैं लेकिन आप निश्चित रहें, मैं आपकी उनसे बातचीत ज़रूर कराऊंगा। पर मुझे यकीन नहीं था। मुझे लगा वह मुझे टरकाने के लिए ऐसा कह रहे हैं।

बीच में कई बार जान को फ़ोन किया और हर बार जान का जवाब था, वे आराम कर रहे हैं।

मैं मायूस और नाउम्मीद हो चुका था। पर क़रीब चार बजे जान का फोन आया। फौरन आ जाएं। साहब जाग गए हैं और वे आपसे बात करने के लिए तैयार हैं।

सचमुच मुझे यकीन नहीं आया था। पर मैंने होटल पहुंचने में देर नहीं की। जीते जी किंवदंती बन चुके दिलीप कुमार से मिलने का ‘जुनून’ मुझे नर्वस किए दे रहा था। क्या उनसे बात कर पाऊंगा मैं? उन्हीं सवालों के बीच जब उनके कमरे में दाख़िल हुआ तो होंठों पर खेलती मुस्कुराहट से उन्होंने मुझे खुशआमदीद कहा।

उनके लबो-लहजे से मैं थोड़ा आशवस्त हुआ। सफेद प्रिंस सूट में वे ख़ूब जंच रहे थे।

‘कहिए क्या पूछना है?’

मैं कुछ पूछता इससे पहले ही वे सवाल जड़ देते हैं।

तब पूरा देश 6, दिसंबर 1992 की घटना के बाद जल रहा था और मुंबई भी उस आग में जली थी। जाहिर है फ़िल्म के अलावा उनसे उन मुद्दों पर ही पहले बातचीत हुई जिससे पूरा देश जूझ रहा था।

अयोध्या और दंगा (Ayodhya and Riot) भी बातचीत का विषय रहा और ‘कलिंगा’ के निर्देशन की बातचीत भी हुई।

पेश है वह पूरी बातचीत जो क़रीब दो घंटे तक चली। हालांकि इस यादगार इंटरव्यू के बाद आज भी एक बात मुझे कचोटती रही है कि उनसे साथ मैं एक फोटो नहीं खिंचवा सका। हालांकि फ़िल्म वालों के साथ फोटो खिंचवाने का ख़ब्त मुझे कभी नहीं रहा है। पर दिलीप साहब के साथ फोटो न खिंचवाने का अफसोस आज भी है। हां अपनी बेटी सुंबुल के लिए उनका ऑटोग्राफ ज़रूर लिया।

दिलीप कुमार ने उर्दू में यह ऑटोग्राफ (Dilip Kumar’s autograph) दिया था। बातचीत से पहले उनका मैंने ऑटोग्राफ लेना चाहा था। उन्होंने बेटी का नाम पूछा और फिर बातों में मशग़ूल हो गए थे।

दो घंटे के बाद बातचीत ख़त्म हुई। चाय पीने के बाद वे कहीं बाहर जाने के लिए कमरे से बाहर निकले तो मैं भी उनके साथ हो लिया था। होटल की लॉबी में एक बच्ची ने उनसे ऑटोग्राफ मांगा, तो उन्होंने बच्ची के गाल को थपथपाया और कहा कि पहले आप मुझे एक पप्पी दो तो मैं तुम्हें ऑटोग्राफ दूंगा। तब वे किसी बच्चे की तरह लगे।

बच्ची को पहले उन्होंने दुलारा, प्यार किया और ऑटोग्राफ दिया। बाहर निकलने लगे तो मैंने उन्हें आटोग्राफ़ की याद दिलाई।

वे हौले से मुस्कुराए और मेरी डायरी पर बेटी का नाम लिखा, आगे लिखा ‘दुआओं के साथ’। फिर नीचे अपने दस्तख़्त कर दिए।

पहले दो वाक्य या यूं कहें कि एक वाक्य उन्होंने उर्दू में लिखे थे और दस्तख़त अंग्रेज़ी में किया था। उनकी याददाश्त को लेकर मैं हैरत में था। दो घंटे के बाद भी उन्हें मेरी बेटी का नाम याद था। यह उनके जीनयिस होने का सबूत था।

दस्तख़त करने के बाद वे हौले से अपने ख़ास अंदाज़ में मुस्कुराए और कहा-तसल्ली हो गई। मुझे याद था कि आपकी बिटिया के लिए आटोग्राफ़ देना है।

कलकत्ते में दिलीप कुमार से हुई लंबी बातचीत के कुछ ख़ास हिस्सा यहां पेश है। हालांकि बातचीत में उनके निर्देशन में बन रही फ़िल्म ‘कलिंगा’ का ज़िक्र भी आया था। उस फ़िल्म को लेकर वे ख़ासे उत्साहित थे। लेकिन वह फ़िल्म कुछ वजहों से बन नहीं पाई। उस अधूरी फ़िल्म को लेकर किए गए सवाल न तो आज प्रासंगकि हैं और न ही उनके जवाब। इसलिए ‘कलिंगा’ को लेकर जो सवाल-जवाब उसे छोड़ दे रहा हूं। हालांकि निर्देशन के अनुभवों को लेकर उन्होंने जो कहा है और वह प्रसंग जितना ज़रूरी समझा उसे यहां ज़रूर पेश कर रहा हूं।

  • मज़हब को अब किस रूप में देखते हैं? व्यक्तिगत आस्था या फिर सार्वजनिक प्रदर्शन के रूप में?
  • देखो भाई। मज़हब तो काफ़ी सीधी-साधी चीज है। इंसान और जानवरों की अलग करने की प्रक्रिया का नाम मज़हब है। मज़हब इंसान को इंसानियत का पैगाम देता है। सारे मज़हब, वह चाहे इसलाम हो, हिंदू धर्म हो, पारसी, ईसाई या फिर सिख हो, यही बात सिखाते हैं। मज़हब दरअसल ‘सोशियो मॉरल डिसिपलिन’ (Socio moral discipline) का सबक देता है। मज़हब का एक मुख़्तसर मायने यह है कि जुल्म न करो, किसी का हक न मारो, दूसरों से मोहब्बत करो, हो सके तो किसी की मदद करो। न कर सको तो किसी को नुकसान न पहुंचाओ। इस के कुछ इंसानी कोड आफ कंडक्ट हैं। मज़हब से लोग एक दूसरे तक पहुंचते हैं। मज़हब दिखावा की इजाजत ही कहां देता है।
  • धर्म निरपेक्षता और सर्वधर्म समभाव की मूल भावना एक है या दोनों अलग-अलग?
  • सेक्युलरिज्म का अर्थ डिकशनरी के हिसाब से तो यह है कि ख़ुदा को मानना ही नहीं। लेकिन लोकतंत्र में धर्मनिरपेक्ष का अर्थ बदल जाता है। पर आज इसके नाम पर जो हो रहा है, वह अलग किस्म की ही चीज है। मज़हबी बातों को लोग अब एक अलग तरह का मेयार बना लेते हैं। सोसायटी से ऐसे लोगों को निकाल बाहर करना चाहिए। लोग आज मज़हब को अपनी सुविधा के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं और उसे अपने-अपने तरीके से अपने-अपने पैमाने में ढाल रहे हैं। मज़हब के उसूलों को तोड़-मरोड़ कर लोगों के सामने रखा जा रहा है और अब यही सब लोगों के भीतर घर कर गया है। मज़हब के नाम पर आज जो कुछ भी हो रहा है वह ढकोसला है, मज़हब नहीं। इसे दूसरे अर्थों में यूं कहें कि आज जो कुछ भी हम देख रहे हैं वह मज़हब का मजाक उड़ाना है।

* आज के माहौल में मज़हब व सियासत का रिश्ता फिर कैसा होना चाहिए?

  • जैसा कि मैंने कहा कि मज़हब आज सिर्फ मजाक बन कर रह गया है। तो ऐसे में मेरा मानना है कि इस पर सिरे से रोक लगा देनी चाहिए। वैसे मज़हब का सियासत से कोई बैर नहीं है। मज़हब जिंदगी के कामों में रूहानी अमल की तरह जुड़ा है। दुनियावी निजाम काफी जटिल है। अपने समाज व मुल्क को बचाने के लिए हमें एक सोच की ज़रूरत होती है। ख़ास कर साइंस व तकनीकी प्रक्रियाओं की जटिलताओं से निकलने के लिए, हमें एक राह चुननी होती है। मज़हब इस राह पर चलने में मदद देता है।
  • मज़हब और फ़िरक़ापरस्ती एक दूसरे से काफ़ी नजदीक है?
  • नहीं- बिल्कुल नहीं। दोनों नजदीक हो ही नहीं सकते। मज़हब तो शुद्ध व पवित्र होता है। पर फ़िरक़ापरस्ती सत्ता हासिल करने के लिए है। मज़हब लोगों के अंदर अपने आप अपना राग सुनाता है। मज़हब तो सरल होता है। चाहे हिंदू, मसुलमान हों, सिख हों या फिर दूसरे धर्म के मानने वाले। सब अपने-अपने तरीके से इबादत करते हैं। मज़हब इंसान को इंसान बनाता है, लेकिन फिरकापरस्ती घर उजाड़ती है, लोगों की जान लेती है। फिरकापरस्ती जुर्म करने को उकसाती है, कानून तोड़ती है। फ़िरक़ापरस्ती को जड़ से उखाड़ फेंकने की ज़रूरत है। इसे कानून की मदद से ख़त्म करना होगा, क्योंकि फ़िरक़ापरस्ती न सिर्फ यह कि कानून को तहस-नहस कर रही है, बल्कि इंसान व इंसानियत को नुकसान पहुंचा रही है।
  • मुंबई के दंगों को आप किस नजर से देखते हैं?
  • मुंबई में हुआ सांप्रदायिक दंगा मज़हबी तो था ही नहीं। लेकिन इसे मज़हबी रंग दिया गया, मुसलिम और अल्पसंख्यकों के नाम पर। अयोध्या में छह दिसंबर, 1992 की घटना के बाद देश में फसाद इसी नाम पर हुए। लेकिन यह दंगे मज़हबी कम, सियासी ज्यादा थे। इसे आप यूं कहें कि अपने-अपने सियासी फायदे के लिए लोगों का गला काटा गया और फिर उसे सांप्रदायिक दंगे में बदल दिया गया।

* अयोध्या मसले का हल आपकी नजर में क्या है? –

देखिए यह सब मसला गड़े मुर्दे उखाड़ना है। यह मुर्दे कौन उखाड़ रहा है, इसका जिक्र मैं ऊपर कर चुका हूं।

* मौजूदा माहौल में एक कलाकार के नाते आप क्या सोचते हैं?

  • हम लोगों का काम है अदाकारी ठीक से करें। अच्छी फ़िल्मों में काम करें और गैरजानिबदार रहे। फ़िल्मों के माध्यम से लोगों को प्यार का संदेश दें। अपने अहसासों को दूसरे तक पहुंचाएं। क्योंकि फ़िल्म एक बड़ा माध्यम है। अपनी बात लोगों तक पहुंचाने का।
  • फ़िल्मों की बात चली है तो यह बातएं कि ‘कलिंगा’ के निर्देशन का फैसला आप ने क्यों किया? क्या यह अचानक नहीं था?
  • देखो मियां! बहुत कुछ अचानक होता। ख़ास कर मुझ पर यह अचानक वाली बात ज्यादा लागू होती है। मेरी जिंदगी में बहुत कुछ अचानक ही हुआ है। ‘कलिंगा’ का निर्देशन भी उन अचानक घटी घटनाओं में से एक है। ‘कलिंगा’ के निर्देशन की जब बात चली तो मैंने काफ़ी सोच-विचार किया। अपने-आप से भी सवाल-जवाब किया। बार-बार खुद से पूछा ‘निर्देशन क्यों नहीं करूं?’ यूं भी देखा जाए तो फ़िल्म निर्माण की संपूर्ण प्रक्रिया से मुझे शुरुआती दौर से ही दिलचस्पी रही है और पीछे मुड़ कर जब माजी की तरफ देखा तो पाया कि दिलीप कुमार को पटकथा-लेखन, कैमरा संचालन, निर्देश, एडिटिंग और सिनेमा की तकनीकी जानकारियों से लगाव रहा है और उसे भले ‘पूरी जानकारी’ न हो, पर जितनी जानकारी हासिल की है वह किसी फ़िल्म के निर्देशन के लिए काफ़ी है। तो मैं ने फिर ‘कलिंगा’ के निर्देशन के लिए हामी भरी। वैसे भी मेरा अनुभवों का संसार है। उस संसार में के आसिफ (मुगले-आजम), महबूब ख़ान (अंदाज), विमल राय (देवदास), तपन सिन्हा (सगीना), एस.एस. वासन (इंसानियत) सरीखे महारथी हैं। इन महारथियों के साथ मैं ने काम किया है और सिनेमा के विभिन्न पहलुओं की जानकारी इनकी देखरेख में ही हासिल की है। इन दिग्गज फ़िल्मकारों से मैंने बहुत कुछ सीखा। फिर जब मैंने और पीछे मुड़ कर देखा तो पाया कि 1943 में नितिन बोस के साथ मिलन में काम करने के दौरान मैं अपने आप को उन्हें असिस्ट करता पाया। नितिन बोस ने मेरी संभावाओं को बेहतर तरीके से तराशा-ख़राशा। उन्होंने मुझे हमेशा इस बात के लिए प्रेरित किया कि मैं फ़िल्म के संवाद और सीन लिखूं। ‘मिलन’ में मैं सहायक निर्देशक भी था। तो इतने साल बाद मुझे यह कहने तो दे ही कि सिनेमा की जानकारी अपने जमाने के श्रेष्ठ निर्देशकों से मैंने हासिल की है। इसलिए जब ‘कलिंगा’ के निर्देशन करने का फैसला किया तो मुझे लगा कि मेरा अनुभव मेरी जानकारी इस काम के लिए काफ़ी है।

* ‘कलिंगा’ का सब्जेक्ट क्या है और क्या कहानी आपकी है?

  • नहीं, कहानी मेरी नहीं है। वीरेंद्र सिन्हा इसके लेखक हैं। कहानी एक रिटायर्ड जज के बारे में है। वे अपने चार लड़कों के साथ जीवन बिताना चाहता है। तीन बेटे पहली पत्नी से है और चौथा दूसरी बीवी से। भावनाओं के टकराव पर आधारित है पूरी फ़िल्म। ‘कलिंगा’ के बारे में अभी इस से ज्यादा कुछ और नहीं कह सकता कि फ़िल्म के क्षेत्र में जाती तौर पर दिलचस्पी ले रहा हूं। और जहां तक मेरा मानना है फ़िल्म बनाने के लिए यह पहली शर्त है कि आपको हर क्षेत्र की अच्छी जानकारी हो। मैं इस बात की कोशिश कर रहा हूं कि मैं एक अच्छी फ़िल्म बनाऊं जिससे मुझे अत्मीय सुख भी मिले। बाकी चीजें तो ऊपर वाले के हाथ है। अब तक जितनी फ़िल्म बनी हैं उस से मैं संतुष्ट हूं।

* क्या इस दौरान कभी आपको यह भी लगा कि निर्देशन के क्षेत्र में आपने देर से कदम धरा है और बहुत कुछ कहीं छूट गया है?

देखो मियां, मेरा मानना है कि हर चीज का एक समय होता है। निर्देशन में उतरने का शायद यही सही वक्त रहा हो मेरे लिए। मुझे इसका मलाल नहीं है कि मैंने निर्देशन में देर से पांव धरा क्योंकि सिनेमा मैंने अपने तरीके से किया। फिल्में वही कीं जो मुझे अच्छी लगीं। पर कुछ चीजें हैं, जो कहीं कुछ छूट गई हैं। बढ़ती उम्र के साथ इसका और शिद्दत से एहसास हो रहा है कि बहुत सारी चीजों को मैंने हाथों से निकल जाने दिया। और यकीन करें वक्त के इस तरह जाया होने का अफसोस है। फिर माज़ी के दरीचे से झांकता हूं तो मुझे अपनी पढ़ाई पूरी न कर पाने का अफसोस है। फिर मुझे विश्व साहित्य न पढ़ पाने का भी बेहद मलाल है।

* किस तरह का साहित्य आप पढ़ना चाहते थे और वे कौन से लेखक थे जिन्हें आप नहीं पढ़ पाए?

देखो, जैसा मैंने कहा कि विश्व साहित्य के लिए मैं ज्यादा समय नहीं निकाल सका। ख़ास तौर से मैं कुछ मशहूर आटोबायोग्राफी पढ़ना चाहता था, उनका अध्ययन गहराई से करना चाहता था। विशेष कर यूरोपीय साहित्य। हालांकि यह सही है कि मैंने काफ़ी कुछ पढ़ा है, पर यह भी सच है कि इतना तो कोई भी आम पाठक पढ़ लेता है। मैं जितना पढ़ पाया, आज मुझे लगता है कि वह काफ़ी नहीं है। मुझे और भी पढ़ना चाहिए था। टॉलस्टॉय, चेकोस्वकी, गॉर्की या समरसेट मॉम को पढ़ा है लेकिन इनको पढ़ना भर ही काफ़ी नहीं है। विश्व के तमाम साहित्य को पढ़ना था। पर ऐसा न हो पाया। उम्र के इस मुकाम पर शायद अब यह न हो पाए। पढ़ भी पाऊं तो शायद उसे ग्रहण न कर पाऊं। इनसे परे कुछ और बातें हैं, जिनसे रू-ब-रू न हो पाने का मलाल है। अफसोस इस का भी है कि दुनिया में जो कुछ बड़ी घटनाएं घटीं। उन क्षणों का मैं गवाह नहीं बन पाया। मैं जानना चाहता था कि गोर्वाचोफ़ किस तरह के इंसान हैं, उनमें क्या ख़ास है। उन्होंने विश्व के सियासी मानचित्र को किस तरह बदला और रूस में खुली नीतियां लागू कीं, मैं इसे देखना चाहता था। रूस के लोग अनुशासित होते हैं, मैं आज भी उनके भीतर झांकना चाहूंगा। तो इसी तरह की कई और बातें हैं, जो छूट गईं।

* क्या आपको इस बात का भी मलाल है कि आपने कुछ वैसी फ़िल्में छोड़ दीं, जो बाद में बॉक्स ऑफिस पर हिट हुर्इं?

  • नहीं मुझे इसका मलाल नहीं हुआ। क्योंकि मैंने फ़िल्में वहीं कीं, जिसमें मुझे अपनी भूमिका पसंद आई। मेरे लिए किरदार महत्त्वपूर्ण रहा है। कई फ़िल्में बुरी तरह फ्लाप हुर्इं, फिर भी मुझे वे बेहद पसंद हैं। सगीना, बैराग या दास्तान सरीखी फ़िल्में चलीं नहीं, पर मुझे इसमें काम कर एक सुख मिला।

* आप अपनी किसी खास फ़िल्म की चर्चा करेंगे, जिसने आपके अभिनय को ऊंचाई दी?

  • कोई एक फ़िल्म! बड़ी मुश्किल बात पूछी है आपने। जहां तक मेरा मानना है, हर फ़िल्म ने मेरे अभिनय को और भी ‘पालिश’ किया है। पर जिस एक फ़िल्म से मैं ज्यादा संतुष्ट हुआ वह है ‘मुगल-ए-आजम’ । मेरा व्यक्तिगत विचार तो यह है कि यह फ़िल्म बेहतर फिल्मों में आज भी कई अर्थों में श्रेष्ठ है। इसके अलावा भी कई फ़िल्में हैं जो निजी तौर पर ज्यादा पसंद हैं। इनमें रमेश सहगल की ‘शिकस्त’, केदार शर्मा की ‘दिल दिया, दर्द लिया’ और ‘जोगन’। हालांकि यह फ़िल्में भी ज्यादा नहीं चलीं। इनके अलावा ‘संगदिल’ ‘देवदास’ और ‘कोहिनूर’ से भी मुझे संतोष मिला। हाल की फ़िल्मों की बात करें तो ‘राम और श्याम’ मेरी अच्छी फ़िल्मों में से एक है।

* आपने के. आसिफ, महबूब ख़ान, तपन सिन्हा और विमल राय के साथ काम किया, इनसे आप ने क्या सीखा?

  • बहुत अच्छा सवाल किया है आपने। एक बात पहले साफ़ कर दूं कि ये सारे लोग सिनेमा के महारथी थे। महान निर्देशक। यह अलग बात है कि वासन पहली नजर में आपको बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करें। उनका व्यवहार कुछ अटपटा लगे। मगर बात ऐसी थी नहीं। उनसे मैं ने सीखा कि लोगों तक कैसे पहुंचा जा सकता है। मेरी याददाशत जहां तक कम करती है, ‘इंसानियत’ के निर्माण के समय मैंने कुछ सीन पर अपने तरीके से काम किया था। कुछ पेपरवर्क किया था।

मैं उन कागजों को पढ़ रहा था कि वासन साहब ने मुझ से एक बात कही। वह बात आज भी मेरे भीतर न सिर्फ मौजूद है बल्कि मुझे बेहतर करने के लिए प्रेरित करती है।

उन्होंने कहा कि ‘दिलीप- यह बात जेहननशीं कर लो कि तुम एक मास मीडियम अर्थात जनता तक पहुंचने वाले संचार माध्यम सिनेमा में काम कर रहे हो। भारत में सिनेमा के कुछ खास फैक्टर होते हैं। सिर्फ बुद्धिजीवियों के लिए कोई फ़िल्म नहीं बनाता है ऐसी फ़िल्म बना कर कोई भी अपनी श्रेष्ठता तो साबित कर देगा, पर बिना आम आदमी तक पहुंचे फ़िल्म बनाने का मकसद पूरा नहीं होता है। इसलिए अवाम के लिए फ़िल्म बनाते वक्त सिर्फ होशियारी ही नहीं दिखाओ, नम्रता का इजहार भी करो।’ तपन सिन्हा, मेरे प्रिय निर्देशकों में से एक हैं। मैं उन्हें सत्यजित राय से किसी लिहाज से भी कम नहीं मानता हूं। वे बड़े निर्देशक हैं। वे कहानी की आत्मा तक बड़ी सहजता से पहुंच जाते हैं। उनमें उत्सुकता और जिज्ञासा है, तथ्यों को समझने की, चीजों को समझाने की। उनकी एक और ख़ूबी है। स्क्रीनप्ले राइटिंग में उन्हें महारत हासिल है। भावुक इंसान हैं और उनका मकसद अपने लोगों तक पहुंचना है। सत्यजित राय तो भारत से इतर पूरे विश्व के दर्शकों के लिए फ़िल्म बनाते थे। पर तपन सिन्हा अपनी फ़िल्मों के माध्यम से अपने लोगों से बात करते हैं। विमल राय बेहद ख़ामोशी से अपना काम करने वाले इंसान थे। काम से उन्हें जुनून की हद तक प्रेम था और हर काम में वे अव्वल रहना चाहते थे। उनकी फ़िल्मों का हर दृश्य अपने आप में पूर्ण होता था। विमल राय, नितिन बोस फ़िल्मों के एक कुशल शिल्पकार थे। दोनों ही बेहतरीन निर्देशक थे। किसी आम कहानी में भी क्लासिक रंग भरने में दोनों माहिर थे। इनसे एकदम अलग एप्रोच महबूब ख़ान का था। वे किसी भी बात को बहुत भीतर तक महसूस करते थे। इतना ही नहीं वे अवाम की पसंद-नापंसद से वाकिफ थे। लोगों तक पहुंचने की कलाकारी उन्हें आती थी। सच तो यह है कि उनकी रूह तो जैसे गांवों में रची-बसी थी। इसका सबूत उन्होंने ‘मदर इंडिया’ में दिया। पर महबूब ख़ान ने शहरों की पृष्ठभूमि पर ‘अंदाज’ और ‘अमर’ सरीखी ख़ूबसूरत फ़िल्में बनाईं। मेरा मानना है कि के. आसिफ की ‘मुगल-ए-आजम’ आरंभ से अंत तक एक बेहतरीन फ़िल्म थी। फ़िल्म का स्क्रीनप्ले बहुत अच्छा था और जिसके एक-एक किरदार को बख़ूबी फ़िल्माया गया था।

एक बात और साफ़ कर दूं कि भारतीय सिनेमा को विश्व मानचित्र पर पहुंचाने में सत्यजित राय की प्रमुख भूमिका रही है। मैं उनकी उपलब्धियों को छोटा नहीं कर रहा था, तपन सिन्हा से कंपेयर कर। यह बात बहुत कम लोगों को मालूम होगी कि एक बार खाने पर उनसे एक फ़िल्म की चर्चा हुई थी। अलाउद्दीन ख़िलजी की जिंदगी पर फिल्म बनाने की बात हुई थी। पर अफसोस है कि यह प्रोजेक्ट बातचीत से आगे नहीं बढ़ पाया। इसलिए उनके साथ काम करने के निजी तजुर्बे की बाबत तो कुछ नहीं कह सकता, पर बातचीत में उन्होंने कहा था कि उन्हें विश्व के दूसरे देशों के दर्शकों का भी ख़याल रखना पड़ता है। कुरोसाव और फेलनी सरीखे निर्देशकों की तरह ही सत्यजित राय ने विश्व सिनेमा में ख़ुद को स्थापित किया था। यह बड़ी बात थी उनके लिए भी और हमारे लिए भी।

* अभिनय के क्षेत्र में आपको किन लोगों ने मदद की जिसके कारण आप बुलंदियों पर पहुंचे?

  • इसमें पहला नाम नितिन बोस का आता है। वे मुझ से बराबर कहा करते थे कि दूसरे कलाकारों की फ़िल्में भी देखा करूं। ख़ास कर हालीवुड की। वे यह भी कहते थे कोई भी क्लासिक फ़िल्म एक बार नहीं देखो। उनका कहना था कि अच्छी फ़िल्में बार-बार देखो। नितिन बोस का मानना था कि पहली बार देखने पर फ़िल्म की ख़ूबियां जैस बढ़िया निर्देशन, अच्छा संगीत या अच्छी ऐक्टिंग ही पकड़ में आता है। दूसरी बार देखने पर यह ख़ूबी और भी उभर कर सामने आती हैं और देखने वाले को गहरे तक प्रभावित करती हैं। पर अगर किसी की बेहतरीन अकादकारी से कुछ सीखना चाहते हैं तो फ़िल्म को तीसरी बार ज़रूर देखना चाहिए। तब आप इधर-उधर की ख़ूबियों को दरकिनार कर सिफर् कलाकारों की ऐक्टिंग पर ध्यान देते हैं।

* तो आप दूसरों से प्रभावित होकर अदाकारी को सही मानते हैं? आप पर किस अदाकार का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा?

  • किसी से सीखना ग़लत तो नहीं मियां। जीवन के हर क्षेत्र में हर किसी का कोई न कोई आदर्श होता है। बहुत सारे लोगों में अपने पिता का पूरा असर होता है। हर व्यक्ति अपने आदर्श को फॉलो करता है। चाहता है वह भी वैसा ही कुछ करे। तो इसमें ग़लत कहां है और अच्छी बातें तो हर किसी से सीखनी चाहिए। मैंने जेम्स स्टुअर्ट, इंग्रिड बर्गमैन, सुसन हेवर्थ, हेनरी फोंडा, कैथरीन हेपबर्न, पाल मुनी, स्पैंसर ट्रेसी, लाना टर्नर सरीखे बेजोड़ कालकारों की फ़िल्में देखी हैं। इन सब से मैंने बहुत कुछ सीखा है। पर मुझ पर स्टुअर्ट और फोंडा का प्रभाव ज्यादा पड़ा। इनकी अदाकारी को गौर से देखने पर पता चला कि उनके चेहरे, उनकी आवाज एक ही वक्त मैं कई तरह के जज्बात को बयान करती हैं। ठीक वैसे ही जैसे संगीत में एक ही गीत के दौरान कोई साज एक अलग धुन बजाता हुआ भी उसी संगीत का एक हिस्सा बन जाता है। इस तरह की अदाकारी से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। पर शर्त यह है कि आप में सीखने की कितनी ललक है। ये सीखने वालों को लिए बेशकीमती ख़जाना थे। जितनी बार उन्हें देखता, उनसे कुछ नया सीखता। पाल मुनी से किरदार को जीवंत करने की कई बारीकियां सीखी जा सकती है। वे एक किरदार को निभाते समय उसमें ढेर सारे चारित्रक गुण का समावेश कर लेने के फन में माहिर थे।

* कई कलाकारों पर आपकी कापी करने का भी आरोप लगाया जाता है?

  • यह तो मैं नहीं जाता कि हिंदी सिनेमा में कौन मेरी ‘कापी’ कर रहा है। पर मेरी आपत्ति इस ‘कापी’ शब्द से है। जो लोग किसी पर किसी के नक्ल का आरोप लगाते हैं। वे ठीक नहीं कर रहे हैं। आप किसी की प्रतिभा को कम कर के देख रहे हैं। मैं उन्हें फिर कहना चाहूंगा कि कोई भी किसी से प्रभावित हो सकता है और यह कहीं से गलत नहीं है। (बीच में ही वे रोकते हैं अब बस भी करें। देखिए चाय ठंडी हो रही है। इसे फिर से गर्म करना होगा)

* एक बात और जानना चाहूंगा कि आपको ‘ट्रेजडी किंग’ (Tragedy king) का ख़िताब मिला, इसने आपके अभिनय को नया आयाम मिला?

  • नहीं भाई, ऐसा नहीं हुअ। इस ख़िताब ने मेरे लिए परेशानी पैदा की। लोगों ने मुझे ‘टाइप्ड’ कर दिया। नतीजे में दूसरे तरह के चरित्र निभाने के मौके कम मिले तब बाद में मैंने कोहिनूर, आन, आजाद, राम और श्याम व गोपी जैसी फ़िल्में कीं। फिर फ़िल्म ‘गंगा जमुना’ बनाई। जो इन सबसे अलग थी। इसी फ़िल्म के बाद ऐक्शन फ़िल्मों का दौर शुरु हुआ।

* अपने समकालीन राजकपूर, देवानंद, राजकुमार के साथ काम करके आपको कैसा लगा था?

  • इनके साथ काम करने का अलग अनुभव है। इन सबसे मैंने कुछ न कुछ सीखा है। कई बार कुछ बातों को लेकर मन मुटाव भी हुए। पर यह सब क्षणिक थे। इनकी अदाकारी की अज भी दुनिया कायल है।

* निर्देशन और अभिनय में से कौन सा काम ज्यादा चुनौती भरा है?

  • न अदाकारी और न निर्देशन। सबसे चुनौती भरा काम है पटकथा लेखन। यह ‘कलिंगा’ के निर्देशन के दौरान मुझे पता चला। (बातें हो गई या और बाकी हैं, वे मुस्कुरा कर पूछते हैं)

* बस! एक सवाल और। यूसुफ़ ख़ान दिलीप कुमार को किस तरह से देखते हैं ?

-दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती है। दोनों एक दूसरे को पसंद करते हैं और एक-दूसरी की ख़्वाहिशों का सम्मान करते हैं। (यह कह कर वे उठते हैं और होंठों पर मुस्कुराहट बिखेर कर कहते हैं, अब चाय पी ही लें।)

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