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इमरजेंसी के बाद इस तरह से अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला पहले नहीं देखा गया

नई दिल्ली, 01 दिसंबर। आतंकवाद विरोधी कानूनों के जरिए नागरिक अधिकार के लिए लड़ने वाले वकीलों, कवियों और लेखकों को प्रताडित कर लोकतांत्रिक असहमति को दबाने की चिंताजनक प्रवृत्ति पर चर्चा करने के लिए कंस्टीट्यूशन क्लब में 1 दिसंबर (शनिवार) को एक सार्वजनिक बैठक आयोजित की गई।

गत 28 अगस्त को वरवर राव, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, अरुण फेरेरा और वरनॉन गोन्जाल्विस को अर्बन नक्सल; होने के आरोप में गिरफ्तार किए जाने के विरोध में सर्वोच्च् न्यायालय गए याचिकाकर्ताओं के समूह की ओर से यह बैठक बुलाई गई थी। सर्वोच्च् न्यायालय से संबद्ध 30 से अधिक वरिष्ठ वकीलों द्वारा समर्थित इनकी याचिका को अंततः खारिज कर दिया गया था। पांच आरोपियों में से चार आज पुणे जेल में हैं जबकि पांचवे आरोपी (गौतम नवलखा) अपनी आजादी के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।

पांचों पर लगाए गए आरोप काफी नाटकीय हैं, जिसमें विदेश से हथियार और गोला बारूद मंगाकर प्रधानमंत्री की हत्या करने की साजिश शामिल है, लेकिन अभी तक इन आरोपों को साबित करने के लिए किसी भी तरह के विश्वसनीय सबूत नहीं मिले हैं। पुलिस ने कुछ संदिग्ध चिट्ठी-पत्रों के बरामद होने का दावा किया है, लेकिन उन्हें अदालत में पेश नहीं किया है। आरोपों की गंभीरता और जांच की धीमी गति के आपसी विसंगति से ऐसा लगता है कि अधिकारी आरोपों को साबित करने के बजाय आरोपियों को प्रताड़ित करने में अधिक रुचि रखते हैं।

प्रोफेसर रोमिला थापर (जेएनयू में अवकाशप्राप्त प्रोफेसर और सर्वोच्च् न्यायालय के मामले में प्रथम याचिकाकर्ता) ने चर्चा की भूमिका पेश की।

वक्ताओं में जनाधिकार कार्यकर्ता अरुणा रॉय,  वरिष्ठ पत्रकार एन. राम, वरिष्ठ जनहित वकील प्रशांत भूषण,जेएनयू के सेवानिवृत्त राजनीतिक विज्ञान प्रोफेसर ज़ोया हसन,  प्रतिष्ठित वकील वृंदा ग्रोवर, विख्यात पत्रकार भाषा सिंह और युवा कार्यकर्ता अनिर्बान भट्टाचार्य शामिल थे।

प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर ने विषय पर बोलते हुए कहा कि भारतीय इतिहास में असहमति और विविधता के विचार का हमेशा सम्मान रहा है और इसे हमेशा ही सामान्य तरीके से ही लिया गया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि असहमति राज्य के खिलाफ कार्य नहीं है बल्कि यह किसी भी लोकतंत्र के लिये एक अनिवार्य हिस्सा है।

प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि यह हमारे व्यवस्था के लिये दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोगों को असहमति जताने के विचार की वजह से गिरफ्तार करके रखा जा सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हमें यूएपीए, एनएसए, आफ्सपा, देशद्रोह के कानून जैसे असंवैधानिक कानूनो के खिलाफ संघर्ष करना पड़ेगा, जिनका असहमति और राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने के लिये इस्तेमाल किया जा रहा है। हमें अपने संस्थाओं को बचाने के लिये और सांप्रदायिक जहर से मुक्ति के लिये भी संघर्ष करना पड़ेगा।

मीडिया की आजादी के अभाव पर बोलते हुए प्रसिद्ध पत्रकार एन राम ने एक तमिल पत्रिका नक्कीरन के खिलाफ आर्टिकल 124-A इस्तेमाल करने का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी को उदार विचारों से आगे जाकर उसे न्याय के विचार के साथ जोड़ना होगा ताकि वो और मजबूत हो सके। उन्होंने एक शैक्षिक अभियान चलाने की बात कही जो अभिव्यक्ति की आजादी में असहमति और प्रदर्शन के महत्व को बता सके।

पत्रकार भाषा सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय में कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ डाले गए पेटिशन को मीडिया के लिये जरूरी बताते हुए कहा कि इस पिटीशन के बाद मीडिया को अपनी भाषा बदलनी पड़ी और आतंक पैदा करने वाली रिपोर्टिंग की जगह ‘कथित’ जैसे शब्दों का ‘अर्बन नक्सल’ के साथ इस्तेमाल करना पड़ा। हाउस अरेस्ट के बाद मीडिया को भी अपनी रिपोर्टिंग के बार में विचार करना पड़ा।

युवा कार्यकर्ता अनिरबन भट्टाचार्य ने कहा कि जो लोग सत्ता में हैं वो तीन डी पर काम कर रहे हैं- डिवाइड, डाइवर्ट और डिमोनाइज। उन्होंने कहा कि अर्बन नक्सल और एंटी नेशनल जैसे शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसे समाज में नाकाम करने के लिये प्रयास करने की जरुरत है।

राजनैतिक विज्ञान की प्रसिद्ध प्रोफेसर जोया हसन ने कहा कि इमरजेंसी के बाद इस तरह से अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला पहले नहीं देखा गया। यह सरकार पिछली सरकार से अलग अंतरिम दुश्मन पैदा कर रही है। इसका उद्देश्य राज्य के असली दुश्मन को लक्ष्य करना नहीं है बल्कि असहमति के स्वर को दबाना और शोषित और अल्पसंख्यक वर्ग को डराना है। इसलिए यह ज्यादा खतरनाक है, जो बहुलतावाद का प्रभुत्व लाना चाहती है।

सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय ने कहा कि देशभर में अपनी यात्रा में उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ आवाज को देखा है। उन्होंने कहा कि सरकार इन सामाजिक कार्यकर्ताओं को सिर्फ इसलिए गिऱफ्तार कर रही है क्योंकि ये लोग बहुत मजबूती से सरकार की नीतियो की असफलता पर सवाल उठाते रहे हैं।

सभी वक्ताओं ने असहमति और लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने के लिए विशेष कानूनों के दुरुपयोग पर गंभीर चिंता व्यक्त की। साथ ही उन्होनें राजसत्ता की जवाबदेही और नागरिकों को कानूनी सुरक्षा उपलब्ध कराने की अनिवार्यता पर ज़ोर दिया। अपने राजनीतिक विरोधियों से लडने के लिए राजतंत्र और विशेष कानूनों का सत्तारूढ तबके द्वारा किए जा रह दुरूपयोग का सभी वक्ताओं ने कड़ी निंदा की।

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