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कुत्ते की मूर्ति लिये कुत्तों की लड़ रहे हैं लोग !!

-भंवर मेघवंशी

इक्कीसवीं सदी का हिन्दू समाज (Twenty first century Hindu society) किस दिशा में आगे जा रहा है, इसकी एक छोटी सी बानगी इन दिनों राजस्थान में देखी जा सकती है, जहां पर एक श्वान प्रतिमा (कुत्ते की मूर्ति ) को लेकर हिन्दू समुदाय आपस मे ही गुत्थमगुत्था है, स्थिति इतनी बदतर हो चली है कि स्थानीय ग्राम पंचायत को अपनी ओर से प्रशासन को लिखना पड़ा है कि कुत्ते की मूर्ति (Dog statue) को यथावत रखा जाये, अन्यथा कोई भी अप्रिय वारदात हो सकती है।

कुछ साल पहले जब बिहार अथवा झारखण्ड प्रदेश में स्थित कुतिया देवी के मंदिर के फोटो (Photos of Bitch Devi temple) सोशल मीडिया पर वायरल हुये तो लोगों ने तरस खाया कि इन भक्तों की अकल क्या घास चरने चली गयी, जो कुतिया का मंदिर बना कर पूजा अर्चना कर रहे हैं, लेकिन अब राजस्थान में कुत्ते की मूर्ति के पक्ष और विपक्ष में लड़ते लोगों को देख कर यह प्रश्न भी उठ रहा है कि मानव की चेतना का विकास किस स्तर तक निम्नतर हो चला है कि कुत्ते की मूरत को लेकर इंसान कुत्तों की तरह लड़ रहे है। इससे भी ज्यादा हैरतअंगेज बात यह है कि इस मूर्ति के प्राण प्रतिष्ठा हेतु आयोजित कार्यक्रम और भजन संध्या में मुख्य अथिति केंद्र व राज्य सरकार के माननीय मन्त्रीगण होंगे।

किसने सोचा था कि आज़ाद, विकासशील और जगदगुरु भारत की इक्कीसवीं सदी का समाज कुत्तों को पूजने लगेगा औऱ जानवरों के नाम पर मनुष्यों के प्राण लेने पर उतारू हो जाएगा।

यह अविश्वसनीय मगर एकदम सत्य घटनाक्रम घट रहा है राजस्थान के पाली जिले के दूसरी ब्लॉक के सारंगवास गांव में, जहां पर रगतिया भैरूजी के पुराने मंदिर प्रांगण में स्थित प्राचीन श्वान प्रतिमा की जगह नए श्वान की मूर्ति स्थापित की गई। इसके पास में ही राजपुरोहित समुदाय के आराध्य देव खेतलाजी का विशाल मंदिर है। उन्होंने इस श्वान प्रतिमा का विरोध करते हुए इसे हटाने हेतु प्रशासन पर दबाव बनाया। तहसीलदार हकीकत जानने मौके पर गए, लेकिन राजपुरोहितों के अलावा की अन्य सभी हिन्दू जातियां श्वान प्रतिमा के पक्ष में खड़ी हो गईं, रात दिन पहरा दिया जाने लगा और मौके पर आए तहसीलदार को भगा दिया गया।

अब 10 नवम्बर को इस मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की होगी, इसमें कई कलाकार और मन्त्रीगण शामिल होंगे, विवाद अभी भी जारी है, शेष सभी जातियों ने मिलकर राजपुरोहित समुदाय के लोगों का अघोषित बहिष्कार भी कर दिया बताते है, दोनो पक्ष अपने अपने स्टैंड पर कायम है, ऐसा भी नही है कि यह मूर्खता या अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई है, प्रथम दृष्टया यह वर्चस्व की लड़ाई लगती है, जिसमे मन्दिरों की कमाई और प्रतिष्ठा का भी सवाल भी है।

कुल मिलाकर लोग हंस सकते है, सिर पीट सकते है मनुष्यता की इस दारुण अवस्था पर जहां इंसान इंसानियत खो रहे है और उनके भीतर की पशुता उभर कर सामने आ रही है, अब मनुष्य गाय, गधे और कुत्ते के नाम पर इंसानों का लहू बहाने पर उतारू है।

 (-भंवर मेघवंशी, लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवम् सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उनकी यह रिपोर्ट हम विलंब से प्रकाशित कर पाने के लिए खेद प्रकट करते हैं। )

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