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Baba Saheb Ambedkar The biggest hero of the social revolution in India बाबा साहेब अंबेडकर : भारत में सामाजिक क्रांति के सबसे बड़े नायक

डॉ. अम्बेडकर संविधान के निर्माता नहीं, बल्कि संविधान के प्रारूपकार थे !

Dr Ambedkar was not the creator of the Constitution, but the drafter of the Constitution!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

डॉ. अम्बेडकर का समग्रता में समावेश होना चाहिये, न कि समग्रता का अकेले डॉ. अम्बेडकर में विलय कर दिया जाये?

एक सवाल अकसर पूछा जाता है कि- इस बात का जवाब भी दिया जाना चाहिये कि डॉ. अम्बेडकर ने राज्यसभा में किन परिस्थितियों में भारत के संविधान को जलाने की बात कही होगी?

वास्तव में इस सवाल का सही-सही जवाब तो डॉ. अम्बेडकर ही दे सकते थे। यद्यपि डॉ. अम्बेडकर जब यह कहते हैं कि मैं भाड़े का टट्टू था और भारत का संविधान जलाने योग्य है, तो बिना पूर्वाग्रह के समझने की क्षमता रखने वाले विवेकवानों को संविधान को जलाने के वक्तव्य का कारण भी स्वतः ही समझ में आ जाना चाहिये। हां जो नहीं समझना चाहेंगे, वो कभी भी नहीं समझेंगे। क्योंकि मानव मनोविज्ञान का सिद्धान्त है कि पूर्वाग्रही या ब्रेनवाश किया हुआ व्यक्ति कभी भी सत्य को नहीं देख सकता।

डॉ. अम्बेडकर के उक्त कथन को समझने के लिये अपूर्वाग्रही, तार्किक, निष्पक्ष एवं बुद्ध की दृष्टि जरूरी है।

मेरा निजी मत (जरूरी नहीं यह सही भी/ही हो और सर्वग्राह्य भी हो) यदि डॉ. अम्बेडकर जैसे विश्वस्तरीय विधिवेत्ता माने जाने वाले व्यक्ति को भारत का संविधान बनाने (‘बनाने’ शब्द पर ध्यान दिया जाये) का वास्तव में अवसर मिला होता तो और स्वयं डॉ. अम्बेडकर ने 1932 से पहले की अपनी डिप्रेस्ड क्लास उद्धारक तथा समर्थक सोच को त्यागा नहीं होता तो निश्चय ही संविधान का वर्तमान स्वरूप नहीं बना होता।

यदि हम समग्रता से विचार करें तो इस विषय पर गहराई से विमर्श, मंथन एवं चिन्तन करने की जरूरत है।

यह एक कड़वा सच है कि MOST/वंचित वर्ग और विशेष रूप से अजा वर्ग में शामिल आर्यवंशी शूद्रों के वर्तमान वंशजों ने डॉ. अम्बेडकर के जीवित रहते हुए तो बाबू जगजीवन राम को आगे करके  डॉ. अम्बेडकर का विरोध किया और उनकी संदिग्ध मौत के तीन दशक बाद राजनीतिक मकसद के लिये डॉ. अम्बेडकर को संविधान निर्माता (‘निर्माता’ शब्द पर ध्यान दिया जाये) के रूप में प्रचारित करके परोक्ष रूप से बकवास वर्ग के संवैधानिक अन्याय का मार्ग ही प्रशस्त किया है।

यह भी एक वजह है कि आज बकवास वर्ग द्वारा डॉ. अम्बेडकर के संविधान के प्रावधानों के नाम पर वंचित वर्गों के हकों का जमकर मखौल उड़ाया जा रहा है। जिसके लिये डॉ. अम्बेडकर नहीं, बल्कि वे लोग जिम्मेदार हैं, जो जबरन डॉ. अम्बेडकर को संविधान निर्माता के रूप में अधिरोपित करते आ रहे हैं। जबकि डॉ. अम्बेडकर संविधान के निर्माता नहीं, बल्कि संविधान के प्रारूपकार थे।

इस तथ्य को हमें यों समझना चाहिये कि जितने भी एक्ट/अधिनियम संसद द्वारा अधिनियमित/पारित किये जाते हैं, हम कभी भी इन एक्ट्स/अधिनियमों के प्रारूपकारों को श्रेय देने की बात क्यों नहीं करते? जबकि इन एक्ट्स/अधिनियमों के ड्राफ्ट्स को भी तो किसी न किसी व्यक्ति के द्वारा ही लिखा ही जाता है। जैसे अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 (जिसे संरक्षित दोनों वर्गों के लिए उच्च कोटि की विधि माना जाता है, लेकिन इसके ड्राफ्ट/लेखक का आज तक किसी को पता नहीं) को बनाने का श्रेय राजीव गांधी सरकार को दिया जाता है।

हाँ यह भी सच है कि ड्राफ्ट लेखक के विचार भी प्रस्तावित एक्ट/अधिनियम के ड्राफ्ट में समाहित होते हैं, लेकिन उन विचारों के लिये, ड्राफ्ट लेखक के रूप में ऐसा व्यक्ति उत्तरदायी एवं जिम्मेदार नहीं होता है। अतः उसे ऐसे एक्ट/अधिनियम का निर्माता कभी नहीं कहा/माना जाता। हां ड्राफ्ट पर चर्चा करके उसे पारित करने वाले अवश्य ऐसे एक्ट/अधिनियम के निर्माता के रूप में संसद के सदस्य के रूप में सामूहिक रूप से और निजी स्तर पर आंशिक रूप से उत्तरदायी एवं जिम्मेदार होते हैं।

डॉ. अम्बेडकर की भी इसी प्रकार की दोहरी भूमिका रही थी।

यह अलग बात है कि प्रभावशाली कानूनविद होने के कारण उन्होंने संविधान सभा की चर्चाओं में अनेक विषयों पर प्रभावी और तार्किक विचार पेशकर अपने उद्देश्यों के अनुसार संविधानसभा को सकारात्मक और नकारात्मक रूप से प्रभावित करने का सम्पूर्ण प्रयास किया था। जिन पर चर्चा या विमर्श करना भारतीय लोकतंत्र में गुनाह नहीं है। विशेषकर तब, जबकि हम डॉ. अम्बेडकर के श्रेृष्ठ कार्यों और प्रयासों के लिये उन्हें श्रेय/क्रेडिट दे सकते हैं तो साथ ही साथ उनके अश्रेृष्ठ या नुकसानदायक या किन्हीं समूहों के लिये या समग्र वंचित वर्ग या राष्ट्र के लिये हानिकारक प्रतीत होने वाले विचारों या किन्हीं अवसरों पर उनके मौन धारण करने पर क्या विमर्श भी नहीं कर सकते?

ऐसा विमर्श तब ही सम्भव है, जबकि हम डॉ. अम्बेडकर तथा तत्कालीन हालातों के प्रति अपूर्वाग्रही और निष्पक्ष दृष्टिकोंण रखें। मेरे विचार से डॉ. अम्बेडकर को संविधान निर्माता कहकर प्रचारित और महिमा मण्डित किया जाना, बेशक अजा वर्ग को राजनीतिक लाभ के लिये संगठित करने में सहायक रहा हो, लेकिन समग्र MOST/वंचित वर्ग के लिये यह विचार आत्मघाती सिद्ध हुआ है और हो रहा है। देश के वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक हालात उक्त तथ्य/बात के गवाह भी रहे हैं। अनुसूचित जाति वर्ग के अलावा MOST/वंचित वर्ग में शामिल शेष समुदायों के आम लोग जब तक संयुक्त रूप से एकजुट नहीं होंगे, सामाजिक न्याय, बराबरी और समान भागीदारी का लक्ष्य मिलना असम्भव है।

अत: हमें डॉ. अम्बेडकर को संविधान निर्माता के रूप में नहीं (जो सच भी है), बल्कि संविधान के ड्राफ्ट लेखक के रूप में ही जानने और समझने की कोशिश करनी होगी।

-तब ही हम राज्यसभा में संविधान को जलाने की बात कहने वाले डॉ. अम्बेडकर के वक्तव्य के दर्द या हकीकत जो भी रही हो, को समझ सकेंगे।

-तब ही हम वंचित वर्ग के हित संरक्षण करने में अप्रभावी संविधान की कमजोरियों पर परिणामदायी विमर्श कर सकेंगे। (जबकि इसके विपरीत वर्तमान भारत में संविधान की कमजोरियों पर विमर्श या चर्चा करने को एक वर्ग/समूह द्वारा संविधान निर्माता के रूप में डॉ. अम्बेडकर का विरोध कहकर दबाने की चेष्टा की जाती है, जो उनका अतार्किक, अन्यायपूर्ण, अबौद्धिक, असंवैधानिक और आत्मघाती विचार है।)

-तब ही हम समस्त वंचित वर्ग के हित में सकारात्मक और परिणामदायी संयुक्त विमर्श कर सकेंगे।

-तब ही हम, “वास्तव में हम” कहलाने के हकदार होंगे।

अंतिम और महत्वपूर्ण तथ्य: हजारों वर्षों से वंचित वर्गों के खिलाफ जारी रहे अन्याय के खिलाफ सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले डॉ. अम्बेडकर एक मात्र या अकेले व्यक्तित्व नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक अन्याय और कुटिल विभेद के विरुद्ध लड़ने वाले अग्रणी तथा चोटी के लोगों में से एक थे। अतः उनका (डॉ. अम्बेडकर का) समग्रता में समावेश होना चाहिये, न कि समग्रता का अकेले डॉ. अम्बेडकर में विलय कर दिया जाये। जैसा कि एक समुदाय द्वारा किया जाने का प्रयास जारी है।

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