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एक साधारण व्यक्ति के लिए अन्याय के समक्ष विरोध प्रदर्शन ही एकमात्र सशक्त हथियार है

एक साधारण व्यक्ति के लिए अन्याय के समक्ष विरोध प्रदर्शन ही एकमात्र सशक्त हथियार है

सार्थक रूप से विरोध प्रदर्शन करना

डॉ. आसमाँ अंजुम खान

मेरे खुदा, क्या मैं विरोध कर सकती हूँ? विरोध कैसे करना है? सवाल यह है!

रूपक प्रस्तुत करने में उत्तम, एरिस्टॉटल का कथन है, “क्रोध एक नकारात्मक मनोभाव है, पर उचित व्यक्ति के प्रति उचित मात्रा में उचित क्रोध अनुभव करना, एक न्याय परायण कार्य है”।

परंतु क्या उन्होने हमें क्रोध ‘कैसे’ व्यक्त करना है, यह भी बताया?

या फिर, विरोध करना।

एक साधारण व्यक्ति के लिए अन्याय के समक्ष विरोध प्रदर्शन ही एकमात्र सशक्त हथियार है।

जीना मरने के समक्ष एक विरोध प्रदर्शन है तथा मारना जीवन के समक्ष। आज हमारा समक्ष अस्तित्व ही एक विरोध प्रदर्शन बन गया है। विरोध करना हमें इस बात का एहसास दिलाता है कि हम वास्तव में क्या हैं और किसके प्रतीकात्मक हैं।

हालांकि, दुर्भाग्यवश, हम लाशों में परिवर्तित होते जा रहे हैं, जिन्हों ने अपने सामुदायिक जीवन के सबसे महत्वपूर्ण अवसरों पर भी खामोश रहना सीख लिया है: भयवश, उदासीनता के कारण या फिर सिर्फ आलस्य के वश में होकर। यह भी सच है कि एक व्यक्ति का विरोध दूसरे व्यक्ति के लिए विजय है।

क्या हम अपनी खामोशी एवं निष्क्रियता से जनित इस विजय में सहयोग नहीं कर रहे हैं?

परंतु विरोध प्रदर्शन के सर्वोत्तम तरीके क्या हैं? क्या हम सफल होंगे? क्या हमारे विरोध प्रदर्शन से मनोवांछित लक्ष्यों की प्राप्ति होगी?

कुछ प्रश्नों के निश्चित उत्तर नहीं होते।

एक जमाने में, विरोध करने का अर्थ था बहिष्कार करना, मोर्चे निकालना, मौन व्रत का धारण करना, व्रत रखना, नारेबाज़ी करना, रास्ता-रोको, जेल-भरो, या कम से कम बाज़ू पे काला कपड़ा बांध लेना। ‘अच्छे दिन’ से समृद्ध होने के पश्चात; गीत गाना, चलचित्र देखना, किताब पढ़ना, ‘मीम’ शेयर करना, नाखूनों पे रंग लगाना तथा गोमांस का सेवन करना (यदि आप अधिक साहसी हैं तो), ये सब विरोध प्रदर्शन के एक तरह के ‘प्रकार’ बन गए हैं। कोलिन कैपेर्निक्क की ‘टेक अ नी’ नें टृंपिस्तान को पसीना पसीना कर दिया है। एक भी दिन ऐसा नहीं गुज़रता जब लोग विरोध प्रदर्शन नहीं करते। पर क्या वे कोई अंतर ला पाते हैं? रोज़ के सौ से अधिक विरोध प्रदर्शनों के इस शोर में, आइये यह जानने का प्रयत्न करते हैं कि एक सच्चे विरोध प्रदर्शन के क्या गुण हो सकते हैं।

असहमति दिखाने के लिए सड़कों पर आ जाना; उप-महाद्वीप के संदर्भ में, हमेशा से ही संकटपूर्ण था। महात्मा गांधी ने ये किया। जिन्नाह ने ये किया। हम भी ये करते आ रहे हैं। परंतु हमने इसकी भारी कीमत चुकाई।

महात्मा के पास अपने हिस्से के पछतावे थे। ‘दाय हैंड ग्रेट अनार्क! इंडिया 1921-51’ में निराद चौधरी महात्मा के पछतावे के विषय में लिखते हैं:

इन सभी आंदोलनों के दौरान लोगों ने अपना मनचाहा ही बर्ताव किया, अहिंसा तथा घृणा के त्याग के विषय में उनकी (गांधी की) किसी भी चेतावनी को अनसुना करके। इस बात का बोध सबसे अधिक खुद गांधी को था। कम से कम एक बार तो उन्होने अपनी हिमालय जैसी बड़ी भूल के विषय में चर्चा की है। (1988:878)

आमरण अनशन महात्मा गांधी का, ब्रिटिश को अपनी मांगो के आगे झुकाने का एक तरीका था। दिलचस्प बात है कि, निराद चौधरी, जो महात्मा के तरीकों की समालोचना करने का एक भी अवसर नहीं खोते थे, अपने एक संस्करण में उल्लेख करते हैं कि जब भी महात्मा अपने मृत्यु पर्यत उपवास की घोषणा करते थे तो लोग उनकी शहादत की प्रत्याशा कर लेते थे और जब यह नहीं होता था तो निराश हो जाते थे।

परंतु आपको यह बात तो माननी पड़ेगी कि मृत्यु पर्यंत उपवास करने के लिए आपको स्वचालित, दृढ़ इच्छा शक्ति से परिपूर्ण और सही मायनों में दृढ़ संकल्पी होना पड़ेगा। कुछ सम्मानित एवं सच्चे उपवास छोड़कर, मृत्यु पर्यत उपवास, चक्र में उपवास करने में परिणत हो चुके हैं। महेश बुधवार को उपवास करेगा, अनिल गुरुवार को और जो क्रमशः अगला व्यक्ति है वह शुक्रवार को। ये आधुनिक समय के मृत्यु पर्यत उपवास हैं।

प्रभावी? जी हाँ, सुबह से शाम तक।

तो विरोध प्रदर्शन करने की सबसे अच्छी तकनीक क्या है?

सत्तर साल बाद, स्थिति बदल गयी है। कुछ दृष्टांत छोड़कर, पुराने तरीकों से किए गए विरोध प्रदर्शन, कितने भी सच्चे होने पर भी, सफल नहीं हो पा रहे हैं। आजकल का अहम मुद्दा यह है कि विरोध प्रदर्शन कैसे होने चाहिए; ताकि वे कुछ बदलाव या सकारात्मक परिणाम अर्जित कर सके, या कम से कम, अपने ओर थोड़ा ध्यान ही केन्द्रित कर सके? नाखूनों पे रंग करना, ताज महल के साथ सेलफ़ी खींचना, गीत गाना इत्यादि, ये सब तरीके कुछ समय तक तो ध्यान आकर्षित कर सकते हैं, पर तभी तक जब तक कुछ नया मुद्दा सामने न आ जाए।

तथापि, अंततोगत्वा, एक सशक्त समाधान के लिए, हमें इन सब से ऊपर उठना होगा।

श्रीनिवासन जैन, एनडीटीवी के पत्रकार, गौरी लंकेश की हत्या के पश्चात, फेसबुक पर लिखते हैं:

अपनी जनजाति के अधिकांश लोगों की तरह, मैं भी विरोध प्रदर्शनों के साथ एकजुटता में खड़ा हूँ। इनमें से कई प्रदर्शनों में मैं गया भी हूँ। पर गंभीरता से सोचें तो, एकजुटता के अतिरिक्त इससे कौनसा प्रयोजन हल होता है? क्या हमें ऐसा लगता है कि सत्ता में जो शक्तियाँ हैं, वो न्याय के लिए अस्पष्ट रूप से अंकित मांगों से प्रभावित हो जाएंगी? या कि नारेबाज़ी से? जब तक कि विरोध प्रदर्शन प्रैस क्लब तक सीमित रहेंगे, और हमारी पत्रकारिता में किसी भी प्रकार से प्रदर्शित नहीं होंगे, इन प्रश्नों का उत्तर ‘न’ ही रहेगा। सत्ता विरोध की परवाह नहीं करती। सत्ता तभी चिंतित होगी जब हम ‘सब आखिरकार सामान्य रूप से चलता ही रहता है’ जैसे मनोभावों तथा कार्य पद्धतियों को एक झटके में त्याग देंगे।

वे ऐसा मानते हैं कि अपने पुराने गतिहीन रूप में विरोध प्रदर्शन अब कारगर नहीं हैं। अपनी इस पोस्ट में वो आगे लिखते हैं कि पत्रकारों के विरोध में हो रहे मुकद्दमों को लड़ने के लिए और निष्पक्ष तथा गैर पक्षपातपूर्ण मीडिया मंचों की स्थापना के लिए पूंजी का संचय करना अवश्यंभावी है। 

यह बुद्धिमत्ता से लिखे गए शब्द हैं।

हाँ, हमारे पास मुद्दे हैं, हममें अपनी शिकायतों के चलते अत्यंत क्रोध भी है, एक कार्टून मात्र पर भी, परंतु अगर हम ‘इसे’ सड़कों पर उतार आने की अनुज्ञप्ति के रूप में ले लेंगे, तो हम बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं।

याद रखिए, कार्टून के प्रति कार्टून, कविता के प्रति कविता, किताब के प्रति किताब, यही सही प्रतिक्रिया है।

सड़कों पर प्रदर्शन आवश्यक हैं किन्तु ये हमारी समस्याओं का ‘छू-मंतर’ उपाय नहीं हैं। ये समूह जनता के क्रोध के अच्छे संकेतक हो सकते हैं, पर ज़्यादातर इसके आगे नहीं बढ़ते। सत्ता द्वारा प्रदर्शित कड़ी निठुरता, दंभ, तथा निष्ठुर बेपरवाही, सज्जन धर्मयोद्धाओं तथा वीरांगनाओं में एक परम लाचारी की अनुभूति कराते हैं, जो ये समझते हैं कि वे ‘अभी भी’ बदलाव ला सकते हैं। आशा तो अंततः अनंत ही होती है।

हम सभी अपने जीवन में हो रहे छोटे अथवा बड़े अन्यायों से समझौता करने के लिए रक्षा तंत्र विकसित कर लेते हैं।

यह जीवित व्यक्ति की एक कसौटी है; जो सही मायनों में जीवित है और खुद की सच्चाई तथा दूसरों के अधिकारों का सम्मान करता है। आज हमारा सारा मानव अस्तित्व अन्याय को प्रसारित करता है। आस-पास देखिये, और आप जान जाएंगे मैं क्या कह रही हूँ।

यह भी है कि एक अन्याय के विरोध में प्रदर्शन करना सभी अन्यायों के विरोध में प्रदर्शन करने में स्वयं ही परिवर्तित हो जाता है। कुछ बुद्धिजीवियों का यह कहना है कि भारत के मुसलमानों को इज़राइल द्वारा पलेस्तीन के कब्ज़े के विषय में चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा सोचना समस्यात्मक हो सकता है। यदि मैं किसी दूसरे का दर्द नहीं समझूंगी, तो मेरा दर्द कोई कैसे समझेगा? अगर हम दूसरों के दर्द को महसूस करने से पूरी तरह मुक्त हैं तो, अपने यहाँ होते नरसंहार, दंगों और भीड़ द्वारा की गयी निर्मम हत्याओं के विरोध में खड़े होने के लिए हम दूसरों से कैसे उम्मीद कर सकते हैं?

फिलिस्तीन सभी विरोध प्रदर्शनों की जननी है। जो व्यक्ति, किसी एक राष्ट्र में, किसी दूसरे राष्ट्र के गैर-कानूनी कब्ज़े का, नरसंहार का तथा मासूम लोगों के उत्पीरण का विरोध करता है, वह यह संदेश पहुंचाता है कि वह ऐसी हिंसक प्रवृत्ति का हर जगह ही विरोध करता है।

समस्या तथा उत्पीड़क का मुक़ाबला करना आवश्यक है। प्रतीकात्मक धरने, बैठक तथा स्मृतिपत्र देने के पश्चात, हमें क्षमता के निर्माण पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। अगर आप अल्पसंख्यक वर्ग से हैं तथा आपके पास इतनी समस्याएँ हैं जो कि पूरी रेलगाड़ी को भर सकने का साधन रखती हों, तो आप सारा वर्ष धरनों के प्लैटफ़ार्म पर बैठ कर व्यतीत नहीं कर सकते; इसके बजाय आप व्यावहारिक हो जाते हैं और कुछ ऐसा करते हैं जो अंततोगत्वा, मूल्यवान सिध्ध हो।

मोमबत्ती जलाकर निकाले गए लंबे जुलूस, बैठकें, शोर शराबा, प्रदर्शन इत्यादि, इन सब का अपना एक महत्व और स्थान है पर क्या हम इन सबके साथ साथ ही उतने ही घंटे ठोस काम करने के विषय में विचार नहीं कर सकते? यह स्वयं के स्तर पर किया जा सकता है, या कुछ योजनाबद्ध सामूहिक परियोजनाओं पर कार्य करके (जैसे कि अपने मुहल्ले की साफ-सफाई में मदद करना, इमारतों के निर्माण की परियोजनाओं में मदद करना, अपने ज्ञान का सदुपयोग करते हुए बच्चों को पढ़ाना, वृद्धों अथवा विकलांग लोगों के साथ काम करना इत्यादि), और इससे अर्जित धनराशि को उस लक्ष्य के लिए समर्पित करके, जिसके लिए विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। ये धनराशि पीड़ितों के पुनर्वास में अथवा कानूनी खर्च पूरे करने में सहायक हो सकती है।

साधारणतः, हम कुछ घंटो, अथवा दो-तीन दिनों तक किसी लक्षय के लिए हो रहे विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बनने के पश्चात अपनी-अपनी दिनचर्या में लिप्त हो जाते हैं, पर अंततः, शोषण, हिंसा या अन्याय के पीड़ितों को व्यावहारिक रूप से न्याय दिलाना ही मायने रखता है। हमें अच्छे प्रकार से ज्ञात है कि न्याय सरलता से प्राप्त नहीं होता और निश्चित रूप से, सस्ते दामों में प्राप्त होने वाली वस्तु तो कदापि नहीं है।

आप किसे प्रधानता देंगे: तीन घंटे तक खड़े होकर बिना रुके नारेबाजी करने को या उन्ही तीन घण्टों के लिए कुछ धनराशि के एवज़ में काम करने को, जहां आप अपने खून-पसीने से अर्जित धनराशि को उस कार्य के लिए समर्पित कर सकें जो आपके हृदय के अत्यंत समीप है?

यह होगा निश्चित रूप से कुछ करना और सही मायनों में कुछ बदलाव लाने की ओर योगदान देना।

दूसरा विकल्प अवश्य ही एक व्यावहारिक विकल्प है और हालांकि न्याय के लिए किसी भी सकारात्मक परिणाम का कोई आश्वासन नहीं है, पर आपने अपनी भूमिका निभा दी है। आपको कठिनाई से प्राप्त मूल्यवान संतुष्टि की अनुभूति होगी जो कुछ ‘ठोस’ करने से ही आती है। लोगों को जानने और समझने से तथा उनके साथ कार्य करने से सामंजस्य को प्रोत्साहन मिलता है और भविष्य में साथ कार्य करने के नए द्वार खुल जाते हैं। सामूहिक मनोवृत्ति को बढ़ावा देने के लिए, भाई-चारा, साथ जुड़े होने की अनुभूति और खुशमिजाज़ी चमत्कार कर सकते हैं।

मैल्कम एक्स ने प्रसिद्ध 1964 की ‘वॉशिंग्टन मार्च’ पर यह कहकर विस्फोटक हमला किया था कि वह इस बात के लिए सबसे बड़ा सबक है कि कोई आंदोलन किस प्रकार विरोधी ताकतों द्वारा कमज़ोर किया जा सकता है। अपने सामान्य निष्ठुर अंदाज़ में उन्होनें इसे एक सर्कस, सैर सपाटा, पिकनिक कहा। हमें उनसे सहमत होने की ज़रूरत नहीं है किन्तु जो गोलियां वे ‘वाशिंगटन में रचे स्वांग’ की ओर दागते हैं, वे सोच को उत्तेजित तो करती हैं।

http://college.cengage.com/history/ayers_primary_sources/malcolm_x_washington_1964.html

दस करोड़ का सवाल यह है कि, अगर हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अनेकों समस्याओं का सामना कर रहे हैं, अगर हमें भारत में सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने के जोखिमों के विषय में ज्ञान है (खासकर, समाज के उस वर्ग के लिए जो आसानी से चपेटे में आ सके), अगर हमें सड़क पर आने की निराशापूर्ण निरर्थकता का बोध है, जहां सिर्फ इसी लक्ष्य की प्राप्ति हो पा रही है, यानि, सड़क पर उतरना, तो; देर-सवेर, एक ऐसा समय आता है जब हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के सबसे रचनात्मक उपाय के विषय में विचार करना चाहिए। क्या बेहतर है: लंबे घंटों तक सड़कों पे चुपचाप या चिल्लाते हुए घूमते रहना और साथ ही निराशा का अनुभव भी करते रहना, या एक सुचारु रूप से नियोजित परियोजना पर, या फिर स्वयं के स्तर पर कार्य करना, क्षमता निर्माण के निश्चित लक्ष्य की ओर, जो कि लुप्त हो गयी सामूहिक मनोवृत्ति को भी पुनः निर्मित और जागृत कर सके?

हममें ऐसे नायक या नायिकाएँ नहीं हैं जो अपने प्रतीकात्मक विरोध से ही एक सशक्त संदेश भेज सकें। पर हम इस बात की भी उम्मीद कर सकते हैं कि हम सकारात्मक तथा लाभदायक तरीकों से सामंजस्य स्थापित करके  अपने मे सामर्थ्य का निर्माण तथा सामूहिक मनोवृति की पुनः स्थापना करेंगे और अपने विरोध प्रदर्शनों को सबसे सार्थक तरीके से आगे बढ़ाएँगे।

(डॉ. आसमाँ अंजुम खान का यह आलेख मूल रूप से http://www.countercurrents.org/2017/10/23/protesting-in-a-meaningful-way/  पर प्रकाशित हुआ है। इस आलेख का अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद निवेदिता द्विवेदी ने किया है। निवेदिता द्विवेदी टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ से एलीमेंट्री एजुकेशन में परास्नातक हैं।)

(Dr. Asma Anjum Khan, based in Maharashtra, teaches English. Motivational speaker. She has written for various prestigious national and international publications and websites on social, ethical, and gender-related issues. She runs an NGO, FEEL (Foundation for English and Ethical Learning) that wants to bring change by equipping people with the language of English. )

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