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दक्षिण एशिया में जाति की समस्या और बाबा साहेब आंबेडकर

मज़हबी राज्यसत्ता कभी भी दलितों और वंचितों के साथ न्याय नहीं कर पायेगी

विद्या भूषण रावत

सर्वप्रथम मैं सर गंगा राम हेरिटेज फाउंडेशन का धन्यवाद करना चाहता हूँ कि उन्होंने बाबा साहेब आंबेडकर और जाति उन्मूलन कि सिद्धांत पर यहाँ ये कार्यक्रम आयोजित किया। लगभग 82 वर्ष पहले जात पात तोड़क मंडल, लाहौर ने डाक्टर आंबेडकर को जातियों का सम्पूर्ण विनाश कैसे हो नामक कार्यक्रम में अध्यक्षीय भाषण के लिए बुलाया था।

डाक्टर आंबेडकर को यह निमंत्रण संगठन के सचिव संत राम जी ने भेजा जो एक आर्य समाजी थे। संत राम और तोड़क मंडल के उनके साथी ये उम्मीद कर रहे थे बाबा साहेब आंबेडकर छुआछूत और जाति प्रथा के खात्मे के विषय में उनकी मित्रमंडली के विचारों को ही समर्थन कर आगे बढ़ाएंगे लेकिन डॉ आंबेडकर ने तो धर्मग्रंथो के अधिकार क्षेत्र को ही चुनौती दे दिया, फलस्वरूप आयोजक घबरा गए और उन्होंने डॉ आंबेडकर से अपने अध्यक्षीय भाषण को बदलने के लिए अनुरोध किया, जिसे डाक्टर आंबेडकर ने ठुकरा दिया और वो इस सम्मेलन में लाहौर नहीं आ पाए। मई 1936 में बाबा साहेब ने जातियों का उन्मूलन कैसे हो, नामक इस आलेख को पुस्तक के तौर पर छापा जो आज के दौर में भी जाति समस्या को समझने और उसके खात्मे के लिए सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

जाति की समस्या मूलतः वर्णव्यवस्था से सम्बंधित है लेकिन इसके वायरस ने दक्षिण एशिया में हर देश और समाज को डँस लिया है, इसलिए जाति समस्या या दलितों का सवाल केवल भारत या हिन्दुओं का सवाल नहीं रहकर पूरे विश्व का प्रश्न है, क्योंकि जातिवाद या जातीय भेदभाव मुस्लिम, ईसाई, सिख समाजो के अन्दर भी है और पूरे दक्षिण एशिया में यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है।

बहुत बड़ी संख्या में लोगो के अभी तक पता भी नहीं है मुसलमानों में पसमांदा सवाल जाति का प्रश्न है

आज भी हलालखोर और वत्तल जैसी जातियां मानव मल ढोने का कार्य कर रही हैं और ये पूर्णतः पुश्तैनी पेशा है। कलंदर, मदारी, बुनकर, नाई,भिश्ती आदि। ईसाइयो में भी सफाई के पेशे में लगे लोग हैं।

वैसे विभाजन से पहले सफाई पेशे में लगे लोग पंजाब में अपने को लालबेगी कहते थे। इसलिए राष्ट्रों और धर्मो की सीमाओं को लांघकर दलितों को आज़ादी मिल गई ऐसा नहीं हुआ। इसलिए जब हम बाबा साहेब आंबेडकर की बात कहते हैं और उनके जाति विनाश के सिद्धांतो को आज के परिपेक्ष्य में देखते हैं तो कम से कम हमें अपनी बातों को पूरी समझदारी से देखना पड़ेगा क्योंकि जुमलेबाजी से काम नहीं चलेगा।

जहाँ तक भारत का प्रश्न है जहाँ सामाजिक तौर पर जाति की बुराई अभी भी मौजूद है तो उसके खिलाफ आवाज उठाने वालों की संख्या भी बहुत अधिक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कानून और संविधान के तौर पर भारत ने बहुत से क़ानून बनाये हैं, चाहे छुआछूत निवारण का हो या अनुसूचित जाति जन जाति अत्याचार विरोधी आधिनियम 1989।



भारत में अम्बेडकरवादी आन्दोलन की धार बहुत मज़बूत है क्योंकि उसकी सबसे बड़ी ताकत है तर्क और कानून।

बाबा साहेब के आन्दोलन की सबसे बड़ी बात यह थी इसने लोगो में बदलाव की बात कही। इसने अपने भाग्य को खुद बनाना सीखा और अपनी नयी संस्कृति विकसित की जो तर्क और मानवीयता पर आधारित थी, ये अपने महापुरुषों के मानवाधिकारों  के संघर्षो के इतिहास को समझ रहे हैं और आगे बढ़ रहे हैं और अपनी समस्याओं का समाधान आधुनिक शिक्षा के जरिये कर रहे हैं। आज भारत में अम्बेडकरवादी व्यावसायिक तौर पर सफल हो रहे हैं और सरकारी क्षेत्र में उनकी उपस्थिति हर लेवल पर बढ़ रही है।

लेकिन जब मैं दक्षिण एशिया में देखता हूँ तो नेपाल को छोड़कर, अभी तक अन्य देशों ने दलितों के प्रश्नों को गंभीरता के साथ नहीं लिया है और न ही उनकी सुरक्षा, प्रतिनिधित्व के कानून उनके पास बने पड़े हैं।

पाकिस्तान में दलितों के हालत गंभीर है लेकिन उनकी सुनवाई के लिए कोई कानून नहीं है और न ही उनका सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में बहुत प्रतिनिधित्व है। सिंध जैसे सूबे में आज भी बंधुआ मजदूरी होती है। दलितों की संख्या बहुत होने के बावजूद भी अधिकांश भूमिहीन हैं। पंजाब जैसे सूबों में अभी भी सफाई कामगारों के लिए चूहड़ा और भंगी शब्द का इस्तेमाल होता है। ईशनिंदा के आरोपों का सबसे ज्यादा शिकार मसीह समाज है जो पाकिस्तान में आज भी सफाई पेशे में लिप्त है और छूआछूत का शिकार है।

पिछले साल उमरकोट में एक सफाई मजदूर सीवर की सफाई के वक़्त बेहोशी के बाद अस्पताल में डाक्टर ने छूने से इनकार कर दिया, फलस्वरूप उसकी मौत हो गयी।

पिछले वर्ष ही एक पत्रकार ने अपनी कहानी सुनाई थी कि किस प्रकार अपने दफ्तर में उसके लिए पीने के पानी का गिलास अलग से रखा जाता था।

मैंने बहुत बार कहा है कि हम लोगों ने आपस में झगड़े किये तो हमारी परम्पराएं और संस्कृति में भी एक दूसरे से सीखा। हम सूफी संतों की मजारों पर साथ पूजा करते हैं तो फैज़ से लेकर मंटो तक और रफ़ी से लेकर साहिर, शैलेन्द्र सभी को पढ़कर बड़े हुए, लता मंगेशकर की आवाज़ के फैन बने तो गुलाम अली और नुसरत फ़तेह के सुने बगैर भी हमारा गुजारा नहीं हुआ। ये सब साथ सेलिब्रेट करने की बातें हैं लेकिन एक बात जो हम सबको कड़वी लग सकती है वो यह है कि हममे ऐब भी एक जैसे हैं। अगर हमारे यहाँ जातिवाद या छुआछूत है, जिसमें सच्चाई थी तो आपके यहाँ क्यों है  हम इस मामले थोडा बेहतर इसलिए माने जायेंगे कि लाख खामियों के बावजूद भी हमारे यहाँ लोकतंत्र बचा रहा और बाबा साहेब का दिया संविधान मौजूद रहा और उसी की बदौलत आज देश में लोगो में चेतना का संचार हुआ है और लोगों को अधिकार मिले हैं, जबकि हमारे पड़ोस में लोकतंत्र की जड़ें अभी भी कमजोर हैं और लोग अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

धर्म की भूमिका अभी भी बहुत बड़ी है और गैर संवैधानिक धार्मिक कट्टरपंथी अभी भी सत्ता पर हावी हैं। दलितों के लिए संवैधानिक तौर पर पाकिस्तान और बांग्लादेश में कुछ नहीं है। सत्ता में दलितों की भागीदारी लगभग न के बराबर है।

बाबा साहेब आंबेडकर का संघर्ष मानवता का संघर्ष था। वो देश को आधुनिक बनाने का संघर्ष था, जिसमें खुलापन हो और ईमानदारी से तर्क करने की गुंजाइश हो। जहां हम अपनी बातों को बिना डर और भय के रख सकें।



भारत का सौभाग्य है कि हमारे पास अपनी बहुत बड़ी ताकत हमारा संविधान है और अम्बेडकरवादी इस संविधान की हिफाजत के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसलिए भारत में अब बात बहुत आगे पंहुंच चुकी है और अम्बेडकरवादी अपना साहित्य, अपना इतिहास और अपनी राजनीतिक लड़ाई स्वयं लड़ रहे हैं, लेकिन दक्षिण एशिया के दूसरे देशों में स्थिति वैसी नहीं है।

पाकिस्तान में अल्पसंख्यको के लिए पृथक निर्वाचन है लेकिन दलितों का प्रतिनिधित्व संसद और राज्य विधानसभाओं में बिलकुल नगण्य है। सरकारी सेवाओं में दलितों की उपस्थिति नहीं है और न ही मीडिया में उनकी उपस्थिति दिखाई देती है। दलितों पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध कानूनी तौर पर उनके पास कोई विशेष नहीं है। छुआछूत की घटनाएं आज भी हैं, जातीय उत्पीड़न आज भी है लेकिन कोई उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं। सरकारें दलित सवाल को भारत का और हिन्दुओं तक सीमित करती हैं जो उसको बहुत सीमित करता है और उसके साथ न्याय नहीं करता।

ये एक संयोग ही था कि आज़ादी के बाद भारत और पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री आन्दोलन में एक दूसरे के साथी थे। बाबा साहेब आंबेडकर भारत के और जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान के कानून मंत्री बने और संविधान सभा के सदस्य भी। दोनों अपने-अपने देश में दलितों के अधिकारों के लिए समर्पित थे। ये सभी के लिए जानना जरूरी है कि आखिर क्या हुआ कि जोगेंद्र नाथ मंडल को 1950 में इस्तीफ़ा देकर भारत आना पड़ा। उनके लम्बे चौड़े इस्तीफे को पढ़ कर समझने की जरूरत है कि कहां गलती हुई है। दक्षिण एशिया के सभी देशों में दलित और अन्य वंचित तबकों के अधिकारों के लिए सेक्युलर कानूनों की जरुरत है। मज़हबी राज्यसत्ता कभी भी दलितों और वंचितों के साथ न्याय नहीं कर पायेगी

सर गंगा राम हेरिटेज फाउंडेशन लाहौर ने दलित प्रश्नों को उठाकर एक अच्छी पहल की है लेकिन उनकी वेब साईट पूर्णतः भारत विरोधी धारणाओं पर आधारित है जबकि दलित प्रश्न अब मात्र भारत का नहीं है। पाकिस्तान को चाहिए के अपने देश में रहने वाले दलितों को न्याय दे और उनकी न्याय प्रशाशन मीडिया में भागीदारी को बढाए। भारत में अम्बेडकरवादी राजनैतिक संघर्ष कर रहे हैं और वो किसी भी तरह से ऐसे किसी भी प्रोपगंडा का शिकार नहीं बनेंगे जो देश के विरुद्ध जाता हो। भारत में संघर्ष जारी है और दलित न केवल राजनैतिक और सामाजिक संघर्ष कर रहे हैं अपितु व्यावसायिक तौर पर भी सफल है, जरुरत इस बात की है के दक्षिण एशिया के अन्य देशो में दलितों के सवाल को वहा की सरकारे स्वीकार करें और उन्हें न्याय दे। नेपाल ने अपने संविधान में दलितों को नए अधिकार और ताकत दी है लेकिन बांग्लादेश और पाकिस्तान ने अभी इस प्रश्न पर दूर-दूर तक भी जवाब नहीं दिए हैं। उन्हें शायद ये दीखता है के दलित प्रश्न भारत का ही है। दूसरे, पाकिस्तान, बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों ने जिस तरीके से ईशनिंदा क़ानून का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों के विरुद्ध किया है उसका सबसे ज्यादा शिकार कम से कम पाकिस्तान में स्वच्छकार समाज हुआ है जो अधिकांशतः ईसाई हैं और अभी भी भेदभाव का शिकार हैं।

दलितों और वंचित समाजो के लिए धार्मिक कानून हमेशा दुश्मन रहे है। बाबा साहेब आंबेडकर ने जब बौध धर्म को अपनाया तो उसके पीछे यही तर्क था के यह मानववादी चिंतन है और लोगों को तर्क और करुणा के साथ कार्य करना सिखाएगा। हकीकत ये है कि एक डाक्टर आंबेडकर जैसे तर्कवादी चिन्तक को धर्म की जरुरत नहीं थी लेकिन बुद्ध के धम्म में उन्हें भारतीय समाज के मानवीयकरण की सम्भावना दिखाई दी और इसलिए उन्होंने इसके नए प्रकार से व्याख्या की। राजनैतिक तौर पर अगर हम देखेंगे तो बाबा साहेब आंबेडकर ने व्यक्ति की सर्वोच्ता को स्वीकार किया, लोकतंत्र को महत्वपूर्ण माना और तानाशाही चाहे मजदूर वर्ग की ही क्यों न हो, उसको अस्वीकार कर दिया। उनके दृष्टिकोण अनुसार  दलितों, वंचितों और अल्पसंख्यको के लिए धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक राज्य ही उनकी सुरक्षा, सम्मान और भविष्य की गारंटी है। दुर्भाग्यवश, भारत को छोड़कर, दक्षिण एशिया में राजनैतिक तौर पर स्थायित्व का अभाव रहा और धार्मिक शंक्तिया सत्ता को नियंत्रित करती रही। आज के दौर में जातियों के उन्मूलन के लिए लोकतान्त्रिक व्यवस्था, धर्मनिरपेक्ष राज्य, बोलने की स्वतंत्रता, धर्मग्रंथो को चुनौती देने की इजाजत और व्यक्तिगत जीवन शैली से रहने की आज़ादी सबसे महत्वपूर्ण है और इनके अभाव में यदि कोई भी चर्चा केवल राजनैतिक लफ्फाजी होगी और वो हमें कही नहीं ले जायेगी।



मैं पुनः सर गंगा राम हेरिटेज फाउंडेशन को मुझे यहाँ आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद् करता हूँ लेकिन उनसे ये अनुरोध भी करूँगा कि वे अपना फोकस पाकिस्तान के दलितों के ऊपर भी रखें।

गंगाराम जी ने दलितों पे कोई काम किया हो या नहीं लेकिन जोगेंद्र नाथ मंडल जी ने पाकिस्तान में दलितों को न्याय दिलाने के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया, लेकिन मात्र तीन वर्षो में ही उन्हें भारत लौट आना पड़ा। ये जानना जरूरी है कि पाकिस्तान के सामंती सत्ता समीकरणों ने दलितों को अंततः क्या दिया। दलितों के नाम पर भारत विरोधी प्रोपगंडा को बंद किया जाना चाहिए क्योंकि ये समस्या सारे दक्षिण एशिया की है और सभी देशों में दलितों के लिए समान कानून और अवसरों की बातों पर चर्चा होनी चाहिए। सयुंक्त राष्ट्र पर जातिभेद को लेकर पुनः बात उठनी चाहिए और उसके परिप्रेक्ष्य में हर एक देश के यूनिवर्सल पीरियॉडिक रिव्यु में उनके यहाँ दलितों पर अत्याचार और सरकार द्वारा उठाये गए कदमो की बात होनी चाहिए। महत्वपूर्ण, दलितों की बराबरी के लिए ये आवश्यक है कि दक्षिण एशिया में सभी देश धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक मूल्यों को गहराई से अपनाएं और अपने यहाँ अल्पसंख्यको को बराबरी का अधिकार दे।

  • सर गंगा राम हेरिटेज फाउंडेशन, लाहौर द्वारा आमंत्रित कार्यक्रम में मैंने एन वक्त पर जाने से इनकार कर दिया। कहीं पर ये लगा कि कार्यक्रम की नियत ईमानदार नहीं है, ये केवल भारत विरोधी प्रोपगेंडा के लिए इवेंट मैनेजमेंट है, इसलिए मैंने तबियत ख़राब होने का बहाना कर इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया। ये कार्यक्रम 25 जनवरी 2018 को लाहौर में होना था। 

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