बिहार में चमकी बुखार से मर रहे बच्चों की लाशों को रौंदती सरकारें और समाज की संवेदनहीनता

क्या हो गया है हमारे समाज को। आज की तारीख में शासन-प्रशासन और मीडिया से तो कोई उम्मीद लगाना ही बेकार है। इसके लिए भी हम ही जिम्मेदार हैं। हां ! हमारे देश के लोग ऐसे रहे हैं कि परेशानी बड़ी हो या फिर छोटी। हमेशा लोगों ने आगे बढ़कर मोर्चा संभाला है। हम लोग यह तो जानने की जिज्ञासा रखते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्या पहन रखा है, वे कितने घंटे सोते हैं, क्या खाते हैं पीते हैं। यह भी जानने की कोशिश करते हैं कि पाकिस्तान की जनता कितनी परेशान है। वे भुखमरी की कगार पर हैं। हमें यह चिंता नहीं है कि हमारे देश की जनता किस हाल में हैं। उसे रोटी-पानी मिल रहा है या नहीं। कहीं कोई सूबा या क्षेत्र की गंभीर बीमारी की चपेट में तो नहीं है।

हम इतने खुदगर्ज हो गए हैं कि यदि किसी पार्टी से हमारा स्वार्थ जुड़ा है और उसका नेता बीमार हो जाये तो दुआओं के लिए मंदिरों में लाइन लग जाती है। यज्ञ होने शुरू हो जाते हैं। कोई सेलिब्रिटी किसी समस्या को लेकर परेशान हो जाये तो बवाल मच जाता है। धर्म के आधार पर यदि कोई मवेशी मर जाए, तो मार काट मच जाती है। हां आदमी की जान की किसी कोई कोई परवाह नहीं हैं। अपने बच्चे को खाएं खरोच भी आ जाये तो जान निकल जाती है, पर देश में कहीं कितने बच्चे मरते रहे हैं, हम पर कोई असर नहीं पड़ता।

बिहार के मुज़फ्फरपुर में चमकी बीमार से मरने वाले बच्चों की संख्या प्रशासन के हिसाब से तो 108 बताई जा रहे पर संख्या 200 से भी अधिक हो गई है। 108 का आंकड़ा तो सरकारी अस्पतालों में हुई मौतों का है। गांवों या प्राइवेट अस्पतालों में दम तोड़ रहे हैं बच्चों का कोई रिकॉर्ड सामने नहीं आया है।

न-न करते आखिकार स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन को बिहार जाना ही पड़ा। जिस देश के मंत्री हाई कमान के बुलाने पर दो घंटे में देश के किसी भी कोने में पहुंच जाते हैं, उस देश के स्वास्थ्य मंत्री को बिहार जाने के लिए 200 मौतों का इंतजार करना पड़ा। दो बच्चों ने तो स्वास्थ्य मंत्री की उपस्थिति में दम तोड़ दिया।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मोदी सरकार में मंत्रियों की संख्या में उलझे रहे और उनके सूबे में बच्चे बुखार से मरते रहे। यह हाल है सुशासन कुमार का। पेंशन की चिंता है पर देश के नौनिहालों की नहीं। बच्चे बचते तो भी तो कैसे ? जिला अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं के नाम पर बस ठेंगा ही है। डॉक्टर और बेड भी नाममात्र के ही हैं। यदि ICU की बात करें तो सूबे के बड़े अस्पताल एसकेएमसीएच आ जाइये।

इसकी हालत यह है कि गत 12 घंटे में 12 से अधिक बच्चों की मौत मुज़फ्फरपुर के इसी एसकेएमसीएच में ही हुई है। आईसीयू का हाल यह है कि एक बेड पर 3-3 बच्चे लिटाये हुए हैं। अस्पताल में एक या दो शिशु डॉक्टर हैं, जो 150 बच्चों को देख रहे हैं। वे करें तो क्या करें।

यदि बिहार में बीमारी से निपटने की व्यवस्था नहीं है तो दिल्ली से डाक्टर या दवा क्यों नहीं मंगाई गई। स्वास्थ्य सेवाएं क्या बस ढिंढोरा पीटने के लिए ही हैं क्या। या फिर बीमार बच्चों को हेलीकॉप्टर या विशेष विमान से दिल्ली एम्स जैसे अस्पतालों में लाने की व्यवस्था क्यों नहीं हो रही है।

बिहार में चमकी बुखार से मरे बच्चों  के मामले में यह प्रश्न तो उठता है कि ये बच्चे अचानक तो मरे नहीं हैं। शासन और प्रशासन स्तर से बीमारी कंट्रोल करने या बच्चों के बचाने के प्रयास क्यों नहीं हुए। प्रदेश या फिर केंद्र सरकार इस बीमारी के प्रति क्यों नहीं सचेत हुई।

नीतीश कुमार बिहार तो नरेंद्र मोदी देश को आगे ले जाने का ढिंढोरा पीटते घूम रहे हैं। तो क्या ये सब उपलब्धियां हैं सरकारों की। कहां हैं गिरिराज सिंह, हर बात में मुंह घुसेड़ देते हैं। क्या चमकी बुखार भी पाकिस्तान से आ गया है क्या ? हिन्दू मुस्लिम के मुद्दे पर तो हर समय बकवास करते घूमते हैं। अब जब सूबे के बच्चे मर रहे हैं तो सांप सूंघ गया है क्या, गरीब के बच्चे हैं न। किसी मंत्री या ब्यूरोक्रेट का कोई बच्चा होता तो पूरा शासन और प्रशासन उधम काट देता।

कहां हैं उपेंद्र कुशवाहा ? खून की नदियां बहा रहे थे चुनाव परिणाम में। कहां हैं तेजस्वी यादव और महागठबंधन के दूसरे महायोद्धा। बस ये सब गरीब वोटबैंक तक ही सीमित हैं। कहां हैं देश को विश्वगुरु बनाने की बात करने वाले लोग ? क्या वोटबैंक के लिए ही बस राष्ट्रवाद है।

जिन लोगों के बच्चे बुखार की चपेट में आ रहे हैं मर रहे हैं। उनके दिल से पूछिए। उनको राम मंदिर बनवाना है या फिर बाबरी मस्जिद। उनसे पूछिए मोदी इमरान खान से बात नहीं कर रहे हैं। आप खुश तो हैं न।

जिस देश और सूबे में छोटे-छोटे बच्चे किसी बीमारी से दम तोड़ रहे हों, उस देश का प्रधानमंत्री और उस सूबे का मुख्यमंत्री निश्चिंत घूम रहा हो। समझ लीजिये देश कहां जा रहा है।

यही हाल महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और कर्नाटक के सूखाग्रस्त गांवों का है। उन गांवों की आपदा के लेकर भी सरकारें गंभीर नहीं हैं। जमीनी हकीकत यह है कि हर समय गरीब की बात करने वाले देश और समाज के ठेकेदारों एजेंडे में गरीब है ही नहीं।

केंद्र और बिहार के स्वास्थय विभाग से जुड़े नेताओं और अधिकारियों को वातानुकूलित माहौल चाहिए। जनता के लिए क्या है। राजनीतिक दलों को घर से लेकर कार्यालय तक फाइव स्टार चाहिए। जनता के लिए तो उसकी जान की सुरक्षा भी नहीं है। जरा-जरा सी बात के लिए डिबेट चलाने वाले मीडिया को अभी और मौतों का इन्तजार है क्या।

आज यदि बिहार में बच्चे किसी गंभीर बीमारी से मर रहे हैं, कर्नाटक और महाराष्ट्र में सूखे में सरकारी उपेक्षा से मर रहे हैं, मराठवाड़ा में किसान आत्महत्या कर रहे हैं तो कहीं न कहीं इसके लिए ये लोग बहुत बड़े जिम्मेदार हैं। जब इन्हें वोट की ताकत दिखाने का समय आता है तो जाति और धर्म के नाम पर नेताओं के बरगलाने में आ जाते हैं।

चरण सिंह राजपूत

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, लंबे समय तक पटना में पत्रकारिता कर चुके हैं।)