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कैसे बेख़ौफ़ ..शनि मंगल के उतारों को पचा गया/ वो भूख का शिकार बच्चा ..मेरे टोटके भी खा गया…

कैसे बेख़ौफ़ ..शनि मंगल के उतारों को पचा गया/ वो भूख का शिकार बच्चा ..मेरे टोटके भी खा गया…

डॉ. कविता अरोरा

..यही कोई आठ बरस का था वो …मगर अपनी असल उम्र से आधे का लगता था…

सूकड़ी सा …

भूख से ..बदन ..पनपा ही नहीं ….

बाएँ मुड्ढे पर …

प्लास्टिक का बोरा टाँगे ..

कूड़े में बीन रहा था ..खुद की रोटियों की जुगाड़ …

और मैं …

लम्बी सी गाड़ी लिए ..ढूँढ रही थी ..किसी अँधे भिखारी को …

कि ..

यक़-बा-यक़ निगाह उस पर पड़ गई …

मैंने कार रोकी…

खिड़की पर चढ़ा कांच उतार ..

उसे आवाज़ दी….

तो बेयक़ीनी …और हैरत से … उसने मुझे तका…

और फिर हाथ के इशारों से ..

मुतमइन होकर ..कार की तरफ़ बढ़ा चला आया …

मैंने डबलरोटियों के ..दो पैकिट ..थमा दिये उसे …. वही.

जो पंडितों ने ..किसी अँधे भिखारी को देने के लिए कहे थे ….

डबलरोटियाँ नहीं थीं वो…

उपाय थे… शनि ..मंगल ..सुधारने के उपाय…

उसकी मासूम निगाह ने ..

मेरी निगाह से .. सवाल तो कई पूछे..

मगर जवाब लिए बग़ैर ..नज़र ..ब्रेड के पैकेटों पर चिपक गईं …

फिर …ना वो कुछ पूछ सका …

और… ना ..

मेरे लबों से ही कोई अल्फ़ाज़ फूटे….

मगर कुछ पलों में ही ..

उन मैली उँगलियों के लम्स ने ..

अपना तमाम दर्द …मेरे कलेजे पे लिख दिया …

वो वहीं उसी कूड़े के ढेर पर बैठ ..

बेतरतीबी से ..सूखे ब्रेड के टुकड़े ..हलक से निगलने लगा…

और मैं ..

इत्मिनान से ..कार का ..ए.सी. चला कर बैठ गई… ..

मुझे अब सुकून था..

खुद पर से ..शनि की लानत जो वार दी थी.. अपनी सारी मुसीबतें ..उस बदनसीब बच्चे पर उतार दी थीं….

मगर मुझे हैरत थी..

दिखने में तो दुबला था …मरियल सा….

कैसे बेख़ौफ़ ..शनि मंगल के उतारों को पचा गया ?

वो भूख का शिकार बच्चा ..मेरे टोटके भी खा गया…

 

 

 

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