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लम्पट विकास के दौर में खेती और किसानी – दशा और दिशा

रवींद्र गोयल

गत कई सालों से किसानों की आत्महत्या की ख़बरें राष्ट्रीय अख़बारों में छप रही हैं, अभी कुछ दिन पहले तमिलनाडु के किसान महीना भर से ऊपर दिल्ली के जंतर-मंतर पर बैठ कर मात्र तमिलनाडु  के मुख्यमंत्री के इस आश्वासन पर कि उनकी मांगों पर गौर किया जाएगा, अपने घरों को लौटने को बाध्य हुए।

हाल तक महाराष्ट्र केमुख्य मंत्री किसानों से इस आधार पर बात करने को तैयार नहीं हो रहे थे कि उनका आंदोलन आसामाजिक तत्वों की अगुआई में चल रहा है। मध्य प्रदेश में भी यही फतवा जारी किया जा रहा था। लेकिन मंदसौर में 7 किसानों के पुलिस द्वारा मारे जाने और कई की आत्महत्या के बाद तथा देश में उसके विरोध में व्यापक प्रतिक्रिया होने के बाद राज्य और केंद्र का शासन भी डोला और अख़बारों में भी खेती और किसानी पर चर्चाएं तेज़ हुई हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का नक्शा भी ढीला हुआ और उन्होंने किसानों को कर्ज़ माफ़ी का आश्वासन दिया। केंद्र सरकार को भो किसानों की सुध आयी लगती है और शिवराज भाई तो उपवास और नमस्कार की भाषा बोल रहे हैं।

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दरअसल, मंदसौर आज इस बात का ज्वलंत सबूत बन गया है कि अब किसानों के सब्र का घड़ा  भरने के कगार पर है और यदि हालात न संभाले गए तो यह सरकार के 2019 के बाद के मंसूबों की कब्र बन सकता है। कुछ कुछ उसी तरह जैसे 2007  का नंदीग्राम पुलिस हत्याकांड  बंगाल में सीपीएम की वाम मोर्चा सरकार की करारी हार का कारण बना थ। बात अभी मात्र सतह पर है। किसान आंदोलन का नेतृत्व अभी धनी और मंझोले किसानों के हाथ में है और उनकी मांगें भी बहुत उग्र नहीं हैं। किसान केवल बैंक के कर्ज़े में राहत और खेती के उत्पाद का बेहतर मूल्य मांग रहे हैं। जबकि पिछले पच्चीस सालों के ग्रामीण अर्थव्यस्था के नकार के घाव गहरे हैं। सम्पूर्ण ग्रामीण अर्थव्यस्था बरबादी से कराह रही है।

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खेती घाटे का सौदा है। पिछले पचीस साल का विकास रोज़गारविहीन विकास है। दुनिया में सबसे तेज़ विकास वाला देश होने के बावजूद खेती की विकास दर में उत्तरोत्तर गिरावट आयी है। 1990 के दशक में जो कृषि की विकास दर 2 .8 प्रतिशत सालाना थी, वो दर 2000 -2010 के बीच घट कर  2 .4 प्रतिशत रह गयी और वर्तमान दशक में तो अब तक मात्र 2 .1 प्रतिशत ही है।

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किसानों के बढ़ते गुस्से का मूल कारण है आज के वैश्वीकृत निज़ाम में खेती का अर्थशास्त्र जो किसानों के खिलाफ है। 90 के दशक में विश्व व्यापर संगठन की सदस्यता और आयत प्रतिस्थापन से निर्यात संवर्धन की विकास नीति की और प्रस्थान ने सरकार की सभी नीतियों को विदेशी पूँजी और विदेशी बाजार से जोड़ दिया है। अब खेती और देशी उद्योगों पर ध्यान देना सरकार की प्राथमिकता में नहीं है।

ख़राब फसल होने पर किसानों की हालत पतली ही रहती है। यदि सूखे की वजह से फसल ख़राब हो गयी तो जो लागत लगी, उसके चलते घाटा होना निश्चित है। पर यदि फसल अच्छी भी हुई तो इससे उनको फायदा ही होगा, यह निश्चित नहीं है। पिछले दो सूखों के बाद 16-17 का मानसून ठीक था और सरकारी उद्बोधन के चलते किसानों ने मोटे अनाज, तिलहन और दलहन की अच्छी फसल पैदा की, लेकिन सरकार ने वादे के अनुसार न तो समर्थन मूल्य ही आकर्षक घोषित किए और न ही फसल को खरीदने की व्यवस्था की।

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अब दुनिया के पैमाने पर भी खेती की अच्छी पैदावार के चलते उपज के दाम सस्ते हुए और वैश्वीकरण को प्रतिबद्ध सरकार ने सस्ते आयात पर भी कोई रोक नहीं लगायी। नतीजा कृषि उपज के बाजार भाव बुरी तरह ध्वस्त हुए। तूअर दाल का दाम 110 रुपये प्रति किलो से घट कर 40 रुपये प्रति किलो रह गया है। नोटबंदी के प्रभाव में मंडियों में सब्ज़ियों और फलों के दाम भी गिर गए हैं। टमाटर 1 रुपए किलो है और आलू-प्याज़ के दाम का भी यही हाल है। इसके चलते बेशक उपभोक्ता कीमत का सूचकांक नरम पड़ा है और रिज़र्व बैंक पर ब्याज दर कम करने का दबाव भी बढ़ रहा है, पर यह किसानों की बर्बादी का सबब बना है। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि खेती घाटे का सौदा बना हुआ है।

कृषि मज़दूरों, सीमान्त किसानों की तो बात ही छोड़िए, मंझोले और बड़े किसानों के सामने भी यह सवाल खड़ा हो गया है कि भोजन कैसे चले और कर्ज़ कैसे भरें।

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सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश में धान की फसल पर किसानों को 15 प्रतिशत घाटा है और गेहूं पर लागत के ऊपर केवल 2 प्रतिशत मुनाफा है। इस बरबादी की जड़ में है पिछले सालों में खेती के काम के जरूरी कच्चे माल की लागत में बढ़ोत्तरी। जबकि समर्थन मूल्य में उस के अनुरूप बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। नीचे की तालिका में 2004-2005 और 2014-2015 के बीच, मध्य प्रदेश में गेहूं के उत्पादन में लगने वाली प्रति हेक्टेयर 3 महत्वपूर्ण लागतों का ब्योरा है।

लागत की मद
प्रति हेक्टेयर

2004 – 2005

2014 – 2015

खाद

1241.34 रुपए 

2695.27 रुपए

बीज

998 रुपए

2653 रुपए

सिंचाई खर्च

1961.50 रुपए

2599.50 रुपए

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अन्य लागतें जैसे कीटनाशक, मज़दूरी, खेती में काम आने वाली मशीनों का भाड़ा भी उसी अनुरूप बढ़ा होगा, लेकिन गेहूं का समर्थन मूल्य  इस बीच 640 रुपए प्रति कुंतल से बढ़ाकर 1400 रुपये प्रति कुंतल किया गया। स्पष्ट है कि जबकि लागतें दुगने से ज्यादा बढ़ी हैं, समर्थन मूल्य दुगना ही हुआ है। अगर वास्तव में देखा जाये तो किसान को यह मूल्य भी मिलता नहीं है, क्योंकि एक तो सरकारी खरीद के माध्यम उतने सुलभ नहीं है और दूसरे सरकारी माध्यमों से पैसा लेना इतना आसान नहीं है। वो व्यापारी को बेच कर कम पैसा लेना पसंद करते हैं। और इस साल तो समस्या ज्यादा विकट है।

नोटबंदी के चलते किसानों को पैसा चेक से दिया जाता है तथा उसे भंजाने में कई दिन लग जाते हैं, क्योंकि बैंकों के पास नकदी के आभाव की ख़बरें हैं।

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ये हालात कोई मध्य प्रदेश के ही नहीं हैं। लगभग पूरे देश के ही हैं। एक शोध के अनुसार, हरियाणा में खेती के लिए ली जानेवाली जमीन का भाड़ा जो 2014 के साल में 37000 रुपए प्रति एकड़ था, वो इस साल 24000 रुपए प्रति एकड़ हो गया है। ऐसे में, किसानों की मांग कि कर्ज़ा माफ़ किया जाए और उन्हें स्वामीनाथन आयोग द्वारा सुझाए गए लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत मुनाफे का समर्थन मूल्य दिया जाए, पूर्णतया जायज है। लेकिन पूंजीपति हितों को प्रतिबद्ध मोदी सरकार ने और भाड़े के कलम के कुलियों ने इन मांगों के खिलाफ चीत्कार शुरू कर दी है।

चुनाव से पहले बेशक मोदी ने किसानों से वायदा किया था कि वो उनको स्वामीनाथन आयोग द्वारा सुझाए गए समर्थन मूल्य देंगे, पर चुनाव जीतते ही उनकी सरकार ने सर्वोच्च न्यायलय में कहा कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं है। हाल में अमित शाह ने भी फतवा जारी किया है कि स्वामीनाथन आयोग द्वारा सुझाए गए समर्थन मूल्य उनकी सरकार तो क्या कोई भी सरकार कभी भी नहीं दे सकती है।

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इसी तरह कर्जमाफी के सवाल पर भी अरुण जेटली कहते हैं कि कर्ज माफी के लिए केंद्रीय सरकार कोई पैसा नहीं देगी। राज्य सरकारों को स्वयं उसके लिए पैसा जुटाना होगा। रिज़र्व बैंक के गवर्नर और कई बुद्धिजीवी कहते हैं कि किसानों की कर्ज़ माफ़ी देश के लिए ठीक नहीं है। उनका तर्क है कि किसान को ब्याज सहित कर्ज़ा समय से लौटना होगा। इसे अर्थशास्त्र की भाषा में ऋण अनुबंध की पवित्रता कहा जाता है और अगर इस पवित्रता का उधार लेने वाले पालन न करें, तो कोई भी अर्थव्यवस्था लंबे समय तक सुचारु रूप से नहीं चल सकती। कोई उनसे पूछे कि जब वो उद्योगपतियों के लाखों करोड़ रुपए के कर्ज़ के समायोजन के लिए तत्पर हैं और बैंकों को यथोचित मुंडन ( haircut ) की सलाह दे रहे हैं तो फिर  उसी तर्क के आधार पर   किसानों  का कर्ज़ा क्यों नहीं माफ़ किया जा सकता।

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बड़े कर्जदारों का नाम बताने में भी सरकार और रिज़र्व बैंक को दिक्कत होती है। बड़े उधार लेने वाले अपनी ताकत और संबंधों के आधार पर और बड़े वकीलों की मदद से बैंकों को डरा-धमका-फुसला कर कर्ज़ा वसूलने से रोक लेते हैं। वैसे भी बड़े कर्ज़ लेने वाली कंपनियों के नाम पर कर्ज़ा लेते हैं और वहां शेयरधारक के रूप उनकी क़र्ज़ लौटने की जिम्मेवारी सीमित है। (यानी कर्ज़ा कानूनी तौर पर उनकी निजी संपत्ति में से नहीं वसूला जा सकता) जबकि छोटे खाते वाले कर्जदारों के लिए यह सही नहीं है। कानूनी तौर पर उनकी कर्ज़ लौटने की जिम्मेवारी असीमित है और उनसे कर्ज़ वसूली के लिए उनकी निजी संपत्ति को भी नीलाम किया जा सकता है।

इस लम्पट विकास के दौर में किसानों की ज़मीन पर सबकी नज़र है। इसे नीलाम करने से कई फायदे होते हैं। बड़े भू-माफियाओं को जमीन और उसमें दबा खनिज औने-पौने दाम में मिल जाता है, बैंकों का कर्ज़ लौट आता है, ताकि वो धन्ना सेठों की और ज्यादा सेवा कर सकें और भूमि विहीन किसान उस श्रम की आरक्षित सेना में शामिल हो जाते हैं जो कामगार की मज़दूरी कम करने के औज़ार के रूप में काम आती हैं।

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हम यह ऊपर कह आये हैं कि किसानों की दोनों मांगें – कर्ज़ा माफ़ किया जाये और स्वामीनाथन आयोग द्वारा सुझाए गए लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत मुनाफे का समर्थन मूल्य दिया जाए, पूर्णतया जायज है, लेकिन यह ध्यान देना होगा कि मात्र इतने से भारतीय किसानी का संकट नहीं दूर हो जायेगा। कर्ज़ माफ़ी सिर्फ उनको राहत देगी, जिन्हें औपचारिक क्षेत्र से कर्ज़ा मिला है और उचित समर्थन मूल्य उनकी कुछ मदद करेगा जो बाजार में अपनी फसल लेकर बेचने जाता है। यह सुविधा सब किसानों को नहीं है। केवल बड़े किसानों या थोड़े मंझले किसानों को ही है।

आंकड़े बताते हैं कि 2011-12 में देश में ऊपरी 10 प्रतिशत किसान 50.2 प्रतिशत भूमि पर काश्त करते थे और शेष 90 प्रतिशत किसान के हिस्से केवल 49.8 प्रतिशत भूमि आती थी। निचले 50 प्रतिशत किसान तो केवल 0.4 प्रतिशत भूमि ही जोतते थे तथा भूमि विहीन ग्रामीण परिवारों की संख्या ग्रामीण परिवारों का 50 प्रतिशत है। इस हिसाब से उपरोक्त दो मांगें ज्यादा से ज्यादा 25 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों (धनी/मंझोले किसानों) को ही फायदा पहुंचा सकती हैं।

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ravinder goyelसच तो यह है कि किसानों के ज्यादा बड़े हिस्से को तो औपचारिक क्षेत्र से कर्ज़ा मिलता ही नहीं है, क्योंकि उसके पास कोई खास संपत्ति ही नहीं होती जिसे वो गिरवी रख सकें। ऐसे में, उनकी कर्ज़ की ज़रूरतें तो सूदखोर और कर्ज़ देने वाले व्यापारी पूरा करते हैं। यह शहरी मित्रों को अटपटा लगा सकता है, पर सूदखोर महाजन पिछले 25 सालों के विकास के अंतर्गत फले-फूले हैं। इन किसानों को खाद और बीज भी निर्धारित मूल्य से महंगा मिलता है और फसल जब बेचनी होती है तो  उसका दाम भी कम मिलता है। कृषि मज़दूरों के कर्ज़ का स्रोत भी तो यही महाजन हैं।
इस ग्रामीण बहुलांश के फायदे की यदि बात करनी है तो कुछ और ही करना होगा। मात्र जारी आंदोलन से उम्मीद पालना एक भुलावा ही होगा।

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में वाणिज्य के प्रोफेसर हैं।

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