जब तक जाति उन्मूलन नहीं होगा, बहुजनों के खिलाफ नस्ली भेदभाव जारी रहेगा

opinion debate

Racial discrimination against Bahujans will continue until caste is abolished

अक्सर बार-बार ठोकर खाते जाने के बावजूद संभलकर चलने की आदत बनती नहीं है। आदत नहीं सुधरने का मतलब आगे फिर सत्यानाश है।

हम बामसेफ के आभारी हैं कि बामसेफ से करीब एक दशक तक जुड़े रहने की वजह से अंबेडकरी मिशन के तमाम लोगों से लगातार संवाद करने का मौका मिला है। वह संवाद आज भी कमोबेश जारी है, जिस वजह से हम हवा हवाई बातें नहीं करते लिखते हैं।

बामसेफ के मंचों से देशभर में आर्थिक मुद्दों पर करीब एक दशक तक हम बातें करते रहे हैं, मुंबई में बजट का विश्लेषण करते रहे हैं और हर सेक्टर में जाकर अर्थव्यवस्था की बुनियादी मुद्दों पर संवाद भी करते रहे हैं।

अब हम बरसों से बामसेफ में नहीं हैं और जिन साथियों को लेकर अंबेडकर के आर्थिक विचारों पर हम जमीनी हकीकत और राजकाज, नीति निर्धारण के तहत ग्लोबीकरण , निजीकरण उदारीकरण पर लगातार संवाद कर रहे थे, वे तमाम साथी भी अब बामसेफ में नहीं हैं।

फिर भी हमारे मुद्दे और सरोकार अब भी वे ही हैं।

बहुसंख्य मेहनतकश जनता के हकूक के मुद्दे, उनकी बुनियादी जरुरतों और बुनियादी सेवाओं के मुद्दे , जल जंगल जमीन आजाविका, पर्यावरण जलवायु, नागरिकता, नागरिक मानवाधिकार कानून का राज, संवैधानिक रक्षा कवच, समता, न्याय, सबके लिए समान अवसर और संसाधनों पर आम जनता के हक के सवाल और मुक्तबाजार के प्रतिरोध के मुद्दे वे ही हैं, जिन्हें हमने बामसेफ के मार्फत बहुजन आंदोलन के मुद्दे बनाने की कोशिश लगभग एक दशक से करते रहे हैं। जो हम कर नहीं सके हैं।

सिर्फ हम बामसेफ की भाषा का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, जो यकीनन बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की भाषा भी नहीं रही है।

विमर्श की भाषा बहुजनों की भी भाषा होनी चाहिए।

बाकी तमाम हककूक से वंचित रहने के साथ ज्ञान और शिक्षा के हकहकूक से हजारों साल से मनुस्मृति विधान के चलते अस्पृश्य बने रहने के नर्क से निकलने के लिए मनुस्मृति के मुताबिक अपनी जाति पहचान को मिटाना बेहद जरूरी है और जाति धर्म नस्ल की भाषा में संवाद का मतलब फिर वही मनुस्मृति सौंदर्यशास्त्र और व्याकरण है, जिससे मुक्त होने के लिए जनमजात जिस जुबान में बात करने को हमें अभ्यस्त बनाया गया है। घृणा की उस जुबान से मुक्त होने की जरुरत है जो सीधे तौर पर तथागत गौतम बुद्ध का पंथ है। यही एकमात्र मुक्तिमार्ग है।

धम्म प्रवर्तन की भाषा में हिंसा का वर्जन दरअसल वर्गीय ध्रुवीकरण है, जिसकी कोई काट ब्राह्मण धर्म और उसके ग्लोबल हिंदुत्व के पास नहीं है और ग्लोबल हिंदुत्व के प्रतिरोध का यही एकमात्र वैकल्पिक ग्लोबल एजंडा संभव है, जो हमारे इतिहास और लोक की विरासत है।

तथागत गौतम बुद्ध के मुकाबले न कोई कल्कि अवतार है और न कोई डान डोनाल्ड है, इसे समझ लें तो प्रतिरोध की जमीन अब भी बनायी जा सकती है।

धर्मस्थलों को फिर ज्ञान के केंद्रों में तब्दील करने का तथागत का आंदोलन ही संस्थागत फासिज्म के राजकाज से मुक्त होने का रास्ता है।

पिछले दिनों एक साक्षात्कार में विद्याभूषण रावत ने मुझसे यही पूछा था कि बहुजनों को शिकायत है कि आपकी भाषा अंबेडकरी कम और वामपक्षी ज्यादा लगती है।

उस संक्षिप्त बातचीत में तमाम मुद्दों के साथ इसका जवाब पूरा दे नहीं सका था।

अब अंबेडकर के रचना समग्र को उठाकर देख लें, डिप्रेस्ड क्लास के अलावा, ब्राह्मणवाद के अलावा वंचितों के हकहकूक की उनकी विचारधारा में गालीगलौज कितने हैं।

जिस भाषा का इस्तेमाल अब अंबेडकरी मिशन के नाम लोग करते अघाते नहीं और जिस भाषा के बूते वे किसी को भी अंबेडकरी तमगा देकर उसके पिछलग्गू बन जाते हैं, यही तर्क और विज्ञान के विमर्श की भाषा में संवाद करने वाले बहुजनों को कम्युनिस्ट बताकर उनका बहिष्कार से हिचकते नहीं हैं, अंबेडकर के विचारों में उस जाति घृणा की कितनी जगह है।

तथागत गौतम बुद्ध के पंचशील की भाषा पर भी गौर करें।

गौरतलब है कि अंबेडकर ने डिप्रेस्ड क्लास कहा है, जाति उन्मूलन की बात कही है। उन्होने अस्पृश्यता खत्म करने के लिए पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद, दोनों का पुरजोर विरोध किया है लेकिन कहीं भी जाति बतौर वंचित वर्ग को संबोधित नहीं किया है बल्कि वर्ग संघर्ष की बात करने वाले कामरेड इसके उलट जाति से इंकार करते हुए जाति वर्चस्व के समीकरण में अपनी विचारधारा और वर्ग संघर्ष दोनों को तिलांजलि देकर मनुस्मृति शासन की निरंतरता बनाये रखने का धतकरम किया है।

वर्ग की बात जब अंबेडकर खुद कर रहे थे, जब अंबेडकर ने लड़ाई की शुरुआत ही वर्कर्स पार्टी और ट्रेड यूनियन आंदोलन के साथ अस्पृशयता विरोधी आंदोलन से की थी, तब जाति से नत्थी अंबेडकरी मिशन के औचित्य पर बहस उसी तरह जरूरी है जैसे वामपक्ष का जाति के यथार्थ से इंकार और बहुसंख्य सर्वहारा से विश्वासघात की चीड़ फाड़ अनिवार्य है।

वाम आंदोलन में अंबेडकर की अनुपस्थिति की वजह से वर्गीय ध्रुवीकरण हुआ नहीं है और जाति व्यवस्था पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है, इस सच का सामना भी करें।

जब तक जाति उन्मूलन नहीं होगा, बहुजनों के खिलाफ नस्ली भेदभाव जारी रहेगा

आरक्षण पर बहस की गुंजाइश है। जब तक जाति उन्मूलन नहीं होगा, जब तक जीवन के सभी क्षेत्रों में बहुजनों के खिलाफ नस्ली भेदभाव का सिलिसला जारी रहेगा, आरक्षण के अलावा वंचितों को समान अवसर और न्याय दिलाने का दूसरा कोई रास्ता नहीं है। हालांकि सत्ता वर्ग ने निजीकरण और मुक्तबाजार के जरिये आरक्षण खत्म करने का चाकचौबंद इंतजाम कर लिया है और मुक्त बाजार का समर्थन करने के आत्मघाती करतबसे अंबेडकरी आंदोलन आरक्षण को तिलांजलि देने में ब्राह्मणतंत्र का सहायक बना है और इस कार्यक्रम में बहुजनों के सारे राम मनुस्मृति के हनुमान बने रहे हैं।

यह भी गौर करने लायक बात है कि वर्णव्यवस्था और जाति व्यवस्था के तहत हजारों जातियों में बंटे हुए भारतीय मेहनतकशों को आरक्षण के तहत बाबासाहेब ने सिर्फ तीन वर्गों में संगठित करके जातियों को उन्ही संवैधानिक वर्गों में अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग में संगठित करने का करिश्मा कर दिखाया है।

अब अगर तमाम अनुसूचित और पिछड़े फिरभी जाति में गोलबंद बने रहकर अंबेडकरी मिशन चलाना चाहते हैं, तो यह फिर अस्पृश्यता के मटके और झाड़ू से खुद को नत्थी करने के अलावा और क्या है, हम यह नहीं समझते। भाषा का तेवर भी वहीं है।

पलाश विश्वास