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माओवाद की जड़ है धूर्त ब्राह्मण, उद्दंड क्षत्रिय और व्यापार बुद्धि वाला वैश्य – ई.एन.राममोहन, पूर्व महानिदेशक बीएसएफ

आनंद स्वरूप वर्मा

सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महानिदेशक ई.एन.राममोहन को कश्मीर और उत्तर पूर्व में विद्रोहियों से निपटने का जबर्दस्त अनुभव प्राप्त है।

1965 से ही भारतीय पुलिस सेवा में कार्यरत राममोहन का लंबा समय असम और नगालैंड में बीएसएफ के प्रमुख के रूप में बीता है।

अप्रैल 2010  में दंतेवाड़ा में माओवादियों ने जब सीआरपीएफ के 76 जवानों की हत्या की, उसके बाद तत्कालीन गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने इस हत्याकांड की जांच के लिए राममोहन को नियुक्त किया। उनका प्रस्तुत इंटरव्यू 12 जून 2010 को ‘तहलका’ में प्रकाशित हुआ था जिसमें उन्होंने माओवाद से निपटने की केंद्र की नीति की आलोचना करते हुए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। उस इंटरव्यू का यह अंश ध्यान देने योग्य है।

पूरे इंटरव्यू का लिंक है: https://l.facebook.com/l.php?u=http%3A%2F%2Fwww.tehelka.com%2F2010%2F06%2Fbringing-on-the-army-against-the-naxals-will-be-a-disaster%2F&h=ATNidseS2XAY0aiD9rQ1XP1qmSM9Nfys-NQF-PRrzESWpO1wvVX12ncw2MIybmir4r5NA6aaPrXoPlekTcgSMI-9s78lmu5MYVP8TW-q0MeF0eTGnNJusFdzYEvghbEmUxDFA8VS4USJya4

 प्रश्नः आंध्र प्रदेश के बारे में आपने बताया। छत्तीसगढ़ के बारे में आपकी क्या धारणा है?

उत्तरः छत्तीसगढ़ का मामला अधिकांशतः जंगलों पर अधिकार के सवाल से जुड़ा है। हजारों साल पहले प्रभावशाली जातियों ने आदिवासियों को धकेल कर जंगल में पहुंचा दिया था और आज स्थिति ये है कि लगभग सभी आदिवासी जंगलों में ही सीमित हैं। उनके पास कोई जमीन नहीं हैं और वे जंगल के उत्पादों से ही अपना काम चलाते हैं। लेकिन उन्हें उन उत्पादों को बेचना होता है और जब वे जंगल से निकलकर बाजार में पहुचते हैं तो उन्हें वहां कोई खरीदार ढूंढना पड़ता है।

अब यह खरीदार कौन है? वैश्य व्यापारी। समस्या की जड़ में देखें तो तीन लोग हैं-धूर्त ब्राह्मण, उद्दंड क्षत्रिय और व्यापार बुद्धि वाला वैश्य।

प्रसंगवश बता दूं कि चिदंबरम भी वैश्य हैं।

इन तीनों सामाजिक समूहों के लोग सदियों से आदिवासियों के अधिकारों को कुचल रहे हैं इसलिए अगर सीपीआई (माओवादी) ने आदिवासियों के लिए मदद का हाथ बढ़ाया है तो इस पर शिकायत कैसी। वे इन बनियों के बही खातों की जांच करते हैं ताकि गरीब आदिवासी को सही पैसा मिल सके।

आप खुद जाइए और देखिए कि तेंदू पत्ता के व्यापार में क्या हो रहा है।

मुझे बताया गया कि इस व्यापार से जो पैसा मिलता है वह दिल्ली में राजनीतिज्ञों के पास पहुंचता है जबकि वह गरीब जो तेंदू पत्ता बटोर रहा है उसे कुछ भी नहीं मिलता।

मैं यह कहना चाहता हूं कि इस तरह के किसी भी विद्रोह में जनता उसी समय बंदूक उठाती है जब उसे लगता है कि अब उसके पास कोई रास्ता नहीं है।

जहां तक छत्तीसगढ़ का मामला है, माओवादियों ने इन आदिवासियों को सिखाया कि वे अपने अधिकारों के लिए लड़ें और मार्क्सवादी शिक्षा में छापामार युद्ध एक प्रमुख विषय है।

घात लगातार कार्रवाई करने जैसी जो घटनाएं हो रही हैं उनका मकसद हथियारों पर कब्जा करना है। लेकिन इसकी जवाबी कार्रवाई में जोखिम यह है कि हमारी फोर्सेज पागलपन की सीमा तक हमलावर हो जाती हैं। वे कहेंगी कि इन्होंने हमारे 76 लोगों को मारा और फिर वे धुंआधार किसी पर भी गोली चला देंगी। वे जिस किसी को मार देंगी यहां तक कि मासूम लोगों को भी।

यह सिलसिला तब तक जारी रहेगा जब तक उन्हें नियंत्रण में रखने के लिए कोई मजबूत नेतृत्व न हो। अफसोस है कि ऐसा नेतृत्व नहीं है। इस सच्चाई को सरकार को समझना चाहिए।

प्रश्नः ऐसी हालत में आपकी दृष्टि में इसका समाधान क्या है?

उत्तरः देखिए संसद में पारित होने के लिए दो कानून पड़े हुए हैं-एक का सरोकार भूमि अधिग्रहण से है और दूसरे का जंगल के अधिकारों से। अब मजे की बात यह है कि जितने भी खनिज पदार्थ हैं वे इन जंगलों में ही पाए जा रहे हैं और जो पार्टी सत्ता में है उसके लिए तो यह बहुत ही बड़ा खजाना है। अगर आप इन खनिज पदार्थों के निकालने के लिए लाखों करोड़ों डॉलर के करारनामे (एमओयू) पर हस्ताक्षर कर लेते हैं तो इसका एक हिस्सा आप के स्विस बैंक के अकाउंट में पहुंच जाता है। जंगल में रहने वाले उस गरीब आदमी को बड़े आराम से भुला दिया जाता है।

बिहार में भूमिहार लोग खुलेआम कहते हैं कि हम बिल्ली और कुत्ते के नाम पर भी पट्टे लगाते हैं। यानी जमीन के खाते में इस तरह के भी नाम दर्ज रहते हैं। ऐसी स्थिति बिना किसी प्रतिरोध के कब तक जारी रह सकती है और तो भी आप कहते हैं कि आप इसे सेना के मदद से निपटना चाहते हैं। आप क्यों नहीं अपने अंदर झांक कर देखते और गड़बड़ियों को ठीक करते।

अगर सरकार के पास थोड़ी भी बुद्धि होगी तो वह इसे ठीक करेगी। वरना उसे विध्वंस का सामना करना पड़ेगा।

सीधी सी बात है कि आप संविधान की पांचवीं अनुसूची को लागू करिए। संविधान के अनुसार देश के सभी अनुसूचित क्षेत्रों का शासन ट्राइब्स एडवाइजरी कौंसिल के माध्यम से गवर्नर द्वारा किया जाना चाहिए और वही तय करेगा कि संबद्ध क्षेत्र में क्या होना चाहिए और वहां का प्रशासन कैसे चलाया जाना चाहिए।

किसी भी गवर्नर ने इस एडवाइजरी कौंसिल का कभी गठन नहीं किया।

आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन में संविधान के अनुसार मुख्यमंत्री अथवा वनमंत्री की कोई भूमिका नहीं होती। ट्राइब्स एडवाइजरी कौंसिल ही तय करेगी कि उस इलाके को खनन के लिए दिया जाय अथवा नहीं। अगर आप आदिवासियों को यह अधिकार दे दें तो वे अपने इलाके का प्रशासन संभाल लेंगे। अगर वे खनिज संपदा निकालना चाहते हैं तो किसी कंपनी से संपर्क करेंगे, उसके साथ समझौता करेंगे और कंपनी जो पैसे देगी वह पंचायत में जमा हो जाएगा।

आज हालत यह है कि मुख्यमंत्री गैर कानूनी ढंग से उस इलाके का प्रशासन संभाल रहा है और माइनिंग कंपनियों के साथ करारनामों पर हस्ताक्षर कर रहा है। क्या यह गैर कानूनी नहीं है…

अगर संविधान में किसी कानून का प्रावधान है और आप उसे लागू नहीं करते हैं तो असंवैधानिक कार्य आपकी तरफ से हो रहा है।

दरअसल इन इलाकों से लाखों करोड़ों डॉलर की आय होती है और कोई भी इस पैसे को आदिवासियों के खाते में नहीं देखना चाहता।"

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