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स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मदरसों की महान भूमिका और RSS की तिरंगे से घृणा

उत्तर प्रदेश में मदरसों को हर दिन देशभक्ति की अग्नि परीक्षा से गुजरने का सरकारी आदेश

हिन्दुत्ववादी हमले का सुझबूझ से मुक़ाबला करें।

शम्सुल इस्लाम

 71वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ सहयोगी महंत योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश की सरकार ने प्रदेश के मदरसों (इस्लामिक शिक्षण संस्था) के लिए हैरान कर देने वाला आदेश जारी किया।

मदरसों को ये हिदायत दी गई कि उन सभी के लिए 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस का समारोह आयोजित करना अनिवार्य है। उसके साथ ये भी अनिवार्य है कि मदरसे उन कार्यक्रमों की वीडियोग्राफी का प्रमाण भी प्रशासन को मुहैया करायें।

यह आदेश उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद के रजिस्ट्रार राहुल गुप्ता ने जारी किया। उनकी ओर से जारी निर्देश पत्र में कहा गया कि सभी मदरसों को सुबह आठ बजे तिरंगा फहराना होगा और राष्ट्रीय गान गाना होगा।

यही नहीं स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों में जमा लोगों के बीच ये भी बताया जाना जरूरी है कि कैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने आजादी हासिल करने के लिए अपनी बलिदानी दी है। तिरंगा फहराने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन और स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग-बलिदानों से भरे भाषण देने और छात्रों द्वारा इस मौके पर स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करना इस आदेश में शामिल है।  

आखिर स्वतंत्रता दिवस के मौके पर क्या क्या करना है, इसकी जो सूची आदेश के साथ मदरसों के लिए जारी की गई है, वह सरकारी स्कूलों के लिए भी जारी क्यों नहीं की गई? यह पूछे जाने पर बुनियादी शिक्षा बोर्ड के सचिव संजय सिंह ने संविधान में सामनता, न्याय और भेदभाव नहीं करने के सारे संकल्पों को एक किनारे करते हुए बैचेन करने वाल जवाब दिया। उनका कहना है कि हम अपने स्कूलों पर भरोसा करते है। वे हमारे शिक्षक, छात्र और कर्मचारी है हमें उनसे स्वतंत्रता दिवस के लिए किसी तरह के प्रमाण की जरुरत क्यों होनी चाहिए?

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इस तरह से वे साफ कहते हैं कि मदरसा के शिक्षक और छात्र तो पराये है और उनकी देशभक्ति संदेहास्पद हैं।

इस तरह के आदेश वास्तव में केवल मदरसों के शिक्षकों, छात्रों की देशभक्ति पर संदेह करने के इरादे से नहीं है बल्कि इसके जरिये उत्तर प्रदेश के समाज में सबसे बड़े अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को लेकर नफरत  का माहौल तैयार करने का इरादा है।

संविधान की शपथ लेने वाली सरकार की तरफ से इस तरह के आदेश से आम मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की वारदतों की आशंका गहरी हो जाती है और इसे भारतीय दंड विधान की धारा 153 ए के तहत आपराधिक कार्रवाई माना जा सकता है। इस धारा के तहत पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी चाहिए थी।

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ये तो पहले से लगता था कि इस आदेश के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी, लेकिन उससे ज्यादा शर्मनाक यह है कि प्रदेश के मुख्य मुस्लिम संगठनों ने भी इसे नजरअंदाज करने की शैली अख्तियार की जबकि वे कम से कम इसके खिलाफ न्यायापालिका का दरवाजा खटखटा सकते थे।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मदरसों की महान भूमिका

उत्तर प्रदेश और देश के दूसरे हिस्सों में मदरसों के खिलाफ साम्प्रदायिक हमले भले हो रहे हो लेकिन तथ्य है कि स्वतंत्रता के आंदोलन में मदरसों की ऐसी शानदार भूमिका रही है जिस पर गर्व किया जाना चाहिए।

भागवत जेल में : ‘नफरत के गुरूजी’

इतिहासकार आर सी मजूमदार अपने महत्वपूर्ण शोध के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अंडमान जेल में कालापानी की सजा भुगतने वालों पर अपने शोध में बताया है कि 1857 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह करने वाले जिन लोगों को वहां रखा गया उनमें मौलाना फज़ल ह़क खैराबादी, मौलाना लियाकत अली और मौलाना ज़फर अली थानेश्वरी पहले वैसे तीन स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होने वहां आजीवन कारवास की सजा भुगतते हुए अपनी जान दे दी।

1857 के विद्रोह के सेनानियों का दूसरा दस्ता वहां वह था जिन्हें वहाबी मौलवियों के रूप में जाना जाता है।

अलगाववादी हिन्दुत्व की तरफ बढ़ने से पहले वीर दामोदर सावरकर ने 1857 के विद्रोह पर अपने मह्त्वपूर्ण लेखन “द इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस 1857 “में उन मौलवियों की भूमिका की जोरदार शब्दों में सराहना की है। उन मौलवियों में शामिल अहमद शाह जैसे के बारे में तो यह भी सावरकार ने लिखा है कि उन्होंने जेहाद का पूरा जाल बेहद ही समझदारी से बुना है।

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सेना के अभिलेखागार में पड़े दस्तावेजों में ये तथ्य देखने को मिलता है कि सितंबर 1857 में ब्रिटिश की सेना ने दिल्ली में शहर पर अपना कब्जा जमा लेने के बाद मदरसों के तीन हजार शिक्षकों व छात्रों को फांसी पर लटका दिया था और मुसलमानों को 1859 तक शहर में घुसने पर पांबदी लदा दी गई थी।

ब्रिटिश उपनिवेश के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मदरसों के मौलवी यानी शिक्षक जो महान लोग थे उनमें मौलाना शिब्ली नोमानी, मौलाना शौकत अली, मौलाना मोहम्मद अली, मौलाना हिफ़जूर रहमान, मौलाना हसरत मोहानी, हाफिज़ इब्राहिम, मौलाना अबु कलाम आजाद, मौलाना हबीबुर रहमान लुधियानवी और मौलाना मदनी थे जिन्हें महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सेदारी करने के लिए दमन और यातनाएं सहनी पड़ी। इनमें से कुछ मौलवियों को माल्टा  ले जाया गया जहां उन्होंने अंग्रेजो की जेलों में अपना आधा जीवन गुजारा। गौरतलब है कि इन सभी मौलवियों ने धर्म के आधार पर देश के बंटवारे को स्वीकार करने से इंकार कर दिया था जबकि कांग्रेस ने उसे स्वीकार कर लिया था।

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जिन मदरसों का स्वतंत्रता आंदोलन में अनगिनत कुर्बानियों के उदाहरण मिलते हो उनकी देश भक्ति पर संदेह कर उन्हें अपमानित और प्रताड़ित किया जा रहा है। मुसलमानों को राष्ट्रविरोधी के रुप में चित्रित कर देशभक्ति सिखाना चाहती है। लेकिन हमें इस मौके पर मदरसों के बुनियादी चरित्र और उस हिन्दू महासभा एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्वतंत्रता आंदोलन में  भूमिका के बीच तुलना करनी चाहिए जिनके लोग देश में हुकूमत कर रहे हैं।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तिरंगे से घृणा

1925 में अपने गठन के बाद से ही आरएसएस वैसे तमाम चीजों से घृणा करती है जो कि ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ देश के तमाम लोगों के एकजुट संघर्ष के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किए जाते थे।इनमें राष्ट्रीय झंडे तिरंगे का उदाहरण सबसे महत्वपूर्ण है। 1929 के दिसंबर महीने में कांग्रेस ने अपने लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित किया। यानी पूरी तरह से भारत के लोगों द्वारा शासित देश बनाने के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने का यह प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें  26 जनवरी 1930 को देश भर के लोगों से स्वतंत्रता दिवस मानने का कार्यक्रम आयोजित करने और उस मौके पर तिरंगा फहराने का आह्वान किया गया। उन दिनों तिरंगा झंडा राष्ट्रीय आंदोलन के झंडे के रूप में आमतौर पर स्वीकार था।

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इस आह्वान पर प्रतिक्रिया देते हुए आरएसएस के प्रमुख हेडगेवार ने तब अपनी सभी शाखाओं को यह निर्देश दिया कि वे राष्ट्रीय झंडे के रूप में भगवा झंडा फहराए।

संघ के दूसरे महत्वपूर्ण नेता गोलवलकर ने 14 जुलाई 1946 को नागपुर में गुरुपूर्णिमा के मौके पर जमा स्वयं सेवकों के बीच कहा कि यह भगवा झंडा ही सही मायने में यहां की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। यही भगवान का दूसरा रूप है। गोलवलकर कहते हैं

हमें पूरा भरोसा है कि आखिरकार पूरा देश इस भागवे झंडे के आगे झुकेगा। ”  

यहां तक कि स्वतंत्रता के बाद जब तिरंगे को राष्ट्रीय झंडा स्वीकार कर लिया गया तब भी आरएसएस ने तिरंगा झंडे को राष्ट्रीय झंडा के रूप में स्वीकार नहीं किया।

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आरएसएस द्वारा प्रकाशित गोलवलकर के लेखों के एक संग्रह ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में ‘ड्रिफ्टिंग एंड ड्रिफ्टिंग’ शीर्षक वाले एक लेख में राष्ट्रीय झंडा तिरंगा के बारे में इस तरह लिखा गया है। गोलवलकर कहते हैं-

हमारे नेताओं ने हमारे देश के लिए एक नया झंडा तैयार किया है। उन लोगों ने ऐसा क्यों किया ? यह एक ऐसा उदाहरण हैं जिसमें नेता दूर भाग रहे हैं और महज नकल कर रहे हैं। हमारे प्राचीन और महान देश का अतीत बेहद गौरवशाली है। तब क्या हमारा कोई अपना झंडा नहीं था? क्या हजारों वर्षों तक कोई राष्ट्रीय चिन्ह्र नही था ? बेशक था. तब इतना ज्यादा खालीपन और हमारे मानस में इतनी शून्यता क्यों है? ”

आरएसएस द्वारा राष्ट्रीय झंडे के अपमान का सबसे ज्यादा परेशान करने वाली घड़ी पहले स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या में महसूस की गई।

1942 भारत छोड़ो आंदोलन और हिंदुत्व टोली :  एक गद्दारी-भरी दास्तान

आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गानाइजर ने 14 अगस्त 1947 दिल्ली के लाल किले पर भगवा झंडा फहराने की मांग की और राष्ट्रीय झंडा तिरंगा के बारे में ये लिखा।

जो लोग सत्ता में आए है वे हमारे हाथों में तिरंगा जरूर थमा रहे हैं लेकिन यह हिन्दुओं को न तो कभी स्वीकार होगा ना ही उसे उनका सम्मान हासिल हो सकता है। तीन की संख्या ही अपने आप में अपशकुन है और इस झंडे में तीन रंग हैं। इसका बेहद बुरा मनोवैज्ञानिक असर होगा जो कि देश की सेहत के लिए खतरनाक है।  

आरएसएस और हिन्दू महासभा की स्वतंत्रता आंदोलन के साथ शर्मनाक गद्दारी

उत्तर प्रदेश में सरकार के सूबे के मदरसों पर स्वतंत्रता दिवस के लिए कार्यक्रमों के लिए आदेश वास्तव में देश की आम जनता की एकजूटता वाले महान स्वतंत्रता आंदोलन के खिलाफ गद्दारी के अध्याय को ढंकने के लिए जारी किया गया है।

भारत छोड़ो आन्दोलन में संघ ने भाग नहीं लिया क्योंकि अंग्रेज भक्ति ही उनकी देशभक्ति थी

आरएसएस ने स्वतंत्रता आंदोलन में कभी हिस्सा नहीं लिया और 1940 के बाद से संघ के प्रमुख रहे गोलवलकर ने इसे स्वीकार भी किया है। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में दो आंदोलन भारत छोड़ों और असहयोग आंदोलन मील का पत्थर माने जाते है और उन्होंने इन आंदोलनों को किस तरह से परिभाषित किया है उनकी जुबानी यहां सुनी जा सकती है।

यह तय है कि इस आंदोलन के बुरे नतीजे सामने आएंगे। 1920-21 के आंदोलन के बाद लड़के उदंड हो गए हैं। यह नेताओं पर कीचड़ उछालने की कोशिश नहीं है। लेकिन इस आंदोलन से यही होना था। वास्तव में हम सही तरीके से इन नतीजों को नियंत्रित नहीं कर सके। 1942 के आंदोलन के बाद लोगों में ये सोच बनने लगी कि उन्हें कानून को लेकर कुछ सोचने की जरुरत नहीं है।

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दरअसल गोलवलकर की चाहत थी कि भारत के लोग ब्रिटिश सत्ता के क्रूर और निर्मम कानूनों का सम्मान करें। गुरू जी ने यह भी स्वीकार किया है कि वे कैसे अपने आप को स्वतंत्रता के आंदोलन से अलग रखने में सफल हो सके।

1942 में भी जब लोगों की भावनाएं उमड़ रही थी। उस समय भी संघ अपने रोजाना के काम में लगा रहा। उसने सीधेतौर पर कुछ भी न करने का प्रण लिया था। जबकि संघ के कार्यकर्ताओं के भीतर उथल पुथल लगातार चल रहा था। संघ एक निष्क्रिय लोगों का संगठन है, उनकी बातें फिजूल भरी होती है। ऐसी बातें बाहर के लोग ही नहीं कर रहे थे बल्कि संघ के भी कई कार्यकर्ता कर रहे थे। उन्हें बेहद घृणास्पद भी महसूस कर रहे थे। [i]   

आरएसएस के दुलारे वीर सावरकर के नेतृत्व वाले हिन्दू महासभा ने उस समय मुस्लिम लीग के साथ मिलकर बंगाल, सिंध और उत्तर पूर्ऴ सीमांत राज्य में मिलीजुली सरकार बनाई जब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कांग्रेस पर अंगेज सरकार ने पाबंदी लगा दी थी। यह हैरान करने वाली सच्चाई है कि तब आरएसएस और भाजपा के आदर्श माने जाने वाले नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल में मुस्लिम लीग वाले मंत्रिमंडल में उप मुख्यमंत्री थे।[ii]

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यह वैचारिक वजह ही है कि गोलवलकर ( 1940 के बाद संघ के प्रमुख), दीन दयाल उपाध्याय ( 1937 से आरएसएस के मुख्य नेता) और लाल कृष्ण आडवाणी ( 1942 से आरएसएस के कार्य़कर्ता) ने स्वतंत्रता आंदोलन में कभी हिस्सा नहीं लिया। यहां तक कि आरएसएस और भाजपा के हिन्दूत्ववादी आदर्श सवारकर ने अंडमान के जेल से रिहा होने के लिए ब्रिटिश सरकार से चार पांच बार लिखित दया की भीख मांगी। आखिरकार उन्हें दस वर्षों के बाद रिहा कर दिया गया जबकि उन्हें सजा पचास वर्षों के लिए मिली थी।

उत्तर प्रदेश में आरएसएस-भाजपा की सरकार द्वारा मुसलमानों की देशभक्ति पर शक पैदा करने के लिए मदरसो के लिए जारी आदेश से राज्य में मुसलमानों का आतंकित होना स्वाभाविक है। उनके भीतर असुरक्षा की भावना और गहरी होगी। उन्हें यह भय है कि गाय के बहाने जिस तरह से उनके उपर हमले हो रहे है उसी तरह से तरह-तरह से तबाह करने और हमले के लिए इसका भी इस्तेमाल किया जाएगा।

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इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा निराशाजनक ये है कि उत्तर प्रदेश में जगह-जगह दिखने वाले मुस्लिम संगठनों ने इस हमले को लेकर चुप्पी बनाए रखी। मुस्लिमों के खिलाफ भेदभाव करने वाले इस आदेश को चुनौती नहीं दी गई है जबकि इस आदेश से आम मुसलमानों के खिलाफ नफरत पैदा करने का इरादा है। 

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