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एक्सक्लूसिव – रेस थियरी का परीक्षण करने के लिए हजारों आदवासियों को मार डाला वैज्ञानिकों ने !

Exclusive – Scientists killed thousands of people to test race theory!

During the Lok Sabha elections, the BJP was donated crores of rupees.

नई दिल्ली। हाल ही में खबर आई थी कि स्वाईन फ्लू की वैक्सीन बनाने वाली दवा कम्पनी सेरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (Serum Institute of India, a company that manufactures the vaccine for swine flu) द्वारा लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा को करोड़ों रूपए चंदा दिया गया था। इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए दमन के विरुद्ध प्रतिरोध के लिए काम करने वाले संगठन रिहाई मंच ने आरोप लगाया था कि दवा कम्पनी को लाभ पहुंचाने के लिए सरकार इस बीमारी को महामारी की तरह फैलने दे रही है।

मंच ने कहा कि दवा कम्पनी से मिले मोटे चंदे और स्वास्थ्य बजट में मोदी सरकार द्वारा बीस प्रतिशत की कटौती महज संयोग नहीं है। यह देश के स्वास्थ्य के साथ दवा कम्पनियों को फायदा पहुंचाने का गंदा खेल है।

Cases of deaths in clinical trials in India

रिहाई मंच के आरोप को सिर्फ राजनैतिक आरोप मानकर सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि भारत में क्लीनिकल ट्रायल में मौतों के कई मामले सामने आ चुके हैं। उधर कुछ अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने आरोप लगाया था कि इबोला और एड्स जैसे घातक रोग अफ्रीकियों पर परीक्षण किये जा रहे जैव हथियार हैं।

अफ्रीकी मीडिया खासकर लाइबेरिया में आई कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक इबोला वायरस अफ्रीका की आबादी कम करने का अमेरिकी प्रयास है।

वर्ष 2000 में प्रतिष्ठित अखबार द गार्जियन में अखबार के पर्यावरण संवाददाता पॉल ब्राउन की एक खबरScientist ‘killed Amazon indians to test race theory‘ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी, जिसमें रहस्योद्घाटन किया गया था कि रेस थियरी का परीक्षण करने के लिए वैज्ञानिकों ने हजारों आदवासियों को मार डाला।

23 सितंबर 2000 को प्रकाशित खबर के अनुसार दक्षिणी अमेरिका के हजारों आदिवासियों की खसरे की बीमारी से मौत हो गई। अमेरिकी आणविक उर्जा आयोग की तरफ से इन आदिवासियों पर अमेरिका के वैज्ञानिकों का एक दल परीक्षण कर रहा था। वैज्ञानिक प्राचीन समाजों के प्राकृतिक चयन पर प्रभाव का अध्ययन कर रहे थे। ऊर्जा आयोग यह जानना चाहता था कि अगर बहुत से समुदाय न्यूकिलियर युद्ध में खत्म हो जाएं तो क्या होगा।

अनुवांशिक शोध के क्षेत्र में काम करने वाले वैज्ञानिक (Scientists working in the field of genetic research) इस बात को जानकर हैरान हैं। उनका कहना है कि आदमियों पर अनुवांशिक शोध करने की यह घटना अंदर तक हिला देने वाली है।

आपको बताते चलें कि इस घटना को बाहर आने में दस साल लग गए जब कर्नैल विश्वविद्यालय में अनुवांशिकी के एक प्रोफेसर टैरी टर्नर ने उस किताब का प्रूफ पढ़ा जिसमें इस घटना के बारे में लिखा गया है।

प्रोफेसर टर्नर का कहना है कि यह घटना मानव विज्ञान के इतिहास में भयंकर अपराध, घोर पाशविकता, भ्रष्टाचार और होने वाले असर के मामले में बेमिसाल है।

किताब का दावा है कि जेम्स नील, वो मानव विज्ञानी है जिसने वेनेजुएला के यानोमामी कबीले के लोगों के ऊपर किए जाने वाले इस घातक प्रयोग की परियोजना का साठ के दशक में नेतृत्व किया था।

किताब में बताया गया है कि परियोजना के लिए उसने यानोमामी कबीले के लोगों में खसरे के एक विषैला टीके का प्रयोग किया जिसकी वजह से वहां महामारी फैल गई और सैकड़ों या शायद हजारों लोग मर गए। वहां लोगों के ऊपर एडमोनसन-बी नामक जहरीली दवा का प्रयोग किया गया जो बिलकुल खसरे के लक्षण पैदा करती है। डाक्टरों ने इस जहरीली और खतरनाक विषैली दवा के आदमियों पर इतनी बड़ी मात्रा में प्रयोग पर आश्चर्य जताया है।

एक बार जब महामारी फैल गई तो, किताब के अऩुसार, शोधकर्ता टीम ने यानोमामी लोगों को किसी भी तरह की चिकित्कीय सुविधा देने या उनका ईलाज करने से मना कर दिया।

इस परियोजना का नेतृत्व कर रहे वैज्ञानिक नील ने अपने सभी साथियों को कठोर आदेश दे रखा था कि किसी का भी ईलाज नहीं करना है और उन्हें सिर्फ इस महामारी को रिकॉर्ड करना और प्रभावों का पता लगाने तक अपने काम को सीमित रखना है।

ये बात तब जाकर सामने आई, जब एक खोजी पत्रकार पैट्रिक टायरेनी ने इस मामले पर डार्कनेस इन एल डोराडो (Darkness in El Dorado Book by Patrick Tierney) नाम से एक किताब लिखी।

सबसे विवादास्पद बात ये है कि यह प्रयोग अमेरिकी आणविक उर्जा आयोग की तरफ से करवाया गया था। उर्जा आयोग यह जानना चाहता था कि अगर बहुत से समुदाय न्यूकिलियर युद्ध में खत्म हो जाएं तो क्या होगा। इस प्रयोग की तुलना नाजी वैज्ञानिक जोसेफ मेंगेले के प्रयोग से भी की जा रही है।

मजे की बात तो ये है कि वैज्ञानिक नील ने इस प्रयोग के लिए वेनेजुएला की सरकार से कोई अनुमति भी नहीं ली जबकि कायदे से उसे इस टीकाकरण अभियान के लिए अनुमति लेना जरूरी था।

भारत में भी हुई हैं क्लिनिकल ट्रायल में मौतें (deaths in clinical trials in India.)-

एक गैर सरकारी सामाजिक संस्था स्वास्थ्य अधिकार मंच ने पिछले दिनों एक विज्ञप्ति में कहा था कि उसके द्वारा फरवरी 2012 में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका पर उत्तर देते हुए सरकार ने स्वीकार किया था कि अवैध दवा परीक्षण के चल रहे 475 क्लीनिकल ट्रायल्स के मामले में सरकार के पास कोई रिकॉर्ड नहीं हैं।

जनवरी 2005 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने नया कानून बनाकर विदेशी दवा कंपनियों को भारत में परीक्षण की हरी झ्ंडी दी जबकि पुराना ड्रग कॉस्मेटिक एक्ट भारतीयों को बलि का बकरा बनने से संरक्षण देता था। विदेशी कंपनियां भारत जैसे गरीब देश में बच्चों के टीके और ड्रग का परीक्षण करती हैं और अमीर पश्चिमी देशों में टीका और दवाई बड़ी कीमत पर बेचती हैं।

एक निजी टीवी चैनल आजतक की 25 जुलाई 2011 की रिपोर्ट के मुताबिक कंपनियों ने तो डॉक्टरों के साथ मिलकर भोपाल गैस पीड़ितों पर भी ट्रायल कर दिया। 2004-08 के बीच 160 गैस पीड़ितों पर परीक्षण में 10 की मौत हो गई। इंदौर की आर्थिक अपराध शाखा की रिपोर्ट और चौंकाने वाली है। एमवाइ अस्पताल के छह डॉक्टरों की ट्रायल में संलिप्तता की जांच हुई।

इस रिपोर्ट के मुताबिक डॉक्टरों ने आयोजक कंपनियों के खर्चे पर विदेशों में सैर-सपाटा भी किया।

पिछले वर्ष के अंत में प्रकाशित एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक फरवरी 2013 से नवंबर 2014 तक देश में क्लिनिकल ट्रायल के चलते कम से कम 370 लोगों की मौत हुई जिनमें कुल 21 मामलों में क्षतिपूर्ति दी गई।

सरकारी आंकड़ों के आधार पर मिली जानकारी के आधार रिपोर्ट में बताया गया कि क्षतिपूर्ति के रूप में चार लाख रुपए से लेकर 40 लाख रुपए तक का मुआवजा दिया गया। अधिकारियों ने बताया कि क्लिनिकल ट्रायल पर बनी नियामक समिति ने 370 मौतों में से 222 (कुल मौतों का 60 प्रतिशत) की रिपोर्ट लिखे जाने तक जांच की। समिति ने पाया कि इन मामलों में से मात्र 21 मामलों में ही हर्जाना मिल सकता था क्योंकि उन मामलों में रोगी की मौत अंडर ट्रायल ड्रग के कारण हुई थी। हालांकि चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना था कि जिन आधारों पर क्षतिपूर्ति की योग्यता का निर्धारण होता है, उन नियमों पर बहुत कम स्पष्टता है।

अवनीश राय के साथ अमलेन्दु उपाध्याय

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