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फासीवाद को परास्त करने का कोई दायित्व कांग्रेस के ऊपर भी है कि नहीं

सीपीएम की आगामी केंद्रीय समिति की बैठक 14-16 अक्टूबर को होने जा रही है। अभी हाल में ही 2 अक्टूबर को हुई पोलित ब्यूरो की बैठक के बाद कुछ लोगों की प्रतिक्रियायें भी देखने को मिली हैं। बहुत लोग यह देख रहे हैं कि सीपीएम किस दिशा में बढ़ रही है।

संघ-भाजपा विरोधी उदार शुभ चिंतकों का पूरा हमला का0 प्रकाश करात की वामपंथी दिशा पर होता रहता है, उन्हें यह लगता है कि प्रकाश करात की वामपंथी राजनीति दिशा यानि जब तक स्वतंत्र वाम-जनवादी ताकतों की गोलबंदी रहेगी, तब तक कांग्रेस को लेकर सीपीआई की तरह का फासीवाद विरोधी मोर्चा नहीं बन पायेगा।

प्रकाश करात की लाइन के विरूद्ध रहने वाले बंधुओं को यह भी समझना चाहिए कि फासीवाद को परास्त करने का कोई दायित्व कांग्रेस के ऊपर भी है कि नहीं। क्या कांग्रेस यह आत्मालोचना करेगी कि उसने वामपंथियों को झटका देते हुए 2008 में अमरीका के साथ परमाणु समझौता किया था, जिसे बाद के घटनाक्रम ने प्रमाणित किया कि उसकी कोई जरूरत नहीं थी और पूरी तौर पर बेकार साबित हुआ है। बेवजह भारत को अमरीका के पल्लू में बांध दिया गया। आज भी कांग्रेस राहुल गांधी के साथ ही साथ मनमोहन व चिदम्बरम को जिनकी आर्थिक व आतंकवाद विरोधी नीतियां पूरी तौर पर गलत साबित हुई हैं, को ही प्रोजेक्ट करने में लगी हुई है।

नई आर्थिक-औद्यौगिक नीति और सांप्रदायिकता में तात्कालिक काम फासीवाद को हराना कह कर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता है, क्योंकि फासीवाद की बढ़त लोगों की रोजमर्रे की आर्थिक कठिनाई है। इसलिए सीपीएम की खासकर प्रकाश करात की लानत- मलानत करने की जगह कांग्रेस को समझाएं कि उसको सद्बुद्धि आये कि वह मनमोहन-चिदम्बरम की पुरानी नीति से पीछे हटे और जन पक्षीय राजनीति के साथ सहयोग करे। कांग्रेस का अधिनायकवाद व भाजपा के फासीवाद में ही चुनने के लिए राष्ट्र अभिशप्त नहीं है। लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने की चुनौती चुनाव में भी और चुनाव के बाहर भी स्वीकार करना होगा।

राजेश सचान

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