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रवींद्र के खिलाफ भयंकर घृणा अभियान

रवींद्र का दलित विमर्श-24

पलाश विश्वास

       रवींद्रनाथ टैगोर पर बचपन और किशोर वय में ही उत्तर भारत के कबीरदास और सूरदास के साहित्य का गहरा असर रहा है और संत सूफी साहित्यकारों के अनुकरण में ब्रजभाषा में उन्होंने भानुसिंह के छद्मनाम से बांग्ला लिपि में पदों की रचना की जो गीताजंलि से पहले की उनकी रचनाधर्मिता है  और ऐसा उन्होंने ब्रह्मसमाज और नवजागरण की विरासत के केंद्र बने जोड़ासांकू की ठाकुर बाड़ी में किया। उनकी यह पदावली 1884 में पुस्तकाकार में प्रकाशित हुई है। गाय पट्टी की इस संत सूफी जमीन की खुशब को महसूस करने के लिए भानुसिंह की पदावली पठनीय है लेकिन नेट फर हमें इसका अनुवाद नहीं मिला है।

हम रवींद्र की रचनाओं पर फिलहाल फोकस नहीं कर रहे हैं। ऐसा हम बाद में करेंगे। फिलहाल हम इस उपमहादेश की अखंड ऐतिहासिक सांस्कृतिक साहित्यिक विरासत में किसानों, मेहनतकशों के सामंतवाद साम्राज्यवाद और नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के प्रतिरोध की जमीन खोज रहे है जो रवींद्र की रचनाधर्मिता का आधार है तो भारतीय बहुजनों,  किसानों और मेहनतकशों के हकहकूक जल जंगल जमीन आजीविका, मनुष्यता,  सभ्यता और पर्यावरण की सरहदों के आरपार निरंतर जारी लड़ाई भी है।

यही लड़ाई रवींद्र का दलित विमर्श है।

हस्तक्षेप पर पूरा आलेख के प्रकाशन से पहले हम इसका एक खास अंश इसीलिए नेट पर शेयर करतो हैं ताकि पूरा आलेख पढ़ने से पहले लगातार शेयर की जा रही संदर्भ सामग्री आप पढ़ और देख लें।

भानूसिंहेर पदावली के वीडियो हम शेयर कर रहे हैं तो रवींद्र साहित्य की ब्रजभाषा की जमीन की महक भी आप महसूस कर सकते हैं।

भानूसिंहेर पदावली सीधे तौर पर बंगाल के बाउल फकीर बहुजन किसान आदिवासी सामंतवाद विरोधी साम्रजाय्वाद विरोधी आंदोलन को बदनाम गायपट्टी के दैवी सत्ता राजसत्ता विरोधी मनुष्यता के धर्म संत सूफी आंदोलन से जोड़ती है और हम प्रतिरोध की इस जमीन पऱ खड़े होकर भी अपनी ही माटी की ताकत से अनजान खुदकशी का विकल्प चुन रहे हैं।

इस संवाद के दौरान हम अपने फेसबुक पेज और सोशल मीडिया पर संदर्भ सामग्री लगातार बांग्ला, हिंदी और अंग्रेजी में शेयर कर रहे हैं, जिनमें फिल्मों और लोकगीतों के वीडियो भी शामिल हैं। जो बांग्ला पढ़ सकते हैं, उनके लिए बांग्लादेश में किये गये शोध और अनुसंधान, बांग्लादेशी अखबारों में जारी संवाद मे साझेदार बनने का मौका है। जो बांग्ला पढ़ नहीं सकते तो वे गुगल बाबा की सेवा लेकर आनलाइन अनुवाद के माध्यम से बांग्ला और अंग्रेजी में उपलब्ध सारी सामग्री पढ़ समझ सकते हैं। सोशल मीडिया की सीमा के तहत पूरा आलेख, सारी संदर्भ सामग्री मूल या अनूदित साथ साथ दी नहीं जा सकती तो कृपया तकनीक का लाभ उठायें।

रवींद्रनाथ टैगोर के दो हजार से ज्यादा गीत प्रचलित हैं।

नजरुल इस्लाम के गीत भी संख्या में बहुत ज्यादा हैं।

इन गीतों में बाउल फकीर संत वैष्णव बौद्ध परंपराओं की लोकसंस्कृति है।

बंगाल के जनपदों मे खेती और प्रकृति से जुड़े जन समुदायों के जीवनयापन और दिनचर्या के परत दर परत गीत हैं।

नदियों की लहरों के साथ, ज्वार भाटा के साथ सूरज की पहली किरण से लेकर आखिरी किरण तक आम जनता का जीवनयापन इन्हीं लोकगीतों के साथ हैं और इन्हीं लोकगीतों मे लोक दलित विमर्श और संवाद की विविधता, बहुलता, द्वंद और एकात्मकता का लोकतंत्र है।

इस महादेश ही नहीं, एशिया ही नहीं, दुनियाभर में किसानों और मेहनतकशों की बोलियों में यह लोकसंस्कृति रची बसी है जिससे उत्पादन संबंध और समाजिक संरचना के साथ साथ अर्थव्वस्था भी जुड़ी होती हैं।

कारपोरेट मुक्त बाजार ने लोक संस्कृति और बोलियों को बाजार की भाषा और बाजार की उपभोक्ता संस्कृति में समाहित कर दिया है तो जाति धर्म की पहचान में निष्णात आत्मध्वंस की राजनीति का यह मृत्यु कार्निवाल है।

बंगाल में लोकसंस्कृति की धारा रवींद्र संगीत और नजरुल संगीत के मार्फत पितृसत्ता के खिलाफ स्त्री अस्मिता की निरंतरता में तब्दील है जो दुर्गोत्सव की महिषासुर वध संस्कृति के विरुद्ध विविधता,  बहुलता,  सहिष्णुता और एकात्मता की साझा विरासत बांर्ला और भारतीय मनुस्मृति नस्ली वर्चस्व की पितृसत्ता के विरुद्ध है।

पश्चिम बंगाल में रवींद्र संगीत और नजरुल संगीत के स्त्री संसार के बाहर पितृसत्ता की बलात्कार सुनामी है तो पूर्वी बंगाल में लोकसंस्कृति जीवन के हर क्षेत्र में साहित्य, कला, भाषा, माध्यम, पत्रकारिता की मुख्यधारा है।

पश्चिम बंगाल में कंगाल हरिनाथ की चर्चा उस तरह नहीं होती जिस तरह बाकी भारत में चुआड़ विद्रोह, पाबना रंगपुर के किसान विद्रोह, नील विद्रोह और आदिवासी किसान आंदोलनों पर सन्नाटा है, लेकिन बांग्ला देश में फिकिरचांद बाउल घराने के प्रवर्तक लालन फकीर के सहयोगी कंगाल हरिनाथ के करीब एक हजार बाउल गीत प्रचलन में हैं और वहां रवींद्र और नजरुल के बराबर कंगाल हरिनाथ का स्थान है।

कंगाल हरिनाथ के बारे में पश्चिम बंगाल में अज्ञानता का आलम है कि विश्वप्रसिद्ध फिल्मकार सत्यजीत रे ने अपनी मशहूर क्लासिक फिल्म पथेर पांचाली में दुर्गी की बुआ के भजन के लिए कंगाल हरिनाथ के पूर्वी बंगाल में बेहद लोकप्रिय हरि पार करो आमारे का फिल्मांकन किया और उस वक्त उन्हें मालूम भी नहीं था कि यह बाउल गीत कंगाल हरिनाथ का है और मालूम पड़ने पर उन्होंने कंगाल हरिनाथ के वंशजों से माफी मांग ली।

कंगाल हरिनाथ और उनकी पत्रिका ग्राम वार्ता का जमींदारों के खिलाफ किसान आदिवासी विद्रोहों, लील विद्रोह, पाबना और रंगपुर के किसानविद्रोहों में बड़ी भूमिका थी तो वे क्रूर महर्षि देवेंद्र नाथ टैगोर के अत्याचारों के खिलाफ भी प्रजाजनों के नेतृत्व का नेतृत्व कर रहे थे। जमींदारों की हिटलिस्ट में वे थे जबकि स्थानीय समस्याओं और विवादों के निपटारे के लिए ब्रिटिश प्रशासन ने उनकी पत्रिका की सारी सामग्री का लगातार अनुवाद का सिलसिला बनाये रखा और कंगाल हरिनाथ के सुझावों के मुताबिक किसानों की समस्याएं सुलझाने की कार्रवाई वे करते रहे। लेकिन जमींदार उन्हें अपना शत्रु मानते थे।

इसी सिलिसले में गौरतलब है कि पूर्वी बंगाल के कुष्टिया (अनिभाजित बंगाल के नदिया जिले के अंतर्गत) सिलाईदह में टैगोर जमींदारी के दायरे में कुमारखाली गांव में ग्राम वार्ता का प्रेस और उसके पास ही लालन फकीर का अखाडा़ और प्रजाजनों के हकहकूक की लड़ाई में लालन फकीर और कंगाल हरिनाथ की युगलबंदी के सारे परिदृ्श्य थे। इसी परिदृश्य में टैगोर जमींदारी के लठैतों ने कंगाल हरिनाथ पर हमला कर दिया तो लालन फकीर के अखाड़े के बाउलों और उनके समर्थकों ने उऩका बचाव किया।

टैगोर जमीदारी के सामंती शिकंजे को तोड़कर ही रवींद्र लालन फकीर और कंगाल हरिनाथ की विरासत से जुड़े।

इसी विरासत मे मतुआ और चंडाल आंदोलन है तो रवींद्र संगीत, नजरुल संगीत से लेकर सचिन देववर्मन सलिल चौधरी से लेकर भूपेन हजारिका तक भारत के सिनेमा और संगीत में लोकगीतों की मुख्यधारी की जड़ें भी यही है।

इसी तरह चित्तप्रसाद और सोमनाथ होड़ की चित्रकला से लेकर ऋत्विक घटक की फिल्मों तक फैली है मिट्टी की वह सोंधी महक जिसकी सबसे सशक्त अभिव्यक्ति भारतीय गण नाट्य आंदोलन के नेतृत्व में भारतीय रंगकर्म में लगातार होती रही है।

आज भी भारतीय रंग कर्म लोकसंस्कृति की इसी विरासत पर आधारित है और उसकी जनपक्षधरता की निरंतरता जारी है।

बांग्ला में महाश्वेता देवी, नवारुण भट्टाटार्य,  सत्तर दशक के तमाम कवि कथाकार से लेकर शंखो घोष की कविता में भी लोकसंस्कृति की वह जमीन है।

हिंदू शूद्र बाउल कंगाल हरिनाथ को लेकर बांग्लादेश मे कोई विवाद नहीं है।  इस्लामी बांग्लादेशी राष्ट्रवाद के कट्टरपंथी तबका रवींद्रनाथ टैगोर को इस्लामी राष्ट्रवाद के लिए सबसे बड़ा खतरा उसी तरह मानते हैं जैसे मनुसमृति नस्ली राष्ट्रवाद के कारपोरेट हिंदुत्ववादी भारत में।

बांग्लादेश में भी रवींद्र के खिलाफ भयंकर घृणा अभियान है और लालन फकीर और बाउल आंदोलन को भी बांग्लादेश में इस्लाम के खिलाफ मानते हैं इ्सलामी राष्ट्रवादी। फिर भी हिंदू मुसलमान प्रजाजनों की अंग्रेजी हुकूमत और देशी जमींदारों के खिलाफ नील विद्रोह, पावना और रंगपुर किसान विद्रोह में खुलना जिले के कुमारखाली गांव से ब्रहमसमाज नवजागरण काल में ग्रामवार्ता पत्रिका निकालकर किसानों और मेहनतकशों के हकहकूक के लिए आवाज उठाने वाले कंगाल हरिनाथ को लेकर कोई राष्ट्रीयतावादी सांप्रदायिक विवाद बांग्लादेश में नहीं है क्योंकि बांग्लादेश की भाषा, विधाओं, बांग्लादेश के साहित्य, उसकी संस्कृति, माध्यमों और पत्रकारिता में भी लोकसंस्कृति का बोलबाला है और इन पर बाजार और पूंजी का दखल नहीं है। भारतीय मीडिया में साहित्य का प्रवेशाधिकार निषिद्ध है, लेकिन बंगालादेश में साहित्य और कला, लोकसंस्कृति पर सारा विमर्श वहां के दैनिक अखबारों में रोजाना जारी है।

इसके विपरीत भारतीय साहित्य, विधाओं और माध्यमों में लोकसंस्कृति और बोलियों का वह ग्रामीण कृषि भारत सिरे से अनुपस्थित है। गोस्वामी तुलसी दास ने रामचरित मानस अवधी में लिखा और वह समूचे भारत के लोगों का पवित्रतम ग्रंथ बन गया। सूरदास ने अपने पद ब्रजभाषा में लिखे तो ब्रजभाषा सामंतवाद विरोधी प्रतिरोध की भाषा बन गयी और रवींद्रनाथ ने भी ब्रजभाषा में भानुसिंहेर पदावली बाउल वैष्णव बौद्ध सूफी संत मनुष्यता के धर्म की अभिव्यक्ति के लिए लिख डाली।

गुरु नानक,  नामदेव,  तुकाराम,  विद्यापति,  दादु,  बशेश्वर, गाडगे महाराज,  मीराबाई, रसखान, रहीम दास जैसे लोगों ने क्षेत्रीय लोकभाषा में लिखा और वह भारतीय साहित्य और संस्कृति की साझा विरासत में तब्दील है।

बांग्लादेश की आम जनता भारत विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान में और बांग्लादेश बनने के बाद आजतक लगातार कट्टर इस्लामी राष्ट्रवाद का प्रतिरोध लोकसंस्कृति के जिस बहुजन आंदोलन और किसान आदिवासी जल जंगल जमीन आजीविका और मनुष्यता के दलित विमर्श की शक्ति से लड़ते हुए उसे बार बार हरा रहा है, वह दलित विमर्श काजी नजरुल इस्लाम, कंगाल हरिनाथ, लालन फकीर और रवींद्रनाथ का दलित विमर्श है।

भारत के दलित विमर्श में रवींद्रनाथ टैगोर नहीं है और आदिवासी किसानों मेहनतकशों के हकहकूक की विरासत की लोकसंस्कृति वह जमीन नहीं है, इसीलिए भारत में मनुस्मृति नस्ली वर्चस्व के खिलाफ कोई प्रतिरोध नहीं है। 

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