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ऐसा फ्रॉड जनता के बीच सच्‍चे अघोरियों को बदनाम करता है

 

अभिषेक श्रीवास्तव

हिंदू धर्म के अघोरपंथी संप्रदाय में श्‍मशान केंद्रीय महत्‍व की चीज़ है। श्‍मशान का जि़क्र दो ही तरह का इंसान कर सकता है। एक, जो श्‍मशान के प्रति सहज हो और दूसरा जो असहज। श्‍मशान के प्रति सहजता साधना से आती है। साधना के अलग-अलग तरीके हो सकते हैं- शव साधना, शिव साधना और श्‍मशान साधना। ऐसी सहजता हासिल करने वाला अघोरी कहलाता है। अ-घोरी मने जो घोर न हो, सहज हो, सामान्‍य हो, निर्लिप्‍त हो, निस्‍पृह हो। यह सब शैव संप्रदाय की बातें हैं। अघोरपंथ के भीतर एक फ्रॉड धारा भी है। इसके लोग कहते तो खुद को अघोरी हैं, लेकिन होते बेहद घोर हैं। भयंकर दुनियावी। भोगी। इसका शैवों से कोई लेना-देना नहीं है।

ये उलटमार्गी लोग होते हैं। वामाचारी। ये मानव-मल का भोग करते हैं। दिखाते हैं खुद को सहज, होते हैं भयंकर असहज। पाखण्‍डी। प्रधानजी जिस लोकेशन से श्‍मशान का जि़क्र छेड़ते हैं, यही वह लोकेशन है। याद करिए, पहले भी वे झोला उठाकर चल देने, फ़कीर होने, परिवार न होने, अपने पास कार न होने, आदि बातें कर चुके हैं। उसका लोकेशन भी यही था। ऐसा फ्रॉड जनता के बीच सच्‍चे अघोरियों को बदनाम करता है। सोचिए कि आखिर हम लोग श्‍मशान से क्‍यों भय खाते हैं। अघोरियों से क्‍यों डरते हैं। ऐसे ही लोगों की वजह से। अपने निजी जीवन में ऐसे लोग मौत से इतना डरते हैं कि उनकी भाषा में आप उनके अवचेतन भय को पहचान सकते हैं।

हमारे जैसे सामान्‍य लोग मौत, शव, श्‍मशान आदि के प्रति वैसे ही असहज होते हैं। भय खाते हैं। इसीलिए श्‍मशान का जि़क्र आते ही हम सामने वाले को बदकार देने लग जाते हैं, बिना यह समझे कि दरअसल वह भी उतना ही डरा हुआ है। फ़र्क बस इतना है कि वह हमारे सामूहिक डर का दोहन कर रहा है क्‍योंकि सत्‍ता में है। एक बार को सामान्‍य आदमी अपने परिजन की मौत पर श्‍मशान को झेल जाएगा, लेकिन डराने के लिए अपने भाषण में उसका इस्‍तेमाल करने वाला आदमी तो सपने में भी पसीना छोड़ देगा। उसके डर को समझिए। उसके दिमाग में झांकिए। डर का जवाब डर नहीं है। प्‍याज को खाने के लिए पहले उसे छीलना होगा।

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