भारत में लोकतंत्र का भविष्य

opinion, debate

Future of democracy in india

देश के उदारवादी तबके के बुद्धिजीवी और प्रगतिशील लोगों के साथ साथ आमजनों का भी बहुत बड़ा तबका है जो भारत में लोकतंत्र के भविष्य (future of democracy in India) को लेकर चिंतित है। लोकतंत्र, जिसे स्वतंत्रता के 67 वर्षों में मात्र कुछ माह को छोड़कर हमारे देश के उदारशील प्रगतिवादी तबके (Liberal progressive sects) ने, राजभारत में लोकतंत्र का भविष्यनीतिज्ञों ने, आमजनों ने बहुत ही शिद्दत के साथ लगातार पोषित किया था। यहाँ मैं 67 वर्ष इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के दिल्ली में काबिज होने के साथ ही यह स्पष्ट हो गया था कि सरकार का नेतृत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh) के एक ऐसे कट्टर अनुयायी के हाथों में चला गया है, जो भारत के संसदीय लोकतंत्र (Parliamentary democracy of india) और उसकी लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्ता को संघ के विचारों के प्रसार में सबसे बड़ी बाधा मानता है और शनैः शनैः आज नहीं तो कल उन पर प्रहार अवश्य प्रारंभ होगा। पिछले 5 वर्षों के दौरान यह आशंका सच ही निकली है। वह चाहे सर्वोच्च न्यायालय हो, सीबीआई हो, रिजर्व बैंक हो या चुनाव आयोग हो, प्रत्येक संस्था संविधान के अंदर नियमों का प्रावधान करते हुए इसलिए गठित की गई थी कि वह देश में लोकतंत्र की रक्षा के लिये सरकार से स्वतन्त्र होकर स्वायत्त तथा पारदर्शी ढंग से कार्य करेगी, आज सरकार के हाथ में कठपुतली है और उसके निर्देशों पर समस्त संवैधानिक प्रावधानों की धज्जियां उड़ाते हुए सिर्फ सत्ता प्रमुख और उसकी पार्टी को बचाने या उसके निर्देशों पर उन सभी के खिलाफ सक्रिय है, जो सत्तारूढ़ पार्टी की हाँ में हाँ मिलाने के लिये तैयार नहीं हैं।

आज जब मैं इन पंक्तियों को लिख रहा हूँ, 17वीं लोकसभा के लिये चल रहे आम चुनावों के आखिरी चरण के चुनाव का प्रचार अभियान पश्चिम बंगाल को छोड़कर शेष देश में थमने को है।

पश्चिम बंगाल को छोड़कर इसलिए कि वहाँ मंगलवार 14 मई को भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान हुए अभूतपूर्व उपद्रव, आगजनी और हिंसा के बाद, जिसके दौरान पुनर्जागरण काल के समाज सुधारक, विधवा विवाह, स्त्रियों के लिये शिक्षा के अधिकार, विधवा विवाह के लिये कानून बनवाने (1856) के लिये आंदोलन चलाने वाले और पूरे देश में आदर के साथ याद किये जाने वाले ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की एक कालेज में स्थापित मूर्ति को तोड़ने की घटना के बाद चुनाव आयोग ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए प्रचार पर पूरे दो दिन के बाद गुरूवार याने 16 तारीख की रात्री 10 बजे से रोक लगा दी थी। चुनाव आयोग के इस फैसले की सराहना होती यदि उसने ऐसा मंगलवार की रात्रि अथवा बुधवार के प्रात: से भी किया होता। पर, चुनाव आयोग ने प्रचार पर बैन लगाने का फैसला लिया गुरूवार याने दो दिन के बाद रात्रि 10 बजे से।

राजनीतिक पार्टियों की बात तो छोड़ भी दें तो भी साधारण जन तक अचंभित थे कि यह कैसा फैसला है? स्पष्टत: गुरूवार को प्रधानमंत्री को पश्चिम बंगाल में दो रैलियां करनी थीं और चुनाव आयोग ने इसके लिये प्रधानमंत्री को पूरा वक्त दिया। वे सभी राजनीतिक दल जिन्होंने शुक्रवार को शाम 5 बजे चुनाव प्रचार थमने के पहले अपनी सभाएं रखी थीं, अपने प्रचार से वंचित हो गए।

भारत में अभी तक हो चुके 16 आमचुनावों में चुनाव आयोग का सत्तारूढ़ दल के लिये इतना ममत्व भरा रवैय्या कभी नहीं देखा गया, जो आज पिछले 4 सालों के दौरान देखने मिल रहा है।

संसदीय लोकतंत्र में न्यायपालिका को विधायिका और कार्यपालिका के बाद अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, पर, मेरे अनुसार, यद्यपि चुनाव आयोग उन तीनों स्तंभों में शामिल नहीं रहता, उसके बावजूद, क्योंकि वह चुनाव कराता है और उसके द्वारा घोषित परिणाम ही सरकार बनाते हैं, उसका महत्व लोकतन्त्र में किसी भी स्तम्भ से ज्यादा है। यदि वही पक्षपाती और फासीवादी प्रवृतियों का पिछलग्गू हो जाए तो बाद का पूरा लोकतन्त्र तो केवल नाटक ही है।

ऐसा नहीं है कि केवल चुनाव आयोग की स्वायत्ता ही देश के लोकतन्त्र प्रेमियों को चिंता में डाल रही है।

चिंतित होने की जरूरत भारत की बहुलतावादी पहचान या संस्कृति पर हो रहे आक्रमण को लेकर भी है। जैसा मैंने पूर्व में इंगित किया कि पिछले 5 वर्षों में मोदी के नेतृत्व में संघ की सोच याने हिंदुत्व की अवधारणा को ही देश के लोगों में कूट कूट कर भरने के सबसे अधिक प्रयास हुए हैं। चाहे वे प्रयास सरकार के मंत्रियों के द्वारा किये गए हों या सत्तारूढ़ पार्टी के सांसदों, विधायकों और नेताओं के द्वारा अथवा लव जिहाद या गाय के नाम पर की गई मॉब लिंचिंग के दवारा, पर, पिछले 5वर्ष का इतिहास इसी से भरा पड़ा है।

अटल बिहारी के पूर्ण रूपेण सत्ता में आने के बाद स्टेम ग्राहम की बच्चों सहित की गई ह्त्या पिछले 5 वर्षों के दौरान भीड़ के द्वारा की गई हत्याओं के सामने कुछ भी नहीं है।

यह पहला आम चुनाव है जिसमें प्रतिबंध के बावजूद भी धार्मिक प्रतीकों का खुल कर इस्तेमाल किया गया है।

मंदिर-मस्जिद-गुरूद्वारे की इस राजनीति का सबसे दुखद पहलू यह है कि देश की सबसे पुरानी और स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई की अगुआ और उसमें से तप कर निकली कांग्रेस पार्टी भी भाजपा के इस ‘हिंदुत्व’ के आक्रमण का सामना करने के लिये ‘नरम हिंदुत्व’ की तरफ झुकी हुई दिख रही है। यही कारण है कि देश के बड़े उदारवादी-प्रगतिशील तबके को कांग्रेस की विचारधारा में आ रहे इस परिवर्तन से चिंता हो रही है।

यदि मध्यमार्गी कांग्रेस का सामाजिक और धार्मिक आधार पर झुकाव भविष्य में भी हिंदुत्व की तरफ इसी तरह नरमतर रहेगा तो देश की बहुलतावादी संस्कृति को खतरा न केवल गहरा होगा बल्कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हिंदुत्व की विचारधारा को और भी गहरे तक पाँव पसारने का मौक़ा मिलेगा, जो कहने की जरुरत नहीं कि देश के लोकतंत्र के लिये घातक ही होगा।

इसका सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि देश का एक भी चुनाव ऐसा नहीं गया है जिसे किसी पार्टी ने जाति और सम्प्रदाय के आधार पर न लड़ा हो। देश की जनता का बड़ा मतदाता वर्ग भी इसे स्वीकार कर चुका है और इस बारे में चिंतित नहीं दिखता है, सिवाय, धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक हिस्से को छोड़कर जो लोकतंत्र में घर कर गये इस क्षरण से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।

ऐसे में ‘हिंदुत्व’ का सामना ‘नरम हिंदुत्व से करने की चेष्टा राष्ट्र की बहुलता वादी संस्कृति के लिये घातक है।

राष्ट्रवाद के नाम पर संसदीय लोकतंत्र में न केवल हमारे देश में बल्कि विश्व के अन्य अनेक देशों में राजनीतिज्ञों ने चुनाव जीते हैं। हमारे देश में ही विशेषकर पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध के बाद, जिसमें बंगला देश का निर्माण हुआ और इंदिरा गांधी की ह्त्या के बाद उपजे राष्ट्रवाद के चुनावों में मतदाताओं का राष्ट्रवाद के लिये रुझान हमने देखा है। पर, वह एक स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में सामने आया था।

अमेरिका में ट्रम्प ने राष्ट्रवाद को उभारने के लिये “America for Americans only” का नारा दिया था। भारत में आज ‘हिदुस्तान हिंदुओं के लिये’ नारा दिया जा रहा है। यह एक कदम आगे “अति-राष्ट्रवाद” की श्रेणी में आता है।

यद्यपि, खुले तौर पर 2014 के आम चुनावों में यह कोई विशेष मुद्दा नहीं था। पर, 2014 में सत्ता में आने के बाद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस विचार को शनैः शनैः देशवासियों के रोजमर्रा के सार्वजनिक जीवन में घुसेड़ने में एक हद तक सफल हुई है, इसे नकारा नहीं जा सकता। यह ऐसा राष्ट्रवाद है जो हिंदुत्व की अवधारणा से जुड़ा हुआ है और राष्ट्रीय झंडे से होते हुए गाय, लव जिहाद, धर्मपरिवर्तन, पाकिस्तान से नफ़रत, आतंकवाद, वंशवाद तक सब कुछ अपने में समेटे हुए है। यह राष्ट्रवाद गंभीर और विचारवान नहीं है। यह उत्तेजना और उच्छृंखलता से भरा हुआ है। यह जय हिंद, भारतमाता की जय पर समाप्त नहीं होता, इसकी सीमा जय श्री राम के उद्घोष से शुरू होकर सरकार की नीतियों और संघ-भाजपा या प्रधानमंत्री की आलोचना करने वालों को पाकिस्तान भेजने तक है, भले ही वह आलोचना आर्थिक नीतियों की हो अथवा कानून का शासन लागू करने में सरकार की विफलता की हो।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब का इस अति-राष्ट्रवाद को 17वीं लोकसभा के लिये हो रहे चुनावों में विशेष हथियार के रूप में इस्तेमाल करना महज एक संयोग नहीं है।

इस अति-राष्ट्रवाद को 17वीं लोकसभा के लिये होने वाले आम चुनावो में प्रमुख हथियार बनाया जाएगा, इसकी तैयारी बाकायदा देशवासियों की आँखों के सामने लोकतंत्र के तीनों स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और चौथे तथाकथित स्तंभ मीडिया की सहायता के साथ पिछले 5 सालों के दौरान की गई ताकि देशवासियों को यह सब स्वाभाविक लगे और वे इसे स्वीकार करें।

मैं यहाँ उस अंडरग्राउंड तैयारी की बात तो कर ही नहीं रहा हूँ जो संघ अपने जन्म से लेकर अभी तक करता रहा है। जो, इस तैयारी को समझ रहे थे और इसके खिलाफ खुछ भी कहने का साहस कर रहे थे, उनके साथ चारों स्तंभों ने साम-दाम-दंड-भेद सभी तरीके अपनाए। कलबुर्गी, पंसारे और लंकेश की हत्याएं उसी की कड़ी हैं।

पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले ने और उसके बाद बालाकोट में की गई एयर-स्ट्राईक ने इस अति-राष्ट्रवाद को और ऊँचाई दी। सेना, जिसका नाम कभी भी देश की राजनीति में नहीं आया, पहली बार उसका इस्तेमाल वोट हासिल करने के हथियार के रूप में होते हमने देखा, बावजूद इसके कि ऐसा करना चुनाव आयोग ने प्रतिबंधित किया था।

सत्तारूढ़ दल ने और स्वयं प्रधानमंत्री ने पिछले पूरे कार्यकाल में आतंकवाद और सर्जिकल स्ट्राईक को लगातार इस तरह प्रचारित और व्याख्यायित किया मानो कि देशवासियों की एकमात्र इच्छा और आवश्यकता है कि देश को एक मजबूत नेता की आवश्यकता है और वह नेता ‘नरेंद्र मोदी’ ही हैं। चाहे, उन्हें वह मजबूती देने के लिये देश की सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं की आहुती ही क्यों न देना पड़े? चाहे इसके लिये देशवासियों के सारे लोकतांत्रिक अधिकार त्यागना ही क्यों न पड़ें?

यह एक बड़ी चिंता का सबब होना चाहिये, क्योंकि यह वह रास्ता है जो सीधा अधिनायकवाद की ओर ले जाता है। चाहे उस अधिनायकवाद में चुनाव होते रहें, देशवासी सरकार चुनते रहें लेकिन जनता की सारी इच्छाएं, आवश्यकताएं उस अति-राष्ट्रवादी अधिनायकवाद के सामने कोई अस्तित्व नहीं रखेंगी। यही कारण है कि इस लंबे चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री, उनके मंत्रियों और उनकी पार्टी के नेताओं ने चुनाव प्रचार को कभी भी अति-राष्ट्रवाद से इतर देशवासियों की आवश्यकताओं के किसी भी अन्य मुद्दे पर केंद्रित नहीं होने दिया।

आज से एक दिन बाद चुनावों का अंतिम चरण भी समाप्त हो जाएगा। 23 मई को परिणाम बताएँगे कि देशवासियों ने कौन सा रास्ता चुना है?

जनता के द्वारा, जनता के लिये, जनता की सरकार के लोकतंत्र का अथवा उस लोकतंत्र का जो ज़िंदा तो रहेगा लेकिन अधिनायकवाद के नीचे घुटी घुटी साँसे लेते हुए। जिसमें वोट देने का अधिअकार तो होगा, पर केवल, प्रत्येक 5 साल में एक नेता का राजतिलक करने के लिये। उसे अपनी आवश्यकताओं को प्रगट करने और उनकी पूर्ति के लिये कोशिशें करने पर अपराधी मान जाएगा। और, यदि पहला रास्ता भी इस देश के प्रबुद्ध मतदाता चुनते हैं तो उनके ऊपर यह जिम्मेदारी तो बनी रहेगी कि जो भी लोकतांत्रिक सरकार आये उससे वे पिछले 5 सालों में लोकतंत्र के अंदर जो छिद्र हुए हैं, उन्हें मजबूती से रिपयेर कराने के लिये संघर्ष करे, क्योंकि अति-राष्ट्रवाद लोकतंत्र में सत्ता पर बने रहने के लिये सभी राजनीतिक नेताओं को बहुत प्रिय होता है।

अरुण कान्त शुक्ला

18मई, 2019