Home » हस्तक्षेप » आपकी नज़र » क्या 21 वीं सदी में गांधी किसी व्यक्ति के रोल मॉडल हो सकते हैं?
Mahatma Gandhi

क्या 21 वीं सदी में गांधी किसी व्यक्ति के रोल मॉडल हो सकते हैं?

क्या 21 वीं सदी में गांधी किसी व्यक्ति के रोल मॉडल हो सकते हैं?

ऋषभ कुमार मिश्र

गांधी की 150 वीं जयंती (150th birth anniversary of Gandhi) के अवसर पर सर्वाधिक प्रासंगिक प्रश्न है कि भारत सहित दुनिया की ‘युवा‘ आबादी के लिए बापू की विरासत के क्या निहितार्थ हैं? क्या वे किताबों, इण्टरनेट, सिनेमा, और मौखिक आख्यानों में कैद ज्ञान हैं जिसकी सराहना की जाती है? या वे एक संदेश हैं, एक विचार हैं जो 21 वीं सदी में प्रकाश स्तंभ की तरह खड़े हैं। इस स्तंभ की छाया में गांधी अपने प्रतीकों- चरखा, खादी, और ग्रामोद्योग की सामग्री के साथ भविष्य की ओर ताक रहे हैं।

विडंबना देखिए कि वर्तमान उन्हें इतिहास की सामग्री मानकर केवल उनके राजनीतिक जीवन और सामाजिक सक्रियताओं को उभारा रहा है। बौद्धिक जगत इसकी आलोचना और सराहना में व्यस्त है।

ये बहसें गांधी को परीक्षा और वाद-विवाद की सामग्री बनाकर आमजन से वैसे ही दूर कर देते हैं जैसे कोई दुर्लभ मंत्र। इसके समांतर सवाल है कि भारत की युवा आबादी के लिए ‘गांधी‘ के क्या मायने हैं? एक टेक्नोक्रेट युवा, कोई दक्ष किसान, स्व-उद्यमी युवक-युवतियां, युवा विद्यार्थियों के लिए गांधी की विरासत के क्या मायने हैं?

क्या 21 वीं सदी में गांधी किसी व्यक्ति के रोल मॉडल हो सकते हैं? आइए इन सवालों के सापेक्ष गांधी की विरासत (Gandhi’s legacy) को खंगालते हैं।

आजकल युवाओं में बढ़ती अहिष्णुता, अधीरता, मानसिक और वाचिक हिंसा, गलाकाट प्रतियोगिता और अशांत चित्त जैसी प्रवृत्तियों को पहचाना गया है। उनमें सबकुछ पाने की जल्दी है। उनमें देश की व्यवस्था के प्रति उत्तेजना है जो कई बार आक्रोश बन प्रकट हो रही है। उनमें सभ्रान्त होने की संभावना है लेकिन यह संभावना श्रम से दूर प्रबंधन के जोड़-तोड़ की ओर बढ़ रही है। इनमें दुनियादारी के आकर्षण है लेकिन उसकी चुनौतियों की चिंता के समाधान के प्रति तटस्थता है। युवाओं के इस समूह से गांधी की बात करना उनमें ओज या वीर रस का भाव नहीं छोड़ता। उनके लिए गांधी एक घिसापिटा मुहावरा है जिसे उन्होंने बचपन में स्कूल के निबंध के लिए याद किया था। यह युवा-समाज नायकत्व की तलाश में है। उसमें अपने होने को परिभाषित करने के लिए लालसा है। ऐसे युवा समाज के लिए गांधी एक संभावना हैं जो स्थापित करते हैं कि नायकत्व किसी एक ‘एक्ट‘ में नहीं पैदा होता है।

यह अचानक घटने वाली घटना नहीं है बल्कि व्यवहार की समग्रता है जिसका केन्द्र आत्म बल से संचालित है, जिसकी परिधि समाज के आखिरी इंसान तक है।

यह नायकत्व युद्ध या वीरता का परिणाम नहीं है बल्कि अहिंसा और सत्य के मार्ग का स्वाभावित फल है। यह नायकत्व सत्ता से नहीं बंधता वह तो सत्ता को सही और गलत का भेद बताता है। वह स्वतंत्र और समग्र है जिसे आत्मबल से अर्जित किया जा सकता है। इसमें पद या धन का फल नहीं बल्कि त्याग का उत्कर्ष है। यह नायकत्व स्वार्थपरायणता या गुटबंदी से परे है। यह ओज या वीर रस का भाव भले न छोड़े लेकिन उसमें असीम शांति है।

हमारी युवा पीढ़ी के मन-मस्तिष्क पर गांधी की वृद्ध प्रतिमा प्रतिष्ठित है जबकि सच्चाई है कि युवा गांधी की ऊर्जा, त्याग और संघर्ष ने गांधी को गांधी बनाया। युवा गांधी के सत्य प्रयोगों का परिणाम वृद्ध गांधी हैं। युवा गांधी के उस पक्ष को देखिए जहां उन्होंने वैयक्तिक लक्ष्य को तिरोहित करके मानवीय मूल्यों के लिए कार्य किया। यह फैसला लेना तो सरल है पर इस पर कायम रखना और इसका श्रेय न लेना बड़ी बात है। गांधी का ‘मैं‘ उनके द्वारा प्रचारित नहीं किया गया बल्कि उसका प्रभा मंडल इतना विस्तृत था कि लोग उसमें स्वयं समाविष्ट हो गए।

गांधी (Mahatma Gandhi) एक आदमी की कहानी है जिसने सत्य और अहिंसा को अपना आत्मबल बनाया। एक देश की बड़ी आबादी को इन हथियारों के प्रभाव के लिए कन्विन्स किया।

वे निपट निरक्षर किसानों की पुकार सुनकर चंपारण पहुंचते हैं तो मिल मजदूरों के लिए अहमदाबाद। वे साबरमती से दांडी जाकर नमक बनाते हैं तो सेवाग्राम पहुंच कर समाज की रचना में व्यस्त हो जाते हैं। इन सबमें उनका कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं था। केवल कुछ प्रयोगों का आनंद था। एक संतुष्टि थी। और यह विश्वास था कि साधारण तरीके से असाधारण कार्य किया जा सकता है।

गांधी का अनुकरण करने में संकट यह है कि हम उतना साधारण नहीं बने रह सकते जितना कि गांधी थे। गांधी साधारण को सौंदर्य में तब्दील करते हैं। सोने-जगने, उठने-बैठने में कहीं वे कोई चमत्कारिक व्यवहार नहीं करते। वे किसी संसाधन की मांग नहीं करते। वे बस वही करते हैं जो एक साधारण मनुष्य को करना चाहिए। वे इस ‘करने‘ को लगातार अपनाए रखते हैं और इस प्रयोग के परिणामों से दुनिया को चकित कर देते हैं। निहितार्थ है कि गांधी राम और कृष्ण की तरह कोई दैवीय पात्र नहीं है और न ही वे सन्यास मार्गी है। वे रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ मूल्यों को अपना लेने का न्योता देते हैं। संभव है इनके अपनाने पर तात्कालिक संकट पैदा हो लेकिन विश्वास मानिएगा कि आत्मिक शांति का रास्ता भी खुलेगा। उदाहरण के लिए जब-जब ऐशो-आराम की तलब जगे तो विचारिए कि कैसे गांधी ने एक ग्रामीण महिला के वस्त्रों के अभाव को जानने के बाद खुद कपड़ों को त्याग दिया था। जब किसी बॉस के उत्पीड़न का डर सताए तो विचारिए कि कैसे गांधी ने सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह से अनगिनत ‘लॉर्डों‘ की नींदे उड़ा दी थी।

जब भावावेश या किसी अन्य परिस्थिति में हिंसक होने की संभावना बढ़े तो गांधी के भजन की उस पंक्ति को याद करिए जिसमें वो कहते हैं ‘वैष्णव जन तो तेने रे कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे‘। जब जाति, धर्म और वर्ग का अभिमान सिर उठाए तो याद रखिएगा कि गांधी ने अंतिम जन को हरिजन बनाकर प्रतिष्ठित कर दिया था। जब किसी काम के बड़े-छोटे होने की शंका मन में जगे तो मन को समझाइएगा कि गांधी स्वयं शौचालय की सफाई करते थे। जब यह विश्वास होने लगे कि असत्य के सहारे बिना आप कमजोर हो रहे हैं तो सत्य के बंधन से बंधे गांधी को याद कीजिएगा जिनके लिए सत्य जीवन से बढ़कर था। जब यह धारणा बने कि पद के बिना पहचान संभव नहीं है तो तुरंत याद कीजिएगा कि क्या जीवन पर्यंन्त गांधी किसी पद पर थे।

हम युवाओं को मानना होगा कि गांधी का यह नायकत्व हमारा पथ प्रदर्शक है जिसे केवल प्रतीको में जिंदा नहीं रखा जा सकता है।

वे एक संदेश हैं, एक मूल्य हैं, इसे जानना और अपनाना होगा। हर युवा के लिए गांधी कर्मक्षेत्र के ऐसे नायक हैं जो कमजोर से कमजोर व्यक्ति की ताकत बन सकते हैं।

ऋषभ कुमार मिश्र, लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में सहायक प्रोफेसर हैं।

ज़रा हमारा यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें

About हस्तक्षेप

Check Also

Ajit Pawar after oath as Deputy CM

जनतंत्र के काल में महलों के षड़यंत्रों वाली दमनकारी राजशाही है फासीवाद, महाराष्ट्र ने साबित किया

जनतंत्र के काल में महलों के षड़यंत्रों वाली दमनकारी राजशाही है फासीवाद, महाराष्ट्र ने साबित …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: