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हिंदुत्ववादियों के प्रति न्यायपालिका का बढ़ता रुझान महिला न्याय के लिए चिंताजनक

 

प्रेमविहीन पितृसत्तात्मक समाज

सरकार, समाज और परिवार की पितृसत्तात्मक सोच हादिया को सम्मान दे पाने में सक्षम नहीं है

हिंदुत्ववादियों के प्रति न्यायपालिका का बढ़ता रुझान महिला न्याय के लिए संघर्ष करने वालों के लिए चिंताजनक है. इसका संकेत हाल ही में सर्वोच्च न्यायलय के उस फैसले से मिला जो केरल की व्यस्क महिला हादिया की अपनी मर्जी से एक व्यस्क पुरुष शफी जहां से शादी से जुड़ा है. इस शादी को केरल उच्च न्यायालय ने अवैध घोषित कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी यानी एनआईए को दे दी है. एनआईए को यह पता लगाने का काम दिया गया है कि कहीं इस तरह की शादियां धर्मांतरण कराके इस्लामिक स्टेट जिहादियों की भर्ती के लिए तो नहीं करा रहा. इसे लव जिहाद भी बहुत लोग कहते हैं. इससे उन सामाजिक कार्यकर्ताओं को झटका लगा है जो यह मानते थे कि न्यायपालिका महिलाओं की हितों की रक्षा के लिए आखिरी उम्मीद है.

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हादिया का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था. उसका नाम अखिला अशोकन था. जब वह फिजियोथेरेपी की पढ़ाई कर रही थी तो अपने मुस्लिम साथियों की संगत में उन्हें इस्लाम अच्छा लगने लगा. इसके बाद उन्हें अपने अभिभावकों की इच्छा के विरुद्ध इस्लाम धर्म अपनाने का फैसला किया और हादिया के नाम से अलग रहने लगी. अदालत ने उसके पिता की हैबस कोर्पस की दो याचिकाओं को खारिज कर दिया और कहा कि उसे जीवन बदलने वाले निर्णय लेने का अधिकार है. हालांकि, ये चीजें तब बदल गईं जब उसने शफी जहां से शादी कर ली. केरल उच्च न्यायालय ने उसकी शादी को रद्द कर दिया और उसके अभिभावकों को उसकी कस्टडी दे दी.

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अदालत, हादिया के अभिभावकों और दक्षिणपंथी संगठनों ने हादिया के मौलिक अधिकारों पर चोट किया है. अदालत और उसके अभिभावकों के बयानों ने उससे अपने निर्णय लेने के अधिकार को छीन लिया. कहां तो अदालत को उसके अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए थी लेकिन उसने उलटे हादिया को ही उसके अभिभावकों के साथ रखकर सजा दे दी. उसे अपने पति से संपर्क करने से रोक दिया गया और उसे अपना काम छोड़ना पड़ा।

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लव जिहाद के पहले के मामलों को आनंद, भोलेपन और दुस्साह के आधार पर पेश किया जाता रहा है. लेकिन हादिया का मामला ऐसा नहीं है. मुस्लिम धर्म अपनाने के बाद उसके मुस्लिमों की शदियों के लिए चल रही एक वेबसाइट पर खुद को रजिस्टर किया और वहां सउदी अरब में काम करने वाला शफी जहां मिला. जिससे उसने शादी की. इससे कई लोगों को परेशानी हो गई. लोगों को लगा कि कैसे कोई महिला सामाजिक नियमों को उलट जाकर ऐसा जोखिम ले सकती है? इसका उत्तर बहुत झकझोरने वाला है. महिलाएं भारतीय समाज की दकियानूसी सोच से परेशान हो गई हैं और प्रचलित सामाजिक मान्यताओं के उलट जाकर निर्णय ले रही हैं. पहले भी इस तरह की चीजें थी लेकिन भूमंडलीकरण ने इसके लिए और मौके पैदा कर दिए हैं. इसलिए यह देखा जा सकता है कि लव जिहाद के मामले केरल, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की छोटी जगहों से ही आ रहे हैं.

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कुछ लोग यह कह सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ जांच के लिए कहा है न कि शादी को खारिज करने के फैसले को सही माना है. लेकिन जांच के तहत हादिया को अलग-थलग रखने का निर्णय उसके सम्मान को ठेस पहुंचाने वाला है. यह हो सकता है कि शफी जहां इस्लामिक स्टेट का समर्थक हो और उसकी सोच भी पुरुषवादी हो. हालांकि, कई पितृसत्तात्मक समाज में महिलाएं शक्ति को अपने हिसाब से चुनती रही है. ऐसे में हादिया को अपना निर्णय लेने से वंचित करके भारतीय राजव्यवस्था ने एक और निचले स्तर को छुआ है.

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महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाले और कानून को समझने वाले इससे व्यथित हैं. पिछले कुछ सालों में यह धारणा बनी थी कि महिलाओं के मामले में अदालतें मजबूती से खड़ी होती हैं. इन मामलों में न्यायिक सक्रियता बहुत बढ़ी. हालांकि, हादिया का मामला यह दिखाता है कि महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले न्यायपालिका पर बहुत अधिक निर्भर रहे. इसी का नतीजा है कि अदालत ने उस प्रावधान का हवाला देकर हादिया की जीवनसाथी की पृष्ठभूमि की जांच का आदेश दे दिया जिसके तहत सरकार पूरे देश की अभिभावक है. कानूनी भाषा में इसे पैरेंट पैट्रियाई कहते हैं. न्यायिक सक्रियता जमीनी स्तर पर बदलाव लाने के लिए संघर्ष, सामाजिक गोलबंदी और संवाद नहीं कायम करा सकती. इन्हीं बातों को आगे बढ़ाना होगा ताकि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो उनकी जासूसी नहीं.

इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली का संपादकीय

(Economic and Political Weekly, 

वर्षः 52, अंकः 34, 26 अगस्त, 2017)

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