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हमारा देश बहुत अध्यात्मवादी है, लेकिन हम मनुष्य को मनुष्य का दर्जा देते हुए भी झिझकते हैं

"हमारे देश- जैसे बुरे हालात किसी  दूसरे देश के नहीं हैं। यहाँ अजब-अजब सवाल उठते रहते हैं। एक अहम सवाल अछूत-समस्या है। समस्या यह है कि 30 करोड़ की जनसँख्या वाले देश में जो 6 करोड़ लोग अछूत कहलाते हैं, उनके स्पर्श मात्र से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा! उनके मंदिर में प्रवेश मात्र से देवगण नाराज हो उठेगें! कुँए से उनके पानी निकालने से कुआं अपवित्र हो जायेग! ये सवाल बीसवीं सदी में किये जा रहे हैं। जिन्हें कि सुनते ही शर्म आती है"*1

               अछूत समस्या भगत सिंह

उदय चे व संजय

जो हालात उस समय 1923 में थे जब ये लेख लिखा गया था, आज भी हालातों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आया है। बल्कि दलितों पर हमले  ज्यादा वृद्धि ही हुई है।

मिर्चपुर एक बार फिर चर्चा में है। चर्चा कोई अच्छे काम के लिए नहीं हो रही है एक ऐसे घिनौने कार्य के लिए हो रही है, जो 21 वीं सदी में मानवता पर कलंक है। एक बार फिर मिर्चपुर के दबंगों ने दलितों पर हमला किया उनके साथ मारपीट की, जाति सूचक गालियां दीं। मिर्चपुर में नौजवानों की रेस का आयोजन होता है। वाल्मीकि जाति से सम्बन्ध रखने वाला नौजवान रेस जीत जाता है। अब द्रोणाचार्य के चेलों को ये कैसे बर्दाश्त हो सकता है कि कोई दलित उनसे कोई भी प्रतियोगिता जीते, क्योंकि उच्च जातीय सामंती मानसिकता को यह बर्दाश्त नहीं कि कोई दलित उनकी बराबरी करे या उनसे आगे निकले। "

अगर ये दलित पढ़ लिख गये तो हमारे खेतों में हाली कौन बनेगा, मैला कौन ढोएगा" यह मानसिकता है इन सामंतवादियों की।

आज से ठीक 6 साल पहले भी इसी गांव में दबंग जाट बिरादरी ने मामूली से झगड़े की आड़ में दलितों की बस्ती को फूंक दिया था। एक 70 साल के अंधे बुजर्ग और उसकी 18 साल की अपँग बेटी को जिन्दा जला दिया था।

 लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में।

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।।

ये कोई सिर्फ मिर्चपुर की अकेली घटना नहीं है। पूरे भारत में ही वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था एक बड़ी आबादी का अतिरिक्त श्रम लूटने का एक जबरदस्त हथियार है। इसलिए शासक वर्गों, उच्च जातियों (70 के दशक के बाद मध्यम किसान जातियों के उभार के बाद) उनका भी एक धनी किसानों का हिस्सा भी दलित जातियों की इस लूट में हिस्सा बटाने के लिए दमन उत्पीड़न के क्रूर तरीकों का सहारा ले रहा है। बिहार, आंध्रा, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र में दलित उत्पीड़न और अत्याचार की भयानक घटनाएं सामने आती रही हैं।

हरियाणा में भी दलित आबादी क्रूर उत्पीड़न का शिकार रही है; तथाकथित आज़ादी में आरक्षण की वजह से शिक्षा व नौकरियों में दलितों के प्रतिनिधित्व व 90 के दशक के बाद दलित आत्मसम्मान उभार के बाद दलितों की चेतना व दलितों की स्थिति में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है जो शासक वर्गों व उच्च जातीय मानसिकता ग्रस्त लोगों को यह खटकता है जिस कारण दलितों पर हमले बेहद तेजी से बढे हैं।

हरियाणा में हरसौला, दुलीना, किलाजफरगढ़, सुनपेड़, सालवन, मिर्चपुर, भगाना, डाबड़ा, बापोड़ा में पिछले कुछ सालों में दलित उत्पीड़न की भयंकर खूंखार घटनाएं सामने आई हैं।

दलितों पर हो रहे अत्याचार की गिनती की जाये तो गिनती खत्म हो सकती है दलितों पर अत्याचार की घटनाएं खत्म नहीं हो सकती। अगर दलित समुदाय इन्हें अपनी नियति मानकर चुपचाप स्वीकार कर ले तो ठीक है लेकिन अगर दलितों द्वारा इसका प्रतिकार किया जाए तो शासक वर्गों की प्रतिनिधि सरकार द्वारा इसे यह कहकर दबाने की कोशिश की जाती है कि इससे 'समाज की शान्ति भंग की जा रही है।'

सबसे बड़ा सवाल ये है कि ये दलित है कौन, और इन पर ये हमले हो क्यों रहे है।

वैसे तो दलित का सीधा सा मतलब-

दलित शब्द का शाब्दिक अर्थ है- दलन किया हुआ। इसके तहत वह हर व्यक्ति आ जाता है जिसका शोषण-उत्‍पीड़न हुआ है।

दलित –  पीड़ित, शोषित, दबा हुआ, दला हुआ, पीसा हुआ, मसला हुआ, रौंदा हुआ,

लेकिन शूद्र में मजदूर और किसान दोनों आते थे। शूद्रों में भी जब कुछ काम अति निम्न दर्जे के बने जैसे मरे पशु को ठिकाने लगाना, चंडाल, मरे पशु की खाल उतार कर उससे जूती-जूते बनाना, मैला उठाना, जिन लोगों को वर्ण व्यवस्था का विरोध करने पर समाज से बहिष्कृत किया गया या वो लोग जो वर्ण व्यवस्था के विरोध स्वरूप डर कर भाग गए। ये सभी दलित बने। इनके घर भी गांव से बाहर होते थे।

लेकिन इसके इतिहास में जाया जाए तो ये वो मेहनतकश इंसान है जो हजारो सालो से सबसे ज्यादा मेहनत करते है लेकिन रात को बच्चों के साथ भूखे सोते हैं। ये वो इंसान है जिन्होंने झोपड़ी से लेकर बड़े-बड़े महल, किले, ताजमहल तक बनाये, ये वो इंसान है जिन्होंने मनुष्य को तन ढकने के लिए कपड़ा बनाया, पांव के लिए जूती बनाई, धरती का सीना चीर कर अन्न उगाने के लिए लकड़ी से लोहे तक के औजार बनाये, ये वो इंसान है जिनको जबरन मजबूर किया गया मैला उठाने के लिए कपड़ा बनाने वाला, जूते बनाने वाला, अन्न पैदा करने वाला, औजार बनाने वाला, मकान बनाने वाला दलित, मतलब मेहनत का प्रत्येक काम करने वाला दलित।

जब आक्रमणकारी आर्य भारत में आये तो वो 3 वर्णो में बंटे हुए थे। ब्राह्मण, क्षेत्रीय और पशुपालक। उन्होंने यहां के लोगो को छल-कपट से हरा दिया, उनकी नगरीय सभ्यता, संस्कृति को नष्ट कर दिया। यहां के मूलनिवासी जो जिन्दा बचे उनको अपना गुलाम बना लिया। गुलाम लोगो को चौथा वर्ण दिया गया शूद्र।

शूद्र जो प्रत्येक मेहनत के काम रोटी, कपड़ा और मकान पैदा करने का काम तो करेगा। लेकिन अब वो गुलाम है इसलिए उसको कोई सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक अधिकार नहीं होंगे।

शिक्षा जो इंसान के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विकास के लिये सबसे जरूरी साधन है उसको शूद्र के लिए कठोरता से बैन कर दिया गया।

जिस किसी भी शूद्र ने शिक्षा हासिल करने की कोशिश की, उसको मार दिया गया, कठोर से कठोर दंड दिया गया।

 इस असमानता और अमानवीय अत्याचार, शोषण के खिलाफ चार्वाहक, शम्बूक, बुद्ध, नानक, रविदास, कबीर, फुले, भगतसिंह, डॉ अम्बेडकर ने बहुत संघर्ष किया है।

अगर भारत में आर्य न आये होते तो भारत नैसर्गिक रूप से दास व्यवस्था में प्रवेश किया होता।

(हमारा देश बहुत अध्यात्मवादी है, लेकिन हम मनुष्य को मनुष्य का दर्जा देते हुए भी झिझकते हैं जबकि पूर्णतया भौतिकवादी कहलानेवाला यूरोप कई सदियों से इन्कलाब की आवाज उठा रहा है। उन्होंने अमेरिका और फ्रांस की क्रांतियों के दौरान ही समानता की घोषणा कर दी थी। आज रूस ने भी हर प्रकार का भेदभाव मिटा कर क्रांति के लिए कमर कसी हुई है। हम सदा ही आत्मा-परमात्मा के वजूद को लेकर चिन्तित होने तथा इस जोरदार बहस में उलझे हुए हैं कि क्या अछूत को जनेऊ दे दिया जाएगा? वे वेद-शास्त्र पढ़ने के अधिकारी हैं अथवा नहीं? हम उलाहना देते हैं कि हमारे साथ विदेशों में अच्छा सलूक नहीं होता। अंग्रेजी शासन हमें अंग्रजों के समान नहीं समझता। लेकिन क्या हमें यह शिकायत करने का अधिकार है?)*2

जहां पर भी इन घटनाओं के खिलाफ दलितों के आंदोलन का नेतृत्व अम्बेडकरवादियों द्वारा, अवसरवादी दलित नेताओं द्वारा या सीपीआई सी.पी.एम. टाइप वामपंथियों द्वारा किया गया तो इसका परिणाम समझौते में या दलितों के पलायन के रूप में दिखा है। प्रशासन द्वारा ऐसे मामलों में दलितों को कुछ राहत देने, कुछ मुआवजा देने या हमला करने वालों में से मुख्य लोगों को छोड़कर एक दो को गिरफ्तार कर लीपापोती करने की कोशिश रही है।

लेकिन जहां भी मिलिटेंट क्रांतिकारी जनसंगठनों द्वारा ऐसे हमलों का करारा जवाब दिया गया है वहां सरकार और प्रभुत्वशाली जातियों को भी बचावकारी मुद्रा में आना पड़ा है या कम से कम ऐसे हमलों की दोहराव में कमी आई है। बिहार झारखण्ड में क्रांतिकारी संगठनों द्वारा रणवीर सेना, ब्रह्मर्षि सेना के सशत्र हमलों का जवाब सशत्र तरीकों द्वारा दिया गया।

2005 में यमुनानगर के छछरौली इलाके के इस्माइलपुर या कुरुक्षेत्र के इस्माइलाबाद के गांवों में शिवालिक जनसंघर्ष मंच, क्रांतिकारी मजदूर किसान यूनियन द्वारा उच्च जातीय गुंडा तत्वों को करारा जवाब दिया गया, जिस कारण आज वहाँ दलित आज सर ऊंचा करके जी पा रहे हैं।

अगर आज सरकार को हरियाणा में दलित उत्पीड़न की घटनाओं पर वाकई रोक लगानी है तो उसे इसे पहचानना होगा और इसे बच्चों या कुछ लोगों की लड़ाई का रूप देकर लीपापोती करने की कोशिश से बचना होगा।

दलितों को भी और दलित संगठनों को अवसरवादी रूख से बचकर जुझारू और समझौतारहित तरीके से लड़ाई लड़नी होगी।

आरोपियों की गिरफ्तारी व न्याय की मांग को लेकर प्रशासन को ज्ञापन देने, धरना प्रदर्शन, भूख हड़ताल, सामूहिक पलायन की धमकी, धर्म परिवर्तन की धमकी संघर्ष व जनता के चेतना बढ़ाने के अनिवार्य कदम व तरीके हो सकते हैं लेकिन संघर्ष के एकमात्र और आखिरी रूप नहीं।

दलितों को एकजुट होकर जुझारू तरीकों से इन हमलों का विरोध करना होगा और केवल आरक्षण के सहारे, खत्म होती सरकारी नौकरियों के आसरे न रहकर वर्गीय एकजुटता दिखाते हुए सामन्तवाद-पूंजीवाद के खिलाफ उत्पादन के साधनों जमीन व कारखानों पर कब्जे की मुहीम को आखिर तक चलाना होगा। लेकिन केवल इतने से ही जातिगत भेदभाव खत्म होने से रहा क्योंकि जाति अधिरचना यानि आर्थिक आधार का सवाल तो है ही साथ ही यह अधिरचना यानी ऊपरी ढाँचे में भी गहरे से व्याप्त है इसलिए हमें लंबे समय तक सांस्कृतिक संघर्ष चलाने होंगे।

शहीदे-ऐ-आजम भगत सिंह के ये लाइनें कितनी सटीक बैठती है-

(इन्सान की धीरे-धीरे कुछ ऐसी आदतें हो गई हैं कि वह अपने लिए तो अधिक अधिकार चाहता है, लेकिन जो उनके मातहत हैं उन्हें वह अपनी जूती के नीचे ही दबाए रखना चाहता है। कहावत है- ‘लातों के भूत बातों से नहीं मानते'। अर्थात् संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो। तब देखना, कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इन्कार करने की जुर्रत न कर सकेगा। तुम दूसरों की खुराक मत बनो। दूसरों के मुँह की ओर न ताको। लेकिन ध्यान रहे, नौकरशाही के झाँसे में मत फँसना। यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती, बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चाहती है। यही पूँजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है। इसलिए तुम उसके साथ कभी न मिलना। उसकी चालों से बचना। तब सब कुछ ठीक हो जायेगा। तुम असली सर्वहारा हो… संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हारी कुछ भी हानि न होगी। बस गुलामी की जंजीरें कट जाएंगी। उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बगावत खड़ी कर दो। धीरे-धीरे होनेवाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा। सामाजिक आन्दोलन से क्रांति पैदा कर दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के लिए कमर कस लो। तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो। सोए हुए शेरो! उठो और बगावत खड़ी कर दो।)*3

UDay Che & संजय

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