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किसी कौम व दूसरे देश से नफरत देशभक्ति नहीं है

 

सुशील कुमार

आज़ादी का सही मायने क्या है, बता पाना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल हो रहा है। मुझे आज भी याद है जब स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए कई दिन पहले से मेरी तैयारी शुरू हो जाती थी। स्कूल में कौन-सा गीत गाना है, कितने बजे जाना है, झंडा कहां से खरीदना है ऐसी तमाम बातें मन में चलने लगती थी।

सच कहूं तो यह मेरे लिए किसी भी दूसरे पर्व से कहीं अधिक महत्त्व का था। मैंने उन तमाम जगहों की लिस्ट बना ली थी जहाँ अपने स्कूल का कार्यक्रम ख़त्म होते ही मुझे तत्काल जाना होता था।

इन जगहों का झंडावंदन मुझे खूब भाता था।जैसे पास केआर्मी कैम्प का परेड मुझे खूब लुभाता था। कभी अंदर जाने का मौका नहीं मिला लेकिन मैंने हमेशा खुद को उन सैनिकों से कम गौरवान्वित महशूस नहीं किया जो परेड कर रहे होते थे।

मेरे दिल में देशभक्ति का आलम यह था कि मैंने बचपन में ही घर वालों से सेना में जाने की बात कह दी थी। लेकिन कुछ वजहों से मेरा यह ख्वाब पूरा नहीं हुआ।

बचपन की देशभक्ति से जुडी एक और बात जो मुझे कभी नहीं भूलती वो मेरे गले में लटकता तिरंगा रुपी लॉकेट। उस समय मैं पांचवी में पढता था। छोटा सा गोल तिरंगा को मैं एक काले डोरे में फंसा कर अपने गले में पहनने लगा था। कई बार इसे लेकर दोस्त मेरी खिंचाई भी करते लेकिन मुझपर इसका कोई फर्क न पड़ता।

सुशील कुमार

मेरी यह राष्ट्रभक्ति उस समय पूरे शबाब पर पहुँच गयी थी जब भारत -पकिस्तान के बीच कारगिल का युद्ध चल रहा था। हमारी पांचवी की महाराष्ट्र राज्य में  भूगोल की किताब में एशिया के देशों के बारे में जानकारी दी गयी थी। इसमें भारत, पकिस्तान, नेपाल, भूटान कई देश थे। पाकिस्तान को लेकर मेरे मन में इतना गुस्सा था कि मैंने अपनी किताब से पकिस्तान देश का चैप्टर ही फाड़ डाला।

किताब के हर उस हिस्से को काट दिया जहाँ पकिस्तान शब्द लिखा था। देखा-देखी कई और मित्रों ने भी ऐसा किया।

मेरे लिए ही नहीं बल्कि उस समय मेरी उम्र के लगभग सभी बच्चे के लिए पकिस्तान से नफरत का अर्थ था देश के मुस्लिमों से नफरत करना।

हालांकि मैं यह कभी समझ नहीं पाय कि इतनी नफरत और गुस्से के बाद भी मेरे अधिकांश मित्र मुसलमान ही थे। मसजिद के जनाब जी जितना उन्हें मुहब्बत करते थे उतना ही मुझे भी। लेकिन मेरे मन में एक द्वेष और राष्ट्रभक्ति बराबर बनी रही।

ये सब आज मैं इसलिए लिख रहा हूं कि कल मैंने टेलीविजन पर एक रिटायर्ड मेजर साहब से यह कहते सुना था कि हमने पकिस्तान के दो टुकड़े किये हैं और हमारी ये पीढ़ी उसके चार टुकड़े करेगी।

ज़रा सोचिए मेजर साहब ये बयान ठीक उस समय दे रहें हैं जब देश में है कई मासूम बच्चे अस्पताल में तड़पकर अपनी जान दे देते हैं। क्या उनके प्रति हमारी सहानुभूति इस राष्ट्रभक्ति से कम है।

दूसरी बात सेना और राष्ट्रध्वज को लेकर हमारे मन में जो देशभक्ति भर दी गयी है आज वो मानवता से कहीं ऊपर चली गयी है। तभी तो हम खून खराबे और टुकड़े करने की बात अपनी पीढ़ी से चाह रहे हैं।

सोचिये एक छोटा बच्चा जब इस तरह की बातें टीवी पर सुनेगा तो उसके मन में इसका कितना गहरा असर पड़ेगा। शायद हमारी सेना और देश की सरकारें पहले से ही हर बच्चे को बचपन में ही एक दुश्मन सौप देना चाहती हैं जिसके खातमे को ही वह अपने जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य मान ले।

जहां तक मेरी बात है बड़े होने पर कुछ समझदार लोगों की संगत मिलन और कुछ अच्छी किताबें पढ़ने से कुछ हद तक समझदारी आ गयी। जिससे की मैं झूठी राष्ट्रभक्ति में फर्क कर पा रहा हूं। लेकिन हर बच्चे के साथ ऐसा नहीं होता। अक्सर वह बचपन की सुनी हुई बातों को ही सच मानकर अपनी धारणा बना लेता है।

आज भी मेरे मन में अपने देश के प्रति उतना ही लगाव है जितना बचपन के दिनों में था। लेकिन असली आज़ादी मैं उस समय मानूँगा जब देश का हर नागरिक खुद को आज़ाद मानेगा।

हर आदिवासी, किसान, मज़दूर, दलित, गरीब, महिला के साथ किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा।

हर गरीब बच्चे को वास्तव में पढ़ने की सुविधा मिले, हर बीमार का बेहतर इलाज हो।

वरना भगतसिंह की जुबां में मेरे लिए यह महज सत्ता का हस्तांतरण है।, जो गोरे अंग्रेजों ने भारत को सौंप दी, लेकिन दोनों के बर्ताव में कोई फर्क नहीं आया।

 

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