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Tea plantation in forest area
Tea plantation in forest area

धीरे-धीरे सूख जायेंगे नदियों के स्रोत

हिमालय में जलवायु परिवर्तन का बढ़ता खतरा-2

हिमालयी पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन – Himalayan Environment and Climate Change

नदियों पर संकट को लेकर देखें तो हिमालय के हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं, भारतीय हिमालय क्षेत्र में नौ हजार से भी अधिक हिमनद हैं, जिनसे अनेक बड़ी नदियों का उद्गम होता है। आज हिमालय में स्थित दो तिहाई हिमनद पिघलकर पीछे हट रहे हैं, जिनमें गंगोत्री एवं यमनोत्री हिमनद भी शामिल हैं। हिमनदों के पिघलने से भारतीय उपमहाद्वीप की इन बड़ी नदियों में बाढ़ की आशंकाएं बढ़ गई हैं। ऐसे में नदियों का आयतन बढ़ जायेगा, लेकिन जलीय मात्रा बढ़ने के अनुपात में हिमनदों का आयतन घटता नजर आयेगा और धीरे-धीरे नदियों के स्रोत सूख जायेंगे।

Increasing risk of climate change in Himalayas

हिमालय के हिमनद (Himalayan glaciers) जिस गति से पीछे हट रहे हैं, उसके अनुसार यह आगामी 40 वर्षों में विलुप्त हो जायेंगे।

हाल ही में उपग्रह के आंकड़ों से स्पष्ट हुआ है कि पश्चिम क्षेत्र में 10 प्रतिशत एवं पूर्वी हिमालय में 30 प्रतिशत हिमनद कम हो गये हैं, जब तक हिमनद में हिम के पिघलने तथा संचय (जमाव) में संतुलन रहता है, तब तक हिमनद का अस्तित्व पूर्ववत् बना रहता है, लेकिन बढ़ते तापमान ने हिम संचय में कमी कर दी है और पिघलने की दर बढ़ा दी है, लिहाजा इनके अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है।

Melting rate of Gangotri glacier in Himalayas

हिमालय में गंगोत्री हिमनद के पिघलने (पीछे हटने) की दर 98 फीट प्रतिवर्ष हो गई है तथा इस आधार पर कहा जा सकता है कि वर्ष 2035 तक पूर्वी हिमालय के समस्त हिमनद विलुप्त हो जायेंगे। सम्पूर्ण हिमालय प्रदेश का औसत तापमान उपमहाद्वीप में तापमान बढ़ने से एक बार तो प्रमुख बड़ी नदियों में बाढ़ आयेगी।

वर्तमान शताब्दी के अंतिम दशकों में प्रतिवर्ष भारत सहित दुनियां की लगभग 10 करोड़ आबादी बाढ़ से प्रभावित होगी।

ताजा जानकारी के अनुसार भारत, बांग्लादेश, चीन, वियतमान तथा इंण्डोनेशिया आदि देशों की तो लगभग आधी से अधिक आबादी ग्लोबल वार्मिंग से आई बाढ़ का संकट झेलेगी। प्रसिद्ध सुन्दर वन का 18500 एकड़ वन क्षेत्र डूब की जद में आने की आशंका है।

World temperature will have the highest impact on per capita availability of water

विश्व तापमान का सर्वाधिक प्रभाव जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता पर पड़ेगा। सन् 2050 तक बढ़ते तापमान के कारण प्रति व्यक्ति की जल उपलब्धता में 30 प्रतिशत कमी आयेगी। बर्फ के पिघलने से सागर तल में वृद्धि होगी तथा मौसमी बदलाव से लोग शरणार्थी बन जायेंगे। इन मौसमी पर्यावरण शरणार्थियों की संख्या आगामी दशक में 5 करोड़ हो जायेगी। ये सभी परिवर्तन यद्यपि प्रकृति में नवीन नहीं है, लेकिन वर्तमान में आये परिवर्तनों से सारी दुनियां पर एक आपदाकारी प्रभाव पड़ रहा है, इसीलिए विश्व तापमान के संभावित खतरों से बचने के लिए रणनीति बनानी होगी, क्योंकि तापमान बढ़ने का जो क्रम चल पड़ा है, इसे एकाएक तो नियंत्रित कर पाना तो संभव नहीं है, लेकिन इसके लिए समय रहते कदम उठायें जाएं तो मानव जाति सहित सम्पूर्ण जीवजगत का भविष्य सुरक्षित रह सकेगा।

हिमालयी पर्यावरण पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पिछले कई वर्षों से लोगों की आजीविका पर पड़ रहा है- हिमालयी राज्यों में अनियंत्रित व अनियमित वर्षा के कारण बाढ़ एवं भू-स्खलन जानलेवा साबित हो रहा है।

अनियमित वर्षा होने से कृषि उत्पादन पर लगभग 50 प्रतिशत की कमी देखी गयी है। गरीब, दलित, बेसहारा लोग जो कृषक एवं कृषि मजदूर की तरह अपना जीवन यापन कर रहे थे, उन्हें भूख का सामना करना पड़ रहा है। वर्षा जल के अनियमित होने से कृषिभूमि, जंगल तेजी से सिकुड़ रहे हैं।

हिमालय क्षेत्र में एकल प्रजाति चीड़ आदि के वनों के फैलने से भी मिश्रित एवं चौड़ी पत्ती के वनों का विकास अवरूद्ध हो रहा है।

Why is it necessary to have broad leaf forests?

पहले चौड़ी पत्ती के वनों के कारण लोगों को स्वच्छ जल, सूखी पत्तियों को मवेशियों के नीचे बिछाने से जैविक खाद, उपजाऊ मिट्टी और खेतों में नमीं की मात्रा मिलती थी, वह वर्तमान में दुर्लभ होती जा रही है।

चौड़ी पत्ती के वनों की मौजूदगी में मैदानी क्षेत्रों को वर्षा ऋतु के समय उपजाऊ मिट्टी मिलती है। पिछले कई वर्षों से हिमालय क्षेत्र में पानी की बहुत ही कमी हो जाने के कारण गांवों के 80 प्रतिशत जलस्रोत सूख गये हैं। गांव के गांव सूखे की चपेट में आ गये हैं।

हिमालयी राज्यों की दो तरह की नदियों में जिसमें एक हिमपोषित है, दूसरी वर्षापोषित है। वर्षापोषित नदियों की जल राशि पिछले 18 वर्षों में काफी कम हुयी है। इसका उदाहरण उत्तराखंड कुमाऊँ की एक कोसी नदी, जिसका जल प्रवाह वर्ष 1993 में 995 लीटर प्रति सेकेण्ड था, वह सन् 2003 में 85 लीटर प्रति सेकेण्ड ही रह गया था। यही स्थिति जलकुर, बाल गंगा, धर्म गंगा, हेंवल, भिलंगना आदि मुख्य नदियों में मिलने वाले गाड़, गदेरों की हो गयी है।

हिमपोषित नदियों के हिमखंड तीव्रता से पिघलने पर नदियों का पानी अप्रैल-जुलाई तक बिना वर्षा के मटमैला रहता है। यह उदाहरण वर्ष 2009 का ही है कि, जुलाई, 09 तक वर्षा न होंने के कारण ग्लेशियर बड़ी तेजी से पिघले हैं। गौमुख ग्लेशियर से आने वाली भागीरथी में ग्लेशियरों का मलवा बाढ़ के रूप में तेजी से बहकर आया है। इसी तरह अलकनंदा नदी के ग्लेशियरों का तेजी से पिघलने की घटनायें सामने आयी है।

महिलाओं के घास, लकड़ी, पानी के जंगल गांव से बहुत दूर चले गये हैं। अब स्थिति यहां तक हो गयी है कि महिलायें अपने घर से लगभग 15 किमी दूर घास, लकड़ी लाने के लिए आना-जाना करती हैं। घास और लकड़ी का ढुलान वे अपनी पीठ एवं सिर से करती हैं। पानी की कमी के कारण शेष बचे जलस्रोतों व हैंडपम्पों पर महिलाओं की लम्बी कतारें लगी रहती है। इस कष्ट के कारण वे कई बीमारियों की शिकार हो रही हैं। मौसम में आये बदलावों से लोग पेट दर्द, सर्दी, जुकाम, उल्टी, दस्त की समस्या झेलने के साथ-साथ सांस से संबंधित बीमारियों से भी ग्रसित हो रहे हैं। अस्पतालों में मरीजों की संख्या पहले की अपेक्षा दो गुनी हो गयी है।

The taste of fruits has changed. Wild animals are moving towards the villages.

वन एवं वन्य जीवों के व्यवहार में एक बड़ा अंतर दिखाई देता है। हिमालय क्षेत्र में जहां एक हजार मीटर से घने जंगल होते थे, वहां पर बंजर एवं वन विहीनता नजर आ रही है। वनों में उगने वाली नयी प्रजातियों की संख्या निरन्तर घटती जा रही है। पेड़-पौधों पर फूल अपने निश्चित समय से लगभग डेढ़-दो माह आगे-पीछे फूलते दिखाई दे रहे हैं। फलों के स्वाद बदल गये हैं। वन्य जीवों का रूख गांवों की ओर बढ़ रहा है। लोग बाघों के शिकार बन रहे हैं तथा जंगली जानवर भी मनुष्यों के शिकार बन रहे हैं। आसमान में पिछले छः माह से जिस तरह बादल छाये हुये हैं, वे वर्षा नहीं दे रहे हैं। हिमालयी क्षेत्रों में जहां इस बार अगस्त, 09 में वर्षा हुई है, वह पिथौरागढ़ आदि स्थानों पर अनियंत्रित वर्षा जानलेवा साबित हुआ है।

लोक व्यवहार पर भी मौसम परिवर्तन का प्रभाव पड़ा है। वर्षा के कारण लोग जून-जुलाई में जहां अपने खेतों की रोपाई में व्यस्त रहते थे, इस बार वर्षा न होंने पर अब उनकी खेती में आये सूखेपन से उनका व्यवहार भी बदल रहा है। मधुमक्खियों को अपने छत्ते के निर्माण के लिए प्रकृति से फूल-पत्ते नहीं मिल पा रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों से चलने वाली आजीविका जैसे-टोकरी, दोने पत्तल, लकड़ी के वर्तन, कृषि उत्पादन, रेशा उद्योग, पनचक्की जैसे आजीविका के साधनों पर प्रभाव पड़ा है।

हिमालयी क्षेत्रों की नदी-घाटियों पर मानव जनित विकास परियोजनाओं का संकटCrisis of man-made development projects on the river valleys of Himalayan regions

हिमालयी राज्यों को बांध निर्माण व पन बिजली उत्पादन के लिए एक ऊर्जा क्षेत्र के रूप में घोषित किये जाने के बाद यहां के निवासियों के बीच में यह एक व्यापक स्तर पर गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है।

भारत के हिमालयी राज्यों में लगभग 1,000 छोटी-बड़ी जलविद्युत परियोजनायें प्रस्तावित एवं निर्माणाधीन हैं, इसमें अधिकांश परियोजनायें सुरंग आधारित हैं, जो नदियों के सिरहाने से ही श्रृंखलावद्ध तरीके से निर्मित करने की योजना सामने आयी है।

अकेले उत्तराखंड राज्य का अध्ययन करके तथा स्वयं सरकार द्वारा उपलब्ध करवायी गयी जानकारी के अनुसार 558 जलविद्युत परियोजनाओं पर कार्य किया जा रहा है। बांध परियोजनाओं में प्रस्तावित सुरंगों के ऊपर हजारों गांव बसे हुये हैं। उत्तराखंड में लगभग 5,000 गांव सुरंगों के ऊपर आ सकते हैं, जिसकी आबादी लगभग 20-22 लाख हैं।

उत्तराखंड भी अन्य हिमालयी राज्यों की तरह भूकम्प की दृष्टि से अतिसंवेदनशील है और यहां पर 1991 के बाद भी कई बार भूकम्प आ चुका है और जान-माल का नुकसान हुआ है। ऐसी विषम परिस्थिति में हिमालयी राज्यों ने बिना सोचे-समझे यहां की भू-गर्भिक हलचल, बाढ़ एवं भू-स्खलन के संबंधित तमाम अध्ययनों व अनुभवों को नजरअंदाज करके, सुरंग बांध परियोजनाओं को बढ़ावा दिया है।

उत्तराखंड में निर्मित विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना (Vishnuprayag Hydroelectric Project) (420 मेगावाट) ने र्चाइं गांव को धराशायी कर दिया है।

मनेरी-भाली फेज प् (90 मेगावाट) व फेज प्प् (304 मेगावाट) जलविद्युत परियोजनाओं के आउटलेट व इनलेट पर बसे हुये तीन दर्जन से अधिक गांव बिना विस्थापन के संकट में पड़ गये हैं तथा उनके गांव के जलस्रोत सूख गये हैं।

भागीरथी, भिलंगना, अलकनंदा, सरयू आदि नदियों पर निर्माणाधीन लोहारीनाग-पाला (600 मेगावाट), पाला-मनेरी (480 मेगावाट), भिलंगना तृतीय (24 मेगावाट), श्रीनगर जलविद्युत परियोजना (320 मेगावाट), आदि कई दर्जनों जलविद्युत परियोजनाओं के सुरंग निर्माण के लिये किये गये विस्फोटों से सैकड़ों घरों में दरारें आ गयी हैं। गांव के जलस्रोत सूख गये हैं। गांवों में भू-स्खलन व भू-क्षरण की समस्या पैदा हो गयी है। यहां तक कि प्रभावित गांवों के जंगल भी निर्माण कम्पनियों के अधीन हो गये हैं।

चारागाहों व बंजर भूमि पर बांध निर्माण कम्पनियों की आवासीय कॉलोनी बन रही हैं। खेद की बात तो यह है कि इन परियोजनाओं से पहले पर्यावरणीय व सामाजिक प्रभाव आंकलनों की जनसुनवाई नहीं हुई है। यहां तक कि कई जलविद्युत परियोनजाओं की डी.पी.आर. मनगढ़ंत तरीके से बनायी गयी है।

नदियों में मौजूदा हालत में उतना पानी नहीं है, जिस आधार पर बिजली उत्पादन के दावे पेश किये जा रहे हैं। इसके उदाहरण टिहरी बांध, मनेरी-भाली प्रथम एवं द्वितीय से अपेक्षित विद्युत उत्पादन नहीं हो पा रहा है।

अतः हिमालय निवासियों पर बदलते मौसम व जलवायु परिवर्तन के दौर में इस तरह का दोहरा संकट लोग झेल रहे हैं। बिडम्बना है कि जहां मौसम परिवर्तन के कारण एक दैवीय आपदा जैसी स्थिति का सामना लोग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उपरोक्त मानव जनित परियोजनाओं से भी लोगों के सामने आजीविका चलाने की समस्या खड़ी हो गयी है।

चिंता इस बात की है कि राज्यों ने इन परियोजनाओं के निर्माण से पहले पुनर्वास, रोजगार व जलनीति नहीं बनायी है। विशेषकर उत्तराखण्ड, हिमांचल, असम, मेघालय आदि राज्यों में बांधों के विरोध में आये दिन आन्दोलन हो रहे हैं, जिसकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

उत्तराखंड राज्य का हमारे पास सरकार द्वारा उपलब्ध करवायी गयी जानकारी के अनुसार भागीरथी में 104, अलकनंदा घाटी में 74, धौली गंगा (अलकनंदा), चमोली में 27, मंदाकिनी घाटी (अलकनंदा) में 24, पिण्डर घाटी में 24, धौली गंगा घाटी, पिथौरागढ़ में 13, गौरी गंगा घाटी, पिथौरागढ़ में 27, टौंस नदी यमुना घाटी में 35, यमुना नदी पर 36, गंगा नदी घाटी पर 19, नयार घाटी में 5, सरयू घाटी में 29, रामगंगा नदी पर 35, कोसी घाटी में 14, महाकाली घाटी में 15, गौला नदी पर 4, पवार नदी पर 3, सौंग नदी पर 5, गोमती नदी पर 3, लधिया नदी पर 2, कोट नदी पर 1, गगास नदी पर 2, दबका नदी पर 2 और अन्य नदी-घाटियों एवं गाड़-गदेरों में 55 बांध परियोजनायें निर्माणाधीन, निर्मित व प्रस्तावित है।

जारी…..

सुरेश भाई

हमारे अस्तित्व को समाप्त कर देगा प्राकृतिक संसाधनों का दुरूपयोग

About the author

सुरेश भाई, लेखक उत्तराखण्ड के जाने-माने पर्यावरण के सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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