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Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना
Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना

हिन्दू धर्म कोई धर्म नहीं, राजनीति है… यह कारपोरेट विध्वंस का खेल पवित्र हिन्दूराष्ट्र के नाम है।

कारपोरेट विध्वंस का खेल पवित्र हिन्दू राष्ट्र के नाम है

हिन्दू धर्म कोई धर्म नहीं, राजनीति है। बाबासाहेब का कहा अब कारपोरेट समय का सबसे निर्मम यथार्थ है भारतीय बहुसंख्य जनगण की अंध आस्था के एटीएम समक्षे। लेकिन प्रतिरोध की सुगबुगाहट भी शुरू हो गयी है।

पलाश विश्वास

बाबा नागार्जुन के शब्दों में –

खड़ी हो गयी चांपकर कंकालों की हूक

नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक

उस हिटलरी गुमान पर सभी रहे हैं थूक

जिसमें कानी हो गयी शासन की बंदूक

बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने विनोबा मूक

धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक

सत्य स्वयं घायल हुआ, गयी अहिंसा चूक

जहां-तहां दगने लगी शासन की बंदूक

जली ठूंठ पर बैठकर गयी कोकिला कूक

बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक

करपोरेट रामराज्य में जाहिर है कि मनुस्मृति अनुशासन की बहाली सर्वोच्च प्राथमिकता है, शूद्रों का वध और स्त्री दमन राजकाज का पर्याय है। हरिकथा अनंत है। देशज तड़के के साथ भोग के तौर तरीके अलग-अलग है। ओबीसी सत्ता केंद्रे हरियाणा, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में दमन तंत्र कुछ ज्यादा ही मुखर है तो वैज्ञानिक नस्ली जातिवर्चस्व के आधार क्षेत्र बंगाल में इस भोग का रूप रस गंध कुछ कामदुनि गंधी है तो कुछ वीरभूम जैसा।

गुवाहाटी से लेकर शेयर बाजार पच्चीस हजार पार बजटपूर्वे के चमत्कारिक ओबामा नमो हानीमूनमुहूर्ते मुंबई में भी गुवाहाटी का नजारा दिख रहा है तो भगाणा के प्रतिरोध में मणिपुर और केरल में माताओं का प्रतिरोध समान है।

फिर भी हिन्दू राष्ट्र सेना का तांडव जारी है,जैसा कि पुणे ने देख लिया है। मुकम्मल गुजरात माडल। बाकी देश को आजमाना है।

हमने सोचा था कि आर्थिक मुद्दों पर बजट के बाद ही लिखेंगे। लेकिन बजट तो सालाना रस्म अदायगी है, कांग्रेसी राजकाज ने इसे पहले ही साबित कर रखा है। संसद तो नुमाइश है। नीति निर्धारण कारपोरेट है। लाख करोड़ की जनादेश डकैती के बावजूद बाजार की ताकतें खामोश कैसे बैठ सकती हैं, समझने वाली बात है।

नाम के वास्ते रामराज है।

काम के वास्ते अंबानी राज।

याद करें, चुनावपूर्व सत्ता संघर्ष धर्मोन्माद बनाम धर्मनिरपेक्षता कुरुक्षेत्र अवसरे हमने कहा था कि जनपक्षधर ताकतें नमोमय भरत रोकने और कारपोरेट जनादेश निर्माण रोकने में किसी तरह का हस्तक्षेप करने की हालत में नहीं है। रंगबिरंगे झंडेवरदारों के मातहत बहुसंख्य भारतीयों के धर्मोन्मादी पैदल सेनाएं बन जाने की वजह से हम चक्रव्यूह में फंसे हुए निहत्थे मृत्यअभिशप्त लोग हैं।

याद करें कि हमने लिखा था कि भाजपा को तिलांजलि देकर कारपोरेट सहयोगे जो हिन्दू राष्ट्र की नींव तामीर की जा रही है लाल नील सहकारिता सौजन्ये, वह हिन्दू राष्ट्र नहीं होगा, मुकम्मल अंबानी राज होगा।

हूबहू वही हो रहा है। अंबानी के खिलाफ बड़बोले अरविंद केजरीवाल की तोपें खामोश हैं। पहले ही कई दो दर्जन मीडिया हाउस अंबानी के कब्जे में थे और अब चैनल एइट भी। पहली अप्रैल के बजाय गैस की कीमतें बिना बजट के पहली जुलाई से दोगुणी हो रही है। बिना बजट या बिना संसदीय अनुमोदन के भारत अमेरिका परमाणु संधि के सर्वोच्च अमेरिकी हित साधकर अमेरिका आमंत्रित हैं गुजरात नरसंहार के लिए एकदा अमेरिकामध्ये निषिद्ध नरेंद्र मोदी। अमेरिकी युद्धक जायनवादी अर्थ व्यवस्था के लिए मंदी के बाद सबसे बड़ी राहत की बात है कि भारतीय प्रतिरक्षा बाजार में रूसी वर्चस्व का अंत सुनिश्चित है और स्वयंभू अति देशभक्त हिंदुत्व सरकार ने शत प्रतिशत प्रत्यक्ष निवेश बजरिये भारत की सुरक्षा अमेरिका हवाले कर दी है। अब खुदरा बाजार पर अमेरिकी दांव है, जो पूरे होकर रहेंगे। इसी के जश्न में सांढ़ों का आईपीएल है मुंबई का शेयर बाजार तो वहां किसी स्त्री को नंगा किया जाना जाहिर है कि जश्न का हिस्सा ही है। स्त्री के कपड़े उतारे बिना, स्त्री को नीलाम किये बिना, स्त्री से बलात्कार किये बिना कोई अश्वमेध पूरा हो सकता नहीं है।

पूर्वोत्तर भारत ने ऐसा बार-बार देखा है और उस सशस्त्र सैन्य विशेषाधिकार कानून के खिलाफ लगातार चौदह साल तक आमरण अनशन कर रही इरोम शर्मिला को हिन्दू राष्ट्र में न्याय यह मिल रहा है कि उन्हें अपराधी साबित करने का चाकचौबंद इंतजाम हो गया है।

वरनम वन भी तानाशाह के खिलाफ रणभूमि में योद्धा बन जाता है तो अब पूरे भारत के वरनम वन बन जाने के आसार हैं। मणिपुर और केरल की माताओं के चेहरे एकाकार हो जाने का शास्त्रीय तात्पर्ययही है कि तानाशाह के विरुद्ध निकल पड़ा है वरनम वन।

गौरतलब है कि देश के सभी सार्वजनिक उपक्रमों, बिजली, संचार और बैंकिंग सेक्टर के अधिकारियों के राष्ट्रीय संगठनों के शीर्ष पदाधिकारियों की 07 जून को दिल्ली में अहम बैठक हो रही है जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र और बैंकिंग सेक्टर को बचाने हेतु राष्ट्रव्यापी अभियान और संघर्ष की रणनीति तय की जाएगी। यदि केंद्र सरकार यू पी ए की नीतियों पर चल कर या और आगे बढ़कर निजीकरण के कार्यक्रम चलाएगी तो इसके विरोध में सार्वजनिक क्षेत्र व बैंकिंग सेक्टर को लामबन्द कर राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने और व्यापक संघर्ष की रणनीति दिल्ली की बैठक में तय की जाएगी।

हमने विनेवेश कथा बार-बार लिखी है। लगातार लिख रहे हैं। विनिवेश कौंसिल ने अटल जमाने में अरुण शौरी तत्वावधाने विनिवेश की जो सूची तय की थी, यूपीए में भी उसी सूची के मुताबिक विनिवेश होता रहा है। उसी अटल सरकार के रोडमैप पर दस साल तक जनसंहारी सुधार कार्यक्रम लागू करते रहे हैं मनमोहिनी कारपोरेट असंवैधानिक तत्व। उसी कार्यकाल में संसद हाशिये पर फेंक दी गयी। लेकिन तब भी कैबिनेट की मंजूरी जरूरी थी। अब संसद के साथ साथ कैबिनेट मंत्रालय सब फालतू रस्म अदायगी है। बड़े-बड़े हवा महल बांटकर जागूरदारों को खुश रखना है। जो कुछ करेगा पीएमओ में बैठकर देश के पीएमसीईओ करेंगे। पीएम की जनता के प्रति सीईओ हैसियत से बजरिये किसी जवाबदेही की उम्मीद न करें। हम सीईओ कृपा के भुक्तभोगी हैं, जो एक बड़े ब्रांड का बारह बजाकर बिना कुछ भुगते और कहीं तबाही मचाने चल दिये। कंपनी राज में काम करने वाले लोग जानते हैं कि सीईओ क्या चीज है।हिन्दू राष्ट्र का सीईओ कितना भयानक हो सकता है यह तो क्रमशः प्रकाश्य है,बताने से लोग समझेंगे नहीं।

बहरहाल स्टेट बैंक, एअऱ इंडिया, रेलवे, जीवन बीमा पर हमारे पुराने आलेख देख लें। हूबहू वही हो रहा है, जो तय था। बैंकों का निजीकरण लाजिमी है वरना बैंक खोलकर निजी कंपनियों का फायदा क्या होना है। निजी कंपनियों और औद्योगिक घरानों के बैंकिंग लाइसेंस देने का असली मकसद बैंकों का निजीकरण ही है। सरल शब्दों में कहा जाये तो भारतीय स्टेट बैंक अंबानी के हवाले किया जाना है। एलआईसी और एअर इंडिया का कबाड़ा जैसे हुआ वैसे ही एसबीआई का कबाड़ा किये बिना छिनाल विदेशी पूंजी का कार्निवाल आईपीएल फर्जीवाड़ा मुकम्मल हो नहीं सकता। संसद में बजट होने से पहले सरकारी बैंकों के मृत्यु परवाने पर दस्तखत कर दिये गये हैं।

धारा 370 के खत्मे का एजंडा का देशप्रेम से कोई लेना देना नहीं है। इसका असली मकसद कश्मीर को भी उत्तराखंड, सिक्किम और खनिज बहुल मध्य भारत की तरह कारपोरेट हवाले कर देना है। इसी तरह रियल्टी सेक्टर को इनफ्रास्ट्रक्चर बना देने की करतब का मतलब बाहुबलि बिल्डरों, प्रोमोटरों और माफिया गिरोहों को राष्ट्र निर्माता का दर्जा दिया जाना है।

यह कारपोरेट विध्वंस का खेल पवित्र हिन्दूराष्ट्र के नाम है।

हम पिछले एक दशक से देशभर में सार्वजनिक सभाओं में और अपने लेखन में चीख चीखकर कह रहे हैं कि मनुस्मृति कोई धर्मग्रंथ नहीं है, भारतीय संदर्भ में विशुद्ध एडम स्मिथ का अर्थ शास्त्र है। हिन्दू राष्ट्र भी विशुद्ध धनतंत्र है। कमल पंखुड़ियां तो अभी खुल ही रही हैं। पूरी पद्म पुराण बाकी है। इंतजार करें।

आप को ओवर दर ओवर आंखों देखा हाल अवश्य बताते रहेंगे।

आज आर्थिक मुद्दे पर जरुरी सूचना वास्ते इतना ही।

शुक्र की बात है कि जैसे कि आनंद तेलतुंबड़े ने लिखा है कि बहुत अच्छा हुआ कि अस्मिता वाहक धारक झंजावरदार सारे क्षत्रप गिरोह इस चुनाव में ढेर हो गये।

अस्मिताओं  के आर पार बिना मसीहा, बिना झंडा, बिना इंद्रधनुषी राजनीति आहिस्ते आहिस्ते एक बहुजन समाज धीरे धीरे आकार लेना शुरु कर चुका है, हो सके तो हाथ बढाइये, उसे मजबूत करें।

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पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए "जनसत्ता" कोलकाता से अवकाशप्राप्त। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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