हीरामन, 15 लाख का सूट भी काम न आया।

Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना

हीरामन, कंपनी वाली बाई से फिर मुहब्बत और वफा की उम्मीद ना रख!

इस हीरामन को मिलने के लिए भूगोल इतिहास में झांकने की जरूरत नहीं है।

लेंस और माइक्रोस्कोप या फिर सर्न जैसे दुनिया उलट पुलटकर हीराबाई को खोजने की जरुरत नहीं है, नहीं है, नहीं है।

आइने में खड़े होकर अपना चेहरा देख लें। देखने की आंख हो तो देख लें। सूंघने खातिर कोई नाक बची है तो चूंकि इज्जत की नाक तो हम गवा ही चुके हैं, सूंघ ले अपने भीतर महमहाती गोबर माटी की गंध, तो समझ में आयेगा कि हीरामन कोई अकेला राजकपूर का चेहरा नहीं है।

हीराबाई को नौंटंकीवाली कंपनी बंद हो गयी होगी लेकिन नौटंकी चालू आहे। शांतता। नौटंकी चालू आहे। मनवा, उस हीराबाई को पहचान लें तो अपनी झूठी मुहब्बत की खुशफहमी दूर हो जाये।

हीरामन, कंपनी वाली बाई से फिर मुहब्बत और वफा की उम्मीद ना रख!

आदरणीय (फनीश्वर नाथ रेणु (Phanishwar Nath Renu) जिन्हें विद्वतजन आंचलिकता में डूब बनाकर मठों के बाबा सौदा बने हुए हैं, उनकी तीसरी कसम का पाठ करें तो लाली लाली रंग में आज का सामाजिक यथार्थ के पीछे जो रघुकुल रीति चली आयी, उसका मायने समझ में आये।

दिल्ली की जनता वोट गेर चुकी होगी, जब यह लिखा आप पढ़ रहे होंगे

हमारा मतबल बस इतना है कि हम जिंदगी से जब वफा और उम्मीद नहीं करते तो क्या खाक जनादेश का मतलब (Mandate means) समझेंगे हम और लोकतंत्र की ताकत समझ में आयेगी कि हम देश बेचने वालों के पक्ष में गोलबंद न हो सकें।

जब हमें जिंदगी से कोई मुहब्बत नहीं है। उसका नाम तक नहीं लेते, जिससे बेपनाह मुहब्बत सांस सांस में बहाल रखते हुए जिंदगी भर सहवास किसी और के साथ करते हैं, राहु केतु शनि के डर से तंत्र यंत्र मंत्र के भरोसे हैं और अंतरिक्ष की उड़ान भी भरते हैं ब्रह्मांड के रहस्य खोलने वास्ते रंग बिरंगे तिलिस्म और प्रपंच रचते हैंतो हमसे लोकतंत्र, संविधान और देश प्रेम की उम्मीद ना रख।

वोट की ताकत हम ना जाने हैं।

जान रहे होते तो कपंनी वाली बाई पान खाइके जलवा बिखेरकर हमारा सबकुछ लूटकर नौ दो ग्यारह बिलियनर मिलियनर हेजेमनी ना हुई रहती।

फतवा और फतवाबाज हमारा वोटलूट न रहे होते कि किसी जानेमन के फतवे से हमारा जनादेश बदल नहीं जाता।

अगर हम सचमुच मुहब्बतऔर वफा की परवाह कर रहे होते।

हम ससुरे अछूत गुलाम अश्वेत झूठन के आदी लोग हैं।

लोकतंत्र संप्रभु नागरिकों का होता है।

गुलामों, दासों, दासियों, बंधुआ मजदूरों के लिए कोई लोकतंत्र नहीं होता।

हमसे समर्थन मांगने की भी नौबत नहीं आती।

कोई हमारा समर्थन ले लें और दो चार टुकड़े अपनी दावत की जूठने के हम पर फेंक दें तो ट्रिकलिंग ट्रिकलिंग विकास हो जाई।

मुहब्बत जमीन आसमान अंतरिक्ष में गुमशुदा है लेकिन नौटंकी मशहूर है किस्सा लैला मजनूं, किस्सा हीर रांझा, किस्सा सोहनी माहीवाल, किस्सा शीरीं फरहाद वगैरह वगैरह।

नौटंकी के देखकर मजे से घर लोटकर उस बिस्तर की ओट में महब्बत की कब्र खोदते हैं हम रोज, जहां हम शेयर करते हैं जिंदगी उसके साथ, जिससे हमें मुहब्बत है नहीं, नहीं है, नहीं है।

बेमुहब्बत दस बच्चे और चालीस पिल्ले कमाने के अभ्यस्त हैं हम।

बेमुहब्बत देहमुक्ति खातिर हम रंग बरंगे खिलौने और गुब्बारों की महक और दहक के गुलाम हैं हम।

हमारी जिंदगी में साझे चूल्हें अब कहीं नहीं है क्योंकि हमारा नसीब अब परमाणु चूल्हा है। हमारे लिए कुछ भी साझा नहीं है। हम न्यक्लियर वानी।

ई रही हमारी मुहब्बत जानी ईश.. ई ह ममार डिजिटल बायोमैट्रिक लोकतंत्र। स्त्री देह की नुमाइश, नीलामी। भोग और उपभोग साथो मा आत्मा परमात्मा प्रवचन धर्म पाखंड फिर एको पाखंड आउर उ कंपनी वाली बाई का जलवा जो इस मृत्यु उपत्यका में लोकतंत्र है।

अपनी सुविधे की मौत चुनने की आजादी है। बाकी औरतखोर मर्द की औजार ताने हम वोट गिराके दारु सारु पीके हीरक राजा के गुलाम बनने को बेताब हैं।

पंडित जगदीश्वर चतुर्वेदी जी कहल रहल, दिल्ली विधानसभा चुनाव में मजेदार प्रचार की खूबी है कि जिन दो दलों आम आदमी पार्टी और भाजपा ने दिल्ली में विगत 15 सालों में एक पेड़ भी नहीं लगाया वे विकास के दावे कर रहे हैं और जिस कांग्रेस ने दिल्ली का नक़्शा बदलकर रख दिया, हर स्तर पर विकास के फल आम आदमी तक पहुँचाए और बेदाग़ राज्य सरकार दी उसे बहस तलब भी नहीं मान रहा मीडिया ! यह तो बड़ी नाइंसाफ़ी है! वोट देने के पहले सोचो केजरीवाल की सरकार बनाओ, कांग्रेस को विपक्ष में लाओ।

तो शाही इमाम के बाद यह आपका फतवा है। नवउदारवाद की संतानों में चुनाव की सलाह है जैसे रवीश कुमार खूब ताने रहिस के बकौल रवीश जी संगठन और जनादेश के बीच है मुक़ाबला। दिल्ली अभी इतनी भी पास नहीं।

संगठन है, संस्थान हैं, नरसंहार संस्कृति और मनुस्मृति की बहाली खातिर हर सामान मौजूद है बाकीर जनादेश का हौआ है जो मीडिया और पइसा बनावल रहि बाकीर लोकतंत्र नहीं है। मिलियनर बिलियनर सत्ता तबका एक फीसद है और बाकी निनानब्वे फीसद हीरामन है। जनादेश दिवास्वप्न है।

हम अपना काला रंग गोरा बनाने के लिए जिंदगी भर फेसियल और फेसलिफ्ट करते रहेगे और अमेरिका में बैठा कोई ओबामा असली भगवान की तरह हमारी किस्मत लिख देगा, जिसकी कुंडली किसी वैदिकी गणित के बूते बनाने की नहीं होगी।

परकटी परियां हमारी बेटियां हैं, बहनें हैं और उनकी तितली सरीखी उड़ाने के खातिरे हम जीते मरते हैं लेकिन दरहकीकत उन्हें मुहब्बत की कोई आजादी नहीं है।

पढ़ लिखकर कुछ बन गइलन जरूर। चूल्हा चौका से आजादी भी मिलल हो। आर्थिक आजादी है। सशक्तिकरण है लेकिन अपनी जिंदगी के फैसले के खातिर फतवा के खिलाफ एको कदम चलने की आजादी ना है।

हम फतवेबाज इतने बेरहम हैं कि अपनी अपनी शूद्रानी, दासियों को किसी भी कसाई, माफ रें जाति की नहीं, गरदन उतारने के दक्ष लोगों की बात कह रहे हैं हम, किसी भी कसाई के आगे उन परकटी परियों को सौंप देने में कोई परवाह नहीं करते।

मोबाइल ऐप्पस में मुहब्बत के गाने भर-भर कर कानों में चाबी लगाकर दीन दुनिया से बेखबर मस्त हैं हम लेकिन किसी ने जिंदगी में मुहब्बत जुबान पर लाने की हिमाकत की नहीं तो मुगलेआजम हैं।

भ्रूण हत्या, आनर किलिंग और बलात्कार का लोकतंत्र जीकर हम मुहब्बत के गाने गुनगुनाते रहते हैं। यही हमारे लोकतंत्र का सच है।

लोकतंत्र का एक भयावह सच (A terrible truth of democracy) जो है वह है बंगाल जहां रोज शारदा फर्जीवाड़े के चार अध्याय बांचने में रात दिन तबाह है और पल दर पल राजनीति और लोकतंत्र, प्रगतिवाद और मानवाधिकार, आजादी और क्रांति के गीत बाबुलंद आवाज से गाये जाते रहते हैं।

पूरे चौदह दिन हो गये, एसएससी बिल्डिंग में एसएससी की नौकरी परीक्षा पास करके बेरोजगारी में मर रहे बच्चे अनशन पर हैं। लेकिन बंगाल में पूरी बहस दीदी के होने और न होने को लेकर हैं। बाकी देश दुनिया की क्या कहें, हमें अपने बच्चे तक की परवाह नहीं है।

पलाश विश्वास

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पलाश विश्वास
पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।