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हिंदी अंग्रेजी में तू-तू, मैं-मैं की वार

14 सितंबर को हिंदी दिवस (Hindi Diwas on 14 september) के मौके पर कई बुद्धजीवियों ने अपने ज्ञान का प्रदर्शन किया। हिंदी के सम्मान (Honor of hindi) के लिए लंबे चौड़े भाषण का भी प्रयोग हुआ। स्कूल से लेकर सोशल मीडिया तक हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में मंच को दुल्हन की तरह सजाया गया। इन तमाम चीज़ों को देखकर मन काफी प्रफुल्लित हुआ, लेकिन तभी अचानक दिमाग की बत्ती जली।

दिमाग की बत्ती जलने पर एहसास हुआ कि कहीं हिंदी प्रेम दिखावटी का ज़रिया तो नहीं बन गया? सवाल कई उठे… लोगों द्वारा हिंदी की खूब तारीफ की गई, लेकिन क्या किसी ने हिंदी को अपनाने का संकल्प लिया? शायद नहीं। अरे भई लें भी क्यों? क्या फ़र्क पड़ता है। अगले साल फिर से हम कह लेंगे कि भारत की शान है हिंदी….फलाना ढिकाना। और फिर 364 दिन तक भूल जाएंगे।

कहने का तात्पर्य यह है कि भाषा संचार का ज़रिया है और उसमें भेदभाव कतई बर्दाश्त नहीं होगा। फिर चाहे हिंदी, अंग्रेजी, तमिल, गुजराती, भोजपुरी और कन्नड़ आदि कोई सी भी भाषा क्यों न हो। हर किसी को अपनी भाषा में संचार करने का पूरा अधिकार है और उसे थोपने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन कल जिस तरह से अंग्रेजी और हिंदी की तुलना की गई, उससे मन व्यथित हो गया।

अंग्रेजी और हिंदी का तो कोई मेल ही नहीं, फिर भी न जाने क्यों लोग भेदभाव का पुल बांधने की कोशिश कर रहे हैं? हिंदी भाषी और अंग्रेजी के ठेकेदारों के बीच कल अजीब सी जंग देखने को मिली, जिसमें किसी को हिंदी के प्रचार से आपत्ति थी तो किसी को जॉब्स में अंग्रेजी के प्रचलन से आपत्ति थी। कुल मिलाकर, दोनों में एक दूसरे को अपने हिसाब से ढालने का अघोषित युद्ध चलता रहा, जोकि अगले साल के लिए स्थगित कर दिया गया है।

“भाषा पर है जन जन का अधिकार

भाषा के नाम पर न हो किसी का दुत्कार।

भाषा न होती, तो न हिंदी-अंग्रेजी में होता वार

आओ मिलकर संकल्प लें, खत्म करेंगे ये दीवार।।”

श्रेया पाण्डेय,

डिजिटल पत्रकार

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