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विटामिन-डी का सेवन कितना उपयोगी ?

How useful is vitamin D intake?

बीते कुछ समय से इस बात का धुंआधार प्रचार किया जा रहा है कि भारतीयों में विटामिन-डी की बहुत कमी (Vitamin-D deficiency) है, जबकि यह शरीर के विकास, हड्डियों के विकास और स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है। आम धारणा है कि धूप के संपर्क में आने पर त्वचा विटामिन डी का निर्माण करने लगती है। यह विटामिन खाने की कुछ चीज़ों से भी प्राप्त होता है, लेकिन इनमें यह बहुत ही कम मात्रा में पाया जाता है। इसलिए मात्र इनसे विटामिन-डी की जरूरत पूरी नहीं हो पाती। आमतौर पर चिकित्सक हड्डी संबंधी बीमारियों के इलाज (Treatment of bone diseases) में एहतियात के तौर पर विटामिन डी की गोलियाँ लेने का परामर्श देते हैं।

लेकिन वहीँ योरोप में एक शोध में पाया गया है कि सेहतमंद वयस्कों में बीमारी के ख़तरों से विटामिन डी की गोलियों का कोई ख़ास असर नहीं होता।

महत्वपूर्ण मेडिकल जर्नल लांसेट में प्रकाशित शोध (Research published in the medical journal Lancet) के अनुसार, तक़रीबन 100 परीक्षणों में पाया गया है कि इन गोलियों से किसी भी स्वास्थ्य संबंधी ख़तरे में कोई महत्वपूर्ण कमी नहीं हुई।

बच्चों, महिलाओं और बुज़ुर्गों समेत तमाम ‘ख़तरे वाले’ समूहों को अभी भी विटामिन डी को पूरक आहार के रूप में लेने की सलाह दी जाती है। बताया जाता है कि इसके कारण वयस्कों में कमजोरी पता चलने लगती है एवं ओस्टियोमेलेशिया (Osteomalacia) जैसे रोग परिलक्षित होते हैं। कूल्हों, पसलियों और पैरों आदि की हड्डियों में दर्द (pain in bones) होने लगता है।

न्यूज़ीलैंड के ऑकलैंड विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं की इस टीम ने पहले भी इन परीक्षणों का मेटा-एनालसिस किया था जिससे पता चला था कि ‘बोन मिनिरल डेंसिटी’ पर विटामिन डी का कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ता। शोधकर्ताओं ने पाया कि हृदय रोग, हृदयाघात या सेरेब्रोवैस्कुलर रोग (cerebrovascular disease), कैंसर और हड्डियों के टूटने के सापेक्षिक खतरे में विटामिन डी का बहुत मामूली प्रभाव पड़ता है। शोध के अनुसार, इस बात पर पर्याप्त संदेह बरक़रार है कि कैल्शियम समेत या इसके बिना विटामिन डी का प्रयोग मृत्यु के ख़तरे को कम करता है।

शोधकर्ताओं के अनुसार,

”हमारे निष्कर्षों के मुताबिक मांसपेशियों और हृदय संबंधी बीमारियों, कैंसर, फ्रैक्टर या मृत्यु के ख़तरे को कम करने में विटामिन डी का परामर्श देने को बहुत सही नहीं ठहराया जा सकता है।”

अक्सर यह दावा किया जाता है कि खून में विटामिन-डी की कमी होने पर कार्डियोवेस्क्युलर रोगों से मृत्यु, याद्दाश्त कमजोर होना, बच्चों का अस्थमा से गंभीर रूप से प्रभावित होना एवं कैंसर आदि की आशंकाएं प्रबल होती हैं।

यह भी बताया जाता है कि शिशुओं में इसकी कमी होने पर मांसपेशियों में मरोड़े, सांस लेने में परेशानी और दौरे आने की परेशानी हो सकती है। उनके शरीर में कैल्शियम की भी कमी हो जाती है। सांस की तकलीफ के कारण बच्चे की पसलियाँ (रिब केज) नर्म रह जाता है और आस-पास की मांसपेशियाँ भी कमजोर रह जाती हैं। उनके पैरों की हड्डियाँ और खोपड़ी कमजोर रह जाती हैं। समय पर दाँत न आना विटामिन डी की कमी का ही लक्षण है। गर्भावस्था में महिला के शरीर में विटामिन-डी की कमी होने पर शिशु में भी इसकी कमी की आशंका होती है। जिन महिलाओं का रंग गहरा होता है, उन्हें इसकी आपूर्ति का विशेष ध्यान रखना चाहिए। मोटापा बढ़ने के साथ ही शरीर में विटामिन-डी का स्तर घटता जाता है। ऐसे लोगों को विटामिन-डी की आपूर्ति के साथ ही मोटापा घटाने की ओर भी ध्यान देना चाहिए, क्योंकि रक्त में मौजूद विटामिन-डी को फैट कोशिकाएं अवशोषित कर लेती हैं और समस्या बढ़ सकती है। विटामिन-डी मधुमेह, उच्च रक्तचाप, ग्लुकोल इनटॉलरेंस और मल्टिपल स्क्लेरोसिस आदि बीमारियों से बचाव और इलाज में महत्वपूर्ण हो सकता है।

ऐसी अनेकों अवधारणाएं भारतीय स्वास्थ्य केन्द्रों, चिकत्सकों और अस्पतालों में व्याप्त हैं। और वे लगातार भारतीय मरीजों को विटामिन डी के प्रयोग के लिए सलाह देते हैं। यहाँ तक कि तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने संसद में बताया कि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा भारत में किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला है कि प्रचुर धूप के बावजूद लोगों में विटामिन डी की कमी है। उन्होंने बताया कि विटामिन की न्यूनता सभी उम्र समूहों में 10 से लेकर 90 फीसदी तक है। शरीर में विटामिन डी का संश्लेषण कई कारकों पर निर्भर करता है। मसलन, धूप की अवधि व समय, अक्षांश, पर्यावरणीय प्रदूषण और त्वचा का रंग।

आजाद ने कहा कि अध्ययन यह भी खुलासा करता है कि हड्डियों में मौजूद खनिज की न्यून सघनता विटामिन डी की कमी की वजह से हो सकती है। इससे हड्डियों को कमजोर होने व टूटने का खतरा बढ़ जाता है।

लेकिन स्वीडन के उपसाला विश्व विद्यालय में सर्जिकल विभाग से जुड़े कार्ल माइकल्सन के अनुसार अभी भी इस बात पर विवाद है कि विटामिन डी की कमी की स्थिति में इसकी गोलियाँ लाभप्रद हैं या नहीं। वे कहते हैं,

”आमतौर पर यह धारणा है कि विटामिन डी का प्रमुख स्रोत धूप है और इसकी थोड़ी खुराक लेने से सेहत में सुधार होगा लेकिन यह अभी बहुत स्पष्ट नहीं है कि ऐसा ही होता है।”

उनके अनुसार यह ज़्यादा उचित होगा कि स्वस्थ लोगों को संभल कर विटामिन डी की गोलियाँ उपयोग करनी चाहिए। कुछ न्यूट्रिशन विशेषज्ञों का कहना है कि विटामिन डी की कमी कई रोगों के लिए ज़िम्मेदार है जैसे कि फ्रैक्चर, कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह और मृत्यु का ख़तरा आदि। जबकि विशेषज्ञों का यह मानना है कि विटामिन डी की कमी ख़राब सेहत का कारण नहीं है बल्कि ख़राब सेहत इसका एक कारण हो सकती है।

दरअसल भारत के लोगों में अचानक विटामिन डी की इतनी कमी कैसे खोज ली गई। आखिर इसके पीछे क्या रहस्य है।

वाशिंगटन के एक शोध के मुताबिक मोटापाग्रस्त किशोरवय लोगों में विटामिन-डी का स्तर सुधारने के लिए विटामिन डी-3 की प्रतिदिन उच्च खुराक सुरक्षित और प्रभावी हो सकती है। विटामिन डी-3 की कमी से अवसाद, पीठ में दर्द, कैंसर, गर्भावस्था के दौरान दोनों इंसुलिन प्रतिरोधक तथा पूर्व एक्लंप्सिया (गर्भावस्था के दौरान होने वाला उच्च रक्तचाप), प्रतिरोधक क्षमता खराब होने और मैकुलर विकार हो जाती हैं।

मिसौरी विश्वविद्यालय में इस विषय पर शोध  के बाद यह निष्कर्ष निकला कि किशोरवय लोगों में विटामिन-डी की कमी का भारी खतरा रहता है क्योंकि उनके शरीर में मौजूद अतिरिक्त वसा इसे रक्त में पहुंचने नहीं देता है।विश्वविद्यालय के एक बयान के मुताबिक शोध में पाया गया कि मेडिसीन संस्थान द्वारा निर्धारित किए गए विटामिन डी-3 की अधिकतम रोजाना खुराक 4,000 आईयूस (अंतर्राष्ट्रीय इकाइयाँ) लेना सुरक्षित और प्रभावी होगा, जो ऐसे लोगों के विटामिन-डी के स्तर में सुधार कर सकता है।

यह बात सर्वविदित है कि ग्लोबलाइजेशन ने बाजार को बुनियादी रूप से बदल कर रख दिया है। माना जाता है कि 1945 में कैलिफॉर्निया विटामिन कंपनी ने इसकी शुरुआत की थी।

भारत में उदारीकरण के बाद इस तरह की मार्केटिंग करने वाली अंतर्राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने पैर पसारे हैं। विज्ञापनों का इसमे बहुत बड़ा हाथ है। प्रॉडक्ट बेचने के न जाने कितने तौर-तरीके हमारे सामने हैं। दुनिया में दवाईयाँ बेचने वाली कम्पनियों का एक बड़ा मकड़जाल है जो किसी भी देश के बाजार में येनकेन प्रकारेण अपना उत्पाद ठूंस देती हैं और बेहिसाब लाभ कमाती हैं चाहे फिर उसके लिए नैतिक अनैतिक कोई भी रास्ता क्यों न अपनाना पड़े।

शैलेन्द्र चौहान

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शैलेन्द्र चौहान, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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