सेल्फी की क्रांति रीतिकालीन साहित्य को ही जन्म देगी

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गाँव में श्रम करती हमारी माताएं बिना मेक-अप के हमें सुंदर क्यों नहीं लगती?

सामान्य स्तर पर देखा जाए तो हमें वह संगीत अधिक सुसज्जित लगता है जिसे एक प्लानिंग के साथ रिकॉर्डिंग रूम में रिकॉर्ड किया जाता है. लेकिन जो सुसज्जित हो वही सुंदर हो यह जरूरी नहीं होता. इसलिए उसी संगीत को उसी गायक के आमने-सामने बैठकर सुनना रिकॉर्डिंग सुनने से कहीं अधिक हमें जोड़ता भी है और आनंदित भी करता है. आमने-सामने जिसे हम लाइव कहते हैं, वहां बनावटीपन लगभग खत्म हो जाता है और संगीत की सुंदरता एक अलग ढंग से हमें प्रभावित करती है. संगीत के इस रूप का यदि जनवादी समीक्षा की जाए तो यह कला इसी रूप में जनपदों की कला की सार्थकता को भी पूर्ण करता है. स्वाभाविक सी बात है कि सुंदरता सिर्फ़ साज-सज्जा का मोहताज नहीं होता है. यदि ऐसा होता तो हम शहर को भविष्य का ख़ुदा मानकर यहाँ अवसर ढूंढने वाले लाखों करोड़ों युवा जो रेम्प पर बाजार द्वारा सुंदरता को पेश करने के अजीबों-गरीब तरीकों की जद में हैं इसके  बावजूद इन चकाचौंध शहरों से हजारों किलोमीटर दूर गाँव में श्रम करती हमारी माताएं बिना मेक-अप के हमें सुंदर नहीं लगती? और ना ही कभी हमारी बहनें ही सुंदर लगती जो माँ के साथ श्रम करती गोबर के उपले तैयार करने में व्यस्त रहती है.

क्या जो महिलाएं या लड़कियां मेकअप नहीं करती हैं क्या वे सुंदर नहीं होती हैं? | Are women or girls who don’t wear makeup, aren’t they beautiful?

सवाल यह है कि जो महिलाएं या लड़कियां मेक-अप नहीं करती हैं क्या वे सुंदर नहीं होती है? हैरत की बात है कि समाज पर वर्चस्व स्थापित करने के क्रम में पुरुषवादी सताओं ने सुंदरता की जो परिभाषा गढ़ दी है कहीं न कहीं उसी गढ़े के विकसित रूप की जद में महिलाएं आन्दोलनकारी और प्रगतिशील होने का भ्रम भी पाले हुए हैं. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना इसी तरह की लड़ाई में फंसे होने से बचाव की बात करते हैं. वे कहते हैं कि हम नकली और फर्जी लडाई में उलझा दिए गए लोग हैं. जहाँ गले की घुटती आवाज को ही हम सुर मान लेते हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि भारतीय स्त्री-विमर्शकारों ने लगभग मसौदों पर सुर और घुटन में फ़र्क करना मुनासिब नहीं समझा.

क्या फेसबुक पर ‘नेचुरल सेल्फी’ एक आंदोलन है ? | Is ‘Natural Selfie’ a Movement on Facebook?

फेसबुक पर ‘नेचुरल सेल्फी’ को आन्दोलन समझने वाली महिलाओं की प्रगतिशीलता की तुलना गाँव की ‘वह तोड़ती पत्थर’ से कर दिया जाए तो क्या होगा? या पुरुष सत्ताओं के खिलाफ खड़ी उन महिलाओं से कर दी जाए जिनके चेहरे पर एसिड झोंककर उनकी पहचान को मिटाने की कोशिश की गई, तब क्या होगा? क्या एसिड अटैक की शिकार महिलाओं ने अपनी तस्वीर को कभी छुपाने की कोशिश की? क्या फेसबुक से लेकर जंतर-मंतर तक की सभाओं में उन्होंने चेहरे को ढककर प्रतिवाद किया? नहीं. उन्होंने खुले रूप में इस चुनौती को स्वीकारा. इसलिए उनकी प्रगतिशीलता और उनके कार्यों को आन्दोलनकारी समझने पर अधिक जोर देने की जरुरत है.

जो लेखक-लेखिकाएं फेसबुक पर फोटोबाजी से बाजार का विरोध तार्किक मानती हैं उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि जिस स्त्रीवादी विमर्श के तहत आप इसे आधी दुनियां का संघर्ष मानती हैं क्या उस आधी दुनिया के संघर्ष में एसिड अटैक से प्रभावित लडकियां नहीं आती हैं? क्या महिला किसानों की आतम-हत्या आपको प्रभावित नहीं करती हैं? क्या मजदुर महिलाओं की समस्या आपके विमर्श में जगह नहीं बना पाती हैं? और यदि ऐसा नहीं है तो क्या कारण है कि आपकी कलाओं में साहित्य में इन विषयों पर एक भी सशक्त रचनाएँ नहीं देखने को मिलती है?

वर्तमान में पलास विश्वास, कर्मेंदु शिशिर, जगदीश्वर चतुर्वेदी जैसे लोगों में यदि ऐसे साहित्य को ख़ारिज करने पर बहस चल रही है जो हमारे जनपदों की समस्या से कोसों दूरी बनाए हुए है तब क्या स्त्री-लेखिकाओं से यह प्रश्न करना जायज नहीं हो जाता है? हमें ऐसे साहित्य और कला या प्रतिरोध के तरीकों की क्या आवश्यकता है जो जमीनी हकीकत से कोसों दूर है. क्या आज कार्टून और उस पेंटिंग में फ़र्क करना गलत है जो पेंटिंग अपनी रूमानियत में खोये बौराए अमीरों के सट्टा बाजार और अमीरियत के नुमाइश का मात्र अखाड़ा बना दिया गया है. कला, साहित्य और प्रतिरोध यदि नव-उपनिवेशवादी चादर ओढ़े हमारे सामने हमें भटका रहा हो तब हमें इसकी समझ और प्रतिवाद के स्वरूप दोनों को विकसित तो करना ही होगा.

स्त्रीवादी लेखिकाओं की सबसे बड़ी दिक्कत क्या है ? | What is the biggest problem of feminist writers?

स्त्रीवादी लेखिकाओं की सबसे बड़ी दिक्कत रही है कि यह विश्वविद्यालयी नाटक बनकर रह गया है जहाँ एक ओर इसने कर्मठ और श्रमशील महिलाओं को ठीक उसी तरह से ख़ारिज करने का कार्य किया जैसा कि कुछ वर्ष पहले ‘हंस’ के मंच से स्त्री और दलित स्त्री के विषय पर स्त्रियों को दलितों के साथ जोड़े जाने के विरोध में गढ़े गए अलगाववादी तर्क बनाए गए तो दूसरी ओर यह धीरे-धीरे समाज के वर्तमान समस्याओं की परिधि से दूर होता गया. यही कारण है कि हमारे समाज में असहिष्णुता के इस भयंकर दौर में जहाँ कई अख़लाक़ मौत के घाट उतार दिए गए, कई नजीब गायब कर दिए गए, कई जुनैदों को मारकर कहा गया कि यह देश तुम्हारा नहीं है, किसानों के सीने में सरकारी गोलियां भर दी गई वहां इस माहौल में नेचुरल सेल्फी की क्रांति परवान चढ़ना चाहती है, यह परवान समझ पाना मुश्किल है.

यह एक आइडेंटिटी क्राईसिस का मसला भर रह गया है. बाजार के विरोध की यह सतही समझदारी लेकर हमारी लेखिकाएं पता नहीं किस दुनिया की क्रांति कर रही हैं यह समझ से परे है. वंदना राग, प्रज्ञा रोहिणी, अंजू शर्मा, कविता, गीता श्री जैसी लेखिकाओं की जिम्मेदारी उनकी रचनात्मकता में एक स्तर तक होने के बावजूद सेल्फी की दुनिया से इत्तर वर्तमान समस्याओं की विविधताओं की पहचान में भी होनी चाहिए थी. यदि ऐसा नहीं हुआ तो फिर हम साहित्य और कलाओं की प्रशंसा संगोष्ठियों तक ही सीमित कर देंगे. हमारी समस्याओं को रेखांकित करता हमारे साथ यदि हमारा साहित्य ही नहीं रहेगा तब हम कौन सी सृजनात्मक दुनिया का सपना देख सकेंगे?

गाँव और छोटे-छोटे कस्बों को यदि छोड़ भी दिया जाए तो क्या शोभा, शहला राशिद, अंजलि, कोपल, रेणु, प्रीति जैसी सैंकड़ों लड़कियां दिल्ली की सड़कों पर कड़ी धूप में झुलसती हुई, पसीने से लथपथ पेंप्लेट और पर्चे बांटती क्यों नजर नहीं आती है? क्या उनकी सुंदरता फेसबुक सेल्फी लेखिकाओं को नेचुरल नजर नहीं आती है? लक्ष्मी के उस बच्चे में जो सुन्दरता की पहचान है जो अपनी माँ पर एसिड अटैक के कारण जले हुए मुंह से चिपका रहता है, चाटता रहता है, हटाने पर भी हटता नहीं है, उसके सुन्दरता की समझ पर कौन सी सेल्फी की जरुरत है.

कहने की आवश्यकता नहीं कि यह दौर सेल्फी-सेल्फी खेल कर क्रांति करने का नहीं है. कठोर शब्दों में कहा जाए तो ये लेखिकाएं उन संघर्ष-शील लड़कियों-महिलाओं के संघर्ष को एक तरह से कमजोर करने का कार्य ही कर रही हैं जो वास्तव में समाज के वर्तमान टूटन को पहचानती हैं और इसके प्रतिरोध में संघर्षशील हैं. बाजार का विरोध बाजार द्वारा हाथ में पकड़ाए गए मोबाइल की सेल्फी (mobile selfie) से संभव नहीं है.

संजीव ‘मजदूर’ झा.