हम जैसे पत्रकारों के लिए यही उचित है कि चुनाव यदि युद्ध है तो वर्तमान सत्ता के विरुद्ध न लिखें

Lalit Surjan ललित सुरजन। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व साहित्यकार हैं। देशबन्धु के प्रधान संपादक

हम जैसे पत्रकारों के लिए यही उचित है कि चुनाव यदि युद्ध है तो वर्तमान सत्ता के विरुद्ध न लिखें

ललित सुरजन

आसन्न विधानसभा चुनावों के संदर्भ में अन्यत्र प्रकाशित इस टिप्पणी का जायजा लीजिए-

”इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले कांग्रेस पार्टी की साख दांव पर लगी है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस प्रतिपक्ष में है। यहां उसे अपनी ताकत सिद्ध करना होगी, अगर वह नहीं जीत पाती है तो उसके सितारे गर्दिश में चले जाएंगे। अगर इन राज्यों में भाजपा हारती है तो भी उसे कोई नुकसान नहीं होगा। 2019 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व के सामने कोई चुनौती नहीं होगी।”

देश के एक प्रमुख अंग्रेजी समाचारपत्र में एक वरिष्ठ महिला पत्रकार ने विधानसभा चुनावों को लेकर लगभग इन्हीं शब्दों में अपनी राय व्यक्त की है। यह शब्दश: अनुवाद नहीं है, लेकिन लेख की भावना यही है। मैंने विगत एक सप्ताह में इस टिप्पणी का सिर-पैर खोजने की खूब कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाया।

हैरान नहीं हूं दिल्ली में बैठे पत्रकारों के विश्लेषण देखकर

जो बात कुछ-कुछ पल्ले पड़ती है, वह बस इतनी ही कि विद्वान पत्रकार ने मोदीजी को पहले से क्लीन चिट दे दी है। कांग्रेस अगर जीते तो यह उसकी किस्मत पर उसका आगामी आम चुनावों में कोई असर नहीं पड़ेगा। यदि कांग्रेस हार जाए तो यह उसके नेतृत्व की विफलता होगी।

मुझे दिल्ली में बैठे पत्रकारों द्वारा इस तरह से किए जा रहे विश्लेषणों को देखकर हैरान होना चाहिए लेकिन मैं हैरान नहीं हूं। आखिरकार बिहार में अपनी करारी हार को भारतीय जनता पार्टी ने दो साल बीतते न बीतते विजय में बदल लिया। गोवा में स्पष्ट रूप से हारने के बावजूद वहां भाजपा की सरकार बन गई और बच भी गई। गुजरात में पिछले पच्चीस साल में सबसे कम अंतर से जीतने के बावजूद भाजपा के तेवरों में कमी नहीं आई। कर्नाटक में पराजय का सामना करना पड़ा। और हां, सबसे पहले तो दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने शिकस्त दी।

इन सबसे अविचलित रहकर भाजपा की यात्रा कुछ इस तरह से चल रही है मानो भीड़ भरी तंग सड़क पर कोई बाइक सवार आजू-बाजू से किसी न किसी उपाय से पतली गली खोजकर दूसरों को पीछे छोड़ अपनी बाइक आगे निकाल ले जाए। इस दु:साहस के चलते किसी का सिर फूटे, किसी की गाड़ी टकराए, किसी पैदल को चोट आए तो उसकी बला से। हम तो आगे निकल गए।

राजनीति व्यक्ति केन्द्रित हो चुकी है Person-centered politics

यह हम अपने अनुभव से जानते हैं कि सत्ताधीशों को जो पसंद न आए, वह बात नहीं लिखना चाहिए। राजनीति विचार केन्द्रित न होकर व्यक्ति केन्द्रित हो चुकी है। मैं इस बात को बार-बार दोहराता हूं यद्यपि इसका कोई लाभ नहीं है। आज की राजनीति में सत्ता पा लेना ही सर्वोपरि है और उसमें नेताओं की आलोचना करने के अलावा बाकी सब जायज है। अक्सर अंग्रेजी कहावत का हवाला दिया जाता है कि प्रेम और युद्ध में सब कुछ जायज है। पूछना चाहिए एकतरफा प्रेम या महज आकर्षण में जो कुछ किया जाता है क्या वह भी जायज है? फिर प्त मीटू जैसी धारणा क्यों जन्म लेती है? पूछना यह भी चाहिए कि क्या चुनावों की तुलना युद्ध से करना सही है? मीडिया ने तो शायद ऐसा ही मान रखा है।

टीआरपी बढ़ाने के लिए रणक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, महासंग्राम, रणभेरी

रणक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, महासंग्राम, रणभेरी जैसी संज्ञाओं का प्रयोग होता है फिर भले ही उसका मकसद टीआरपी बढ़ाना क्यों न हो। ध्यान दीजिए कि क्रिकेट के खेल में भी इसी शब्दावली का प्रयोग किया जाता है। अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि पत्रकारों के सामने भाषा का संकट है। वे नहीं जानते कि कैसे विषय के अनुकूल भाषा का निर्माण और शब्दों का प्रयोग करें।

पृथ्वीराज चौहान के पास चंदबरदाई थे नेताओं के दरबार में पत्रकार हैं

खैर! जब चुनावों की तुलना युद्ध से करते हैं तो हमारे सोचने का नजरिया भी बदल जाता है। आज के सत्तालोलुप नेताओं को यह स्थिति बहुत रास आती है। उन्हें विरुदावलि गाने वालों की जरूरत पड़ती है। पृथ्वीराज चौहान के पास चंदबरदाई थे जिन्हें हिन्दी साहित्य के वीरगाथा काल का प्रथम महाकवि माना जाता है। इस इक्कीसवीं सदी में जनता के वोटों से विजित या पराजित नेताओं के दरबार में सामंतकालीन कवियों का स्थान पत्रकारों ने ले लिया है। उनमें से जो महाकवि बनने की योग्यता हासिल कर लेते हैं उन्हें या तो राज्यसभा में जगह मिल जाती है या फिर वे किसी नवरत्न कंपनी के डायरेक्टर, एडवाइजर वगैरह भी बन सकते हैं। जो नेता जितना बड़ा, उसके द्वारा दी गई मोतियों की लड़ी भी उतनी ही महंगी। जो इतने ऊंचे नहीं पहुंच पाते वे अपनी-अपनी काबिलियत के मुताबिक  इनाम, इकरार पा जाते हैं। जिन्हें ड्योढ़ी चढ़ना कबूल नहीं है, वे अपने घर में बैठे रहते हैं; सोशल मीडिया पर टिप्पणियां लिखकर अपने मन का गुबार हल्का कर लेते हैं। गो कि खतरा वहां भी कम नहीं है। जब युद्ध चल रहा है तो फिर जो हमारे साथ नहीं हैं वह हमारा दुश्मन ही तो कहलाएगा! रावण के दरबार से सगे भाई विभीषण को भी निकलना पड़ा था, फिर बाकी की तो बिसात ही क्या?

बहरहाल अभी जो चुनाव होने जा रहे हैं उनके परिप्रेक्ष्य में मुझे रामायण का कम, महाभारत का ज्यादा ध्यान आ रहा है। रामायण में मोटे तौर पर राम और रावण दोनों के पक्षों का विभाजन लगभग स्पष्ट था। जबकि महाभारत में शुरू से बोलचाल की भाषा में कहूं तो भारी कन्फ्यूजन था। पहले तो अर्जुन ही रणक्षेत्र में उतरने को तैयार नहीं थे; फिर कृष्ण एक तरफ और उनकी सेना दूसरी तरफ; मद्र देश से नकुल-सहदेव के मामा शल्य भांजों की मदद के लिए आ रहे थे तो दुर्योधन ने उन्हें रास्ते में ही छेंककर अपने पक्ष में लड़ने का वचन ले लिया, उसके आगे का किस्सा शल्य-कर्ण संवाद में है; भीष्म पितामह लड़ रहे थे कौरवों की तरफ से, लेकिन अंत समय में उपदेश सुनाने का पल आया तो वहां अर्जुन उपस्थित थे। आजकल के चुनावों में इसी तरह के दृश्य देखने मिलते हैं।

2014 के लोकसभा चुनावों के ऐन वक्त पर कांग्रेस के कितने ही धुरंधर नेता भाजपा में चले गए थे। गोवा विधानसभा चुनावों में भी वही हुआ, मेघालय में भी, और तेलंगाना की कहानी क्या कम रोचक है। मैं छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बैठकर अपने आसपास देखता हूं तो समझ नहीं आता कि क्या हो रहा है। मैं अपनी ही बात क्या करूं, हमारे प्रदेश के मतदाता भी उलझन में हैं कि माजरा क्या है? फिल्म ”जाने भी दो यारो” का वह दृश्य मुझे याद आता है जब चलते नाटक के बीच अफरातफरी मच जाती है और नेत्रहीन पात्र बार-बार पूछता है- कोई बताएगा मुझे क्या हो रहा है? मैं अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए कुछ बिन्दु सामने रखना चाहता हूं जो विभिन्न वर्गों के लोगों से चर्चा करने के बाद समझ पड़े हैं-

1.     मतदाता चाहता है कि रमन सिंह मुख्यमंत्री बने रहें, लेकिन भारतीय जनता पार्टी चुनाव हार जाए। पन्द्रह साल के राज से जनता थक गई है।

2.     कांग्रेस चुनाव जीत जाए, लेकिन मुख्यमंत्री कौन हो, यह किसी को समझ में नहीं आ रहा है। विद्वान, विश्लेषक कहते हैं कि कांग्रेस के पास रमन सिंह के मुकाबले में कोई चेहरा नहीं है। लेकिन क्या 2003 में भाजपा के पास अजीत जोगी के मुकाबले कोई चेहरा था?

3.    ‘आप’ पार्टी किस इरादे से मैदान में उतरी है और उसके रहने से किसे लाभ होगा? युवा ‘आप’ नेता संकेत ठाकुर की हालिया जेल यात्रा के पीछे भी क्या कोई योजना थी?

4.     अजीत जोगी किसके लिए लड़ रहे हैं? खुद के लिए, परिवार के सदस्यों के लिए, कांग्रेस के बुनियादी मूल्यों को बचाने के लिए या भाजपा की मदद करने के लिए?

5.     जोगी कांग्रेस और बसपा का गठबंधन किन शर्तों पर हुआ है और किसकी प्रेरणा या दबाव से हुआ है?

6.     जोगी कांग्रेस और सीपीआई के गठजोड़ की क्या उपयोगिता है? सीपीआई के सैकड़ों कार्यकर्ता जिस पुलिस अधिकारी के हाथों प्रताड़ित हुए वह तो जोगीजी के लिए पुत्रवत था। फिर क्या हुआ?

7.     रामदयाल उइके को कैसे प्रेरणा मिली कि उन्हें घर वापिस आ जाना चाहिए?

8.     एक बात जो लोग खुलकर कह रहे हैं कि भाजपा पानी की तरह पैसे बहाएगी जबकि कांग्रेस के सामने अर्थ संकट है। इस कॉलम के छपने तक प्रथम चरण के चुनाव के टिकट शायद घोषित हो जाएंगे लेकिन इन सवालों के जवाब इतने जल्दी नहीं मिलेंगे। इसलिए हम जैसे पत्रकारों के लिए यही उचित है कि चुनाव यदि युद्ध है तो वर्तमान सत्ता के विरुद्ध न लिखें। मतदाता जिस दिन निर्णय कर देगा उस दिन हम भी निश्चिंत होकर विश्लेषण करेंगे।

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About the Author

ललित सुरजन
ललित सुरजन रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत के एक पत्रकार और संपादक थे। वह देशबंधु के प्रधान संपादक थे। देशबंधु देश का एक ख्यातिप्राप्त अखबार है, जिसमें स्वर्गीय ललित सुरजन की काफी लंबे समय तक संपादकीय पारी रही है । वह ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी भूमिका देश में पत्रकारिता की दशा और दिशा बदलने में रही है। ललित सुरजन जाने माने संपादक होने के साथ साथ लेखक, साहित्यकार और चिंतक रहे हैं। वह साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सद्भाव व विश्व शांति से सम्बंधित मुद्दों पर हमेशा बेबाक राय रखते थे। जन्म की तारीख और समय: 1946 मृत्यु की जगह और तारीख: 2 दिसंबर 2020 किताबें: तुम कहाँ हो जॉनी वाकर : भारतीय मीडिया पर कुछ बेबाक टिप्पणियाँ, ज़्यादा