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दलितों का स्वतंत्रता आन्दोलन शुरू होता है अब …

वीरेन्द्र जैन

देश की अंग्रेजों से स्वतंत्रता चाहने वाले दूसरे लोगों की तरह स्वतंत्रता आन्दोलन में अम्बेडकर अंग्रेजों से तुरंत आज़ादी के पक्षधर इसलिए नहीं थे क्योंकि उस मांग में दलितों को सवर्णों की गुलामी से मुक्ति पाने की स्पष्टता नहीं थी। उनका सही सवाल था कि यह आज़ादी किसको मिलेगी? जब तक देश में जातिभेद है तब तक जिनके हाथों में सत्ता आयेगी वे दलितों को समान नागरिक का दर्जा भले ही दे दें पर समाज में बराबरी की हैसियत हासिल नहीं करने देंगे। दूसरी ओर सामंती समाज में गाँधीजी अछूत उद्धार के कार्यक्रम इतनी सावधानी से चला रहे थे ताकि स्वतंत्रता आन्दोलन में समाज की एकता बनी रहे। वे चाहते थे कि अम्बेडकर द्वारा समर्थित अंग्रेजों द्वारा जातिवाद की विसंगति को उभारने वाला अलग निर्वाचन क्षेत्र का कानून लागू न हो।

जैसा कि प्रचारित किया जाता है, उसके विपरीत महात्मा गाँधी ने अनशन के हथियार का प्रयोग अंग्रेजों के खिलाफ नहीं किया था अपितु अपने लोगों के मानस को बदलने के लिए ही किया था। ऐसा ही एक अनशन उन्होंने यरवदा जेल में रहते हुए अम्बेडकर की दलितों के अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग के खिलाफ किया था। असहमत होते हुए भी अम्बेडकर ने देश भर के राष्ट्रीय नेताओं के आग्रह पर यह मांग इसलिए वापिस ले ली थी क्योंकि वे गाँधीजी के जीवन को महत्वपूर्ण मानते थे। इसे इतिहास में पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है।

26 सितंबर 1932 को गांधी जी ने, कवि रवींद्रनाथ ठाकुर तथा अन्य मित्रों की उपस्थिति में संतरे का रस लेकर अनशन समाप्त कर दिया था। इस अवसर पर भावविह्वल कवि ठाकुर ने स्वरचित "जीवन जखन शुकाये जाय, करुणा धाराय एशो" यह गीत गाया।

गांधी जी ने अनशन समाप्त करते हुए जो वक्तव्य प्रकाशनार्थ दिया, उसमें उन्होंने यह आशा प्रकट की कि, "अब मेरी ही नहीं, किंतु सैकड़ों हजारों समाजसंशोधकों की यह जिम्मेदारी बहुत अधिक बढ़ गई है कि जब तक अस्पृश्यता का उन्मूलन नहीं हो जाता, इस कलंक से हिंदू धर्म को मुक्त नहीं कर लिया जाता, तब तक कोई चैन से बैठ नहीं सकता। यह न मान लिया जाए कि संकट टल गया। सच्ची कसौटी के दिन तो अब आनेवाले हैं।"   

समाज का पीड़ित पक्ष संगठन में कमजोर और बिखरा हुआ भी होता है और ज्यादातर अवसरों पर वह अपनी लड़ाई लड़ने की हिम्मत, संसाधन और रणनीति भी खुद नहीं बना पाता, जबकि उत्पीड़क पक्ष अधिक साहसी साधन सम्पन्न और तर्क सम्पन्न होता है, उसे परम्परा का बल मिला होता है। यही कारण है कि पीड़ित पक्ष के बहुत सारे आन्दोलनों की भूमिका उनसे सहानिभूति रखने वाले भिन्न पक्ष ने लिखी होती है। दलितों के मसीहा अम्बेडकर की प्रतिभा को निखारने में मदद करते हुए उनकी वैचारिक स्वतंत्रता बनाये रखने में बड़ोदा के महाराज सियाजीराव गायकवाड़ की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।



आज़ादी के बाद लिखे संविधान में दलितों के उत्थान के लिए जो आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी उसने जातिवाद के उन्मूलन में तो वांछित भूमिका नहीं निभा पायी किंतु सत्तर सालों में इतना चेतना सम्पन्न अवश्य  कर दिया कि वे अब अपने समान मानवीय अधिकारों की बात सोच सकते हैं। प्रारम्भ में जब उन्हें आरक्षण मिला तब शिक्षा में प्रवेश व नौकरी आदि के लिए प्राथमिक योग्यता की अनिवार्ताएं वही रहीं जिन्हें प्राप्त करने का अवसर ही उनके समाज को नहीं मिला था, इसलिए योग्य उम्मीदवार के न मिलने को आधार बना कर रिक्त स्थानों को सवर्ण अधिकारियों ने गैरआरक्षित वर्ग से भर लिया। बहुत बाद में यह व्यवस्था आयी कि आरक्षित पदों को तब तक खाली रखा जायेगा जब तक कि उसी वर्ग में से वांछित योग्यता वाले उम्मीदवार नहीं मिल जाते। संसद और विधानसभाओं में भी बहुत सारी आरक्षित सीटों पर पूर्व राजा महाराजा या सवर्ण नेताओं के आरक्षित वर्ग के सेवकों को भेजा जाता रहा। सदन की कार्यवाही की रिपोर्टें बताती हैं कि सदन की बहस में उनको कितने कम अवसर मिल सके हैं। आज़ादी के तीस-चालीस साल बाद जब साधन हीन दलितों की पहली शिक्षित पीढी सामने आयी उसी समय से आरक्षण का सक्रिय विरोध भी शुरू हो गया।

आरक्षण ने सभी कार्यालयों में निश्चित संख्या में आरक्षित वर्ग की उपस्तिथि तय करने का प्रारम्भिक काम किया। सवर्णों के वर्चस्व वाले इन कार्यालयों में आरक्षित वर्ग से आये कर्मचारियों के साथ जो नफरत और उपेक्षा बरती गयी उससे पीड़ित लोगों की आवाज बन कर कांसीराम उभरे। वे इसलिए आगे बढ सके क्योंकि एक निश्चित स्थान पर निश्चित संख्या में थोड़ा पढा लिखा, पीड़ित वर्ग उपलब्ध था जिसके साथ संवाद किया जा सकता था और उसका सहयोग लिया जा सकता था। इसमें मिली सफलता के बाद ही वे बामसेफ, डीएसफोर से गुजरते हुए बहुजन समाज पार्टी के गठन तक पहुँचे और जब तक यह पार्टी भटक नहीं गयी तब तक दलितों के आन्दोलन की बड़ी संस्था बनी रही। वंचित वर्ग के भटकने और चकाचौंध में दृष्टि खो देने की सम्भावनाएं भी अधिक रहती हैं। मायावती के बाद उदितराज और रामदास अठावले आदि की भटकनें इसका उदाहरण हैं। 

पिछले दिनों दलितों के शिक्षित और नाराज युवकों की जो पीढ़ी सामने आयी है वह दलितों की आज़ादी का एक नया इतिहास लिखने जा रही है। वे जानते हैं कि उनके वर्ग के लोग प्रत्येक कार्यालय, संसद, विधान सभा व शिक्षण संस्थानों में हैं। जे एन यू और हैदराबाद विश्वविद्यालय में उनके छात्र संगठन का उभार हो या गुजरात में जिग्नेश व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चन्द्रशेखर उर्फ रावण की भीम सेना का उभार हो, वे अपने अधिकारों को कटोरा लेकर नहीं मांग रहे अपितु टेबिल ठोक कर लेना चाह रहे हैं। गुजरात, आन्ध्रप्रदेश, उत्तरप्रदेश, तामिलनाडु, महाराष्ट्र, आदि स्थानों पर वे टकराव की स्थिति में हैं तथा दूसरे अन्य स्थानों में भी वे पीछे नहीं हैं। वे बार बार विभिन्न स्थानों पर धर्म बदल कर चुनौती दे रहे हैं, और भाजपा कानून का समरण कराने का साहस भी नहीं दिखा पा रही।।

भाजपा ने उनकी चुनौती को समझा है इसलिए वह दो तरह की रणनीतियों पर काम कर रही है एक ओर तो वह दलित नेतृत्व को पदासीन कर रही है जैसे कि राष्ट्रपति पद पर श्री रामनाथ कोविन्द को बैठाना, दूसरी ओर वह आदिवासियों को दलितों से दूर करने के लिए उन्हें विशेष महत्व दे रही है। पिछले दिनों मध्यप्रदेश में एक आदिवासी महिला को राज्यसभा में भेजा गया है। वे आरक्षण को खतरे की तरह चित्रित कर रहे हैं और सवर्णों की बेरोजगारी को आरक्षण से जोड़ कर उन्हें भड़काकर अपना सवर्ण वोट बैंक मजबूत करने में लगे हैं। आरएसएस प्रमुख ने चुनावों से पहले आरक्षण की समीक्षा का बयान दे कर सवर्णों को सांत्वना दी थी। भाजपा के पास जुटाये हुए दलित नेता तो हैं किंतु स्वाभाविक रूप से उभरा दलित नेतृत्व नहीं है। यह हो भी नहीं सकता क्योंकि उनके हिन्दुत्व का स्वरूप दलितों को डराता है। मृत जानवरों के चमड़े का काम करने वाला दलित भयभीत है और अपना धन्धा चौपट हो जाने के कारण गुस्से में है।

आगामी गुजरात चुनाव में इसका परिणाम दिखाई देगा।

 

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