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Sushma Swaraj Paying respect to the Father of the Nation

सुषमा जी, युद्धोन्माद मुक्ति के लिए हिमालय का आपको धन्यवाद

विडंबना यह कि भारत के प्रधानमंत्री तो जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा के चरण चिन्हों का अनुसरण कर रहे थे। मीडिया जो चाहता है, वे वही कहते हैं।

पलाश विश्वास

संदर्भ प्रसंग समवेत : India and China have resolved the stand off at the Ladakh border, External Affairs Minister Sushma Swaraj said on Thursday.

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा है कि भारत और चीन ने लद्दाख सीमा पर चल रहे गतिरोध का समाधान कर लिया है और सैनिकों की वापसी शुक्रवार से शुरू हो कर 30 सितंबर तक पूरी हो जाएगी। सुषमा ने इस मुद्दे के समाधान को एक ‘बड़ी उपलब्धि’ बताया।

चीन के विदेश मंत्री से मिलने के बाद सुषमा स्वराज ने कहा कि 30 सितंबर तक चीनी सेना लद्दाख से हट जाएगी।

सुषमा स्वराज ने कहा,

‘मुझे यह बताते हुए खुशी है कि दोनों देश ने बातचीत करके बॉर्डर विवाद को सुलझा लिया है।’

गौरतलब है कि सुषमा स्वराज ने गुरुवार को चीनी विदेश मंत्री वांग यी से यूएन में मुलाकात की।

सत्तर में छात्र युवा आंदोलनों की सुनामी के हिस्सेदार हम लोग भी थे। 1977 में जब पहली बार हरियाणा से चुनाव जीती थीं सुषमा स्वराज आपातकाल अंते कांग्रेस की आज से बड़ी हार के वक्त, उस वक्त बड़े परदे पर स्वयं स्वप्न सुंदरी छायी हुई थीं, जो अब संसदीय छटा हैं। उस वक्त भी सुषमाजी बहुत सुंदर लगती थीं।

स्मृति विपर्यय के बावजूद उनकी वह सुंदरता अब भी भूले नहीं हैं हम लोग। स्वप्न सुंदरी अब भी सपनों की तरह हैं, लेकिन सुषमा उसी तरह जमीन से खिली गुलाब जैसी हैं अब भी। अब भी वह सुंदर हैं।

संघ परिवार को कभी न कभी अफसोस करना ही होगा कि इतनी सुन्दर सारस्वत कन्या को उनने भारत की प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया।

संघ परिवार को हो न हो, हम जैसे लोगों को इसका अफसोस होना ही चाहिए। पुरुष वर्चस्व की राजनीति में जो भी महिला राजनीति में हैं, हमें उन्हें तब तक समर्थन देते रहन चाहिए, जब तक वे इसकी योग्य हैं।

हम यूं अचानक सुषमा वंदना नहीं कर रहे हैं।

मोदी महाराज के अमेरिका फलाहार पर्व पर निकल जाने के बाद सुषमा का अवतरण बतौर विदेश मंत्री पूर्ण सुषमित है और उस सुषमा का करिश्मा यह जो भारत चीन द्विपाक्षिक संबंध युद्धोन्मादी वक्तव्य प्रति वक्तव्य के तिलिस्म में फंसा हुआ था, हिमालयी धुंध साफ हो जाने से वह हिमपात के बाद खिल खिली धूप है।

सीमा पर अब कोई तनाव नहीं है और भारतीय और चीनी सेनाएं यथास्थान हैं।

काल्पनिक अंग्रेजी मैकमोहन रेखा भी यथास्थान है वैसी ही जैसे कश्मीर घाटी में कहर बरपा रही झेलम नदी अब फिर अपनी धार में बहने लगी है।

याद करें कि हमने लिखा था कि भारत के प्रधानमंत्री को मीडिया की खबरों से प्रभावित नहीं होना चाहिए।

कभी नरेंद्र मोदी से हम मुखातिब हो सकें तो उनसे यही निवेदन करुंगा कि चाहे मैं भी क्यों न हूं या कोई और महान से महानतम, उनके उच्च विचारों को पढ़ें सुनें जरूर, लेकिन बिना पार्टीबद्ध हुए आप बतौर भारतीय लोक गणराज्य के संप्रभु प्रधानमंत्री अपने विवेक से राष्ट्रहित में जो सही लगे, वह करते रहिए।

इतिहास न टीवी चैनल है और न कोई अखबार का पन्ना।

कार्य जैसा भी हो, उसका परिणाम निर्णायक होता है, सकारात्मक भी और नकारात्मक भी।

मीडिया खबरों के चलते पंडित जवाहर लाल नेहरू संसद से चीनी फौजों को खदेड़ने का ऐलान कर 1962 की रणभेरी बजा दी तो सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ भारतीय राजनयिक प्रधामंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की राजनय भी कारगिल के मुकाबले छोटी रह गयी।

लोकसभा चुनाव से दस दिगंते नरेंद्र भाई मोदी की जो जय-जयकार है, उनसे रीढ़ की हड्डी और दिलो दिमाग के समुचित समन्वय से राजनीतिक समीकरण और वोट बैंक राजनीति के धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद से ऊपर उठकर एशिया का नया सहअस्तित्व इतिहास रचने का थोड़ी सी उम्मीद जरूर थी।

विडंबना यह कि भारत के प्रधानमंत्री तो जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा के चरण चिन्हों का अनुसरण कर रहे थे। मीडिया जो चाहता था वे वही कहते हैं।

कम से कम किसी स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र के प्रधानमंत्री को मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था में मीडिया का भोंपू नहीं होना चाहिए।

भारतीय शास्त्रों और मिथकों के मुताबिक इंफार्मेशन टेक्नलाजी के बिना ढेकुली सवार कालातीत एक महान पत्रकार हुआ करते थे, नारद मुनि। इंद्र को वे उंगलियों मं नचाते थे। स्वर्ग के देवताओं देवियों को जब चाहे तब नचाकर रखते थे। देवासुर संग्राम के वे महान रचनाकार थे। अब हमें नहीं मालूम है कि उन्हें पत्र पुष्पम देने का कोई रिवाज ता या नहीं। शास्त्रों में ऐसा उल्लेख नहीं है। विष्णु भगवान शास्त्रमते स्वर्ग राज्य के कुलाधिपति या राष्ट्रपति हैसियत के सर्वोच्च प्रथम नागरिक प्रतीत होते हैं।

शंकर भगवान को तांडव कराने वाले, त्रिकालदर्शी ब्रह्मा की दाढ़ी नोंचने वाले इन नारद महाराज जब-तब विष्णु भगवान की दरबार में प्रगट हो जाने की कथा ही पुराण कथा का सूत्रधार है। लेकिन बुरबक बनाइंग के अपने कलाकौशल से वे विष्णु भगवान तो मात दे पायें हों, हमने कहीं ऐसा पढ़ा नहीं है।

बेहतर होता कि भगवान कृष्ण जन्म जन्मांतर के कर्मफल के अलावा मीडिया के बारे में भी कुछ भागवत कथा और गीतोपदेश देते तो अपने मनुस्मृति शासन में नरेंद्र भाई मोदी इतने मीडियाये न होते और मीडिया भी इतना मोदियाया न होता।

सुषमा जी आप अब भी उतनी ही सुंदर हैं और उतनी ही कुशल राजनेता। हम संघ परिवार के प्रबल विरोधी हुए तो क्या भारत के नागरिक तो हैं और बतौर नागरिक आपका धन्यवाद कि हिमालय को एक और युद्दोन्माद से इस देश के प्रधानमंत्री ने नहीं, बल्कि विदेश मंत्री ने बचाया जिन्हें अब तक कोई मौका ही नहीं दिया गया और सार्वजनिक तौर पर बतौर विदेश मंत्री आपने उल्लेखनीय काम किया है,जिसका नोटिस लिया जाना चाहिए।

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About Palash Biswas

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए "जनसत्ता" कोलकाता से अवकाशप्राप्त। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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