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india's daughter documentary review

इंडियाज़ डॉटर – पोर्न, स्त्री और अपराध बाज़ार में सबसे ज्यादा बिकने वाला माल साबित हुआ

इंडियाज़ डॉटर-सेक्स, वोईलेंस और वुमेन : बाज़ार का सबसे ज्यादा बिकाऊ माल” की दूसरी कड़ी

Second episode of “India’s Daughter-Sex, Violence and Women: Market’s Most Selling Merchandise”

India’s daughter documentary review

दरअसल ये बाज़ार उन मुल्कों में अपनी घुसपैठ कर चुके हैं जहां तमाम तरह की पारम्परिक बंदिशें, रिवाज, समाज के काएदे कानून सदियों से लागू हैं। लोकतांत्रिक समाज में जबरन लोगों पर थोपे गये हैं। ऐसे मुल्कों में कानून और राजनीतिक व्यवस्था सबसे अधिक लचर और असमानता पर आधारित है। तीसरे दर्जे के देशों की गणना में शुमार मुल्क इस कारोबार को अपने मुताबिक़ कई तरह के मुनाफे की चरम ऊंचाई तक ले जा रहे हैं। जबकि विकसित मुल्क इन उत्पादों को आर्थिक आधार मजबूत करने के लिए, बिजनेस में मुनाफे के लिए इस्तेमाल कर रहा है।

हर देश का मीडिया इन उत्पादों को सबसे ज्यादा प्रभावी बनाने की खातिर नये-नये विचार और माडल बना रहा है। एक चस्क, एक चाहत और एक आकर्षण लगातार इन उत्पादों के बाज़ार में आने के साथ ही लुभावनी प्रस्तुति के जरिये संभव हुआ है।

मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ (Fourth pillar of democracy) दुनिया भर में माना जाता है, इस व्यापार में अपना दायित्व निभाने का दावा करते हुए भी अपने अथाह मुनाफे को कतई नहीं भूलता। ज्यादातर मीडिया हाउस इन विकासशील मुल्कों में अपनी नई पहचान लिए बाज़ार में उतरे हैं।

यह मुनाफ़ा कमाने की हवस ज्यादातर विकासशील मुल्कों में अपनी रीढ़ टिकाये हुए है।

दुनिया के सबसे सस्ते माल और दुनिया की महंगी वस्तुओं के मुकाबले अधिक उत्तेजित करने वाले, इन्द्रिय-सुख देने वाले यह सामान हर आदमी तक पहुँचने की कूबत रखते हैं।

इन सामानों को बनाने वाली मंडियों, कारखानों में जो काम करने वाले दैनिक मजदूर हैं। वो इतने अधिक लाचार मजबूर और निर्धन हैं कि जिन्हें दो वक्त की रोटी भी ठीक से मुहैया नहीं है। और जिन अमीर लोगों ने इस कारोबार में जगह बनाई। उन्हें हर समय सत्ता और सरकार ने सुरक्षित किया। उनकी ताकत को बढाने में जरूरी सहूलियतें दीं। जबकि इस कारोबार के मजदूरों के लिए खतरे उतने ही बड़े और कानूनी की सख्त दंड प्रक्रिया शामिल हैं। ये एक ही लोकतंत्र में दो तबकों के लिए दोहरी नीति ही तो है।

सेक्स औरत और अपराध का व्यापार करने वाले सरकार की नेआमत से अपनी पहचान बनाने में लगे हैं। वह पहले से कहीं अधिक ताकतवर और सुविधाभोगी बनते जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में उनकी इज्जत बढ़ी है। वे किसी भी सीमा द्रोह के बिना यह कारोबार करने के लिए पूरी तरह आज़ाद हैं।

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यह दौर जिसमें तीसरे दर्जे के मुल्क जी रहे हैं, यह उदारीकरण का दौर है, भूमंडलीकरण का दौर है। दुनिया भर की पूंजी के निवेश, आवागमन का दौर है। इस दौर में यदि सबसे ज्यादा तेजी से कुछ बढ़ा है तो वह है बाज़ार।

दुनिया के किसी भी मुल्क में बाज़ार के भीतर वो कौन सी वस्तुएं है जो बाज़ार की नजर में किफायती, उत्तेजक और सबसे ज्यादा मुनाफ़ा देने वाली हो सकती है। इसका सर्वेक्षण करते हुए बाज़ार ने तीन चीजें खोजीं। अश्लीलता (पोर्न), औरत (वीमेन) और (क्राइम) अपराध। ये दुनिया के बाज़ार में सबसे ज्यादा बिकने वाला माल साबित हुआ। इनकी जितनी तेज़ बिक्री किसी भी मुल्क में, किसी भी तबके में हो सकती है अन्य किसी माल से यह मुनाफा कतई मुमकिन नहीं है। इसके लिए कोई पाबंदी और सरकारी नियन्त्रण कतई नहीं है। क्योंकि सरकारें भी अब इस दौर में पूंजीवादी मुल्कों की प्रायोजित बाजारवादी स्पर्धा में खुद को साबित करने में लगी हैं।

यह बाज़ार किस तरह संचालित होता है? क्या इसके लिए नीतियाँ और कानून व्यवस्था पूरी तरह जिम्मेदार है?

इसमें जो आय माल को तैयार करने में बाज़ार के मुताबिक़ लगाई जाती है वो बहुत अधिक जगह और सुविधाओं की मांग नहीं करती है। – इस बिरादरी के बिजनेस हाउस, मुल्क के भीतर मौजूद व्यवस्था और उसके संचालकों का भरपूर सहयोग लेकर इस तैयार माल को किसी भी कीमत पर खरीद-फरोख्त करने के लिए आज़ाद हैं।

उदारीकरण ने इन तीनों उत्पादों को एक बड़े बाज़ार में उतारने का माध्यम खड़ा किया। जिस गति से पोर्न, क्राइम और वीमेन को बेचने खरीदने का सिलसिला शुरू हुआ। उतनी तेजी से कोई बिजनेस अब तक नहीं फैला। हर मुल्क में इन सामानों की मांग पैदा की गई। और ग्राहकों तक पहुँचने का बाज़ार बड़ी मजबूती से गढ़ा गया। यह माल तैयार होता है हर देश में सबसे मजबूत मानी जाने वाली संसदीय और कानूनी  संस्था के सहयोग से फलता फूलता है। और व्यवस्था इस बाज़ार के मुनाफे का मजबूत आधार-स्तम्भ हैं।

अब सेक्स अपराध और औरत की देह को सामान बनाने वाली कम्पनियां और बाज़ार इन सामानों पर लगे सामाजिक राजनीतिक प्रतिबन्ध हटाने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रही है। इन सामानों को बेचने खरीदने के लिए आजादी चाहती हैं। इस तरह की मांग बाजारवादी ताकतें उठाने लगी है।

हमें समझना होगा कि असल में सेक्स अपराध और औरतों का कारोबार करने वाली कंपनियों की गिरफ्त से किस तरह बचा जाय? और इन कारोबारी नेटवर्क से मुक्त होने के लिए किस तरह पहल की जाय?

औरतों की देह की आजादी की बात करने वाले समुदाय बड़ी चतुराई से औरतों को ही उपभोग के लिए उनकी सहमति से या कमजोर तबके की औरतों को जिस्म-फरोशी के कारोबार में ढकेलते हैं। बाज़ार की ताकत से प्रभावित करते हैं। और सेक्स का बाज़ार तैयार करते हैं। नये सिरे से औरतों के प्रति बदलता नजरिया, अपराध की भावना में बढत यहीं से होती है।

एक नये ढाँचे में आदमी किस तरह अपने अस्तित्व को बनाए बचाए रखे, यह समझना बेहद जरूरी है। नये तरह की बदली हुई सामजिक राजनीतिक संरचना एक परेशानी का सबब बनती जा रही है। इसे खत्म करने के लिए परम्परा और आधुनिकता के बीच की गैरबराबरी वाली खाई को पाटना होगा। इसके सिवाय कोई और रास्ता नहीं है। तभी सेक्स अपराध और औरतों की खरीदफरोख्त करने वाले कारोबारीयों और घिनौने बाज़ारतन्त्र से मुक्त हुआ जा सकता है।

इंडियाज़ डाटर जैसी डाक्यूमेंट्री ने इस पूरे मसले पर एक उत्पाद बनाकर समाज के सामने इसे जिस तरह पेश करने का फैसला लिया। यह देखना होगा कि इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी। वे कौन सी वजहें हैं, जिन्हें ध्यान में रखते हुए फिलहाल इसे बेचने की कवायद नहीं की गई है। यदि इस तरह की मांग बढ़ती है तो भविष्य में सेक्स अपराध और औरत को केंद्र में रखकर एक से एक बेहतरीन उत्पाद बाज़ार में बिकने के लिए तैयार खड़े होंगे।

दरअसल यह फिल्म उस बाज़ार का नमूना है जो अपने उत्पाद को उतारने के साथ ही इस तरह की पड़ताल करता है कि कोई माल कितनी तेजी से मानवीय भावना को तुष्ट करने में सफल साबित होता है। यह बाज़ार का माल बेचने के लिए एक साइकोलॉजिकल तरीका है। मगर दूसरी तरफ सरकार का प्रतिबंध केवल इस कारण तो कतई नहीं है कि जो वजह यहाँ बताई जा रही है उसे अम्ल में लाया जा रहा है बल्कि वहां  एक और दबाव लगातार बना हुआ है।

उदारीकरण के बने बनाये ढाँचे में रहकर बदलते हुए बाज़ार का शक्ति-प्रदर्शन के साथ सरकार का टकराव। यह राजनीतिक अस्तित्व का सवाल है। यहाँ भी सरोकार यह नहीं है कि समाज पर इसका क्या असर होगा? बल्कि लगातार एक डर बना हुआ है कि राजनीतिक अस्तित्व के खतरे बाज़ार के मुकाबले माल के मुनाफे से कहीं अधिक बड़े और घातक साबित हो सकते हैं।

वैसे इस फिल्म की खासियत यही है कि वह बिना किसी का पक्ष लिए एक कहानी प्रस्तुत करती है जिसमें हर चरित्र की भूमिकाएं तय हैं।

ऐसा नहीं है कि पहले इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी गयी फिर उसे अभिनय के लिए चरित्र तलाशे गये बल्कि हुआ यह कि 16 दिसम्बर की घटना पर सर्वेक्षण करते हुए फिल्म की टीम जैसे-जैसे आगे बढ़ी उसे पसंदीदा और पूरी तरह एक मजेदार और जायकेदार उत्पाद बनने की जिज्ञासा नजर आई। इस पूरे फिल्म में आन्दोलन भी है। आक्रोश भी है और एक गरीब परिवार की दयनीय दशा दर्शाते हुए सामान्य माँ-बाप की बातें एक ख़ास जगह जाकर खत्म की गई है।

इस फिल्म में कई ऐसे उदाहरण अदाकारों ने दिए हैं। बिना अभिनय की दरकार के बावजूद फिल्म अपने मूल मकसद से कहीं भी भटकती नहीं है। निर्माता को यह मालूम है इसे कहाँ कैसे शुरू करना है और इसका अंत किस खूबसूरती से किया जाय। कम बजट में तैयार यह डाक्यूमेंट्री देखने लायक है। जिसे हर आदमी को देखना जरूरी है ताकि हर पहलू और असीम संभावनाओं को तलाशा जा सके। इसके प्रतिगामी परिणामों पर ख़ास नजर अभी सरकार के प्रतिबन्ध के बावजूद बनी हुई है।

समाज में यह फिल्म क्या सन्देश देगी इसे देखना एक मजेदार अनुभव होगा। जब एक घटना से प्रभावित माँ-बाप अपनी लाचारी और तंत्र की मार खाकर केवल एक उम्मीद लिए हाजिर हैं। वहीं अपराधी सजा ए मौत के बाद भी निश्चिन्त और तटस्थ दिखाई देता है। सरकार के भीतर अजब सी हलचल मची हुई है। देखने वाले लोगों के नजरिये का अभी बेसब्री से इन्तजार चल रहा है। अभी तो यकीनन प्रतिक्रियाओं की फुसफुसाहट शुरू हुई है। देखते हैं असल में इसके दूरगामी परिणाम पूरे  मामले को किधर ले जाते हैं। क्या बाज़ारतंत्र का फलसफा समाज पर हावी होगा या फिर राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई में कोई नया मोड़ आएगा।

समाप्त

डॉ. अनिल पुष्कर

About the author

अनिल पुष्कर कवीन्द्र, प्रधान संपादक अरगला (इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका)

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