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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मीडिया पर प्रभाव, ग़ायब हैं यथार्थ के चित्र और यथार्थ की ख़बरें

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मीडिया पर प्रभाव, ग़ायब हैं यथार्थ के चित्र और यथार्थ की ख़बरें

निष्पन्न अपराध है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

जगदीश्वर चतुर्वेदी

यह वर्चुअल युग है, यथार्थ और उसके समस्त संदर्भों के विध्वंस का युग है, इसमें अन्य या हाशिए के लोगों को मीडिया यथार्थ के बाहर खदेड़कर विध्वंस के हवाले कर दिया गया है।

मीडिया से ग़ायब हैं यथार्थ के चित्र और यथार्थ की ख़बरें

स्थिति बड़ी भयावह है लेकिन मीडिया में यथार्थ के चित्र और यथार्थ की ख़बरें ग़ायब हैं। मसलन्, सालाना हज़ारों औरतें दहेज और घरेलू हिंसा के ज़रिए मारी जा रही हैं, लेकिन उनकी चर्चा तक नहीं मिलती, लाखों किसान और मज़दूर ग़रीबी के कारण मर रहे हैं, वे खबर तक नहीं बन पा रहे हैं, अल्पसंख्यकों पर निरंतर हमले हो रहे हैं लेकिन अधिकांश को पुलिस बयान के आधार पर कभी-कभार अति सामान्य खबर के रुप में पेश करके दफ़्न कर दिया जाता है। इसके अलावा मेडीकल अपराध के कारण हर साल लाखों लोग मारे जा रहे हैं। लेकिन इस क्षेत्र की भी ख़बरें गायब हैं।

सवाल यह है यथार्थ ख़बरों से मीडिया क्यों भाग रहा है ?

हमारे चेहरे और शरीर पर प्लास्टिक सर्जरी का रंदा चल रहा है। व्यक्तिगत जैसी कोई चीज नहीं बची है। प्राइवेसी में सेंधमारी चल रही है, निगरानी चल रही है।

कहने के लिए हम सूचना क्रांति में दाख़िल हो चुके हैं लेकिन वस्तुत: सूचना के कचरे में डूबे हुए हैं। हमारे आसपास जो दुनिया बनायी गई है वह यथार्थ से कम और वर्चुअल यथार्थ से बनी ज्यादा है। सब चीज़ों में क्लोनिंग पद्धति दाख़िल हो गई है।

यथार्थ की हत्या का तंत्र बन गया है सूचना क्रांति के नाम पर विकसित समूचा ढाँचा

हमने 'विकास' के जयघोष की आड़ में "अन्य" को हाशिए पर डाल दिया है। साथ ही 'अन्य' पर हमले तेज़ कर दिए हैं। इसके लिए इंटरनेट, सोशलमीडिया,  मास मीडिया आदि का रीयल टाइम कम्युनिकेशन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। सूचना क्रांति के नाम पर विकसित समूचा ढाँचा समग्रता में यथार्थ की हत्या का तंत्र बन गया है। आज सच्चाई यह है कि कम्युनिकेशन ही यथार्थ और हाशिए के लोगों की हत्या का पूरक तंत्र बन गया है।

नए कम्युनिकेशन के परिदृश्य के प्रधान लक्षण ये हैं-

1. हाशिए के समुदायों का कम्युनिकेशन बंद ।

2.शत्रु के साथ बातचीत बंद।

3. अब किसी क़िस्म की नकारात्मकता मीडिया में नज़र नहीं आती, सिर्फ़ परम सकारात्मकता की ही इमेज वर्षा होती रहती है ।

4. अब अन्य नहीं है सिर्फ़ अस्मिता और भिन्नता है

5. अब भ्रम नहीं है,  बल्कि हायपर रियलिटी,  वर्चुअल रियलिटी है

6. अब गोपनीयता नहीं है बल्कि ट्रांसपरेंसी के नाम पर निगरानी है।

7. मीडिया में सुंदर सामाजिक जीवन का सपना ग़ायब है, उसकी जगह सुंदर वस्तुओं ने ले ली है। यानी मीडिया में अब भविष्य नहीं वस्तुओं का बोलबाला है।

यही वह परिप्रेक्ष्य है जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को निष्पन्न अपराध के रूप में निर्मित कर रहा है।

( वर्द्धमान विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा "सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिन्दी साहित्य" विषय पर 29 सितम्बर 2015 को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिए गए वक्तव्य का अंश)

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