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क्या महज सियासी औजार है महाभियोग ?

राकेश अचल

देश की सबसे बड़ी अदालत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग का इस्तेमाल सियासी हथियार नहीं बल्कि एक संवैधानिक प्रावधान है, इस हथियार का इस्तेमाल कांग्रेस ने पहली बार नहीं किया, कांग्रेस ने इसका विरोध भी किया, इसलिए इस भरम से महाभियोग को बाहर निकालना जरूरी है.

सबसे पहले तो ये जानना बहुत जरूरी है की महाभियोग राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के जजों को हटाने की एक प्रक्रिया है। इसका प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 61, 124 (4), (5), 217 और 218 में किया गया है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज पर कदाचार, अक्षमता और भ्रष्टाचार को लेकर संसद के किसी सदन में जज के खिलाफ महाभियोग लाया जा सकता है। देश में कम से कम पांच अवसरों पर इस संवैधानिक 'ब्रम्हास्त्र'का इस्तेमाल करने की कोशिश की गयी इसलिए ये कहना जनता को बेवकूफ बनाना है कि कांग्रेस महाभियोग का सियासी इस्तेमाल कर रही है.



कब होती है किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई ?

किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई तब की जाती है जब पानी सर के ऊपर से बहने लगता है. बीते चार साल में देश के सबसे विश्वसनीय माने जाने वाले न्यायतंत्र को उसके ही फैसलों ने संदिग्ध बनाया है और आज नौबत महाभियोग तक आ गयी है. और कांग्रेस आधा दर्जन विपक्षी दलों को साथ लेकर महाभियोग के लिए कमर कस कर खड़ी है. ये बात अलग है की कल इसका क्या होगा, कोई नहीं जानता.

ऐच्छिक है प्रस्ताव

महाभियोग प्रस्ताव यदि कांग्रेस का सियासी औजार होता तो कांग्रेस पार्टी भले ही 6 विपक्षी दलों को अपने साथ लाने में सफल हो गई हो, लेकिन बाकी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर वीरप्पा मोइली और पी. चिदंबरम जैसे वरिष्ठ नेता भी इस प्रस्ताव के विरोध में खड़े नहीं होते. महाभियोग प्रस्ताव पर कांग्रेस की ओर से राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह के भी साइन नहीं हैं. इसके अलावा कांग्रेस के जिन 51 सदस्यों ने इस प्रस्ताव पर साइन किए हैं उनमें से 6 पहले ही रिटायर हो चुके हैं. सपा की ओर से भी सांसद जया बच्चन, रेवती रमण और बेनी प्रसाद वर्मा के हस्ताक्षर भी इस प्रस्ताव पर नहीं हैं. इससे जाहिर है की ये प्रस्ताव ऐच्छिक है, इसमें कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की गयी है.

केवल हंसा जा सकता है जेटली के बयान पर

वित्तमंत्री अरुण जेटली ने विपक्षी दलों की ओर से लाए गए प्रस्ताव को रिवेंज पिटीशन करार दिया है. उन्होंने कहा कि महाभियोग का राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाn नहीं किया जाना चाहिए. साथ ही जेटली ने कहा कि जज लोया केस में कांग्रेस का प्रोपेगेंडा फेल साबित हुआ इसी वजह से बदले की भावना में चीफ जस्टिस के खिलाफ वह महाभियोग लेकर आई है. जेटली के बयान पर केवल हंसा जा सकता है, सवाल तो ये है कf महाभियोग के घेरे में उलझते दिख रहे मुख्य न्यायधीश के पक्षधर ये कहते क्यों दिखाई दे रहे हैं कि कांग्रेस राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला टालने के लिए सारा नाटक कर रही है, क्या भक्तमंडली को पता है कि कोर्ट राममंदिर के पक्ष में ही फैसला सुनाने वाला है ?

ईश्वर करे ये प्रस्ताव सदन में गिर जाये

मै ईश्वर से कामना करता हूँ कि इस महाभियोग को भी पहले की तरह अंजाम तक नहीं जाना चाहिए, या तो ये प्रस्ताव सदन में गिर जाये या फिर मुख्य न्यायाधीश अपने पद से इस्तीफा देकर नयी नजीर बनने से रोक दें। ऐसे पहले सुप्रीम कोर्ट के जज वी रामास्वामी के खिलाफ 1993 में महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया था लेकिन यह प्रस्ताव लोकसभा में गिर गया।

पहले कब आए महाभियोग प्रस्ताव ?

2011 में कोलकाता हाईकोर्ट के जज सौमेत्र सेन के खिलाफ महाभियोग लाया गया। लेकिन उन्होंने प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही पद से इस्तीफा दे दिया। सिक्किम हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी की गई, लेकिन प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। गुजरात हाईकोर्ट के न्याधीश जे.बी. पर्दीवाला के खिलाफ वर्ष 2015 में राज्यसभा के 53 सदस्य महाभियोग का प्रस्ताव लाए थे। नोटिस आरक्षण के मुद्दे पर आपत्तिजनक टिप्पणी और पाटीदार नेता हार्दिक पटेल के खिलाफ एक मामले में फैसले को लेकर पर्दीवाला के खिलाफ महाभियोग लाया गया। जैसे ही सदस्यों ने महाभियोग का नोटिस तत्कालीन राज्यसभा चेयरमेन हामित अंसारी को सौंपा, उसके कुछ घंटों बाद ही पर्दीवाला ने अपनी टिप्पणी वापस ले ली थी।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हाईकोर्ट के जज नागार्जुन रेड्डी पर एक दलित न्यायाधीश को प्रताड़ित करने के लिए पद का दुरुपयोग करने का आरोप था। जिसके बाद राज्यसभा के 61 सदस्यों द्वारा उनके खिलाफ महाभियोग लाया गया। लेकिन राज्यसभा के जिन 61 सदस्यों ने रेड्डी के खिलाफ महाभियोग शुरू करने का प्रस्ताव दिया था, उनमें से 9 सदस्यों ने अपने हस्ताक्षर वापस ले लिए थे और महाभियोग गिर गया।

आने वाले दिन देश की न्यायपालिका पर बहुत भारी हैं, देश के तमाम समझदार लोगों को इस संकट से न्यायपालिका को उबारने में मदद करना चाहिए. अग्निपरीक्षा के दौर से गुजर कर हमारी न्यायपालिका या तो और निखर कर सामने आएगी या फिर उसकी प्रतिष्ठा के लिए खतरे और बढ़ जायेंगे.

(राकेश अचल, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व इतिहासकार हैं। )

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