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ये पत्रकारिता का भक्ति-सेल्फ़ी काल है

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में प्रचंड बहुमत से राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के सत्तारूढ़ होने के बाद प्रभाष जोशी ने दीन हीन विपक्ष का जिक्र करते हुए पत्रकारिता और पत्रकारों से सजग और सक्रिय विपक्ष की भूमिका निभाने का आह्वान किया था

जयशंकर गुप्त

हमारे मित्र, वरिष्ठ पत्रकार अजय सेतिया ने अपनी टिप्पणी में सवाल किया है कि दिन रात प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना करने वाले पत्रकार हैं क्या?

उनकी यह फेसबुकिया टिप्पणी यहां हूबहू चिपकाते हुए अपना जवाब संलग्न कर रहा हूं। आप भी देखें।

अजय सेतिया की टिप्पणी:

"मैंने कल पहला सवाल यह उठाया कि दिन रात मोदी की आलोचना करने वाले पत्रकार हैं क्या ? मोदी की आलोचना में लगे रहने वालों ने काफी टिप्पणियां की है। ये वही लोग हैं जो मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले भी उन के विरोधी थे और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी विरोध जारी है। उन पर इस देश के जनादेश का कोई असर नहीं, क्योंकि न तो उन की लोकतंत्र में कोई आस्था है, न निष्पक्ष पत्रकारिता में और न ही न्यायपालिका में। क्योंकि वे अपने वैचारिक एजेंडे पर चलते हुए गोधरा कांड के बाद से मोदी का विरोध जारी रखे हुए हैं। न उन्होंने न्यायपालिका का सम्मान किया, न जनादेश का। इन सब के बावजूद वे खुद को निष्पक्ष पत्रकार कहलाना चाहते हैं।

मैंने यह सवाल उन लोगों से पूछा था, जो इस सब को देख रहे हैं। लेकिन चोर की दाढ़ी में तिनका की तरह मोदी विरोधी मेरे सवाल से परेशान हैं और उन्होंने प्रति सवाल किया है कि मोदी भक्ति करते रहने वाले पत्रकार हैं क्या ? तो मेरा जवाब है – नहीं। मोदी भक्ति भी निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं, जो इस समय रिपब्लिक कर रहा है, वह चीन के ग्लोबल टाइम्स जैसी पत्रकारिता है, जो सिर्फ सरकार की डुगडुगी बजाता है। और द वायर का मोदी विरोध किसी भी हालत में पत्रकारिता नहीं है।क्योंकि उस के सारे पत्रकार वामपंथी विचारधारा का पोषण करने वाले लोग हैं, जिन का एजेंडा मोदी के खिलाफ लिख कर कांग्रेस को लाभ पहुंचना है।

मेरा जवाब :

"अजय, बात बे बात सरकार और उसके प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों (चाहे वह किसी भी दल के हों या रहे हों) के सही गलत कार्यों का अंध समर्थन और उनके पक्ष में दुंदभि बजाना पत्रकारों और पत्रकारिता का धर्म या दायित्व कबसे बन गया! इसके लिए सरकारी प्रचार माध्यम सक्षम और समर्थ नहीं रह गए हैं क्या!

इससे पहले की सरकारों के बारे में हमने, आपने या आपकी ही भाषा बोल रहे हमारे कुछ अन्य मित्रों ने कितनी भक्ति दिखाई और प्रशस्तिगाथाएं लिखी या सुनाई थी। अपने बारे में कह सकता हूं कि हमने ऐसा कभी नहीं किया। आपने किया हो तो बताएं। आपको शायद स्मरण हो, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में 416 सांसदों के प्रचंड बहुमत से राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के सत्तारूढ़ होने के बाद वरिष्ठ संपादक प्रभाष जोशी ने दीन हीन विपक्ष (भाजपा के केवल दो ही सांसद चुन कर आए थे) का जिक्र करते हुए पत्रकारिता और पत्रकारों से सजग और सक्रिय विपक्ष की भूमिका निभाने का आह्वान किया था ताकि शासन और शासक निरंकुश नहीं हो सकें।

इस समय नक्कारखाने में तूती की आवाज सदृश चंद अपवादों को छोड़ दें तो बहुतायत मीडिया, मालिक, संपादक और पत्रकार प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों के जयघोष की दुंदुभि बजाने में समर्पित भाव से जुटे हैं, इनमें से अधिकतर 'सेल्फी' को ही अपनी तटस्थ पत्रकारिता का सर्टिफिकेट मानते हैं। शायद इसलिए भी कुछ लोग इसे मीडिया का 'चारणकाल'भी कहने लगे हैं।

ऐसे में अगर अपवादस्वरूप होने वाली असहमति और आलोचनाएं भी नागवार और नाबर्दाश्त होने लगें तो अफसोस ही होता है। अभी असहमति के स्वरों को किस तरह दबाया जा रहा है यह भी क्या बताने की जरूरत है। इसके बावजूद अगर इस तरह की टिप्पणियां करने से हमारे किसी या किन्हीं मित्रों का अभीष्ट सिद्ध होता है तो, हमें कुछ नहीं कहना। लगे रहें, आज नहीं तो कल…..

हस्तक्षेप मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। आप भी मदद करके इस अभियान में सहयोगी बन सकते हैं।

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