#BhimaKoregaonViolence : जिग्नेश और उमर खालिद से भाजपा और दक्षिणपंथी ताकतें असहज क्यों होती हैं ?

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जख्म दो सौ साल पुरानी जंग के

महाराष्ट्र के भीमा-कोरगांव में दो सौ साल पुरानी जंग पर जीत का जश्न, जातीय हिंसा में तब्दील हो गया।

1 जनवरी 1818 को पेशवा बाजीराव द्वितीय और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच युद्ध हुआ, जिसमें कंपनी की 8 सौ दलितों की फौज ने पेशवा के 28 हजार सैनिकों को हरा दिया था। ऊपरी तौर पर यह अंग्रेजों की पेशवा पर जीत थी, लेकिन ब्राह्मण पेशवाओं के खिलाफ दलित महारों ने युद्ध जीता था और तब से लेकर अब तक हर साल इस जीत को दलित बड़ी उपलब्धि की तरह मनाते हैं। इस बार महारों की जीत की 2 सौवीं वर्षगांठ थी, तो हजारों की जगह लाखों की भीड़ जुटी।

सनसवाडी गांव में अंग्रेजों द्वारा निर्मित विजय स्तंभ के चारों ओर भारी संख्या में दलित जुटे थे, लेकिन तभी कथित तौर पर कुछ दक्षिणपंथी अराजक तत्वों की ओर से पत्थरबाजी होने लगी और देखते-देखते हिंसा बढ़ने लगी। आज इस हिंसा की चपेट में महाराष्ट्र का बड़ा हिस्सा आ गया है। एक व्यक्ति की मौत के अलावा, सार्वजनिक और निजी संपत्ति का भारी नुकसान हुआ है। फड़नवीस सरकार ने फिलहाल न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं, उधर गुजरात के नवनिर्वाचित निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी और छात्रनेता उमर खालिद के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई है कि इनके भड़काऊ भाषणों के चलते हिंसा भड़की।

ताल ठोंकने वाले एक स्वनामधन्य पत्रकार ने तो जांच रिपोर्ट आने के पहले ही अपने ट्वीट में इन दोनों को अपराधी जैसा करार दिया है।

इन पत्रकार बंधु ने लिखा है कि कांग्रेस समर्थित जिग्नेश मेवाणी द्वारा समर्थित उमर ख़ालिद ने ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के अपने सपने को पूरा करने के लिए महाराष्ट्र में चाल खेल दी है। अबकी बार कश्मीर नहीं, दलित ढाल बने हैं।

काश कि जज बने ये पत्रकार वर्तमान की घटना पर त्वरित टिप्पणी का लोभ कुछ देर रोकते और इतिहास में झांकते तो उन्हें पता चलता कि कश्मीर हो या महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश हो या केरल, जाति के कारण तो भारत सदियों से टुकड़ों में बंटा हुआ है। जिन पेशवाओं पर जीत का उत्सव मनाया जा रहा था, उनकी छवि बाजीराव मस्तानी जैसी फिल्मों में जैसी दिखाई गई है, असल में वैसा नहीं था।

इतिहास बताता है कि छत्रपति शिवाजी की विरासत को आगे बढ़ाने वाले पेशवा दरअसल जाति व्यवस्था के मामले में उनके आदर्शों पर नहीं चल पाए थे। अपने ब्राह्मण होने पर उन्हें न केवल गर्व था, बल्कि इसके लिए वे दलितों को प्रताड़ित करने में बिल्कुल पीछे नहीं रहते थे।

उन्होंने पेशवाई कानून लागू किया था, जिसके मुताबिक अपवित्र जाति के लोगों को गले में हांडी और पीछे झाड़ू बांध कर चलना होता था, ताकि उनके थूक और पैरों के निशान से सड़क अपवित्र न हो जाए।

कुछ लोक कथाएं में यह भी बताती हैं कि दिन के समय दलितों को कई इलाकों से रेंगकर निकलना होता था, या किसी ब्राह्मण के सड़क से गुजरते समय जमीन पर लेट जाना होता था, ताकि उनकी छाया किसी पवित्र व्यक्ति पर न पड़े।

पेशवाओं ने अपने से पराजित राज्यों के साथ भी बहुत बुरा सलूक किया और महिलाओं का भी वह सम्मान नहीं किया, जो शिवाजी के वक्त होता था। ये तमाम वजहें अंग्रेजों के सामने उनका पतन का कारण बनीं।

महारों में अपने पूर्वजों के साथ हुए व्यवहार के प्रति नाराजगी भरी हुई है, जो इस तरह के आयोजनों से थोड़ी-थोड़ी बाहर आती है।

रहा सवाल इस बार भड़की हिंसा का तो इसकी पहली जिम्मेदारी महाराष्ट्र की सरकार की बनती है, क्योंकि उसकी आंतरिक सूचना व्यवस्था विफल हो गई या जानबूझकर स्थिति को बिगड़ जाने दिया गया

महाराष्ट्र में जातीय तनाव पहली बार नहीं हुआ है, फिर क्यों फड़नवीस सरकार ने उचित सावधानी नहीं बरती? इस कार्यक्रम में जिग्नेश मेवाणी, उमर खालिद के अलावा बाबा साहेब अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर और रोहित वेमुला की मां भी शामिल हुई थीं।

भाजपा और दक्षिणपंथी ताकतें इनसे असहज महसूस कर रही होंगी, क्योंकि ये बार-बार उन्हें चुनौती देने खड़े हो जाते हैं।

कोरेगांव में उमर खालिद ने न केवल दो सौ साल पुरानी लड़ाई के शहीदों को याद किया, बल्कि रोहित वेमुला, अखलाक और गौरी लंकेश की शहादत को भी याद दिलाया। उन्होंने अन्याय के खिलाफ बिना डरे आंदोलन का आह्वान किया। अगर लोकतांत्रिक देश में आंदोलन की बात करना देश के टुकड़े करने समान है, तो क्या अब बाबा साहेब अंबेडकर को भी इसका आरोपी माना जाएगा?

जिग्नेश मेवाणी ने इस आयोजन में आए लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की। इन दोनों की बातों से कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है, लेकिन इस हिंसा के लिए उन्हें सीधा जिम्मेदार ठहराना गलत है।

राहुल गांधी और मायावती दोनों ने इस घटना के लिए भाजपा और आरएसएस को जिम्मेदार ठहराया है। इस वक्त महाराष्ट्र और केंद्र दोनों जगह भाजपा ही सत्तारूढ़ है, इसलिए उन पर पलटवार करने या जिग्नेश, उमर आदि को जिम्मेदार बताने की बजाए उसे देश को संतोषजनक जवाब देना चाहिए।

देशबन्धु का संपादकीय