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चुप कर दी गईं गौरी लंकेश : क्या अब भी नहीं चेतेंगे प्रजातंत्रवादी

गौरी लंकेश की कलम को एक बुज़दिल की गोलियों ने चुप कर दिया है। जिन लोगों ने उन्हें मारा, उनमें इतनी भी हिम्मत नहीं है कि वे इसकी जवाबदारी लें। वे जानते हैं कि वे अपनी इस हरकत का औचित्य किसी भी व्यक्ति के सामने सिद्ध नहीं कर सकते, सिवाय चंद अति दक्षिणपंथी हिन्दू श्रेष्ठतावादियों के। इनमें निखिल दधीच जैसे लोग शामिल हैं, जिन्हें हमारे प्रधानमंत्री ‘फॉलो’ करते हैं। दधीच ने एक ट्वीट कर कहा कि गौरी की हत्या एक कुतिया की मौत है।

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कुछ लोग संपत्ति के लिए हत्या करते हैं, कुछ लोग धन के लिए, कुछ क्षणिक आवेग में आकर किसी को मौत के घाट उतार देते हैं तो कुछ बदला लेने के लिए खून बहाते हैं। जो लोग इन सब कारणों से हत्याएं करते हैं वे अपने अपराध को छिपाते हैं ताकि वे कानून के पंजे से बच सकें। वे कानून से भागने की कोशिश करते हैं। उनका प्रयास यही होता है कि उन्हें पहचाना और पकड़ा न जा सके।

गौरी की हत्या न तो धन के लिए की गई, न संपत्ति के लिए, न बदला लेने के लिए और ना ही क्षणिक आवेग में। युद्ध के दौरान सैनिक ऐसे लोगों को मारते हैं जिन्हें वे पहचानते भी नहीं हैं और जिनसे उनका कोई लेनादेना नहीं होता। गौरी किसी के साथ युद्धरत नहीं थीं। कुछ लोग वैचारिक कारणों से भी हत्या करते हैं। ऐसे लोग अपने कृत्य की जिम्मेदारी लेते हैं। माओवादी उनके द्वारा की गई हत्याओं की जिम्मेदारी लेते हैं। जब उन्होंने कंधमाल, ओडिसा में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या की थी, तब उन्होंने इसकी जिम्मेदारी ली थी। मुस्लिम आतंकी संगठन जब निर्दोर्षों की हत्या करते हैं तब भी वे उसकी जिम्मेदारी लेते हैं।

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इसके विपरीत, हिन्दू दक्षिणपंथी श्रेष्ठतावादी अपने कायराना हमलों की कभी जिम्मेदारी नहीं लेते – फिर चाहे वह सांप्रदायिक हिंसा भड़काना हो, बम विस्फोट करना हो या किसी व्यक्ति की हत्या। जब महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे नामक एक हिन्दू राष्ट्रवादी ने की थी तब उसने नकली दाढ़ी आदि लगाकर मुसलमान का भेष धरने करने का प्रयास किया था।

गोवा के मारगाव में 16 अक्टूबर, 2009 को दो व्यक्ति, जिनकी पहचान बाद में मालगोंडी पाटिल और योगेश नायक के रूप में हुई, विस्फोटकों से भरा एक थैला स्कूटर पर ले जा रहे थे। तभी थैले में रखे बम फट गए। उन्हें तुरंत गोवा मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया जहां बाद में दोनों की मौत हो गई। यह विस्फोट मारगाव के ग्रेस चर्च के नज़दीक हुआ, जहां उस समय एक धार्मिक कार्यक्रम चल रहा था।

पुलिस ने अपनी जांच में यह पाया कि इस विस्फोट के पीछे दक्षिणपंथी हिन्दू संगठन सनातन संस्था थी। परंतु सनातन संस्था ने इस घटना में अपना हाथ होने से इंकार किया। सनातन संस्था के एक सदस्य विनोद तावड़े पर नरेन्द्र दाभोलकर और गोविंद पंसारे की हत्या करने का आरोप है। इन दोनों हत्याओं की भी किसी संस्था ने जिम्मेदारी नहीं ली।

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गौरी लंकेश का मिशन

गौरी लंकेश, हिन्दू श्रेष्ठतावादियों और हिन्दुत्व की राजनीतिक विचारधारा की घोर विरोधी थीं। उनकी दृष्टि में हिन्दू धर्म, सामाजिक पदक्रम और जाति पर आधारित ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें दलित सबसे निचले पायदान पर थे और महिलाओं को दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता था। उन्होंने सूफी पवित्रस्थल गुरू दत्तात्रेय बाबा बुधान की दरगाह पर कब्जा करने के संघ परिवार के प्रयासों का विरोध किया था।

गौरी की यह राय थी कि बसवन्ना के अनुयायी, जो लिंगायत कहलाते हैं, हिन्दू नहीं हैं क्योंकि वे वेदों, उपनिषदों और हिन्दू धर्म के अन्य पवित्र ग्रंथों में विश्वास नहीं करते। गौरी ने साम्प्रदायिक राजनीति का विरोध करने के लिए कौमी सौहार्द वेदिके नामक संस्था की स्थापना की थी।

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गौरी, हिन्दू श्रेष्ठतावाद और संघ परिवार की विचारधारा की विरोधी थीं। वे उदारवादी और वामपंथी थीं। वे अभिव्यक्ति की आज़ादी की समर्थक थीं। उन्होंने तमिल लेखक पेरूमल मुरूगन का बचाव किया था, जिनपर हिन्दू दक्षिणपंथी ताकतें कटु हमले कर रही थीं। मुरूगन ने एक उपन्यास लिखा था जिसका शीर्षक था ‘वन पार्ट वूमन’। इस उपन्यास में यह दिखाया गया था कि एक संतानहीन हिन्दू दंपत्ति, संतान प्राप्ति के लिए विवाहेतर यौन संबंध स्थापित करते हैं।

गौरी ने कहा कि एसएल भईरप्पा नामक ब्राह्मण उपन्यासकार ने नियोग की प्रथा पर आधारित एक उपन्यास लिखा था जिसका शीर्षक ‘पर्व’ था परंतु उन पर हमला नहीं किया गया। इसके बाद, हसन ज़िला ब्राह्मण सभा ने एक रैली निकालकर मांग की कि पुलिस गौरी के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करे।

जो इस पागलपन में शामिल नही होगें वो मारे जाएंगे…

गौरी लंकेश पत्रिके में एक लेख छपा जिसमें यह आरोप लगाया गया कि भाजपा नेताओं प्रहलाद जोशी, उमेश दुषी, शिवानंद भट्ट और वेंकटेश मिस्त्री ने एक जौहरी के साथ एक लाख रूपए की धोखाधड़ी की है। यद्यपि यही आरोप कई अन्य अखबारों में प्रकाशित खबरों में भी लगाया गया था परंतु भाजपा नेताओं ने केवल गौरी लंकेश के खिलाफ मानहानि का प्रकरण दायर कर दिया। उनका लेख भाजपा के अंदर के स्रोतों द्वारा प्रदान की गई सूचना पर आधारित था। उन्होंने अपने स्रोत का नाम उजागर करने से इंकार कर दिया। उन्होंने यह आरोप लगाया कि उनके खिलाफ यह प्रकरण राजनीतिक कारणों से दायर किया गया है। गौरी को निचली अदालत ने दोषी करार दिया परंतु उन्हें यह उम्मीद थी कि वे ऊँची अदालतों में अपनी बेगुनाही सिद्ध कर देंगी।

गौरी लंकेश का कत्ल तर्कवादियों दाभोलकर, पनसारे और कलबुर्गी की हत्याओं की अगली कड़ी

गौरी, वामपंथी युवा कार्यकर्ताओं, जिनमें जिग्नेश मेवानी, कन्हैया कुमार, उमर खालिद और शैला रशीद शोरा शामिल थे, को अपने बच्चों जैसा मानती थीं और जब भी इनमें से कोई भी बेंगलुरू आता था, तो वे उसे अपने घर अवश्य आमंत्रित करती थीं। इस सबसे यह जाहिर है कि गौरी, हिन्दुत्व की राजनीति की विरोधी थीं और वामपंथी उदारवादी राजनीति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी। उनकी हत्या की निंदा करने वालों में माओवादी शामिल हैं। इसके विपरीत, हिन्दुत्व की राजनीति के पैरोकारों ने उनकी मौत पर ज़रा-सा भी गम जाहिर नहीं किया, उसकी आलोचना करना तो दूर की बात है। इसके विपरीत, कुछ भाजपा नेताओं ने इस हत्या का महिमामंडन करने का प्रयास किया।

कर्नाटक के भाजपा विधायक डीएन जीवराज ने टिप्पणी की कि अगर गौरी ने ‘‘आरएसएस के लोगों के कत्लेआम‘‘ की आलोचना की होती तो वे नहीं मारी जातीं। निखिल दधीच ने उनकी हत्या को एक कुतिया की मौत बताया। उनके भाई इंद्रजीत, जिन्होंने फरवरी 2005 में गौरी पर नक्सलवादियों के प्रति सहानुभूति रखने का आरोप लगाया था, ने कहा कि संभवतः माओवादियों ने उनकी हत्या की है।

 

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गौरी लंकेश की हत्या के निहितार्थ

गौरी की जान लेने के लिए बंदूक का ट्रिगर किसने दबाया और किसने ट्रिगर दबाने वाले को बंदूक उपलब्ध करवाई, यह जांच का विषय है। पुलिस हत्या की जांच कर रही है और इस विषय में हम कोई कयास लगाना नहीं चाहते। परंतु अगर उनकी हत्या संपत्ति या किन्हीं व्यक्तिगत कारणों से नहीं की गई है तब हमें इस निष्कर्ष पर पहुंचना ही होगा कि गौरी ने अपनी जान इसलिए गंवाई क्योंकि वे प्रजातंत्र, अभिव्यक्ति की आज़ादी, जातिगत, धार्मिक व लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार, और सबसे बढ़कर, मानवता की हामी थीं। उन्होंने कभी ऐसी प्रथाओं और परंपराओं पर प्रश्नचिन्ह लगाने में संकोच नही किया जो मानवता, समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ थीं। उनकी हत्या, उन सभी लोगों के लिए एक चेतावनी है जो इन मूल्यों के हामी हैं।

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कुछ समय पूर्व से लिंगायतों का एक तबका यह मांग करता आ रहा है कि उन्हें एक अलग धर्म के रूप में मान्यता दी जाए। इस वर्ष 19 जुलाई को कर्नाटक के बिदार जिले में लगभग पचास हजार लिंगायतों ने इस मांग के समर्थन में एक जुलूस निकाला था।

उनका कहना है कि लिंगायत और वीरशैव एक नहीं हैं। लिंगायत एक स्वतंत्र धर्म है जो बसवन्ना के वचनों अर्थात उनकी कविताओं पर आधारित है। गौरी इस मांग की समर्थक थीं।

एमएम कलबुर्गी भी लिंगायतों को एक अलग धार्मिक समूह के रूप में मान्य किए जाने के हामी थे। इसके विपरीत, हिन्दू श्रेष्ठतावादी, हिन्दुओं की एकता का नारा देते रहे हैं।

कलबुर्गी की हत्या 15 अक्टूबर, 2015 को की गई थी। गौरी की हत्या से यह साफ है कि उन सभी लोगों की जान खतरे में है जो यह मानते हैं कि लिंगायत एक अलग धर्म है और हिन्दू धर्म का हिस्सा नहीं है। कुछ अखबारों में छपी खबरों में यह बताया गया है कि प्रोफेसर कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्या जिन गोलियों से हुई वे एक-सी थीं – 7.65 मि.मी. की। गौरी की हत्या उन सभी लोगों को चुप कराने का प्रयास है जो अभिव्यक्ति की आज़ादी में आस्था रखते हैं और जो उन आस्थाओं, विश्वासों और परंपराओं का विरोध करते हैं, जो सभी व्यक्तियों की समानता और गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार और सामाजिक न्याय के विरूद्ध हैं।

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गत 12 सितंबर को गौर लंकेश के लिए न्याय की मांग को लेकर बैंगलुरू में जो रैली और सभा की गई उससे ऐसा लगता है कि उनकी हत्या से प्रजातंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी के समर्थक आतंकित नहीं हैं और वे अपनी बात कहना जारी रखेंगे। इस रैली में बहुत बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे, जिनमें प्रतिष्ठित शख्सियतें भी शामिल थीं। देश भर में इस नारे की गूंज सुनाई दी कि ‘मैं गौरी हूं, तुम गौरी हो, हम सब गौरी हैं’। ये नारे लगाने वाले हिंसा और असहिष्णुता की संस्कृति का विरोध कर रहे थे।

दिल्ली में भाजपा की सरकार आने के बाद से हिंसा में विश्वाश रखने वाले दक्षिणपंथी तत्वों की हिम्मत बहुत बढ़ गई है। इस सरकार के सत्ता संभालने के बाद से स्वामी असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा सिंह व अमित शाह को निर्दोष घोषित कर दिया गया और कर्नल पुरोहित और डीजी वंजारा जमानत पर रिहा हो गए हैं। ‘गोरक्षकों’ के दल सड़कों पर तांडव मचा रहे हैं।

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सन 2008 के मालेगांव बम धमाके में लोक अभियोजक रोहिणी सालियान ने एक साक्षात्कार में यह आरोप लगाया कि उन्हें यह निर्देष दिया गया था कि वे इस मामले में अभियोजन पक्ष की बात मज़बूती से न रखें। जब उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया तो उनकी जगह किसी अन्य व्यक्ति को इस मामले में लोक अभियोजक नियुक्त कर दिया गया।

मोहसिन शेख, जिसकी हत्या पुणे में एक सांप्रदायिक दंगे के दौरान कर दी गई थी, के माता-पिता चाहते थे कि उनके पुत्र के हत्यारों के खिलाफ चल रहे मुकदमे में रोहिणी लोक अभियोजक बनें। परंतु महाराष्ट्र सरकार ने उनकी यह मांग स्वीकार नहीं की और किसी अन्य व्यक्ति को लोक अभियोजक नियुक्त कर दिया गया।

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जो लोग गोहत्या के मुद्दे पर जुनून भड़का रहे हैं, जो लोग उन सभी व्यक्तियों को देशद्रोही बता रहे हैं जो हिन्दू श्रेष्ठतावादियों की सोच से असहमत हैं, जो लोग लवजिहाद के बेसिरपैर के आरोप लगा रहे हैं, जो लोग अन्यों को इस बात के लिए मजबूर करना चाहते हैं कि वे वंदेमातरम गाएं – उन लोगों के खिलाफ कार्यवाही करने में सरकारें संकोच कर रही हैं।

हाल में गोवा में हिन्दू जनजागरण समिति द्वारा आयोजित एक हिन्दू सम्मेलन में साध्वी सरस्वती ने ऐसा भाषण दिया जो स्पष्टतः भड़काऊ था और जिसके आधार पर उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता था। तब गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ने यह कहकर उनका बचाव किया कि उन्हें अपनी बात कहने की आज़ादी है! हिन्दू श्रेष्ठतावादी खुलेआम हथियार चलाने का प्रशिक्षण देने के शिविर आयोजित कर रहे हैं। घातक हथियारों को पवित्र प्रतीक बताकर लोगों में बांटा जा रहा है और प्रशिक्षार्थियों के दिमाग में यह भरा जा रहा है कि उन्हें उन सभी लोगों से घृणा करनी चाहिए जो उनसे सहमत नहीं हैं।

असहिष्णुता के इस वातावरण में जब कुछ संगठन लोगों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देंगे तब क्या हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि वे कानून का पालन करेंगे। सरकार की ढिलाई से ऐसे तत्वों की हिम्मत बढ़ती है और वे गौरी लंकेश जैसे लोगों की हत्या करने क दुस्साहस कर पाते हैं।

संघ संस्कृति की उपज है गौरी लंकेश की हत्या

बौद्धिकता का विरोध

इस समय देश में बौद्धिकता-विरोधी वातावरण व्याप्त है। विश्वविद्यालयों को राष्ट्रविरोधियों का अड्डा बताया जा रहा है। एक भाजपा विधायक हर सुबह जेएनयू परिसर में लगे डस्टबिनों में पड़े कंडोमों को गिनने जाते हैं।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के नए कुलपति, जिन्हें भाजपा सरकार ने नियुक्त किया है, ने यह सुझाव दिया है कि विश्वविद्यालय के केम्पस में एक टैंक रखा जाए ताकि विद्यार्थियों में देशभक्ति की भावना बढ़ सके। आईआईटी चैन्नई में अंबेडकर-पेरियर स्टडी सर्किल पर प्रतिबंध लगा दिया गया। ये बौद्धिकता-विरोधी दृष्टिकोण के कुछ उदाहरण हैं।

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कुछ चुनिंदा परंपराओं का महिमामंडन किया जा रहा है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति – जो किसी भी देश की उन्नति के लिए महत्वपूर्ण हैं, के स्थान पर अतीत पर गर्व करने को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। अतीत को जानने-समझने में कोई बुराई नहीं है परंतु अगर हम केवल गुज़रे हुए कल में जीते रहेंगे तो हम पिछड़े और दकियानूसी बन जाएंगे।

ऐसा कहा जा रहा है कि भारत दो हजार साल भी बहुत प्रगति कर चुका था। रामायण और महाभारत काल में प्लास्टिक सर्जरी थी और मिसाइलें भीं। अतीत पर गर्व एक ऐसा हथियार है जिसका इस्तेमाल विशेषाधिकार संपन्न लोगों को सुरक्षित रखने और भूखे-नंगों को चमत्कृत रखने में किया जाता रहा है।

जानिए असल वजह, क्यों की गयी गौरी लंकेश की हत्या

हमें क्या करना चाहिए

गौरी लंकेश की हत्या ने उन प्रजातांत्रिक ताकतों को एक किया है जो उदारवादी मूल्यों, संस्कृति के प्रजातांत्रिकरण और जातिगत व लैंगिक समानता के हामी हैं। इस एकता को आगे बनाए रखना होगा।

गौरी लंकेश को न्याय दिलवाना हम लोगों का पहला प्रयास होना चाहिए। चूंकि दाभोलकर, कलबुर्गी और पंसारे के हत्यारे नहीं पकड़े गए इसलिए उन लोगों की हिम्मत बढ़ गई और उन्होंने गौरी लंकेश को मौत के घाट उतार दिया। अगर गौरी लंकेश के हत्यारों को नहीं पकड़ा गया तो इस तरह की हत्याएं आगे भी होती रहेंगी।

गौरी लंकेश असुर संस्कृति की अनार्य सभ्यता की द्रविड़ प्रवक्ता थीं, इसीलिए उनका वध हुआ

 

दूसरे, हमें हत्या और हिंसा के इस ढांचे को तोड़ना होगा। इस ढांचे के नटबोल्ट हैं घृणा फैलाने वाले भाषण और वे प्रशिक्षण शिविर, जिनमें लोगों को हथियारों का उपयोग करना सिखाया जाता है और उनके दिमाग में अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष रूप से यह ज़हर भरा जाता है कि अल्पसंख्यक, राष्ट्रविरोधी हैं।

इस देश में केवल पुलिस और सेना को देश की रक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए हथियारों का इस्तेमाल करने का अधिकार है। किसी अन्य नागरिक को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता।

हमें सरकार पर यह दबाव बनाना होगा कि वह यह सुनिश्चित करे कि ऐसे लोगों के हाथों में बम व पिस्तौलें न पहुंचे जो किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं।

सुन लो ! नहीं बनेगा भारत पागल हत्यारों का देश – हम सब हैं गौरी लंकेश

तीसरे, हमें हमारे देश की समतावादी परंपराओं और मूल्यों को पुनर्जीवित करना होगा और उनका प्रचार करना होगा। हमें बसवन्ना, रविदास, कबीर, बाबा फरीद, बुल्लेशाह, मीराबाई, मुक्ताबाई, तुकाराम और नरसी मेहता जैसे लोगों के विचारों को आमजनों तक पहुंचाना होगा। हमें चार्वाक, आजीवक, जैन और बौद्ध दर्शन का प्रचार करना होगा। ये सभी दर्शन तार्किकतावादी हैं।

चौथे, हमें लोगों को यह समझाना होगा कि यह देश, जो एक उपमहाद्वीप के आकार का है और जिसमें अनेक भाषाएं बोलने वाले, कई धर्मों को मानने वाले और कई परंपराओं के वाहक हैं, उसे एकसार नहीं बनाया जा सकता। इसकी विविधता को जिंदा रखना होगा। हमें स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के संवैधानिक मूल्यों के आधार पर समाज का संचालन करना होगा। हमारा संविधान यह कहता है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना और सांझा संस्कृति को स्वीकार करना नागरिकों का मूल कर्तव्य है।

देश कभी हत्यारों से न तो बनता है और चलता है, लोकतंत्र को हम कत्लघर में तब्दील होने नहीं देंगे

पांचवां हमें अपनी संस्कृति का प्रजातांत्रिकरण करना होगा। हमारी कुछ परंपराएं, विशेषकर ब्राह्मणवादी परंपराएं जो जाति-आधारित पदक्रम और पितृसत्तामकता को औचित्यपूर्ण ठहराती हैं, हमारे संवैधनिक मूल्यों के खिलाफ हैं। हाल में उच्चतम न्यायालय ने तुरतफुरत मुंहज़बानी तलाक को गैरकानूनी घोषित किया। यह एक अत्यंत स्वागतयोग्य निर्णय है। हमें इसी दिशा में आगे बढ़ना होगा।

यदि हमें प्रजातंत्र और स्वतंत्रता को जिंदा रखना है तो हमें हमेशा सचेत रहना होगा।

-इरफान इंजीनियर

(मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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