योग इवेंट हर बार करोड़ों रूपये कारपोरेट घरानों के पॉकेट में पहुँचा देता है

Jagadishwar Chaturvedi

21 जून अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस, June 21 International Yoga Day

नए भारत में योग, राजनीतिक हथियार है, सत्ता की राजनीति का अंग है। भारत के प्राचीन-मध्यकालीन इतिहास में योग कभी सत्ता का औजार नहीं बना, सत्ता के प्रचार और साम्प्रदायिक प्रचार का उपकरण कभी नहीं बना।

ज्ञान से उपभोग में योग का रूपान्तरण-

मैं योग दिवस (June 21 International Yoga Day) के पक्ष में हूँ !! मैं बाबा रामदेव (Baba Ramdev) आदि के भी पक्ष में हूँ! क्योंकि इन लोगों ने योग को मासकल्चर का अंग बना दिया, कल तक योग, कल्चर का अंग था।

मैं बाबा रामदेव और मोदीजी से बहुत ख़ुश हूँ कि उन्होंने योग को ग्लोबल ब्राण्ड (Global Brand) बना दिया। पूँजीवादी विरेचन का हिस्सा बना दिया। उसे एक माल बना दिया।

पहले योग ज्ञान का अंग था, इन दिनों उपभोग का हिस्सा है। यह योग के महापतन की सूचना है।

योग आज कारपोरेट मुनाफा संस्कृति (Corporate profit culture) का एक आकर्षक माल है। हम इस प्रश्न पर विचार करें कि योग के वस्तुकरण से हिंदू परंपरा का लाभ हुआ या नुकसान ?

योग करने के कई फ़ायदे हैं जिनको योगीजन टीवी पर बता रहे हैं। लेकिन सबसे बडा फ़ायदा है कि वह अब सरकारी फ़ैशन, वोट पाने का नारा, सरकारी जनसंपर्क और सरकारी जुगाड़ का अंग बन गया है।

योग आसन था लेकिन अब योग शासन और मुनाफा है।

पहले योग स्वैच्छिक था, आज माल है, कल अनिवार्य होगा!

केन्द्र सरकार से लेकर तमाम देशी -विदेशी सरकारों तक योग अब शासन का अंग है।

यूएनओ कोई जनसंगठन नहीं है वह सत्ताओं का संगठन है। योग को 117 देशों का समर्थन है योग अब आसन नहीं शासन की क्रिया है!

पतंजलि के योग को हिंदू समाज और उसके विद्वान सैंकड़ों साल पहले ठुकरा चुके थे, जिसे समाज खारिज कर चुका था उसे फिर से थोपने की कोशिश की जा रही है। कमाल का है हिंदू समाज,मुर्दों में प्राण फूंकने के ढोंग में माहिर !

जिस तरह फ्रिज का प्रचार होता है वैसे ही और उसी पद्धति से योग का मीडिया प्रचार चल रहा है। हमने फ्रिज खरीदा अब योग भी खरीदें !

एम्स के निदेशक ने कभी बीमारियों से बचने के लिए कोई एडवायजरी मीडिया में जारी नहीं की, यदि जारी भी की हो तो मीडिया ने कवरेज नहीं दिया, लेकिन योग से किन-किन बीमारियों में फायदा पहुँच सकता है उसका आज मीडिया कवरेज चौंकाने वाला है, साथ ही इस बात का प्रमाण है कि किस तरह सत्ता के दवाब में विज्ञान और विज्ञानचेतना पर हमले किए जा रहे हैं।

योग के नाम पर सिरों की गिनती हो रही है, इतने लोगों ने योग किया। सिरों की गिनती की फासिस्ट कला है। बाजार में ब्राण्ड प्रमोशन की कला है। इतने लोग मान रहे हैं, तुम भी मानो, इतने लोग इस्तेमाल कर रहे हैं तुम भी इस्तेमाल करो। यह नए किस्म की भेड़चाल है।

योग के प्रचार और इवेंट पर जितना पैसा खर्च किया जा रहा है उतना यदि चिकित्सा सुविधाएं पहुँचाने और पार्क बनाने पर खर्च किया जाता तो देश का ज्यादा भला होता। हरबार योग इवेंट करोडों रूपये कारपोरेट घरानों के पॉकेट में पहुँचा देता है।

वाम का नारा बेकारों को काम दो, मोदी का नारा है-बेकारों को राम दो।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

    About the Author

    प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी
    प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी - प्रोफेसर एवं पूर्व अध्यक्ष हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय, कोलकाता, स्वतंत्र लेखन और स्वाध्याय।