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यह सरकार खुद इतनी अराजक है कि सारा देश इसे अराजक दिखता है : सरकार के दबाव में ‘जुटान’ रद्द

25 जून को गया में ‘जुटान’ के होने वाले कार्यक्रम को सरकार के दबाव में हमें मजबूरन स्थगित करना पड़ रहा है। ख़ुफ़िया सूचना के आधार पर दिल्ली से पहुंचे विजिलेंस के लोगों ने वहां पूछताछ का सघन अभियान चलाकर भय का ऐसा माहौल बनाया कि इस कार्यक्रम को लेकर बात करने में लोग घबड़ाने लगे। उनका पहला आरोप था कि इस कार्यक्रम में माओवादियों के आने की सूचना है, दूसरा आरोप था कि कार्यक्रम करने वाले लोग अराजक तत्व हैं और तीसरा आरोप था कि इसमें दिल्ली से साहित्यकार लोग आ रहे हैं। इन तीन बेबुनियाद आरोपों के आधार पर उनलोगों ने पूछताछ शुरू की और सबसे पहले बेहतरीन शायर खुर्शीद अकबर के पास गए जो गया में सरकारी अधिकारी भी हैं। उन्होंने कार्यक्रम के लिए सहयोग राशि के तौर पर दस हज़ार रूपए दिए थे। उनका सवाल था कि ऐसे लोगों को आपने चंदा क्यों दिया। वे हंस के संपादक संजय सहाय के पास पहुंचे कि उन्होंने अच्छी तरह से पड़ताल किए बिना कार्यक्रम के लिए अपना हॉल रेनेशां उन्हें क्यों किराए पर दिया। आयोजन समिति के प्रमुख सदस्य कवि सत्येंद्र कुमार ने बताया कि रात साढ़े ग्यारह बजे भी पूछताछ करने वालों के कॉल उनके पास आने लगे। परिवार के सदस्यों की नींद हराम हो गई।

आखिर क्या जानना चाहते थे वे ? किसे कह रहे थे वे अराजक तत्व ? कार्यक्रम में शामिल होने वाले जिन लोगों के नाम निमंत्रण पत्र पर छपे थे वो हैं – मंगलेश डबराल, असद ज़ैदी, जय प्रकाश कर्दम, आलोक धन्वा, हृषिकेश सुलभ, राणा प्रताप, संजय सहाय, अवधेश प्रीत, संध्या नवोदिता, निवेदिता शकील, अनुज लुगुन, रणेन्द्र, शम्भू बादल, अमिताभ बच्चन, निर्मला पुतुल, तैयब हुसैन, सुरेश कांटक, सुधीर सुमन, बलभद्र, हसन इमाम, विनोद शंकर, अर्जुन प्रसाद सिंह, कृष्ण कुमार, असीम सत्य, शैव अफसह ज़फर, के के नारायण, शम्भू विश्वकर्मा और रंजीत वर्मा। अब बताएं वो कि कौन हैं इनमें अराजकता फैलाने वाले लोग ? कौन हैं इनमें माओवादी ? उनका कहना था कि बड़ी संख्या में यहां माओवादी इकठ्ठे हो रहे हैं।

दरअसल यह सरकार खुद इतनी अराजक है कि सारा देश इसे अराजक दिखता है। विपक्षविहीन सत्ता की चाहत इसे इतनी ज्यादा निरंकुश बनाती जा रही है कि संविधान का खुद इस सरकार के लिए कोई मतलब नहीं रह गया है। चाहे वह संविधान की प्रस्तावना हो या संविधान का तीसरा अध्याय हो। इसलिए इस सरकार के लिए न तो धर्म-निरपेक्षता का कोई मतलब है और न देश के अर्द्ध-संघात्मक स्वरूप से ही इसको कोई लेना-देना है। इनके लोग इस तरह राज्यों में प्रवेश करते हैं जैसे सब कुछ उनके अधीन हो और राज्य मशीनरी का काम सिर्फ और सिर्फ उनके आदेश का पालन करना हो। फिर वहां की सरकारें किस लिए हैं ? राज्य सरकार को बिना विश्वास में लिए केंद्र सीधे कार्रवाई में नहीं उतर सकता।यह असंवैधानिक है। और अगर राज्य सरकार की सहमति से वहां गया में छानबीन चल रही थी तो लालू किस बात पर यह गुमान पाले हुए हैं कि नीतीश उनके साथ हैं। क्या अब भी सीना ठोककर वे कह सकते हैं कि यहां भाजपाइयों को उन्होंने पटखनी दी है !

अगर केंद्र की खुफिया एजेंसी को यह खबर थी कि यहां माओवादी या नक्सलाइट जमा हो रहे हैं तो उसे चाहिए था कि वह कार्यक्रम होने देती और जब सब जमा हो जाते तो आकर सबको दबोच लेती। लेकिन वे जानते थे कि ऐसा कुछ होने नहीं जा रहा है इसलिए उन्होंने इसका सिर्फ बहाना बनाया और पूछताछ कर ऐसा दहशत भरा माहौल पैदा किया कि स्थानीय आयोजकों की टीम दो लाइनों पर सोचने लगी। एक लाइन थी कि कार्यक्रम स्थगित कर दिया जाए जबकि दूसरी लाइन थी कि कार्यक्रम हो चाहे इसके लिए जो कुछ भी करना पड़े।

सरकार की इस पूरी कार्रवाई को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले के तौर पर देखा जाना चाहिए। यह लिखने पढ़ने वालों पर एक हमला था ठीक वैसा ही असंवैधानिक, फासीवादी और नृशंस हमला जैसा हमला यह सरकार किसानों पर, मजदूरों पर, छात्रों पर अपने शुरूआती दिनों से ही करती चली आ रही है। यह बुद्धिजीवियों को बोलने नहीं देना चाहती, यह छात्रों को पढ़ने नहीं देना चाहती, यह किसानों को अन्न नहीं देना चाहती, यह मजदूरों को मजदूरी नहीं देना चाहती। यह मुसलमानों, आदिवासियों और दलितों के निजी जीवन में दमनकारी ढंग से प्रवेश करती है और समाज से काटकर उन्हें अलग-थलग करने की कोशिश करती है। इस तरह यह देश तोड़ने की साजिश रचती है।

इस जनविरोधी सरकार के खिलाफ हम सबके एकजुट होने का समय आ गया है। अकेले अकेले रहकर इस सरकार का सामना नहीं किया जा सकता अत: हम यह अपील करते हैं कि हम सब एक व्यापक गोलबंदी की ओर बढ़ें और फासीवादी माहौल बनाने की जो कोशिश की जा रही है उसे ध्वस्त कर दें ताकि हो रहे हमले से लोकतंत्र की रक्षा संभव हो सके।

अत: हम कड़े से कड़े शब्दों में इस पूरी कार्रवाई की निंदा करते हैं और आप सबसे अपील करते हैं कि सक्रिय हस्तक्षेप करने के और क्या तरीके हो सकते हैं इस पर विचार करें और सबको अपने साथ लेने की कोशिश करें।

यहां अंत में यह बता देना जरूरी है कि कार्यक्रम वाले दिन यानि कि पच्चीस जून यानि कि आज सरकार की इस फासीवादी रवैये के खिलाफ गया में एक प्रतिरोध मार्च निकाला जा रहा है। उम्मीद है कि इस प्रतिरोध मार्च में तीन सौ से चार सौ के बीच लोग उपस्थित रहेंगे। सबसे खुशी की बात तो यह कि संघर्ष के मोर्चे पर डटे किसान और छात्र बड़ी संख्या में शामिल होंगे। साथ में कवि-लेखक, पत्रकार, प्रोफेसर, ऐक्टिविस्ट भी पर्याप्त संख्या में मौजूद रहेंगे। यह मार्च गया स्टेशन रोड से शुरू होकर अम्बेडकर पार्क पहुंचेगा जहां यह रैली सभा में बदल जाएगी।

हस्ताक्षरकर्ता –

वरवर राव, आलोक धन्वा, मंगलेश डबराल, असद ज़ैदी, आनंद स्वरुप वर्मा, पंकज बिष्ट, रविभूषण, अरुण फरेरा, सुधीर ढाबले, गौहर रजा, बल्ली सिंह चीमा, नूर जहीर, देवी प्रसाद मिश्र, चौथी राम यादव, अशोक भौमिक, वीरेंद्र यादव, ह्रषिकेश सुलभ, अवधेश प्रीत, स्वप्नील श्रीवास्तव, सुभाष गताड़े, संजय सहाय, रामजी राय, सुरेश कांटक, कबीर कला मंच, नूर मोहम्मद नूर, रामकुमार कृषक, अर्जुन प्रसाद सिंह, मुशर्रफ अली, कौशल किशोर, बलभद्र, एम जेड खान, सियाराम शर्मा, अमिताभ बच्चन, आनंद तेलतुंबड़े, जिग्नेश मेवानी, शंभुनाथ, हिमांशु कुमार, मदन मोहन, फैसल अनुराग, शंभु बादल, कात्यायनी, अनवर शमीम, जीतेंद्र भारती, शीतल साठे, वाजदा खान, कविता कृष्णपल्लवी, मिथिलेश सिंह, निवेदिता शकील, निर्मला पुतुल, अभिषेक श्रीवास्तव, संध्या नवोदिता, प्रीति सिन्हा, सत्यनारायण पटेल, संजीव माथुर, रामजी यादव, प्रकाश श्रीवास्तव, जीतेंद्र कुमार, हैदर रिजवी, देश निर्मोही, सीमा आजाद, अमलेंदु उपाध्याय, अनिल अंशुमन, भगवान स्वरूप कटियार, सुधीर सुमन, शिल्पी रवीन्द्र, संतोष सहर, मनोज मोहन, अपर्णा, विपिन चौधरी, सुप्रिया अम्बर, योगेश प्रताप शेखर, जमीर अहमद, सौरभ बाजपेयी, सत्यनारायण, प्रकाश उप्रेती, अजहर खान, बबिता केशरवाणी, मयंक सक्सेना, नसीर अहमद, अजय प्रकाश, शिव इंद्र, मसाउद अख्तर, ललित फुलारा, हसन इमाम, कृष्ण कुमार, असीम सत्य, शैव अफसह जफर, के के नारायण, इंदर बेलाग, राजीव कार्तिकेय, निशांत, तैयब हुसैन, अजित साहनी, राजविन्दर मीर, अनुज लुगुन, शंभु विश्वकर्मा, विनोद शंकर, संजय श्याम, मजकूर आलम, नित्यानंद गायन, रंजीत वर्मा।

क्रांतिकारी कवि वर वर राव की सहमति लेने के लिए जब उनके पास यह बयान भेजा गया तो उन्होंने अपनी सहमति के साथ एक टिप्पणी भेजी जो निम्नलिखित है –

At the outset I strongly condemn the undemocratic act of the Bihar state government and the central government in creating situation of state terror and compelling forcibly to cancel the programme – the organisers – themselves.

The organisers should have asked what if the people with maoist conviction attend the programme and put their point of view. Third paragraph in the statement that way is in defence self restricting broad unity particularly against fascist state will become if we exclude revolutionary forces.

in a revolutionary solidarity

(Release)

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